केला एक फल है. कभी-कभार इसका इस्तेमाल सब्ज़ी के रूप में भी होता है. कुल जमा बातये कि केला खाने की वस्तु है. लेकिन एक समय यही केला सेंट्रल अमेरिका के कई देशोंमें सरकार बना और गिरा भी रहा था. इस भौकाली की कहानी क्या है? साल 1871 की बात है.न्यू यॉर्क के ब्रुकलिन में 23 साल का एक नौजवान रहता था. नाम कीथ माइनर. पढ़ाईपूरी होने के बाद उसे एक एनिमल फ़ार्म की ज़िम्मेदारी मिली. कीथ को इस काम में मज़ानहीं आ रहा था. उसकी नियति कुछ और ही थी. तभी एक दिन उसके चाचा हेनरी मिग्स की एकचिट्ठी आई. चाचा ने कीथ को एक ऑफ़र दिया था. दरअसल, हेनरी मिग्स को कोस्टा रिका केजंगलों में रेल लाइन बिछाने का ठेका मिला था. उन्हें कुछ भरोसेमंद लोगों की दरकारथी. इसलिए, उन्होंने कीथ को मदद के लिए बुलाया. कीथ के कोस्टा रिका पहुंचने के कुछही समय बाद चाचा की मौत हो गई. इसके बाद पूरा भार उसके ऊपर आ गया. शुरुआती चरण मेंहज़ारों की संख्या में मज़दूर भी मारे गए थे. कीथ ने इसके दो रास्ते निकाले. उसनेजमैका से मज़दूर बुलाए. ये लोग कोस्टा रिका की जलवायु से अच्छी तरह वाकिफ़ थे.दूसरी समस्या उन्हेें पौष्टिक खाना खिलाने से जुड़ी थी. इसके लिए उसने पटरियों केआजू-बाजू केले के पेड़ लगाना शुरू किया. केले की फसल बहुत जल्दी पक जाती थी. येपौष्टिक भी था. और, इसमें बहुत खर्चा भी नहीं आता था. दोनों समस्या सुलझी ही थी किकीथ के सामने तीसरी समस्या आकर खड़ी हो गई. पता चला कि कोस्टा रिका सरकार का खज़ानाखाली हो चुका है. इसके बाद कीथ इंग्लैंड गया. वो वहां से पैसा लेकर आया. बतौरकर्ज़. कीथ ने कोस्टा रिका सरकार के सामने एक शर्त रखी. उसने कहा कि मैं बिना पैसेके रेल लाइन बिछाऊंगा. बदले में मुझे कुछ चाहिए. क्या? 99 साल की लीज़ पर रेल लाइनके इस्तेमाल की इजाज़त. लिमोन पोर्ट का नियंत्रण और खेती के लिए पटरियों केइर्द-गिर्द बसी आठ लाख एकड़ ज़मीन. सरकार के पास और कोई रास्ता नहीं था. उसने सभीशर्तों को मान लिया. 1890 में रेल लाइन बिछाने का काम पूरा हो गया. इसके बाद कीथमाइनर ने कॉफ़ी का निर्यात चालू किया. लेकिन उसे अच्छा मुनाफ़ा नहीं मिल रहा था. तबउसका ध्यान केले की तरफ़ गया. केला उस समय अमेरिका और ब्रिटेन के लिए एक लग्ज़रीवाला फल था. हर कोई इसे अफ़ोर्ड नहीं कर सकता था. कीथ की कंपनी ने पूरा फ़ोकस केलेकी खेती और उसके निर्यात पर लगा दिया. उन्हें इस काम में फायदा भी मिल रहा था.लेकिन उन्हें इस बिजनेस को आगे बढ़ाने का रास्ता नहीं पता था. तब कीथ ने बॉस्टनफ़्रूट कंपनी के एंड्रयू प्रिस्टन की मदद ली. फिर मार्च 1899 में कीथ और एंड्रयू नेमिलकर यूनाइटेड फ़्रूट कंपनी की स्थापना की. इसका काम चल निकला. यूनाइटेड फ़्रूटकंपनी ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करना शुरू किया. कंपनी ने सेंट्रल अमेरिकाके अलग-अलग देशों में केले की खेती के लिए ज़मीन क़ब्ज़ाई. इसके बहाने वो उन देशोंकी आंतरिक राजनीति में भी दखल देने लगी. जो कोई उनके रास्ते में आया, भले ही वो कोईसरकार ही क्यों ना हो, उन्हें रास्ते से उठाकर बाहर कर दिया. इसके दो बड़े उदाहरणहोंडुरास और ग्वाटेमाला थे. साल 1910. होंडुरास. मैनुअल बोनिया उस समय तक पूर्वराष्ट्रपति हो चुके थे. तीन साल पहले ही उन्हें गद्दी से उतार दिया गया था. उन्हेंनिर्वासन में रहना पड़ रहा था. हालांकि, उन्होंने कुर्सी दोबारा पाने का सपना छोड़ानहीं था. दिसंबर 1910 में वो वापस लौटे. हथियारबंद सैनिकों की टुकड़ी के साथ. 1911की शुरुआत तक उन्होंने कुर्सी हासिल कर ली. बोनिया के पीछे एक शक्तिशाली कंपनी खड़ीथी. कुयामेल फ़्रूट कंपनी. होंडुरास ने कंपनी के व्यापार पर दो प्रतिशत का टैक्सलगा दिया था. इससे नाराज़ कंपनी ने तख़्तापलट की फ़ंडिंग की. फ़रवरी 1911 मेंबोनिया ने होंडुरास में सरकार बना ली. क़ुयामेल फ़्रूट कंपनी को बाद में यूनाइटेडफ़्रूट ने खरीद लिया. कंपनी के मालिक सैम ज़मूरी बाद में यूनाइटेड फ़्रंट के मुखियाबने. होंडुरास के बाद अब ग्वाटेमाला की कहानी सुन लेते हैं. साल 1954 की बात है.ग्वाटेमाला में जैकॉबो अर्बेन्ज़ राष्ट्रपति चुने गए. उस समय यूनाइटेड फ़्रूट कंपनीएकाधिकार चला रही थी. स्थानीय किसानों के पास ज़मीन की भारी कमी थी. अर्बेन्ज़ नेइस समस्या से निपटने का एक रास्ता निकाला. वो एक कृषि सुधार लेकर आए. इसके तहत,कंपनी के क़ब्ज़े वाली ज़मीन को किसानों में बांटा जाने लगा. कंपनी इससे नाराज़ होगई. उसने इसकी शिकायत अमेरिका के राष्ट्रपति आइज़नहॉवर से की. यूनाइटेड फ़्रूट मेंराष्ट्रपति और सरकार के कई लोगों का शेयर था. राष्ट्रपति ने सीआईए को काम पर लगाया.अर्बेन्ज़ सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा कैंपेन चलाया गया. सीआईए ने पैसे देकरहोंडुरास से लड़ाके बुलाए और उन्हें अर्बेन्ज़ के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए उकसाया.चौतरफ़ा घिरे राष्ट्रपति अर्बेन्ज़ ने इस्तीफ़ा दे दिया. तब ग्वाेटमाला में कठपुतलीसरकार बिठाई गई. जो अंतिम समय तक यूनाइटेड फ़्रूट के इशारे पर नाचती रही. यूनाइटेडफ़्रूट के कारनामे यहीं पर ख़त्म नहीं होते. जब तक ये कंपनी चली, उसने सेंट्रलअमेरिका में तख़्तापलट, विद्रोह और हिंसा का खेल जारी रखा. और, ये सब खेल केले केनाम पर हो रहा था. दिग्गज पत्रकार पीटर चैपमैन ने अपनी किताब ‘बनानाज़: हाउ दयूनाइटेड फ़्रूट कंपनी शेप्ड द वर्ल्ड’ में लिखा, यूनाइटेड फ़्रूट कंपनी ने केले केनाम पर जितने तख़्तापलट करवाए, उतना तो तेल के नाम पर भी नहीं हुआ. आज के दिन केलेकी चर्चा क्यों? तुर्की में इस समय लगभग 36 लाख सीरियन शरणार्थी रह रहे हैं. वे दससालों से चल रहे सिविल वॉर से भागकर आए हैं. जैसे-जैसे शरणार्थियों की संख्या बढ़रही है, वैसे-वैसे उनके ख़िलाफ़ माहौल भी बन रहा है. तुर्की के स्थानीय लोगों कामानना है कि ये शरणार्थी उनकी नौकरी और उनके संसाधन हड़प रहे हैं. कई दक्षिणपंथीनेताओं ने तो शरणार्थियों को बाहर निकालने की मुहिम भी चलाई हुई है. पिछले हफ़्तेइस माहौल में अचानक से उबाल आ गया. इसकी वजह बना एक वीडियो. दरअसल, एक सीरियन महिलाइस्तांबुल के एक बाज़ार में केले खरीद रही थी. इसी दौरान उसकी कुछ स्थानीय लोगों सेबहस हो गई. वो महिला शरणार्थियों का बचाव कर रही थी. वहीं तुर्क लोगों का कहना थाकि अफ़ग़ान और सीरियन शरणार्थी उनकी नौकरी छीन रहे हैं. एक व्यक्ति ने शिकायती लहजेमें कहा, ‘तुम यहां आराम से रह रही हो. तुम लोग किलो के किलो केले खरीद रहे हो,जबकि मैं एक केला तक नहीं खा पा रहा हूं.’ इस बहस का वीडियो किसी ने रेकॉर्ड करलिया. ये वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. तुर्की में इन दिनों महंगाईचरम पर है. लीरा का मूल्य लगातार नीचे गिर रहा है. बुनियादी चीज़ों की कमी है. ऐसेमें शरणार्थी संकट उनके लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. जब वीडियो चर्चा में आया तोलोगों ने इसकी नकल शुरू कर दी. तुर्की में टिकटॉक पर ‘बनाना चैलेंज’ शुरू हो गया.सीरियन शरणार्थियों ने केले खाने का वीडियो बनाकर टिकटॉक पर डालना शुरू किया. कुछबनाना फ़िल्टर्स का इस्तेमाल करने लगे. कईयों ने केले को लेकर मीम भी बनाए. लेकिनजब एक फ़ोटो लिमिट से बाहर निकल गई. इसमें तुर्की के झंडे को फ़ोटोशॉप करके केले कीतस्वीर लगा दी गई थी. दक्षिणपंथी विक्ट्री पार्टी इसके ऊपर चढ़कर बैठ गई. उसने आरोपलगाया कि सीरियन शरणार्थी तुर्की के झंडे का अपमान कर रहे हैं. वे तुर्की के लोगोंऔर उनके आर्थिक हालात का मज़ाक उड़ा रहे हैं. फिर इसका विरोध शुरू हुआ. पिछलेहफ़्ते टर्किश अधिकारियों ने केले खाने का वीडियो बनाने के लिए 11 सीरियनशरणार्थियों को गिरफ़्तार कर लिया. 31 अक्टूबर को इस्तांबुल पुलिस ने एक सीरियनपत्रकार माजिद शमा को अरेस्ट कर लिया. माजिद ने एक फ़नी वीडियो बनाया था, जिसमें वोलोगों से केले खाने के अनुभव के बारे में पूछ रहे थे. गिरफ़्तार किए गए लोगों केसाथ क्या होगा? टर्किश अधिकारी उनके कागज़ात की जांच कर रहे हैं. कुल सात लोगों कोडिपोर्ट करने की तैयारी चल रही है. उन्हें कहां भेजा जाएगा, इस बारे में कोई स्पष्टजानकारी नहीं है. अंतरराष्ट्रीय कानून शरणार्थियों को उस जगह पर भेजे जाने से रोकताहै, जहां उनके साथ कुछ ग़लत होने का ख़तरा हो. सीरिया में इस समय भी सिविल वॉर चलरहा है. ऐसे में उन्हें वापस सीरिया नहीं भेजा जा सकता है. तुर्की और क्या कर रहाहै? तुर्की ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की निगरानी बढ़ा दी है. वो ऐसे सभी वीडियोज़ औरपोस्ट हटवाने की तैयारी में है, जिनमें टर्किश लोगों को चिढ़ाया जा रहा हो. साथ ही,इन्हें पोस्ट करने वाले लोगों की पहचान भी की जा रही है. इन लोगों पर मुकदमा चलायाजाएगा. कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में तुर्की से डिपोर्ट किए जाने वालेशरणार्थियों की संख्या बढ़ सकती है. अब आप सोच रहे होंगे कि केले को लेकर कोई इतनाभावुक कैसे हो सकता है? इतनी छोटी सी बात को हंसी में भी उड़ाया जा सकता था. इसेअंतरराष्ट्रीय स्तर का विवाद बनाने की ज़रूरत ही क्या थी? लेकिन क्या है ना किइतिहास ख़ुद को अक्सर दोहराता रहता है. अतीत में भी ऐसे ही विचित्र मुद्दों परदेशों में झगड़ा भी हो चुका है. कब, कहां, क्यों और कैसे? कुछ उदाहरण से समझातेहैं. पहली कहानी अक्टूबर 1925 की है. ग्रीस-बुल्गारिया की सीमा. बाल्कन युद्ध केबाद से दोनों देशों के बीच भारी तनाव का माहौल था. वहां दोनों तरफ़ से बड़ी संख्यामें सैनिक तैनात थे. एक ग्रीक सैनिक के पास एक कुत्ता था. एक दिन वो कुत्ता बॉर्डरपार कर बुल्गारिया की सीमा में घुस गया. ग्रीक सैनिक उसके पीछे भागा. इसी चक्कर मेंवो बॉर्डर का ध्यान रखना भूल गया. जैसे ही उसने सीमा पार की, बुल्गारिया की तरफ़ सेगोली चली. ग्रीक सैनिक वहीं पर ढेर हो गया. बुल्गारिया ने इस घटना के लिए माफ़ीमांगी. उसने जांच के लिए एक कमीशन बनाने की पेशकश भी की. लेकिन ग्रीस में सैन्यसरकार इसके लिए राज़ी नहीं हुई. उसने आधिकारिक माफ़ी के साथ-साथ भारी ज़ुर्माना भीमांगा. ग्रीस ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया. बुल्गारिया ने कहा, हम नहीं मानते.नाराज़ ग्रीस के प्रेसिडेंट थियोड्रोस पेंगालोज ने बुल्गारिया पर हमले का आदेश देदिया. ग्रीक सैनिकों ने बुल्गारिया के कई गांवों पर क़ब्ज़ा भी कर लिया. तबबुल्गारिया लीग ऑफ़ नेशंस के पास पहुंचा. संस्था ने युद्धविराम का आदेश दिया. साथही साथ, ग्रीस को मुआवज़ा चुकाने के लिए भी कहा. जब तक झगड़ा रुका, तब तक 55 लोगोंकी मौत हो चुकी थी. ग्रीस को लगभग 30 लाख रुपये चुकाने पड़े. ये उसका अपमान था. कुछसमय बाद सेना ने थियोड्रोस को भी गद्दी से उतार दिया. इस झगड़े को इतिहास में ‘दवॉर ऑफ़ द स्ट्रे डॉग’ के नाम से जाना जाता है. 1828 में मेक्सिको सिटी में एक दंगाहुआ. इसमें एक पेस्ट्री की दुकान को भी लूट लिया गया. ये दुकान एक फ़्रेंच व्यक्तिकी थी. उसने पहले मेक्सिको सरकार से मुआवजा मांगा. मेक्सिको ने पैसे देने से मना करदिया. फिर उसने फ़्रेंच सरकार से मदद मांगी. इस मांग पर एक दशक बाद सुनवाई हुई.फ़्रांस के राजा लुई-फ़िलिप ने मेक्सिको से छह लाख पेसो चुकाने के लिए कहा.मेक्सिको ने इससे मना कर दिया. तब फ़्रांस ने अक्टूबर 1838 में मेक्सिको के ख़िलाफ़युद्ध शुरू कर दिया. लड़ाई मार्च 1839 में ख़त्म हुई जब ब्रिटेन की मध्यस्थता मेंसमझौता कराया गया. मेक्सिको को ज़ुर्माने की रकम अदा करनी पड़ी. इसमें से बड़ाहिस्सा पेस्ट्री शॉप के मालिक को देना पड़ा. इसके अलावा 1859 में ब्रिटेन औरअमेरिका के बीच एक सुअर की हत्या को लेकर तनातनी बन गई थी. कहानियां और भी हैं.उनकी चर्चा फिर कभी.