ये आर्टिकल 'दी लल्लनटॉप' के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. 'इस्लाम का इतिहास'नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे मेंजानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्तकी घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी कीव्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते परचिट्ठी भेज सकते हैं - writertabish@gmail.com--------------------------------------------------------------------------------इस्लाम के पहले का अरब: भाग 11इस्लाम के पहले अरब में केवल मूर्तिपूजा ही हो रही थी ऐसा नहीं था. मूर्तिपूजा केसाथ-साथ वहां आसपास अन्य धर्म भी फल-फूल रहे थे. यहूदी और ईसाई तो पहले से ही थेवहां. कुछ अन्य पंथ और धर्म भी थे, जो साथ-साथ चल रहे थे. पांचवीं शताब्दी केआते-आते अरबों के बीच इस बात को लेकर एक हीनता बहुत जोर से सर उठा रही थी कि उनकेपास कोई आसमानी किताब और पैगंबर नहीं है. अरब इस बात को लेकर बड़े बेचैन रहते थे किआखिर अल्लाह ने उन्हें आसमानी किताब और पैगंबर से उपेक्षित क्यों रखा?उपेक्षा की ये धारणा इसलिए और भी मज़बूत होती गई क्योंकि यहूदी और ईसाई अपने आप परइस बात का बहुत गर्व करते थे कि ख़ुदा ने उन लोगों को आसमानी किताब और पैगंबर दियाहै. यहूदी हमेशा से अपने आप को ख़ुदा द्वारा धरती पर भेजी गई ख़ास नस्ल समझते थे.ईसाई तो मूर्तिपूजक अरबों की इसी बात को लेकर बहुत हंसी उड़ाते थे.झूठे पैगंबरपांचवी और छठवीं शताब्दी का दौर इस कशमकश से गुज़र रहा था. जहां एक ओर अरबों के भीतरख़ुदा द्वारा उपेक्षित किए जाने दर्द था, वहीं उनके भीतर ये आस भी लगी हुई थी किशायद इस बार अगला पैगंबर उन्हीं में से हो. ये पैगंबर और भविष्यवक्ता कीप्रतिस्पर्धा उस समय इतनी प्रबल हो चुकी थी कि मुहम्मद के आने से पहले से ही कईलोगों ने अपने आपको पैगंबर घोषित कर रखा था. उनके अच्छे खासे समर्थक भी थे. आज केइस्लाम में इन्हें 'False Prophets' या 'झूठे पैगंबर' के नाम से पुकारा जाता है.पैगंबर मुहम्मद के आने से पहले जिस व्यक्ति ने स्वयं को पहले से पैगंबर घोषित कररखा था वो था, मुसैलिम या मुसलमा. इतिहासकार अन्य पैगंबरों के बारे में भी बतातेहैं मगर कोई एतिहासिक सबूत नहीं मिल पाता है. मुसैलिम के बारे में इसलिए अधिकजानकारी उपलब्ध है क्योंकि वो पैगंबर मुहम्मद के इस दुनिया से जाने के बाद भी जीवितरहा. मुहम्मद के जीवन काल में और उसके बाद जिन-जिन प्रमुख लोगों ने अपने आपकोपैगंबर घोषित कर रखा था वो थे, मुसैलिम, तुलैहा, अल-अस्वद, अलसफ़ बिन सय्यद, औरसजाह.पैगंबर और नजूमी एक जैसे ही समझे जाते थेसजाह एक औरत थी और मुहम्मद के जीवन काल में ही उसने स्वयं को पैगंबर घोषित कर रखाथा. उसके भी बहुत भारी मात्रा में समर्थक थे. इस्लामिक इतिहास ये कहता है कि सजाहने ख़ुद को पैगंबर मुहम्मद के जाने के बाद घोषित किया. हालांकि सारे इतिहासकार इस सेसहमत नहीं हैं. क्योंकि सजाह इस से पहले एक बहुत मशहूर भविष्यवक्ता के रूप में जानीजाती थी. उस समय के अरबों के लिए पैगंबर और भविष्यवक्ता में कुछ ख़ास फ़र्क नहीं था.Image: Reutersजब पैगंबर मुहम्मद इस दुनिया से चले गए, तो पहले ख़लीफ़ा अबू-बकर ने 'स्वधर्म त्यागयुद्ध' के नाम से एक सैनिक कार्यवाई शुरू की. जिसमें ऐसे सारे लोगों के ख़िलाफ़ युद्धछेड़ दिया गया, जिन्होंने स्वयं का कोई धर्म चला रखा था या स्वयं को पैगंबर घोषितकिया हुआ था. इस युद्ध का जवाब देने के लिए सजाह (सजाह बिन्त अल-हारिस) ने अपने चारहज़ार समर्थकों के साथ मदीना की ओर प्रस्थान किया. मदीना में भी उसके बहुत से समर्थकउठ खड़े हुए थे. जो इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि सजाह को लोग पहले से पैगंबरस्वीकार कर चुके थे. एक दिन में इतने समर्थक किसी को नहीं मिल जाते. कहा जाता है कितुलैहा ने भी पैगंबर मुहम्मद के आख़िरी दिनों में ही स्वयं को पैगंबर घोषित किया था.बहुत सारे कबीलों ने उसे अपना पैगंबर स्वीकार भी कर लिया था. क़बीलों द्वारा इतनीभारी मात्रा में खड़े हो कर किसी को पैगंबर स्वाकार कर लेना इस बात को और मज़बूत करताहै कि इन 'झूठे पैगंबरों' की गतिविधियां बहुत पुरानी रही होंगी. ऐसा जन समर्थन पानाऔर अपनी सेना खड़ी कर लेना कुछ रातों की बात नहीं होती है. तुलैहा भी एक भविष्यवक्ताथा और उसने ये दावा भी कर रखा था कि उसके पास भी कुरान की तरह आयतें आती हैं.तुलैहा और खलीफा अबू-बकर का युद्धअरब के लोग भविष्यवक्ता के भविष्य बताने को वैसे भी अल्लाह की ज़बान समझते थे. इसलिएउसकी वाणी को अल्लाह की वाणी स्वीकार करना कोई ऐसी बड़ी बात नहीं थी. जितने भीभविष्यवक्ता होते थे उस समय, उन सब की वाणी को अल्लाह की वाणी समझा जाता था. इसलिएहर एक ये दावा करता था कि जैसे मुहम्मद को अल्लाह की वाणी आती है, वैसे उन्हें भीआती है.पहले ख़लीफ़ा अबू-बकर द्वारा चलाये गए स्वधर्म त्याग युद्ध में तुलैहा के साथ अबू-बकरकी सेना का युद्ध हुआ, जिसे 'बुज़ाखा का युद्ध' के नाम से जाना जाता है. इसमेंअबू-बकर की ओर से उनके सेनापति ख़ालिद बिन वलीद के साथ तुलैहा की जंग हुई. इस युद्धमें तुलैहा के पंद्रह हज़ार सैनिक थे, जबकि ख़ालिद के छः हज़ार. अंत में तुलैहा की हारहुई और वो सीरिया भाग गया. बाद में जब मुसलमानों का सीरिया पर कब्ज़ा हो गया, तोउसने इस्लाम अपना लिया. और ख़लीफा उमर के साथ आगे के युद्धों में भी इस्लाम की ओर सेहिस्सा लिया.इस्लाम द्वारा घोषित इन झूठे पैगम्बरों में सबसे रोचक इतिहास है 'मुसैलिमा यामुसलमा का. जिसकी पूरी कहानी, शिक्षा और मुहम्मद के साथ उसके संबंध के बारे में हमअगले भाग में जानेंगे.(इस आर्टिकल का ज़्यादातर रेफरेन्स A.I. Akram, The Sword of Allah: Khalid binal-Waleed, His Life and Campaigns Lahore से लिया गया है)क्रमशः...--------------------------------------------------------------------------------'इस्लाम का इतिहास' की पिछली किस्तें:Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्तियों कीPart 2: कहानी उस शख्स की, जिसने काबा पर कब्ज़ा किया थाPart 3: जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ापार्ट 4: अल्लाह को इकलौता नहीं, सबसे बड़ा देवता माना जाता थापार्ट 5: 'अल्लाह' नाम इस्लाम आने के पहले से इस्तेमाल होता आया हैपार्ट 6:अरब की तीन देवियों की कहानी, जिन्हें अल्लाह की बेटियां माना जाता थापार्ट 7: कहानी काबा में लगे काले पत्थर की, जिसके बारे में अलग-अलग किस्से मशहूरहैंपार्ट 8 : सफा और मारवा पहाड़ियां, जहां से देवता आसिफ और देवी नायेलह की मूर्तियांहटाई गईंपार्ट 9: इस्लाम के आने से पहले औरतों की स्थिति कैसी थी?पार्ट 10: इस्लाम से पहले अरब के लोग शारीरिक संबंधों को लेकर खुली सोच के थेवीडियो: अयोध्या में उस आदमी का इंटरव्यू जिसने बाबरी मस्जिद तोड़ी थी!