जानिए, क्यों हो रही है देर ATM तक पैसा पहुंचने में
रिज़र्व बैंक से एटीएम तक नोटों का सफ़र लंबा है.
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फोटो - thelallantop
पैसों के लिए इस समय हाहाकार मचा हुआ है. आजकल लोग रात को लोग इस दहशत में सोते हैं कि पता नहीं कल एटीएम में पैसा मिलेगा या नहीं. छुट्टे ले लेकर उधारी में आ गए हैं. जिनके घरों में शादियां हैं, वो अलग परेशान हैं. बहुत लोग रात भर लाइन में लगे होते हैं कि एटीएम में पैसा आते ही वो उसे झपट लें. नए नोटों की सप्लाई जारी है.नोटों की मांग इतनी बढ़ गई है नोट छापने वाली स्याही ही ख़त्म हो गई. कहीं-कहीं तो अधछपे नोट ही एटीएम से निकले. यानी जल्दबाजी में ही सही नोट किसी तरह एटीएम तक पहुंच रहे हैं. लेकिन इन्हें पहुंचाने के लिए एक बहुत बड़ा सिस्टम काम करता है और उसके पीछे बहुत से लोगों की मेहनत होती है. तो आखिर रिज़र्व बैंक से चलकर नोट लोकल एरिया के बैंक और एटीएम तक कैसे पहुंच रहे हैं? क्यों देर हो रही है? रिज़र्व बैंक रखता है पैनी नज़र देश भर के एटीएम को मैनेज करने के लिए रिज़र्व बैंक के पास इस समय पंद्रह लोगों की एक टीम है. जब से नोट बंदी हुई है, एक कांफ्रेंस वॉर-रूम बनाया गया है, जहां से पूरे देश पर नज़र रखी जा रही है. ग्राउंड रिपोर्ट के लिए ज़मीन पर अधिकारी तैनात हैं जो जोनल ऑफिस में रिपोर्ट करते हैं. यहां से हेड ऑफिस को इनफार्मेशन भेजी जाती है. हेड ऑफिस इस डेटा को वॉर-रूम में भेज देता है.

शुरुआत हर फाइनेंशियल इयर के शुरुआत में, रिज़र्व बैंक (आरबीआई) इस बात का आकलन करता है कि साल भर में कितने कैश की ज़रुरत होगी. इसे सरकार और नोट छापने वाले प्रेस से डिस्कस किया जाता है. इसके लिए जो जीडीपी हासिल करनी है, उस पर भी नज़र रखी जाती है.
आरबीआई के एक अफसर के मुताबिक़, आरबीआई के 19 रीजनल ऑफिस से डेटा इकठ्ठा किया जाता है. इसके बाद फाइनेंस मिनिस्ट्री को सूचना दी जाती है. एक साल में छपने वाले नोट आरबीआई और मिनिस्ट्री की निगरानी में छपते हैं. पेपर की छपाई इसके बाद हाई सिक्योरिटी वाले बैंक पेपर तैयार किए जाते हैं. इन्हें मैसूर और होशंगाबाद की पेपर मिल से सप्लाई किया जाता है. होशंगाबाद मिल 1967 में शुरू हुई थी और मैसूर मिल 2015 में. मैसूर मिल को रिजर्व बैंक देखती है और होशंगाबाद मिल सरकार के कण्ट्रोल में है. नोटों के कुछ सिक्योरिटी फीचर्स जैसे गांधी जी का वाटरमार्क, हरी वाली पट्टी इन्हीं दो मिल्स में बनाए जाते हैं. इन दोनों मिलों से सालाना 18,000 मीट्रिक तन पेपर तैयार होते हैं. बैंक पेपर को इम्पोर्ट भी किया जा सकता है.

बैंक पेपर की छपाई
नोटों की छपाई बैंक पेपर्स को सील बंद कंटेनर में छपाई के लिए प्रेस में भेज दिया जाता है. इसके लिए देश में चार प्रेस हैं. नासिक, देवास, मैसूर और मिदनापुर. नासिक, देवास के प्रेस सरकार की निगरानी में और मैसूर, मिदनापुर प्रेस रिज़र्व बैंक की निगरानी में चलते हैं. यहां नोटों में कुछ और सिक्योरिटी फीचर्स जोड़े जाते हैं. जैसे रंग बदलने वाले फीचर्स.
यूरोप में किसी नोट के सिक्योरिटी फीचर्स को तैयार करने में एक साल तक लग जाता है, जबकि भारत में जो 500 और 1000 के नोट अभी जारी किए गए हैं उनके सिक्योरिटी फीचर्स 6 महीने में ही तैयार किए गए हैं.इस समय के 2000 के नोट जिस शीट में छपते हैं उसमें एक शीट में 40 नोट बनाए जा सकते हैं. 2015-16 में नोटों की छपाई में पिछले साल के बजाय 8.1 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई . 2016-17 में 17.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई.
Symbolic Image
नोटों को देश भर में भेजना इन प्रिंट हो चुके नोटों को आरबीआई के 19 ऑफिसों में भेजा जाता है. जिन जगहों में ऑफिस नहीं हैं वहां करेंसी चेस्ट हैं जो वॉल्ट की तरह काम करते हैं. पूरे देश में 4,000 करेंसी चेस्ट हैं. इसके अलावा 3,700 छोटे सिक्कों के डिपो हैं.ये डिपो कमर्शियल बैंक, कोऑपरेटिव बैंक और रीजनल बैंक में होते हैं. आरबीआई इन जगहों के स्टॉक और ट्रांजैक्शन का रोज रिकॉर्ड रखती है.
नोटों को ट्रेन और ट्रकों से ट्रांसपोर्ट किया जाता है. इनकी पुलिस सिक्योरिटी राज्य सरकारों के जिम्मे होती है. नॉर्थ-ईस्ट स्टेट और जम्मू कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में नोट पहुंचाने के लिए एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर का भी सहारा लिया जाता है.
करेंसी चेस्ट तक पहुंचने से पहले ये नोट सिर्फ कागज़ के टुकड़े ही माने जाते हैं. इन्हें लीगल टेंडर तब माना जाता है जब रिजर्व बैंक इनके लिए वाउचर जारी करता है.एटीएम तक नोटों का पहुंचना अलग-अलग करेंसी चेस्टों से नोट हाई सिक्योरिटी में बैंकों में पहुंचते हैं. नोटों को बैंक तक पहुंचाना उतनी बड़ी बात नहीं है जितना उन्हें एटीएम तक पहुंचाना है. इस समय देश भर में 2.2 लाख से भी ज्यादा एटीएम हैं. इस समय लगभग 8,800 कैश वैन और 7 कैश फर्म्स इन तक कैश पहुंचा रहे हैं.
एक फर्म के चीफ एग्जीक्यूटिव ने बताया कि इस समय लगातार कई घंटों तक हम बिना सोए काम कर रहे हैं. रोज हम लगभग 13,000 एटीएम तक पहुंच रहे हैं.फर्म की गाड़ी और ड्राईवर की पुलिस जांच करती है. इन दिनों ग्रामीण इलाकों में पैसा दोबारा एटीएम तक पहुंचने में छह दिन लग रहे हैं और शहरों में तीन दिन.
एटीएम के अन्दर चार कंटेनर होते हैं जिन्हें कैसेट कहा जाता है. एक कैसेट में ढाई हजार नोट रखे जा सकते हैं यानी कुल दस हजार नोट. पहले ये कैसेट 100, 500 और 1000 के नोटों के हिसाब से बने थे. लेकिन अब ज्यादातर गांवों में 500 और 1000 के नोट नहीं हैं इसलिए दो कैसेटों में सौ-सौ के ही नोट डाले जा रहे हैं. 2000 के नोट शहरों तक ही सीमित हैं. कई दिनों से फर्म के लोग दिन रात नोटों को पहुंचाने में लगे हैं लेकिन उम्मीद से कम ही नोट पहुंच पा रहे हैं.
यानी स्थितियां बहुत अच्छी नहीं हैं और हमारे पीएम साहब हैं कि हर तीसरे दिन इमोशनल कार्ड फेंकने लगे हैं.
ये स्टोरी निशान्त ने की है.
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