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'धर्म संसद' में हो रही भड़काऊ बयानबाजी पर कब होगी कार्रवाई?

पुलिस ने इस मामले में अबतक क्या किया?

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जंतर मंतर पर 5 फरवरी को हुई सभा (वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट: ट्विटर)
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अभिनव पाण्डेय
6 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 6 फ़रवरी 2023, 10:51 PM IST)
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2023 का साल वैश्विक दुनिया के लिहाज से हिंदुस्तान के लिए काफी अहम होने वाला है. यही वो साल हैं जब हम G-20 मीटिंग की सदारत करने वाले हैं. इस इंटर नेशनल इकॉनमिक फोरम के मौजूदा चेयरमैन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. राजधानी दिल्ली समेत देश के अलग-अलग शहरों में तैयारियां जोरों पर है, जहां-जहां कार्यक्रम होने हैं वहां सरकारी अमला पूरी तत्परता से जुटा है. टैग लाइन है वसुधैव कुटुंबकम. 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिंदुस्तान आने वाले हैं तो पूरी दुनिया की नजर इधर ही बनी हुई है. मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा. जनवरी जैसे-तैसे बीता ही था कि फरवरी के पहले हफ्ते में फिर से भड़काऊ धर्म संसद हो गई. मुसलमान और ईसाईयों को काटने मारने के आह्वान किए गए. वो भी राजधानी दिल्ली में.

4 फरवरी की दोपहर बागेश्वर धाम के ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से एक पोस्टर ट्वीट किया गया. पोस्टर में लिखा गया, पहुंचो जंतर-मंतर, बागेश्वर धाम महाराज जी के समर्थन में. थीम रखी गई सनातन धर्म संसद. दिन रविवार, तारीख 5 फरवरी और वक्त सुबह 10 बजे. इस पोस्टर के बाद बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के समर्थन में दिल्ली के जंतर-मंतर पर दर्जनों लोग जुट गए. कुछ दिन पहले विवादों में आने के बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने बयान दिया था- 

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इसी को कोर एजेंडा बनाकर कई अतिवादी संगठन के लोग पहुंचे. जिसमें कुछ साधु संत के वेष में भी थे. मगर उनकी बातें असल संतों जैसी कतई नहीं थी.

देश की राजधानी में खड़े होकर मारने-काटने की बात करना. दूसरे धर्म के लोगों को अपशब्द कहना, ये कौन सा धर्म है और कैसी धर्म संसद. और बात यहां किसी धर्म की नहीं बल्कि देश के कानून की है. वो कानून जो इस तरह के भड़काऊ आयोजनों को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है. वो कानून जो इस तरह का बयान देने वालों को जेल में डालने के लिए बने हैं. मगर क्या दिल्ली पुलिस ने कोई कार्रवाई की? जिसने ये बयान दिया, उनका नाम महामंडलेश्वर हरि सिंह बताया जा रहा है. हमने देखा है बड़े हिंसक दंगों की शुरुआत इसी तरह के उकसाऊ बयानों से होती है. जिन्हें शुरू में पुलिस नजरअंदाज कर देती है. यहां भी वही हुआ. हिंसक और भड़काऊ बयानों से भरपूर आयोजन में देश के कुछ नेताओं को गोली मार देने की भी बात कही गई.

ऐसा पहली बार नहीं है कि दिल्ली में इस तरह का आयोजन हुआ है. बीते बरस की ही बात है जब बीजेपी के सांसद, विधायक इसी तरह की बातें कर रहे थे. ना तब कोई कार्रवाई हुई, ना अब. बागेश्वर वाले बाबा के समर्थन में हिंदू राष्ट्र बनाने को लेकर नारेबाजी हुई. भीड़ दिखाने के लिए स्कूली बच्चों तक को लाया गया. भारतीय संविधान की धारा 51-A(H) कहती है कि  'वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानवता और सवाल व सुधार की भावना का विकास करना' हर नागरिक का दायित्व है. वैज्ञानिक चेतना के साथ ही संविधान ही सभी धर्मों को बराबर का दर्जा देता है. तो ये देश संविधान से चलेगा या फिर इन जैसों के बयानों से? बात इनकी संख्या की नहीं है. बात चलन की है जो लगातार बढ़ता जा रहा है.

यहां से आते हैं कुछ गंभीर सवाल. पहला ये कि ऐसे आयोजनों के लिए अनुमति पुलिस किस आधार पर देती है? क्या ऐसे आयोजनों की निगरानी की जाती है? और कोई भड़काऊ बयान दिया गया तो उस पर फौरी कार्रवाई क्यों नहीं होती है? कभी धर्म संसद के नाम पर भड़काऊ बयान दिए जाते हैं, तो कभी महापंचायतें बुलाकर ये काम किया जाता है. तो कभी किसी क्षेत्रिय दल से जुड़ा नेता बहुसंख्यक आबादी को धमका देता है. और इन सारे कार्यक्रमों में एक पैटर्न देखने को मिलता है. पहले कार्यक्रम होते हैं, फिर इनके बयान वायरल होते हैं. फिर इन वायरल बयानों के आधार पर पुलिस से सवाल किये जाते हैं कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई. तब पुलिस टका सा जवाब दे देती है - हमें तो शिकायत ही नहीं मिली. जब मामला हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाता है, तब जाकर भोली-भाली पुलिस हरकत में आती है. ये दिल्ली से भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा के हेट स्पीच वाले मामले में दोहराई गई तो सुप्रीम कोर्ट ने बुरी तरह से दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई थी.

21 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के एम जोज़फ और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ के समक्ष एक याचिका आई. इसमें भारत में मुस्लिम समुदाय की बढ़ती टार्गेटिंग को रोकने हेतु तुरंत दखल देने की अपील थी. याचिकाकर्ताओं की दलील थी, कि हेट स्पीच और नरसंहार का कॉल देने वालों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं होती. सिर्फ सामान्य धाराओं में FIR दर्ज कर ली जाती है. ऐसे में न्यायालय को भारत सरकार और राज्य सरकारों को ये निर्देश देना चाहिए कि हेट स्पीच और हेट क्राइम के मामलों की गंभीरता से जांच हो. जो लोग हेट स्पीच वाले कार्यक्रम आयोजित करते हैं, उनके खिलाफ Unlawful Activities Prevention Act (uapa) और दूसरे सख्त कानूनों के तहत दंडात्मक कार्रवाई हो.

सारे तर्क सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सख्त फैसला दिया. कोर्ट ने दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर कहा कि वे स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करके बताएं कि उन्होंने हेट स्पीच के मामलों में क्या कार्रवाई की? न्यायालय ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ये बिलकुल साफ कर दिया था कि अब कहीं भी हेट स्पीच या हेट क्राइम का मामला सामने आता है तो पुलिस शिकायत मिलने का इंतजार नहीं कर सकती. उसे स्वत: संज्ञान लेकर मामला दाखिल करना होगा और आरोपियों के खिलाफ उपयुक्त कदम उठाने होंगे. इस बाबत संबंधित राज्य सरकारों को अपने यहां निर्देश जारी करने का आदेश दिया गया है. न्यायालय ने ये भी साफ कर दिया कि अगर उसके फैसले का पालन नहीं हुआ, तो ये सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के रूप में देखा जाएगा.

मतलब कि अब पुलिस ये बहाना नहीं कर सकती है कि उससे किसी ने शिकायत ही नहीं की. आज तक के रिपोर्टर अरविंद ओझा ने इस पर पुलिस की प्रतिक्रिया जाननी चाही. अधिकारियों से बात करने पर वही पुराना बहाना सुनने को मिला. कहा गया- पुलिस को कोई शिकायत अभी तक नहीं मिली है, FIR दर्ज नहीं है. सोशल मीडिया के जरिए मामला संज्ञान है, लीगल प्रोसेस कर रहे हैं.

साफ है कि दिल्ली पुलिस ने लापरवाही की है. दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र के अधीन काम करती है. केंद्र में बीजेपी की सरकार है और गृहमंत्री अमित शाह. क्या ऊपर बैठे लोग, पुलिस की जवाबदेही तय करेंगे? आप सोच रहे होंगे राजधानी दिल्ली में इस तरह से दूसरे धर्म के लोगों को मारने काटने की बात हो गई. क्या दिल्ली पुलिस ने कुछ नहीं किया. हम कहेंगे हां किया है. नीरज झा नाम के एक पत्रकार, जिसने घटना को रिपोर्ट किया. उसके लिए डीसीपी नई दिल्ली के ऑफिस ने नोटिस जारी कर दिया. नोटिस में लिखा गया कि ये पाया गया है कि आपने सोशल मीडिया का इस्तेमाल आक्रामक, दुर्भावनापूर्ण और भड़काने वाली बात शेयर की है. साइबर सेल आपके खिलाफ नोटिस को देख रही है, CRPC की धारा 149 के तहत आपके खिलाफ नोटिस जारी हुआ है. नोटिस में स्ट्रिक्ट पैनल एक्शन की बात कही गई. जिसने आयोजन किया, जिसके नाम पर आयोजन हुआ, जिसने भाषण दिया, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं. मगर जिसने घटना को रिपोर्ट किया, उस पत्रकार को नोटिस थमा दिया. ये तो तरीका है दिल्ली पुलिस का.

जरूरी है कि इस तरह के भाषणों पर, चाहे वो किसी भी धर्म के नेता, साधु, मौलवी, पादरी की तरफ से दिया जाए. उसे पुलिस तत्काल संज्ञान में लेकर कार्रवाई करे. ना कि अपनी हताशा रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों को नोटिस भेज कर दिखाए.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: बागेश्वर वाले धीरेंद्र शास्त्री के समर्थन में धर्म संसद करने वालों ने जो कहा उस पर कार्रवाई कब?

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