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हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले BSP-INLD के साथ आने के पीछे असली खेल क्या है?

हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले INLD और BSP एक बार फिर साथ आई हैं. Akash Anand ने यहां तक कह दिया कि अगर गठबंधन जीतता है तो Abhay Chautala मुख्यमंत्री बनेंगे.

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Haryana Election
INLD और बसपा की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अभय चौटाला और आकाश आनंद की तस्वीर. (Facebook/INLD)
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सौरभ
12 जुलाई 2024 (अपडेटेड: 17 जुलाई 2024, 05:45 PM IST)
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लोकसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं, लेकिन हरियाणा की सियासत में नित नए रंग आए दिन दिखाई दे रहे हैं. क्योंकि हरियाणा के लिए लोकसभा चुनाव सेमीफाइनल था, फाइनल मुकाबला तो कुछ ही महीने में होने वाले विधानसभा चुनाव को माना जा रहा है. राज्य की सियासी बिसात में दो मोर्चों से खबरें आई हैं. कहा जा रहा दोनों के मायने उतने भर नहीं हैं जितना बताया और दिखाया जा रहा है.

पहली खबर तो ये कि मायावती की बीएसपी इस बार हरियाणा में कुछ ज्यादा ही जोश में नज़र आ रही है. उन्होंने ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी INLD से गठबंधन कर लिया है. और दूसरी खबर ये है कि भाजपा ने राज्य में अपना नया अध्यक्ष नियुक्त किया है. ये दोनों फैसले चुनाव में कितना असर डालेंगे? इन दोनों घटनाक्रमों से कांग्रेस का कोई लेना-देना नहीं है, पर क्या उसकी सियासत पर भी असर पड़ेगा?

INLD-BSP गठबंधन

बसपा की जड़ें उत्तर प्रदेश में ही जमी हैं. मगर आलम ये है कि यूपी में मायावती की पार्टी के पास विधानसभा में एक सीट है और लोकसभा में एक भी सीट नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे कहते हैं कि बसपा अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. और कुछ ऐसा ही हाल चौटाला की पार्टी भारतीय राष्ट्रीय लोकदल (INLD) का भी है. हरियाणा विधासभा में INLD की एक सीट है और लोकसभा में एक भी नहीं.

हरियाणा चुनाव से पहले दोनों पार्टियां एक बार फिर साथ आई हैं. बीएसपी के नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद ने कहा कि 6 जुलाई को मायावती और अभय चौटाला के बीच विस्तार से सीटों पर चर्चा हुई. 90 में से 37 सीटों पर बीएसपी चुनाव लड़ेगी और बाकी पर INLD. 11 जुलाई को नया गांव में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए INLD नेता अभय चौटाला ने कहा कि यह गठबंधन किसी स्वार्थ पर आधारित नहीं है, बल्कि लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है.

INLD जाट पॉलिटिक्स के लिए जानी जाती है और बसपा को दलितों की पार्टी कहा जाता है. हरियाणा में करीब 28 प्रतिशत जाट आबादी है और करीब 20 प्रतिशत दलित. दोनों को मिलाकर राज्य की करीब आधी जनसंख्या बनती है. यानी हरियाणा में दोनों समाज मिलकर भी और अकेले भी सरकार बनाने और बिगाड़ने की हैसियत रखते हैं. और गौर करने की बात ये है कि बीते लोकसभा चुनाव में ये दोनों वोट बैंक कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुए.

CSDS-लोकनीति के चुनावों के बाद के सर्वे बताते हैं कि 64 प्रतिशत जाटों ने इस बार कांग्रेस को वोट दिया. जबकि बीजेपी को सिर्फ 27 फीसदी वोट मिल पाया. दलितों की बात करें तो, इस समाज के 68 फीसदी वोटरों ने कांग्रेस को वोट दिया. जो कि 2019 के मुकाबले 40 फीसदी ज्यादा है. जबकि बीजेपी को सिर्फ 24 प्रतिशत वोट मिले. नतीजा ये रहा कि बीजेपी 2019 के 58 प्रतिशत वोट से फिसल कर इस बार 46 प्रतिशत पर आ गई. और कांग्रेस 28 प्रतिशत से 44 पर पहुंच गई. कांग्रेस शून्य सीट से पांच पर आ गई. और बीजेपी 10 से पांच पर पहुंच गई.

लेकिन राज्य में इन्हीं दोनों वोट बैंक पर दावा करने वाली दो अलग-अलग पार्टियां अब साथ आ गई हैं. लोकसभा के नतीजों के पैटर्न को देखा जाए तो ये गठबंधन कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकता है. मगर सवाल है कितना नुकसान.

इस पर हमने बात की हरि भूमि से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र कांवड़ी से बात की. उनका मानना है कि-

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2019 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 4.2 प्रतिशत वोट मिले थे. जो इस बार लोकसभा में घटकर 1.3 पर्सेंट पर आ गया. जबकि चौटाला की पार्टी को पिछले विधासभा चुनाव में 2.5 प्रतिशत वोट मिले थे, जो इस बार घटकर 1.7 पर्सेंट पर आ गया.

INLD के पास विधासभा में सिर्फ एक सीट है. वो भी प्रधान महासचिव अभय चौटाला की ऐलनाबाद विधानसभा. 28 जनवरी, 2021 को अभय चौटाला ने किसान आंदोलन के दौरान किसानों के समर्थन में विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. हालांकि, दोबारा चुनाव हुए और दोबारा चौटाला ही जीत कर आए. बसपा के पास राज्य में एक भी सीट नहीं है. मीडिया से बातचीत के दौरान आकाश आनंद ने कहा कि अगर उनका गठबंधन चुनाव जीतता है तो अभय चौटाला ही मुख्यमंत्री बनेंगे.

हालांकि, INLD-BSP गठबंधन पर हरियाणा की राजनीति को तीन दशक से बारीकी से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र सिंह कुछ अलग राय रखते हैं. उन्होंने आरोपनुमा लहज़े में कहा कि इस गठबंधन के पीछे बीजेपी का हाथ भी हो सकता है. हालांकि उन्होंने भी इस बात पर सहमति दर्ज कराई कि इस गठबंधन से कुछ सीटों पर दलित और जाट वोटबैंक कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं. हालांकि इसका दायरा सीमित ही रहने की संभावना है.

कांग्रेस की बात करें तो भूपेंद्र हुड्डा के रूप में पार्टी के पास एक बड़ा जाट लीडर है. जिसकी सरपरस्ती में ही कांग्रेस आगे बढ़ रही है. लोकसभा चुनाव में भी हुड्डा हावी रहे. और सगंठन में भी हुड्डा की ही चलती है. दूसरी तरफ कुमारी सैलजा के रूप में कांग्रेस के पास दलित नेता भी है. इस चुनाव में भले ही आरक्षण के मुद्दे ने कांग्रेस को दलितों का वोट दिलवाया हो, लेकिन पार्टी की नज़र इस वोट बैंक पर लंबे समय से रही है. कांग्रेस ने हरियाणा में 2007 से अब तक किसी ना किसी दलित नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. 2007 में फूलचंद मुलाना. 2014 में अशोक तंवर, जो अब बीजेपी में हैं. 2019 में कुमारी सैलजा. और 2022 में उदयभान. यानी पिछले 17 साल से हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष दलित नेता ही रहा है.

यानी एक बात तो साफ है कि बीजेपी जहां हरियाणा में नॉन-जाट पॉलिटिक्स को बढ़ावा दे रही है, वहीं कांग्रेस की नज़र जाट और दलितों पर लंबे समय से है. ऐसे में रविंद्र सिंह की बात में कितनी सच्चाई है और INLD-BSP गठबंधन कांग्रेस को कितना नुकसान और बीजेपी को कितना फायदा पहुंचाएगा, अगले कुछ महीनों में साफ हो जाएगा.

बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष

मनोहर लाल खट्टर के इस्तीफे के बाद नायब सिंह सैनी हरियाणा के नए मुख्यमंत्री बने तो बीजेपी ने प्रदेश में नए पार्टी अध्यक्ष की तलाश शुरू की. जो मोहनलाल बड़ौली के रूप में पूरी हुई. बड़ौली सोनीपत जिले की राई सीट से विधायक हैं. उन्होंने इस बार सोनीपत सीट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा. लेकिन कांग्रेस के सतपाल ब्रह्मचारी से हार गए.

बड़ौली को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने इस बार ब्राह्मण चेहरे को आगे किया है. इससे पहले हरियाणा में दो ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं राम विलास शर्मा और रमेश जोशी. बड़ौली तीसरे हैं. बीजेपी के इस फैसले पर रविंद्र सिंह कहते हैं,

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यहां एक और बात को रेखांकित करने की जरूरत है. प्रदेश अध्यक्ष बड़ौली ब्राह्मण समाज से आते हैं, जिनकी आबादी करीब 12 प्रतिशत है. मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी OBC वर्ग से आते हैं. हरियाणा में OBC आबादी जिसमें जाट शामिल नहीं हैं, 20 प्रतिशत है. और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर पंजाबी समुदाय से आते हैं जिनकी आबादी करीब 20 फीसदी है.

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