PFI पर बैन लगने से पहले अमित शाह की बैठक में क्या हुआ?
PFI बैन पर ओवैसी ने क्या कहा?

सुबह के करीब 6 बज रहे थे. न्यूज चैनल्स के दफ्तर में अखबार की प्रतियां खंगाली ही जा रही थी. सुबह के बुलेटिन की तैयारी चल रही थी. तभी एक लाइन का न्यूज़ फ्लैश आता है. Centre bans PFI and eight affiliate organisations for 5 years.मतबल केंद्र सरकार ने PFI के साथ 8 सगंठनों पर 5 साल का प्रतिबंध लगा दिया है.
PFI मतलब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया. CAA प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा हो या फिर हाथरस का मामला देश में कोई भी विवाद हो, कोई भी फसाद हो नाम PFI का ज़रूर आता था. लंबे वक्त से PFI पर बैन की मांग उठ रही थी. एक दफे झारखंड की सरकार ने बैन लगाया था तो हाईकोर्ट से राहत मिल गई थी. मगर इस बार रडार NIA का था. 22 सितंबर को ED,NIA और राज्यों की पुलिस ने देश भर से 106 PFI कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. 4 दिन की खामोशी रही, पूछताछ होती रही. फिर आती है 27 सितबंर की तारीख. राजस्थान में सियासी हलचल मची हुई थी, लोगों का ध्यान इस खबर पर कम गया.
मगर उस दिन मेगा ऑपरेशन हुआ. देशभर से 247 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनके संबंध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से PFI से जुड़े थे. इन दोनों कार्रवाइयों के दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय में हाई लेवल मीटिंग हुई थी. पटकथा लिखी जा चुकी थी. PFI के चेयरमैन तक को हिरासत में ले लिया गया. लग रहा था कि कुछ बड़ा होने वाला है. 29 सितंबर की सुबह PFI के ताबूत में कील बनकर आई. PFI को गृहमंत्रालय ने उन 42 बैन्ड संगठनों की सूची में डाल दिया, जिनपर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम यानी UAPA की धारा 35 तहत कार्रवाई होती है. PFI के साथ जिन 8संगठनों को बैन किया गया, पहले उनका नाम जान लीजिए
जूनियर फ्रंट
रिहैब फाउंडेश
नेशनल विमेन फ्रंट
एम्पावर इंडिया फाउंडेशन
रिहैब इंडिया फाउंडेशन (RIF)
कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI)
ऑल इंडिया इमाम काउंसिल (AIIC)
नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन (NCHRO)
बैन के लिए गृह मंत्रालय ने नोटिफिकेशन जारी किया. जिसमें PFI और सहयोगी संगठनों के लिए ‘Unlawful Association’ शब्द का इस्तेमाल कर गतिविधियों और भूमिकाओं पर गंभीर टिप्पणियां की गईं.
PFI ने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अपनी पहुंच को बढ़ाने के लिए सहयोगी संगठनों या संबद्ध संस्थाओं की स्थापना की है. इसका उद्देश्य PFI की सदस्यता, प्रभाव और फंड जुटाने की क्षमता को बढ़ाना है. PFI ‘हब’ की तरह काम करता है. वो सहयोगी संगठनों की जनता के बीच पहुंच और फंड जुटाने की क्षमता का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए करता है. ये संगठन "जड़ और शिराओं" की तरह भी काम करते हैं. इनके माध्यम से PFI को पैसा और शक्ति मिलती है.
PFI और इसके सहयोगी संगठन या संबद्ध संस्थाएं सार्वजनिक तौर पर एक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संगठन के रूप में काम करते हैं. लेकिन ये गुप्त एजेंडा के तहत समाज के वर्ग विशेष को कट्टर बनाकर लोकतंत्र की अवधारणा को कमजोर करने की दिशा में काम करते है. जो देश के संवैधानिक प्राधिकार और ढांचे के प्रति घोर अनादर दिखाते हैं. ये संगठन कानून विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं, जो देश की अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ है. जिससे शांति तथा सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल खराब होने और देश में उग्रवाद को बढ़ावा मिलने की आशंका है.
सरकार की तरफ से तैयार डोजियर में आतंकी संगठन SIMI से संबंध होने की भी बात लिखी गई. PFI के ISIS के साथ अंतरराष्ट्रीय संपर्क के कई उदाहरण हैं. वो और इसके सहयोगी संगठन चोरी-छिपे देश में असुरक्षा की भावना को बढ़ावा देकर एक समुदाय के कट्टरपंथ को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं. इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इसके कुछ सदस्य अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से जुड़ चुके हैं.
इन वजहों को आधार बनाकर सरकार ने साफ कर दिया कि PFI के खिलाफ UAPA के तहत ऐक्शन लेना जरूरी है. इसके लिए सरकार ने कई हिंसक घटनाओं का उल्लेख किया. विभिन्न मामलों में जांच से साफ हुआ है कि PFI और इसके काडर बार-बार हिंसक और विध्वंसक कार्यों में संलिप्त रहे हैं. इनमें एक प्रोफेसर का हाथ काटना, दूसरे धर्मों का पालन करने वाले संगठनों से जुड़े लोगों की निर्मम हत्या करना, प्रमुख जगहों और लोगों को निशाना बनाने के लिए विस्फोटक प्राप्त करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना आदि शामिल हैं, इनमें प्रमुख हैं-
नवंबर 2021 में केरल में हुई संजीत की हत्या
2019, तमिलनाडु में वी रामलिंगम
2021 केरल में नंदू
2018 में केरल के अभिमन्यु की हत्या
2017 में केरल के बिबिन की हत्या
कर्नाटक में 2017 का शरत की हत्या का मामला
2016 में आर रुद्रेश की हत्या
इन हत्याओं पर गृह मंत्रालय ने साफ लिखा है कि ये हत्याएं और आपराधिक कृत्य सार्वजनिक शांति को भंग करने और लोगों के मन में आतंक का भय पैदा करने के एकमात्र उद्देश्य से की गई. PFI के कुछ सदस्य ISIS में शामिल हुए हैं. उन्होंने ईराक, सीरिया और अफगानिस्तान में आतंकी गतिविधियों में भाग लिया है .ये भी सरकार की तरफ से बताया गया. इसके बाद सरकार ने कहा अगर PFI पर तत्काल रोक या नियंत्रण नहीं लगाया गया तो ये संगठन और इसके सहयोगी इस मौके का इस्तेमाल अपनी विध्वंसक गतिविधियों को जारी रखने में करेंगे, जिससे लोक व्यवस्था भंग होगी और राष्ट्र का संवैधानिक ढांचा कमजोर होगा. इन सभी कारणों का हवाला देते हुए आखिर में गृहमंत्री अमित शाह के मंत्रालय के नोटिफिकेशन में लिखा गया,
इसी घोषणा के साथ PFI पर देश में 5 साल का बैन लग गया. इसके पहले सरकार आयकर अधिनयिम के तहत PFI के खातों को भी सीज कर दिया था. अब कोई भी व्यक्ति जो PFI या उससे जुड़े संगठनों का सदस्य रहता है तो उसे गिरफ्तारी का सामना करना पड़ सकता है. इन संगठनों की सदस्यता में शामिल होना भी अपराध माना जाएगा.जैसे ही केंद्र सरकार की तरफ से कार्रवाई की गई. PFI ने एक घंटे बाद संगठन को भंग करने का स्टेटमेंट जारी कर दिया. PFI के जनरल सेक्रेट्ररी ए अब्दुल सत्तार ने बयान जारी कर कहा,
PFI ने एक तरह से फैसले को स्वीकर कर लिया, लेकिन केरल में सक्रिय PFI के राजनीतिक संगठन Social Democratic Party of India यानी SDPI ने इसे बीजेपी सरकार की तानाशाही बताया. यहां हम साफ कर देते हैं कि SDPI पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. क्योंकि किसी भी राजनीतिक पार्टी पर प्रधिबंध लगाने का अधिकार गृह मंत्रालय के पास नहीं है. ये काम चुनाव आयोग के जिम्मे होता है.
यहां गौर करने वाली बात है कि बीजेपी सरकार के इस फैसले का विरोध कांग्रेस भी नहीं कर रही है. सवाल दूसरे हैं मगर सीधे तौर पर PFI के प्रतिबंध पर कोई सवाल नहीं उठाया गया. बीते दिनों राहुल गांधी ने भी कहा था कि किसी भी तरह की रेडिकल एक्टिविटी पर जीरो टॉलरेंस होना चाहिए. केरल में 2002 हुई 8 हिंदुओं की हत्या के बाद तत्कालीन ए के एंटनी सरकार ने भी PFI को SIMI का बदला हुआ स्वरूप करार दिया था. मतलब यही कि सरकार का ये ऐसा फैसला था जिसे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी खारिज नहीं कर पाया. मगर एक दिलचस्प बयान लगातार 12वीं बार RJD अध्यक्ष बने लालू प्रसाद यादव का भी आया. उन्होंने कहा,
RJD अध्यक्ष लालू यादव ने PFI की तुलना बीजेपी के मातृ संगठन RSS से करते हुए उस पर भी बैन की मांग कर डाली. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी RSS भी तीन बार प्रतिबंध झेल चुका है. पहली दफा गांधी की जी की हत्या के बाद गृहमंत्री सरदार पटेल ने 1948 में बैन लगाया था. 4 फरवरी 1948 को सरकार ने RSS पर बैन लगा, 11 जुलाई 1949 को RSS पर से सशर्त प्रतिबंध हटा लिया गया. दूसरी बार 1975 में इमरजेंसी के वक्त बैन लगा,इमरजेंसी हटी. जनता पार्टी की सरकार आई तो बैन हट गया. तीसरी बार 1992 में बाबरी ढांचा गिराए जाने के वक्त बैन लगा. इसके बाद एक बार फिर पुलिस इंक्वायरी हुई. इंक्वायरी में भी सीधे तौर पर RSS के खिलाफ कुछ नहीं मिला. 4 जून 1993 को सरकार ने RSS पर से प्रतिबंध हटा लिया गया. लालू यादव के अलावा कुछ और नेताओं ने RSS पर बैन की मांग की तो जवाब RSS की तरफ से भी आया. आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार ने कहा,
RSS ने खुद पर बैन की बात करने वालों को संविधान के खिलाफ बताया. लगभग हर तरफ से PFI बैन पर प्रतिक्रिया आ चुकी थी. एक व्यक्ति लोगों की विशेष नजर थी कि वो क्या कहते हैं. हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी. उनका भी बयान दोपहर तक आ गया. ये इकलौते नेता हैं जिन्होंने सीधे PFI पर बैन को गलत बताया.
ओवैसी ने अपने बयान में पहले ही डिस्क्लेमर जोड़ दिया. PFI की गतिविधियों से नाइत्तफाकी दिखाई, मगर बैन का सीधे तौर पर विरोध भी कर दिया. मगर दूसरी कोई भी राजनीतिक पार्टी विरोध नहीं कर पाई. अब केंद्र सरकार के लिए सिर्फ एक चुनौती है , वो ये कि सरकार को ये सभी बातें कोर्ट में साबित भी करनी होगी.
वीडियो: अमित शाह की बैठक में PFI बैन पर पेश उस दस्तावेज में क्या लिखा है?

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