लंबाई करीब 45 फुट. सोने के पानी से लिखी वंशावली. हजारों साल पुरानी, जिसमें दर्जथा आदम, मुहम्मद साहब और इस्लाम धर्म के सूफियों का इतिहास. 12 अक्टूबर 1986 कोराजस्थान के टोंक की एक सरकारी एजेंसी अरबी-फारसी शोध संस्थान से ऐसे ही दोदस्तावेज बेहद फिल्मी अंदाज में गायब हो गए थे. कीमत करोड़ों में थी. लेकिन येवंशावली और दस्तावेज जिस तरह से गायब हुए थे, उसी तरह से वापस अपनी जगह पर आ गए.वक्त लगा करीब 50 दिन. इसके गायब होने की खबर बेहद दिलचस्प ढंग से बाहर आई. वंशावलीकी खूबसूरती कुछ ऐसी थी कि देखने वाले देखते रह जाएं. 18वीं शताब्दी में अरब के एकसौदागर ने जब मिस्त्र में बनी इस वंशावली को टोंक के नवाब को दिया तो वो इत्ता खुशहुए कि सौदागर को इसके बदले 3 लाख रुपये दे दिए. उस दौर में ये एक बड़ी रकम थी. इसवंशावली के साथ एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी चोरी हुआ था. टोंक के नवाब की इज्जत आफजाईमें अकबर शाह-2 का जारी किया फरमान. इसमें नवाब को शहंशाह का दर्जा दिया गया. ये भीसोने से लिखा कीमती दस्तावेज था. कैसे हुआ गायब? टोंक नवाब के वारिस थे अजीज मियां.अजीज दस्तावेज अरबी फारसी शोध संस्थान से मांगकर ले गए थे. वजह बताई कि जॉर्डन केशाह आ रहे हैं, उनके आगे इनकी नुमाइश करनी है. उस दौर में संस्थान के अध्यक्ष थेशौकल अली खां. उन्होंने दस्तावेज दे दिए कि अजीज लौटा जाएंगे. लेकिन इस बारे मेंकिसी को ज्यादा जानकारी नहीं दी गई. लेकिन जब काफी दिन बीत जाने पर अजीज नेदस्तावेज और सामान नहीं लौटाया, तब उन्होंने पुलिस के पास शिकायत की. खां ने टोंकके पुलिस कमिश्नर को शिकायत दी कि अजीज मियां जयपुर के होटल में इस वंशावली कीतस्करी कर रहे हैं. पुलिस ने पहले होटल फिर मियां की कोठी पर छापा मारकर नवाब कीइज्जत बयां करता 'फरमान' बरामद कर लिया. लेकिन वंशावली अब तक पहुंच से दूर थी. नवाबकी इज्जत से लिए मजे! वंशावली अब तक पुलिस और संस्थान की पहुंच से दूर थी. ऐसे मेंपुलिस कमिश्नर अनिल खन्ना की तरकीब काम आई. उन्होंने कहा: 'नवाबजादे को अपनी इज्जतप्यारी होगी. रोज सुबह शाम उनकी कोठी पर पुलिस भेजो. पुलिस के सिपाही कोठी पर जाएंऔर दरवाजा खटखटाकर लौट आएं.' इज्जत की ऐसी फजीहत होता देख अजीज मियां ने फोन करसुलह करने की बात कही. लेकिन वंशावली की शर्त खन्ना की ओर से लगाने पर मियां नेघुटने टेक किए और वो वंशावली लौटा गए. तब जाकर कहीं वंशावली और फरमान अपनी जगह पेपहुंच सके. लेकिन इसके बाद इन ऐतिहासिक दस्तावेजों की मिल्कियत को लेकर काफी वक्ततक विवाद रहा.