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जोधाबाई का वो सच जिस पर बॉलीवुड ने लगातार पर्दा डाला

दुर्गा खोटे की ममता भरी मुस्कान या ऐश्वर्या की लव स्टोरी, सब फर्जी हैं.

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फ़िल्म 'जोधा अकबर' में ऐश्वर्या ने जोधाबाई का किरदार निभाया था.
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लल्लनटॉप
27 नवंबर 2017 (अपडेटेड: 28 नवंबर 2017, 07:20 AM IST)
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ये आर्टिकल राना सफवी ने डेली ओ के लिए लिखा था. वे इतिहासकार, ब्लॉगर और राइटर हैं. उनकी कई किताबों में से एक ‘वेयर स्टोन्स स्पीक’ भी है. आर्टिकल में लिखे विचार उनके निजी हैं. इन्हें यहां हिंदी में दी लल्लनटॉप की रुचिका प्रस्तुत कर रही हैं.
 
 


जोधा बाई जो रानी नहीं थी

आपकी उम्र के लोग जोधा बाई को दुर्गा खोटे और ऐश्वर्या राय से जोड़ेंगे.
दुर्गा खोटे ने डायरेक्टर के असिफ़ की फ़िल्म 'मुगल-ए-आज़म' में जोधा बाई का किरदार निभाया था. इस फ़िल्म में उन्हें राजसी तो दिखाया गया, साथ ही अपने डिंपल वाले गालों के साथ, वो बहुत ममता से भरी भी दिखीं. वहीं आशुतोष गोवारिकर की फ़िल्म 'जोधा अक़बर' में ऐश्वर्या राय अपने डिज़ाइनर गहनों और लुक्स के कारण बिलकुल रानी लग रही थीं.
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फ़िल्म 'जोधा अकबर' पर इतिहास से छेड़छाड़ के आरोप लगे थे.

हमारे पास इन दोनों चित्रण को जज करने के लिए कोई एतिहासिक संदर्भ नहीं है. क्योंकि असलियत में अकबर की ऐसी कोई पत्नी नहीं थी जिसे जोधा बाई कहा जाता था.
मुग़ल प्रशासन में हरम एक ज़बरदस्त संगठित और बढ़िया ढंग से चलाया जाने वाला डिपार्टमेंट था. अकबर ने नियम बनाया था कि एक जैसे नामों में कनफ़्यूज़न न हो, इसलिए अपनी हर रानी और पटरानी को उस शहर के नाम से बुलाएंगे जहां वो पैदा हुई थीं.
ऐसे में जोधा बाई को जोधपुर से होना चाहिए था. लेकिन जैसे की 'मुग़ल-ए-आज़म' और 'जोधा-अकबर' में दिखाया गया कि अकबर की राजपूत पत्नी आमेर से थीं. इसका मतलब उन्हें जोधा बाई तो नहीं बुलाया जा सकता.
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हमें ये भी नहीं पता कि वो शहजादे सलीम की मां थीं भी या नहीं (बाद में सलीम की ताजपोशी जहांगीर के नाम से हुई थी). कई इतिहासकारों का मानना है कि जहांगीर एक पटरानी से पैदा हुए थे. और यही वजह है कि अपने संस्मरण 'तुज़ुकानामा या जहांगीरनामा' में से किसी में भी जहांगीर ने कभी अपनी मां के नाम का ज़िक्र नहीं किया. हांलाकि इसमें उन्होंने अपनी और अपने पिता की कई पत्नियों के नाम लिए थे.
जहांगीर के संस्मरण में ये वो संदर्भ हैं, जहां उन्होंने अपनी मां का ज़िक्र किया है, सिर्फ़ ज़िक्र किया कभी नाम नहीं बताया.
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जब वो 'मरियम-ज़मानी' की बात करते हैं, तो वो उन्हें अपनी मां नहीं बताते, बल्कि कोई और ही बताते हैं:
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कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब 'Annals and Antiquities of Rajasthan' में अकबर की पत्नी का नाम जोधा बाई लिखा है. अपने 1920 के संस्करण में संपादक विलियम क्रुक ने आईन-ए-अकबरी का हवाला देते हुए, ये स्पष्ट किया था कि जोधपुर की राजकुमारी की अकबर से नहीं, जहांगीर से शादी हुई थी. मारवाड़(जोधपुर) की राजकुमारी, राजा उदय सिंह की बेटी थीं. उनका नाम जगत गोसेन/ मणमती था और उन्हें बिल्कीस मकानी का टाइटल मिला था.
नाटककार इम्तियाज़ अली ताज के नाटक 'अनारकली' पर फ़िल्म 'मुगल-ए-आज़म' आधारित है. उसमें स्पष्ट था कि ये एक एतिहासिक फ़िक्शन है. लेकिन किसी भी फ़िल्ममेकर ने आगे रिसर्च करने की ज़हमत नहीं उठाई.

सुल्तान रज़िया, महरौली से शासक

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जब भी हम रज़िया सुल्तान की बात करते हैं, हमारे दिमाग में हेमा मालिनी की तस्वीर आ जाती है.

एक और एतिहासिक कैरेक्टर, जिसे बहुत नुकसान पहुंचाया गया वो हैं रज़िया. दिल्ली की पहली और इकलौती महिला शासक होने के कारण इतिहास को उन पर जितना ध्यान देना चाहिए था, उतना दिया नहीं. कुछ संदर्भों से पता चलता है कि उनकी इज़्ज़त पर बहुत चोट मारी गई है. सबसे बुरा तो यही है कि जो उनके गुरु और पिता समान थे, लोगों ने उनका उन्हीं से ही लव एफ़ेयर दिखा दिया.
उनके साथ रज़िया के कथित प्यार की मनगढ़ंत कहानियां हाल ही में फ़ैली हैं. कोई भी समकालीन इतिहासकार इस बात का उल्लेख नहीं करता.
कमल अमरोही ने अपनी फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' में रज़िया को राजसी कम और कामुक ज़्यादा दिखाया. उन्होंने उनका टाइटल भी सही नहीं लिखा था.
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फिर भी, इल्तुतमिश की मौत के बाद, अप्रैल 1236 में तुर्की राजवंशियों ने उनके भाई रुकनुद्दीन फ़िरोज़ को राजगद्दी पर बैठा दिया. वो राज-पाठ में कम और दुनिया भर के आनंद लेने में ज़्यादा ध्यान देते थे, यही कारण था कि उनका शासनकाल बहुत ही छोटा रहा.
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ख्वाजा अब्दुल्लाह मलिक इसामी ने 'फुतुहास सलातीन' (1349-50) में लिखा था कि रज़िया ने ऐसे कपड़े पहने थे जैसे गरीब पहनते हैं. उन्होंने खुद को शुक्रवार की नमाज़ के लिए इकट्ठे हुए लोगों के सामने पेश किया. अपने पिता के नाम पर उन्होंने अपील की कि वे शाह तुर्कान (रुकनुद्दीन फिरोज़ की मां और असली शासक) की साज़िश के खिलाफ़ उनकी मदद करें.
उन्हें देखकर और उनके ताकतवर शब्द सुनकर वहां इक्ट्ठे हुए लोगों को बहुत फ़र्क पड़ा. इसके बाद रज़िया और दिल्ली के लोगों के बीच एक समझौता हुआ. इसामी हमें बताते हैं कि रज़िया ने लोगों के साथ ऐसा समझौता कर लिया था कि 'उन्हें अपनी काबिलियत साबित करने का एक मौका दिया जाए. और अगर वो अपने आप को पुरुषों से बेहतर साबित नहीं कर पाईँ तो उनका सिर धड़ से उखाड़ दिया जाए.'
अक्टूबर 1236 में उन्हें दिल्ली की सुल्तान का ताज हासिल हुआ. उनके नाम पर सिक्के निकाले गए. जिन पर 'सुल्तान-उल-आज़म जलातत-उद दुनिया वा दिन, मैकत-उल बिंत इल्तुतमिश और सुल्तान मेहरात अमीर-उल-मोमिनीन( महान सुल्तान, दुनिया की चमक और उसका भरोसा, रानी, सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी और वफादार कमांडर) लिखा था.
खुतबा या शुक्रवार का धर्मोपदेश उनके नाम पर पढ़ा जाता था. यहां तक ​​कि बगदाद के खलीफ़ा ने भी उन्हें दिल्ली की शासक के रूप में स्वीकार किया था. बाद में उन्होंने नुसरत अमीर-उल-मु'मिनिन का टाइटल अपना लिया था.
उन्होंने महिलाओं की पोशाक से परदे को हटा दिया. रज़िया बिना परदे के घुड़सवारी पर निकलती थीं. उनके शासन की सूझ-बूझ पर कभी संदेह नहीं किया गया. उन्होंने समझदारी के साथ बढ़िया ढ़ंग से शासन किया. उन्होंने तुर्की अमीरों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की रणनीति का इस्तेमाल करके कंट्रोल किया था.
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आज राज़िया पुरानी दिल्ली के एक पुराने पत्थर की कब्र में दफ़न हैं. एक गुमनाम कोने में.
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उनकी बरबादी का कारण ये रहा कि वो तुर्कियों के हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं थीं. ये तुर्की दिल्ली सल्तनत में बड़े पोस्ट पर थे.
उन्होंने एबिसिनियन दास मलिक याकूत को अमीर-ए-अख़ुर या घोड़ों के कमांडर के रूप में नियुक्त किया - ये एक महत्वपूर्ण पद था, क्योंकि सुल्तान को हमेशा अपनी सिमाओं का बचाव या उनका विस्तार करना होता था.
इससे संकेत मिलता है कि तुर्की के दास राज्यवंशी उन्हें मेनिपुलेट नहीं कर सकते थे. और इन राज्यवंशियों में से एक, ताबरहिंडा( भटिंडा) के गवर्नर ने उनके खिलाफ़ विद्रोह कर दिया.
वो उनसे बचते हुए घोड़े पर सवार ताबरहिंडा पहुंची, जहां उन्हें पकड़ लिया गया.
मलिक याकूत इस लड़ाई में मारे गए. और तुर्कियों ने अप्रैल 1240 में रज़िया के भाई बहरामशाह को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया.
वो हार मानने वालों में से नहीं थीं. उन्होंने मलिक अल्तुनिया के साथ एक राजनीतिक गठबंधन किया और उनके साथ शादी करली. जिसकी वजह से उन्हें कैद से आज़ाद कर दिया गया.
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जब भी हम रज़िया सुल्तान के बारे में सोचते हैं, हमारे दिमाग में हेमा मालिनी और धर्मेंद्र आ जाते हैं.
मैं चाहती हूं कि जो लोग एतिहासिक बैकग्राउंड से नहीं हैं, वो इतिहास, एतिहासिक फ़िक्शन, कॉमिक्स और फ़िल्मों में अतंर जानें.


 
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