भगवान कृष्ण को एक बार एक बड़ा आरोप झेलना पड़ा था. बहुत पापड़ बेलने के बाद उन्हेंउस कलंक से मुक्ति मिली. और तो और, इस दौरान उनकी मौत की अफवाह भी फैल गई थी. कहानीइस तरह है. एक था राजा सत्राजित. तपस्या से खुश होकर भगवान सूर्य ने उसे एक मणि दीथी, जिसे 'स्यमंतक मणि कहते थे.' मणि इतनी जोर की लाइट मारती थी कि सत्राजित जब उसेगले में लटकाकर नगर में घुसे तो सब लोग यों कहते हुए दौड़ने लगे कि 'देखो सूर्य जारहे हैं.' घर पहुंचकर सत्राजित ने यह मणि अपने प्राणों से प्यारे छोटे भाईप्रसेनजित को दे दी. भगवान कृष्ण भी इस मणि पर मुग्ध थे. उन्होंने प्रसेन से वह मणिमांगी, लेकिन प्रसेन ने नहीं दी. समर्थ होने पर भी कृष्ण ने जबरदस्ती मणि नहींछीनी. लेकिन फिर एक अनहोनी घटी. 'शो ऑफ' के नशे में चूर प्रसेनजित मणि लटकाकर शिकारखेलने गए थे. वहां एक शेर ने उनका काम तमाम कर दिया और मणि को मुंह में दबाकरदौड़ने लगा. इतने में वहां रीछों के राजा जाम्बवान आ निकले. उन्होंने शेर को मारडाला और उससे मणि लेकर अपनी गुफा में चले गए. उधर राजा प्रसेनजित की फैमिली का शकगया कृष्ण पर. उन्हें लगा कि कृष्ण ने ही मणि के लिए प्रसेनजित की हत्या की है,क्योंकि उन्होंने एक बार मणि मांगी भी थी. जाहिर है झूठा आरोप था, कृष्ण को नागवारगुजरा. उन्होंने अपने भाई बलराम और कुछ यादवों को साथ लिया और अपनी बेगुनाही साबितकरने निकल पड़े. राजा के कदमों के निशान का पीछा करते हुए उन्हें घोड़े और राजा कीलाश मिल गई. थोड़ी ही दूर पर शेर की लाश भी मिली. रीछ जाम्बवान भी अपने कदमों केनिशान से पहचाना गया. कृष्ण जाम्बवान की गुफा के बाहर पहुंचे तो उन्हें भीतर से एकमहिला की आवाज सुनाई दी जो संभवत: अपने बच्चे से कह रही थी कि यह मणि अब तेरी हीहै. यह आवाज सुनकर कृष्ण ने बलराम और सैनिकों को वहीं दरवाजे पर बैठा दिया और खुदगुफा के भीतर गए. वहां उनके और महाबली जाम्बवान के बीच पूरे 21 दिनों तक कुश्तीचली. इस बीच बलराम और उनके साथी सैनिक द्वारका लौट आए और सबको कृष्ण के मारे जानेकी खबर कर दी. लेकिन कृष्ण तो कृष्ण थे. उन्होंने जाम्बवान को हराया और फिर उसी केअनुरोध पर उसकी कन्या जाम्बवती को ग्रहण किया. वहां से मणि लेकर कृष्ण चल पड़े औरराजा सत्राजित को मणि सौंपकर अपनी बेगुनाही साबित की. (ब्रह्म पुराण, गीताप्रेस,44,45,46 )