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जब गायब हुआ आदम, मुहम्मद साहब से जुड़ा ऐतिहासिक डॉक्युमेंट

कीमत करोड़ों में थी. दस्तावेजों को वापस लाने के लिए पुलिस कमिश्नर ने मस्त फिल्मी तरीका अपनाया.

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विकास टिनटिन
11 दिसंबर 2015 (अपडेटेड: 19 दिसंबर 2015, 07:49 PM IST)
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लंबाई करीब 45 फुट. सोने के पानी से लिखी वंशावली. हजारों साल पुरानी, जिसमें दर्ज था आदम, मुहम्मद साहब और इस्लाम धर्म के सूफियों का इतिहास. 12 अक्टूबर 1986 को राजस्थान के टोंक की एक सरकारी एजेंसी अरबी-फारसी शोध संस्थान से ऐसे ही दो दस्तावेज बेहद फिल्मी अंदाज में गायब हो गए थे. कीमत करोड़ों में थी. लेकिन ये वंशावली और दस्तावेज जिस तरह से गायब हुए थे, उसी तरह से वापस अपनी जगह पर आ गए. वक्त लगा करीब 50 दिन. इसके गायब होने की खबर बेहद दिलचस्प ढंग से बाहर आई. वंशावली की खूबसूरती कुछ ऐसी थी कि देखने वाले देखते रह जाएं. 18वीं शताब्दी में अरब के एक सौदागर ने जब मिस्त्र में बनी इस वंशावली को टोंक के नवाब को दिया तो वो इत्ता खुश हुए कि सौदागर को इसके बदले 3 लाख रुपये दे दिए. उस दौर में ये एक बड़ी रकम थी. इस वंशावली के साथ एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी चोरी हुआ था. टोंक के नवाब की इज्जत आफजाई में अकबर शाह-2 का जारी किया फरमान. इसमें नवाब को शहंशाह का दर्जा दिया गया. ये भी सोने से लिखा कीमती दस्तावेज था. कैसे हुआ गायब? टोंक नवाब के वारिस थे अजीज मियां. अजीज दस्तावेज अरबी फारसी शोध संस्थान से मांगकर ले गए थे. वजह बताई कि जॉर्डन के शाह आ रहे हैं, उनके आगे इनकी नुमाइश करनी है. उस दौर में संस्थान के अध्यक्ष थे शौकल अली खां. उन्होंने दस्तावेज दे दिए कि अजीज लौटा जाएंगे. लेकिन इस बारे में किसी को ज्यादा जानकारी नहीं दी गई. लेकिन जब काफी दिन बीत जाने पर अजीज ने दस्तावेज और सामान नहीं लौटाया, तब उन्होंने पुलिस के पास शिकायत की. खां ने टोंक के पुलिस कमिश्नर को शिकायत दी कि अजीज मियां जयपुर के होटल में इस वंशावली की तस्करी कर रहे हैं. पुलिस ने पहले होटल फिर मियां की कोठी पर छापा मारकर नवाब की इज्जत बयां करता 'फरमान' बरामद कर लिया. लेकिन वंशावली अब तक पहुंच से दूर थी. नवाब की इज्जत से लिए मजे! वंशावली अब तक पुलिस और संस्थान की पहुंच से दूर थी. ऐसे में पुलिस कमिश्नर अनिल खन्ना की तरकीब काम आई. उन्होंने कहा:
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इज्जत की ऐसी फजीहत होता देख अजीज मियां ने फोन कर सुलह करने की बात कही. लेकिन वंशावली की शर्त खन्ना की ओर से लगाने पर मियां ने घुटने टेक किए और वो वंशावली लौटा गए. तब जाकर कहीं वंशावली और फरमान अपनी जगह पे पहुंच सके. लेकिन इसके बाद इन ऐतिहासिक दस्तावेजों की मिल्कियत को लेकर काफी वक्त तक विवाद रहा.

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