अयोध्या फैसला देने वाले जज अब्दुल नज़ीर को राज्यपाल बनाए जाने के पीछे की कहानी क्या है?
क्या इस तरह की नियुक्ति से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ख़तरा है?

तारीख 12 फरवरी, छुट्टी का दिन रविवार. हमारे-आपके लिए छुट्टी होती है, मगर राजनीति तो 365 दिन काम करती है. सो सुबह-सुबह ही एक खबर आई कि महाराष्ट्र, असम, बिहार, हिमाचल प्रदेश समेत 12 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में नए राज्यपाल और उपराज्यपाल की लिस्ट आई है. आप जानते हैं कि केंद्र सरकार की अनुशंसा पर राष्ट्रपति, राज्यपालों की नियुक्ति करते हैं. मतलब ये विशुद्ध राजनीतिक नियुक्ति होती है. 13 लोगों के नाम वाली लिस्ट में छठे नंबर के नाम पर सबकी निगाह टिक गई. शूचिता और नैतिकता का लाल गोला भी इसी नाम के सामने लग गया. नाम- जस्टिस अब्दुल नज़ीर, नियुक्ति आंध्र प्रदेश के राज्यपाल.
सुप्रीम कोर्ट के एक जज जिनको रिटायर हुए अभी डेढ़ महीना भी नहीं हुआ था, वो जज जिन्होंने अयोध्या, ट्रिपल तलाक जैसे अहम फैसले दिए. उनको इस तरह और इतनी जल्दी राज्यपाल का पद मिलना, कई सवाल उठा गया. उनके फैसलों और राजनीतिक पद को एक तराजू में रखकर तौलकर देखा जाने लगा.
बचपन में हम अेट्टीज, नाइनटीज की फिल्मों में देखते आएं हैं. जब भी कोर्ट रूम का सीन आता था तो कैमरा न्याय की देवी को जरूर दिखाता. मान्यताओं में न्याय की देवी का कॉन्सेप्ट मिस्र की देवी माट से आया. माट को मिस्र की समरसता, न्याय, कानून और शांति व्यवस्था की विचारधारा का प्रतीक माना जाता है. जिनके एक हाथ में तराजू और एक हाथ में तलवार होने के साथ आंखों में पट्टी बंधी होती है. इसे देखकर कहा गया. कानून अंधा होता है. इसका मतलब ये कि नहीं उन्हें कुछ दिखता नहीं. मतलब ये होता है कि जिस तरह ईश्वर सभी को बिना भेदभाव किए एक समान रूप से देखते हैं, उसी तरह न्याय की देवी भी देखती हैं. बिना किसी का चेहरा या प्रभाव को देखते तराजू पर तथ्य और सत्य को बिना किसी अपेक्षा के निरपेक्ष भाव से तौला जाता है.
जस्टिस नजीर के राज्यपाल बन जाने के बाद न्याय के इसी निरपेक्ष भाव पर सवाल उठ रहे हैं. खासकर कि बीजेपी की विरोधी पार्टियों की तरफ से. सवाल, जवाब की तरफ बढ़ें, उससे पहले आप जस्टिस नजीर के कुछ महत्वपूर्ण मुकदमों और फैसलों पर नजर डालिए. जस्टिस नजीर 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट से पदोन्नती पाकर सुप्रीम कोर्ट आते हैं. करीब 5 साल के कार्यकाल में 5 बड़े फैसलों में शामिल होते हैं. कौन से फैसले बताते हैं...
1. 2018 में ट्रिपल तलाक पर फैसला देने वाली 5 जजों की पीठ का हिस्सा थे. 3-2 से आए फैसले में जस्टिस नजीर ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक नहीं माना था. जबकि तीन जजों ने ट्रिपल तलाक पर रोक लगाते हुए असंवैधानिक करार दिया था.
2. 2018 के बरस ही जस्टिस नजीर ने केएस पुट्टीस्वामी मामले में भी फैसला दिया, जिसमें उन्होंने प्राइवेसी यानी निजता को मौलिक अधिकार माना था.
3. 2019 में ऐतिहासिक अयोध्या मामले में 5 जजों की खंडपीठ का हिस्सा थे. जिसमें राम मंदिर के पक्ष में फैसला आया.
4. उन्होंने उस संविधान पीठ का भी नेतृत्व किया, जिसके फैसले ने ये स्थापित कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 19 के खंड (2) में बोलने के अधिकार को ले कर जो कुछ अतिरिक्त रोक लगाई गई हैं, वो मंत्रियों और विधायकों के स्वतंत्र भाषण के अधिकार पर नहीं लगाई जा सकतीं. अनुच्छेद 19 हमें बोलने की आज़ादी देता है, वहीं 19(2) प्रशासन और सरकार को ये ताकत भी देता है कि देश की आवाम की सुरक्षा और शांति को कायम रखने के लिए फ़्री स्पीच के प्रावधान पर कुछ हद तक रोक भी लगा सके.
5. रिटायरमेंट से ठीक पहले उन्होंने नोटबंदी पर फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने नोटबंदी को सही माना था.
इन सब को ध्यान रखते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि किसी रिटायर्ड जज का राज्यपाल बनना न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करता है. सैद्धांतिक रूप से विरोध करते हुए कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. और विरोध के लिए बीजेपी के दिवंगत नेता अरुण जेटली के उस बयान को कोट किया. जिसमें उन्होंने कहा था,
"रिटायर होने के बाद, नौकरी पाने के मक़सद से रिटायर होने से पहले फ़ैसले लिखे जाते हैं. ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ख़तरा है."
विपक्षी होने के नाते कांग्रेस ने सवाल किया तो जवाब बीजेपी की तरफ से भी आया. कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने ट्वीट कर लिखा,
"राज्यपाल की नियुक्ति पर एक बार फिर से पूरा इको सिस्टम एक्टिव है. उन्हें बेहतर तरीके से यह समझना चाहिए कि वे अब भारत को अपनी निजी जागीर नहीं मान सकते. अब भारत संविधान के नियमों के अनुसार चलेगा."
राजनीति के आरोप-प्रत्यारोप से इतर, सवाल तो न्याय व्यवस्था का है. जिसपर बीते 24 घंटे से खूब चर्चा हो रही है. सोशल मीडिया पर जस्टिस नज़ीर के बहाने अयोध्या फैसले पर सबसे ज्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं. ये उन 5 जजों की ऐतिहासिक तस्वीर है, जिसे अयोध्या फैसले के बाद खींचा गया था. बारी-बारी से इनके बारे में जान लेते हैं. और ये भी फिलवक्त किस पद पर हैं ?

सबसे बीच में पूर्व चीफ जस्टिस रहे रंजन गोगोई हैं.
>>जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर, 2019 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में रिटायर हुए. चीफ जस्टिस रहते हुए इन पर यौन शोषण के आरोप लगे थे, लेकिन बाद में मामला खत्म हो गया.
>>रिटायरमेंट के चार महीने बाद उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा में संसद सदस्य के रूप में नियुक्त करने के लिए नामित किया. फिलहाल वो राज्यसभा के सदस्य हैं.
सबसे बायीं तरफ जस्टिस अशोक भूषण हैं.
>>अशोक भूषण जुलाई 2021 में सुप्रीम कोर्ट जज के पद से रिटायर हुए.
>>चार महीने बाद, नवंबर 2021 में उन्हें राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया. NCLAT प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल चार साल का है. ये नियुक्ति भी केंद्र सरकार की तरफ से हुई.
बायें से दूसरे नंबर
>> शरद अरविंद बोबडे. 23 अप्रैल, 2021 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए. सुप्रीम कोर्ट में उनका आठ साल का कार्यकाल था.
-रिटायर होने के बाद से उन्होंने कोई आधिकारिक सार्वजनिक पद नहीं संभाला.
रंजन गोगोई की दायीं तरफ
डी वाई चंद्रचूड़. जो फिलवक्त देश के मुख्य न्यायधीश हैं. नवंबर 2022 में भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी.
-उनका कार्यकाल दो साल का यानी नवंबर 2024 तक रहेगा.
और सबसे आखिर में जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर जो जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट जज के पद से रिटायर हुए थे और कल ही उन्हें आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया.मतलब ये कि अयोध्या मामले का फैसला सुनाने वाले 5 में से 3 जज अब केंद्र सरकार की तरफ से दिए पद पर आसीन हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि
क्या जजों का राज्यपाल जैसे पद स्वीकार करने से उनके फैसलों के प्रति शंका का भाव नहीं पैदा करता है? राजनीतिक सांठ-गांठ के भी तो आरोप लगते हैं. हमने ये सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर से सवाल किए.
जस्टिस गोविंद माथुर मानते हैं कि कूलिंग पीरियड जैसी व्यवस्था होनी चाहिए. मतलब ये कि एक तय वक्त तक कोई जज भी, कोई सरकारी या लाभ का पद ना ग्रहण कर पाए. दूसरी बात कि जजों को व्यक्तिगत तौर पर भी इसका ध्यान रखना चाहिए, ऐसे पदों से बचना चाहिए.
ये बात सही है कि संविधान ने कभी भी किसी जज को राज्यपाल या दूसरे सरकारी पद संभालने से नहीं रोका है. संविधान में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि कौन राज्यपाल बन सकता है, राज्यपाल के पास क्या शक्तियां रहती हैं. संविधान के आर्टिकल 157 और 158 में राज्यपाल पद को लेकर विस्तार से बताया गया है. संविधान के मुताबिक जो भारत का नागरिक है, जिसकी उम्र 35 या उससे ज्यादा है, जो संसद या विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य ना हो, जो किसी भी लाभ वाले पद पर ना रहा हो, जो कुछ समय से राजनीति में सक्रिय नहीं है, उसे राज्यपाल बनाया जा सकता है. यहां बात संविधान की नहीं है, बल्कि नैतिकता की है.
अब चूंकि इस घटना को नैतिकता से जोड़ दिया गया है, तो ज़रूरी है कि ये परख लिया जाए कि क्या ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं.पहले भी क्या सुप्रीम कोर्ट के जजों को राज्यपाल बनाया गया था. क्या विवाद तब भी हुए ? बिलकुल शुरू से शुरू करते हैं.
>>1952 में, यानी पंडित नेहरू की सरकार के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सईद फ़ज़्ल अली इस्तीफ़े के महज 7 दिन बाद बाद राज्यपाल बनाए गए थे. जस्टिस नजीर को 39 दिन बाद. 1952 से 54 तक ओडीशा के फज्लेअली राज्यपाल रहे. फिर 1956 से 59 तक असम के राज्यपाल का कार्यभार संभाला.
>>दूसरा वाकिया है छह साल बाद का. 1958 का. ये भी नेहरू सरकार के दौरान. बॉम्बे हाई कोर्ट के तात्कालिक चीफ़ जस्टिस एमसी छागला ने तो भारत का राजदूत बनने के लिए चीफ़ जस्टिस के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. ख़बरें थीं कि नेहरू के ही आमंत्रण पर जस्टिस छागला ने इस्तीफ़ा दिया था. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने 1958 से 1961 तक अमेरिका में भारतीय राजदूत के रूप में काम किया किया. फिर अप्रैल 1962 से सितंबर 1963 तक UK में भारतीय उच्चायुक्त रहे. वापस भारत आए. उन्हें कैबिनेट मंत्री बनने के लिए कहा गया और 1963 से 1966 तक वो भारत के शिक्षा मंत्री रहे. फिर नवंबर 1966 से सितंबर 1967 तक भारत के विदेश मंत्री भी रहे. यानी चीफ़ जस्टिस से राजदूत, फिर उच्चायुक्त, फिर शिक्षा मंत्री, विदेश मंत्री.
>> अब आपको सबसे विचित्र उदाहरण के बारे बताते हैं. बहरुल इस्लाम. जिनका नाम जस्टिस नजीर के बचाव में बीजेपी भी खूब ले रही है. वकील थे, कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा गए, फिर हाई-कोर्ट जज बन गए, जज से रिटायर हुए तो सुप्रीम कोर्ट के जज बने और फिर से राज्यसभा सांसद बन गए. दिमाग चकरा गया ना. इनके पोर्टफोलियो की पूरी कहानी सुन लीजिए. बहरुल इस्लाम ने 1958 में बतौर वकील सुप्रीम कोर्ट में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. 1956 से ही वो कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे और 1962 में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा पहुंचा दिया. 1968 में पार्टी के सदस्य के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए भी चुन लिए गए. 1972 में उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफ़ा दे दिया और जनवरी 1972 में तत्कालीन असम और नागालैंड उच्च न्यायालय, जिसे अब गुवाहाटी उच्च न्यायालय कहते हैं, उसके जज नियुक्त किए गए. 7 जुलाई 1979 को उन्हें गुवाहाटी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया और 1 मार्च 1980 तक उन्होंने कार्यभार संभाला. रिटायर होने के लगभग 9 महीने बाद ही उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त कर दिया गया. तब तक ऐसा नहीं हुआ था कि हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया जाए. लेकिन बहरुल इस्लाम के केस में ऐसा हुआ. और इतना ही नहीं हुआ. इसके तीन साल बाद ही उन्होंने असम के बारपेटा से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफ़ा दे दिया. हालांकि, उस साल असम के चुनाव टल गए और उन्हें फिर से राज्यसभा के लिए चुन लिया गया.
>> इसके बाद इस फ़ेहरिस्त में आते हैं भारत के 21वें चीफ़ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद भारत के नैशनल ह्यूमन राइट्स कमिशन का पहला अध्यक्ष बनाया गया और कुछ ही साल बाद वो कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद बने. 1998 से 2004 तक वो राज्य सभा में रहे और वो बहरुल इस्लाम के बाद राज्यसभा सदस्य बनने वाले दूसरे सुप्रीम कोर्ट जज हैं.
>>अगला नाम है जस्टिस फ़ातिमा बीवी का. UPSC की तैयारी करने वालों ने इनका नाम ज़रूर सुना होगा. भारत के सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के तौर पर नियुक्त होने वाली पहली महिला. वो उच्च न्यायपालिका में पहली मुस्लिम महिला और एशियाई देश में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनने वाली पहली महिला भी थीं. रिटायरमेंट के बाद उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सदस्य बनीं और बाद में 1997 से 2001 तक तमिलनाडु की राज्यपाल के रूप में काम किया.
>> मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद चीफ़ जस्टिस सदाशिवम को जब केरल का गवर्नर बनाया गया था, तब भी बहुत बवाल हुआ था. पी सदाशिवम ने 2013 से 2014 तक भारत के 40वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में काम किया. रिटायर होने के बाद सदाशिवम को 5 सितंबर 2014 से 4 सितंबर 2019 तक केरल का 21वां राज्यपाल नियुक्त किया गया था.
एक सवाल और ये भी रह जाता है कि संविधान में इसके लिए क्या प्रावधान हैं? क्या संविधान निर्माताओं ने इस पर कभी सोचा नहीं था कि ऐसी नौबत आगे आ सकती है. संविधान का संरक्षक होने के नाते, न्यायपालिका को स्वतंत्र होना चाहिए. दबावों और प्रलोभनों से अछूता. इसलिए, न्यायाधीशों के अधिकारों की रक्षा करने वाले कई संवैधानिक प्रावधान हैं. आज ये बहस नैतिकता की हो गई है, तो ये भी छान लिया जाए कि पुरखों ने क्या कहा था. संविधान सभा की बहस के दौरान भारतीय अर्थशास्त्री, अधिवक्ता और समाजवादी के टी शाह ने सुझाव दिया था कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को सरकार से संबंधित कार्यकारी कार्यालय नहीं लेना चाहिए. ताकि ज़्यादा वेतन, प्रलोभन या प्रतिष्ठा के चलते एक न्यायाधीश की स्वतंत्रता प्रभावित न हो.
उनका इशारा राज्यपाल जैसे पदों पर ही था. हालांकि, इस सुझाव को डॉ बी आर अंबेडकर ने ख़ारिज कर दिया था. उनके मुताबिक़, "न्यायपालिका केवल उन मामलों पर फ़ैसला करती है, जिनमें सरकार का दूर-दूर तक कोई हित न हो." नतीजतन, बी आर अम्बेडकर ने कहा कि सरकार, न्यायपालिका के आचरण को प्रभावित करे, इसकी संभावना बहुत कम है. आज़ादी के तुरंत बाद तो देश की अदालतें निजी विवादों का फ़ैसला करने में लगी हुई थी. नागरिकों और सरकार के बीच शायद बहुत कम मामले सामने आते थे. हालांकि, ये तर्क आज मान्य नहीं है क्योंकि अदालतों में सरकार से जुड़े सबसे ज़्यादा मुक़दमों हैं. और इसीलिए जब-जब इस तरह की नियुक्तियां होंगी, सवाल उठते रहेंगे.
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