आज जयशंकर प्रसाद का जन्मदिन है. प्रसाद प्रेमचंद के जमाने में हुए. दोनों दोस्तनहीं थे. दुश्मन भी नहीं थे. भले मानस जैसे होते हैं आपस में. वैसे ही थे. मगर उनकेबाद के जमाने ने खूब जतन किए. सचिन बनाम सौरव और सलमान वर्सेस शाहरुख की तर्ज पर.लोग भूल जाते हैं कि हर महानता अपने मापे जाने का एक अलग पैमाना लेकर आती है. दूधवाले नपने में सिल्क नहीं भरा जाता और थान में मलाई नहीं लपेटी जाती. प्रसाद महानहैं. उन्होंने एक बहुत लंबा काव्य लिखा. महाकाव्य. कामायनी. कोर्स में था. तब भीसमझ नहीं आया. जटिल दर्शन. दर्शन से कभी बच्चों के होंठों से होकर आती दूध सी खुशबूनहीं आ सकती क्या? वो मां की बनाई रोटी सा सा निखालिस गोल, गोरा-भूरा, गर्म और छूतेही राहत देने वाला क्यों नहीं हो सकता? दार्शनिक ही बता सकते हैं. प्रसाद कीकहानियां खूब लुभाती हैं. दो तो यूपी बोर्ड में कोर्स में ही लगी थीं. 'आकाशदीप' और'गुंडा'. आकाशदीप समझने के लिए समझ चाहिए. 'गुंडा' अपने साथ समझ लेकर भीतर उतरतीहै. बुरी लेकिन सम्मोहक संगत की तरह. पहले पल से ही. इस कहानी की आखिरी लाइन मरनेके बाद मेरी राख भी सुना सकती है... वह काशी का गुंडा था. एक बात और. ठीक रहाजयशंकर प्रसाद मर गए. समय से मर गए. अपने समय में ही मर गए. जीते रहते तो आज भाजपाईकरार दिए जाते. इधर क्या है कि जो भी राष्ट्र की बात करता है, उसकी पर्ची काट दीजाती है. और प्रसाद ने तो अपने तमाम नाटकों, कहानियों, कविताओं में बार बार भारत,उसके गौरवशाली अतीत और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए शब्द-भाव खर्चे. बड़े स्खलित समयमें जीने का नुकसान उठा रहे हैं हम आप. हर कोई आवेश में है. पर ये सब निपट बुदबुदा.रत्ती भर न ठहरे. असल में बनने-बिगाड़ने के लिए आवेग चाहिए. उसी को मिलेगा. जोसत्यार्थ समझेगा. जीवन का. जैसे इस गुंडे ने समझा. आइए मिलते हैं. काशी के गुंडेसे.-------------------------------------------------------------------------------- जयशंकर प्रसाद की अमर कहानी: गुंडा वह पचास वर्ष से ऊपर था. तब भी युवकों से अधिकबलिष्ठ और दृढ़ था. चमड़े पर झुर्रियाँ नहीं पड़ी थीं. वर्षा की झड़ी में, पूस कीरातों की छाया में, कड़कती हुई जेठ की धूप में, नंगे शरीर घूमने में वह सुख मानताथा. उसकी चढ़ी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह, देखनेवालों की आँखों में चुभती थीं.उसका साँवला रंग, साँप की तरह चिकना और चमकीला था. उसकी नागपुरी धोती का लाल रेशमीकिनारा दूर से ही ध्यान आकर्षित करता. कमर में बनारसी सेल्हे का फेंटा, जिसमें सीपकी मूठ का बिछुआ खुँसा रहता था. उसके घुँघराले बालों पर सुनहले पल्ले के साफे काछोर उसकी चौड़ी पीठ पर फैला रहता. ऊँचे कन्धे पर टिका हुआ चौड़ी धार का गँड़ासा, यहभी उसकी धज! पंजों के बल जब वह चलता, तो उसकी नसें चटाचट बोलती थीं. वह गुंडा था.ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में वही काशी नहीं रह गयी थी, जिसमेंउपनिषद् के अजातशत्रु की परिषद् में ब्रह्मविद्या सीखने के लिए विद्वान ब्रह्मचारीआते थे. गौतम बुद्ध और शंकराचार्य के धर्म-दर्शन के वाद-विवाद, कई शताब्दियों सेलगातार मंदिरों और मठों के ध्वंस और तपस्वियों के वध के कारण, प्राय: बन्द-से होगये थे. यहाँ तक कि पवित्रता और छुआछूत में कट्टर वैष्णव-धर्म भी उस विशृंखलता में,नवागन्तुक धर्मोन्माद में अपनी असफलता देखकर काशी में अघोर रूप धारण कर रहा था. उसीसमय समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्र-बल के सामने झुकते देखकर, काशी केविच्छिन्न और निराश नागरिक जीवन ने, एक नवीन सम्प्रदाय की सृष्टि की. वीरता जिसकाधर्म था. अपनी बात पर मिटना, सिंह-वृत्ति से जीविका ग्रहण करना, प्राण-भिक्षामाँगनेवाले कायरों तथा चोट खाकर गिरे हुए प्रतिद्वन्द्वी पर शस्त्र न उठाना, सतायेनिर्बलों को सहायता देना और प्रत्येक क्षण प्राणों को हथेली पर लिये घूमना, उसकाबाना था. उन्हें लोग काशी में गुंडा कहते थे. जीवन की किसी अलभ्य अभिलाषा से वञ्चितहोकर जैसे प्राय: लोग विरक्त हो जाते हैं, ठीक उसी तरह किसी मानसिक चोट से घायलहोकर, एक प्रतिष्ठित जमींदार का पुत्र होने पर भी, नन्हकूसिंह गुंडा हो गया था.दोनों हाथों से उसने अपनी सम्पत्ति लुटायी. नन्हकूसिंह ने बहुत-सा रुपया खर्च करकेजैसा स्वाँग खेला था, उसे काशी वाले बहुत दिनों तक नहीं भूल सके. वसन्त ऋतु में यहप्रहसनपूर्ण अभिनय खेलने के लिए उन दिनों प्रचुर धन, बल, निर्भीकता और उच्छृंखलताकी आवश्यकता होती थी. एक बार नन्हकूसिंह ने भी एक पैर में नूपुर, एक हाथ में तोड़ा,एक आँख में काजल, एक कान में हजारों के मोती तथा दूसरे कान में फटे हुए जूते कातल्ला लटकाकर, एक जड़ाऊ मूठ की तलवार, दूसरा हाथ आभूषणों से लदी हुई अभिनय करनेवालीप्रेमिका के कन्धे पर रखकर गाया था- ‘‘कहीं बैगनवाली मिले तो बुला देना.’’ प्राय:बनारस के बाहर की हरियालियों में, अच्छे पानीवाले कुओं पर, गंगा की धारा में मचलतीहुई डोंगी पर वह दिखलाई पड़ता था. कभी-कभी जूआखाने से निकलकर जब वह चौक में आ जाता,तो काशी की रँगीली वेश्याएँ मुस्कराकर उसका स्वागत करतीं और उसके दृढ़ शरीर कोसस्पृह देखतीं. वह तमोली की ही दूकान पर बैठकर उनके गीत सुनता, ऊपर कभी नहीं जाताथा. जूए की जीत का रुपया मुठ्ठियों में भर-भरकर, उनकी खिडक़ी में वह इस तरह उछालताकि कभी-कभी समाजी लोग अपना सिर सहलाने लगते, तब वह ठठाकर हँस देता. जब कभी लोग कोठेके ऊपर चलने के लिए कहते, तो वह उदासी की साँस खींचकर चुप हो जाता. वह अभी वंशी केजूआखाने से निकला था. आज उसकी कौड़ी ने साथ न दिया. सोलह परियों के नृत्य में उसकामन न लगा. मन्नू तमोली की दूकान पर बैठते हुए उसने कहा-‘‘आज सायत अच्छी नहीं रही,मन्नू!’’ ‘‘क्यों मालिक! चिन्ता किस बात की है. हम लोग किस दिन के लिए हैं. सब आपही का तो है.’’ ‘‘अरे, बुद्धू ही रहे तुम! नन्हकूसिंह जिस दिन किसी से लेकर जूआखेलने लगे उसी दिन समझना वह मर गये. तुम जानते नहीं कि मैं जूआ खेलने कब जाता हूँ.जब मेरे पास एक पैसा नहीं रहता; उसी दिन नाल पर पहुँचते ही जिधर बड़ी ढेरी रहती है,उसी को बदता हूँ और फिर वही दाँव आता भी है. बाबा कीनाराम का यह बरदान है!’’ ‘‘तबआज क्यों, मालिक?’’ ‘‘पहला दाँव तो आया ही, फिर दो-चार हाथ बदने पर सब निकल गया. तबभी लो, यह पाँच रुपये बचे हैं. एक रुपया तो पान के लिए रख लो और चार दे दो मलूकीकथक को, कह दो कि दुलारी से गाने के लिए कह दे. हाँ, वही एक गीत- ‘‘विलमि विदेशरहे.’’ नन्हकूसिंह की बात सुनते ही मलूकी, जो अभी गाँजे की चिलम पर रखने के लिएअँगारा चूर कर रहा था, घबराकर उठ खड़ा हुआ. वह सीढिय़ों पर दौड़ता हुआ चढ़ गया. चिलमको देखता ही ऊपर चढ़ा, इसलिए उसे चोट भी लगी; पर नन्हकूसिंह की भृकुटी देखने कीशक्ति उसमें कहाँ. उसे नन्हकूसिंह की वह मूर्ति न भूली थी, जब इसी पान की दूकान परजूएखाने से जीता हुआ, रुपये से भरा तोड़ा लिये वह बैठा था. दूर से बोधीसिंह कीबारात का बाजा बजता हुआ आ रहा था. नन्हकू ने पूछा-‘‘यह किसकी बारात है?’’ ‘‘ठाकुरबोधीसिंह के लड़के की.’’-मन्नू के इतना कहते ही नन्हकू के ओठ फड़कने लगे. उसनेकहा-‘‘मन्नू! यह नहीं हो सकता. आज इधर से बारात न जायगी. बोधीसिंह हमसे निपटकर तबबारात इधर से ले जा सकेंगे.’’ मन्नू ने कहा-‘‘तब मालिक, मैं क्या करूँ?’’ नन्हकूगँड़ासा कन्धे पर से और ऊँचा करके मलूकी से बोला-‘‘मलुकिया देखता है, अभी जा ठाकुरसे कह दे, कि बाबू नन्हकूसिंह आज यहीं लगाने के लिए खड़े हैं. समझकर आवें, लड़के कीबारात है.’’ मलुकिया काँपता हुआ ठाकुर बोधीसिंह के पास गया. बोधीसिंह और नन्हकू सेपाँच वर्ष से सामना नहीं हुआ है. किसी दिन नाल पर कुछ बातों में ही कहा-सुनी होकर,बीच-बचाव हो गया था. फिर सामना नहीं हो सका. आज नन्हकू जान पर खेलकर अकेला खड़ा है.बोधीसिंह भी उस आन को समझते थे. उन्होंने मलूकी से कहा-‘‘जा बे, कह दे कि हमको क्यामालूम कि बाबू साहब वहाँ खड़े हैं. जब वह हैं ही, तो दो समधी जाने का क्या कामहै.’’ बोधीसिंह लौट गये और मलूकी के कन्धे पर तोड़ा लादकर बाजे के आगे नन्हकूसिंहबारात लेकर गये. ब्याह में जो कुछ लगा, खर्च किया. ब्याह कराकर तब, दूसरे दिन इसीदूकान तक आकर रुक गये. लड़के को और उसकी बारात को उसके घर भेज दिया. मलूकी को भी दसरुपया मिला था उस दिन. फिर नन्हकूसिंह की बात सुनकर बैठे रहना और यम को न्योता देनाएक ही बात थी. उसने जाकर दुलारी से कहा-‘‘हम ठेका लगा रहे हैं, तुम गाओ, तब तकबल्लू सारंगीवाला पानी पीकर आता है.’’ ‘‘बाप रे, कोई आफत आयी है क्या बाबू साहब?सलाम!’’-कहकर दुलारी ने खिडक़ी से मुस्कराकर झाँका था कि नन्हकूसिंह उसके सलाम काजवाब देकर, दूसरे एक आनेवाले को देखने लगे. हाथ में हरौती की पतली-सी छड़ी, आँखोंमें सुरमा, मुँह में पान, मेंहदी लगी हुई लाल दाढ़ी, जिसकी सफेद जड़ दिखलाई पड़ रहीथी, कुव्वेदार टोपी; छकलिया अँगरखा और साथ में लैसदार परतवाले दो सिपाही! कोई मौलवीसाहब हैं. नन्हकू हँस पड़ा. नन्हकू की ओर बिना देखे ही मौलवी ने एक सिपाही सेकहा-‘‘जाओ, दुलारी से कह दो कि आज रेजिडेण्ट साहब की कोठी पर मुजरा करना होगा, अभीचले, देखो तब तक हम जानअली से कुछ इत्र ले रहे हैं.’’ सिपाही ऊपर चढ़ रहा था औरमौलवी दूसरी ओर चले थे कि नन्हकू ने ललकारकर कहा-‘‘दुलारी! हम कब तक यहाँ बैठेरहें! क्या अभी सरंगिया नहीं आया?’’ दुलारी ने कहा-‘‘वाह बाबू साहब! आपही के लिए तोमैं यहाँ आ बैठी हूँ, सुनिए न! आप तो कभी ऊपर...’’ मौलवी जल उठा. उसने कड़ककरकहा-‘‘चोबदार! अभी वह सुअर की बच्ची उतरी नहीं. जाओ, कोतवाल के पास मेरा नाम लेकरकहो कि मौलवी अलाउद्दीन कुबरा ने बुलाया है. आकर उसकी मरम्मत करें. देखता हूँ तो जबसे नवाबी गयी, इन काफिरों की मस्ती बढ़ गयी है.’’ कुबरा मौलवी! बाप रे-तमोली अपनीदूकान सम्हालने लगा. पास ही एक दूकान पर बैठकर ऊँघता हुआ बजाज चौंककर सिर में चोटखा गया! इसी मौलवी ने तो महाराज चेतसिंह से साढ़े तीन सेर चींटी के सिर का तेलमाँगा था. मौलवी अलाउद्दीन कुबरा! बाजार में हलचल मच गयी. नन्हकूसिंह ने मन्नू सेकहा-‘‘क्यों, चुपचाप बैठोगे नहीं!’’ दुलारी से कहा-‘‘वहीं से बाईजी! इधर-उधर हिलनेका काम नहीं. तुम गाओ. हमने ऐसे घसियारे बहुत-से देखे हैं. अभी कल रमल के पासेफेंककर अधेला-अधेला माँगता था, आज चला है रोब गाँठने.’’ अब कुबरा ने घूमकर उसकी ओरदेखकर कहा-‘‘कौन है यह पाजी!’’ ‘‘तुम्हारे चाचा बाबू नन्हकूसिंह!’’-के साथ ही पूराबनारसी झापड़ पड़ा. कुबरा का सिर घूम गया. लैस के परतले वाले सिपाही दूसरी ओर भागचले और मौलवी साहब चौंधिया कर जानअली की दूकान पर लडख़ड़ाते, गिरते-पड़ते किसी तरहपहुँच गये. जानअली ने मौलवी से कहा-‘‘मौलवी साहब! भला आप भी उस गुण्डे के मुँह लगनेगये. यह तो कहिए कि उसने गँड़ासा नहीं तौल दिया.’’ कुबरा के मुँह से बोली नहीं निकलरही थी. उधर दुलारी गा रही थी’’ .... विलमि विदेस रहे ....’’ गाना पूरा हुआ, कोईआया-गया नही. तब नन्हकूसिंह धीरे-धीरे टहलता हुआ, दूसरी ओर चला गया. थोड़ी देर मेंएक डोली रेशमी परदे से ढँकी हुई आयी. साथ में एक चोबदार था. उसने दुलारी को राजमातापन्ना की आज्ञा सुनायी. दुलारी चुपचाप डोली पर जा बैठी. डोली धूल और सन्ध्याकाल केधुएँ से भरी हुई बनारस की तंग गलियों से होकर शिवालय घाट की ओर चली. 2 श्रावण काअन्तिम सोमवार था. राजमाता पन्ना शिवालय में बैठकर पूजन कर रही थी. दुलारी बाहरबैठी कुछ अन्य गानेवालियों के साथ भजन गा रही थी. आरती हो जाने पर, फूलों की अञ्जलिबिखेरकर पन्ना ने भक्तिभाव से देवता के चरणों में प्रणाम किया. फिर प्रसाद लेकरबाहर आते ही उन्होंने दुलारी को देखा. उसने खड़ी होकर हाथ जोड़ते हुए कहा-‘‘मैंपहले ही पहुँच जाती. क्या करूँ, वह कुबरा मौलवी निगोड़ा आकर रेजिडेण्ट की कोठी परले जाने लगा. घण्टों इसी झंझट में बीत गया, सरकार!’’ ‘‘कुबरा मौलवी! जहाँ सुनतीहूँ, उसी का नाम. सुना है कि उसने यहाँ भी आकर कुछ....’’-फिर न जाने क्या सोचकर बातबदलते हुए पन्ना ने कहा-‘‘हाँ, तब फिर क्या हुआ? तुम कैसे यहाँ आ सकीं?’’ ‘‘बाबूनन्हकूसिंह उधर से आ गये.’’ मैंने कहा-‘‘सरकार की पूजा पर मुझे भजन गाने को जानाहै. और यह जाने नहीं दे रहा है. उन्होंने मौलवी को ऐसा झापड़ लगाया कि उसकी हेकड़ीभूल गयी. और तब जाकर मुझे किसी तरह यहाँ आने की छुट्टी मिली.’’ ‘‘कौन बाबूनन्हकूसिंह!’’ दुलारी ने सिर नीचा करके कहा-‘‘अरे, क्या सरकार को नहीं मालूम? बाबूनिरंजनसिंह के लड़के! उस दिन, जब मैं बहुत छोटी थी, आपकी बारी में झूला झूल रही थी,जब नवाब का हाथी बिगड़कर आ गया था, बाबू निरंजनसिंह के कुँवर ने ही तो उस दिन हमलोगों की रक्षा की थी.’’ राजमाता का मुख उस प्राचीन घटना को स्मरण करके न जानेक्यों विवर्ण हो गया. फिर अपने को सँभालकर उन्होंने पूछा-‘‘तो बाबू नन्हकूसिंह उधरकैसे आ गये?’’ दुलारी ने मुस्कराकर सिर नीचा कर लिया! दुलारी राजमाता पन्ना के पिताकी जमींदारी में रहने वाली वेश्या की लडक़ी थी. उसके साथ ही कितनी बार झूले-हिण्डोलेअपने बचपन में पन्ना झूल चुकी थी. वह बचपन से ही गाने में सुरीली थी. सुन्दरी होनेपर चञ्चल भी थी. पन्ना जब काशीराज की माता थी, तब दुलारी काशी की प्रसिद्ध गानेवालीथी. राजमहल में उसका गाना-बजाना हुआ ही करता. महाराज बलवन्तसिंह के समय से ही संगीतपन्ना के जीवन का आवश्यक अंश था. हाँ, अब प्रेम-दु:ख और दर्द-भरी विरह-कल्पना केगीत की ओर अधिक रुचि न थी. अब सात्विक भावपूर्ण भजन होता था. राजमाता पन्ना कावैधव्य से दीप्त शान्त मुखमण्डल कुछ मलिन हो गया. बड़ी रानी की सापत्न्य ज्वालाबलवन्तसिंह के मर जाने पर भी नहीं बुझी. अन्त:पुर कलह का रंगमंच बना रहता, इसी सेप्राय: पन्ना काशी के राजमंदिर में आकर पूजा-पाठ में अपना मन लगाती. रामनगर मेंउसको चैन नहीं मिलता. नयी रानी होने के कारण बलवन्तसिंह की प्रेयसी होने का गौरव तोउसे था ही, साथ में पुत्र उत्पन्न करने का सौभाग्य भी मिला, फिर भी असवर्णता कासामाजिक दोष उसके हृदय को व्यथित किया करता. उसे अपने ब्याह की आरम्भिक चर्चा कास्मरण हो आया. छोटे-से मञ्च पर बैठी, गंगा की उमड़ती हुई धारा को पन्ना अन्य-मनस्कहोकर देखने लगी. उस बात को, जो अतीत में एक बार, हाथ से अनजाने में खिसक जानेवालीवस्तु की तरह गुप्त हो गयी हो; सोचने का कोई कारण नहीं. उससे कुछ बनता-बिगड़ता भीनहीं; परन्तु मानव-स्वभाव हिसाब रखने की प्रथानुसार कभी-कभी कही बैठता है, ‘‘कि यदिवह बात हो गयी होती तो?’’ ठीक उसी तरह पन्ना भी राजा बलवन्तसिंह द्वारा बलपूर्वकरानी बनायी जाने के पहले की एक सम्भावना को सोचने लगी थी. सो भी बाबू नन्हकूसिंह कानाम सुन लेने पर. गेंदा मुँहलगी दासी थी. वह पन्ना के साथ उसी दिन से है, जिस दिनसे पन्ना बलवन्तसिंह की प्रेयसी हुई. राज्य-भर का अनुसन्धान उसी के द्वारा मिलाकरता. और उसे न जाने कितनी जानकारी भी थी. उसने दुलारी का रंग उखाड़ने के लिए कुछकहना आवश्यक समझा. ‘‘महारानी! नन्हकूसिंह अपनी सब जमींदारी स्वाँग, भैंसों कीलड़ाई, घुड़दौड़ और गाने-बजाने में उड़ाकर अब डाकू हो गया है. जितने खून होते हैं,सब में उसी का हाथ रहता है. जितनी ....’’ उसे रोककर दुलारी ने कहा-‘‘यह झूठ है.बाबू साहब के ऐसा धर्मात्मा तो कोई है ही नहीं. कितनी विधवाएँ उनकी दी हुई धोती सेअपना तन ढँकती है. कितनी लड़कियों की ब्याह-शादी होती है. कितने सताये हुए लोगों कीउनके द्वारा रक्षा होती है.’’ रानी पन्ना के हृदय में एक तरलता उद्वेलित हुई.उन्होंने हँसकर कहा-‘‘दुलारी, वे तेरे यहाँ आते हैं न? इसी से तू उनकी बड़ाई.....’’‘‘नहीं सरकार! शपथ खाकर कह सकती हूँ कि बाबू नन्हकूसिंह ने आज तक कभी मेरे कोठे परपैर भी नहीं रखा.’’ राजमाता न जाने क्यों इस अद्भुत व्यक्ति को समझने के लिए चञ्चलहो उठी थीं. तब भी उन्होंने दुलारी को आगे कुछ न कहने के लिए तीखी दृष्टि से देखा.वह चुप हो गयी. पहले पहर की शहनाई बजने लगी. दुलारी छुट्टी माँगकर डोली पर बैठ गयी.तब गेंदा ने कहा-‘‘सरकार! आजकल नगर की दशा बड़ी बुरी है. दिन दहाड़े लोग लूट लिएजाते हैं. सैकड़ों जगह नाला पर जुए में लोग अपना सर्वस्व गँवाते हैं. बच्चे फुसलायेजाते हैं. गलियों में लाठियाँ और छुरा चलने के लिए टेढ़ी भौंहे कारण बन जाती हैं.उधर रेजीडेण्ट साहब से महाराजा की अनबन चल रही है.’’ राजमाता चुप रहीं. दूसरे दिनराजा चेतसिंह के पास रेजिडेण्ट मार्कहेम की चिठ्ठी आयी, जिसमें नगर की दुव्र्यवस्थाकी कड़ी आलोचना थी. डाकुओं और गुण्डों को पकड़ने के लिए, उन पर कड़ा नियन्त्रण रखनेकी सम्मति भी थी. कुबरा मौलवी वाली घटना का भी उल्लेख था. उधर हेंस्टिग्स के आने कीभी सूचना थी. शिवालयघाट और रामनगर में हलचल मच गयी! कोतवाल हिम्मतसिंह, पागल कीतरह, जिसके हाथ में लाठी, लोहाँगी, गड़ाँसा, बिछुआ और करौली देखते, उसी को पकड़नेलगे. एक दिन नन्हकूसिंह सुम्भा के नाले के संगम पर, ऊँचे-से टीले की घनी हरियालीमें अपने चुने हुए साथियों के साथ दूधिया छान रहे थे. गंगा में, उनकी पतली डोंगीबड़ की जटा से बँधी थी. कथकों का गाना हो रहा था. चार उलाँकी इक्के कसे-कसाये खड़ेथे. नन्हकूसिंह ने अकस्मात् कहा-‘‘मलूकी!’’ गाना जमता नहीं है. उलाँकी पर बैठकरजाओ, दुलारी को बुला लाओ.’’ मलूकी वहाँ मजीरा बजा रहा था. दौड़कर इक्के पर जा बैठा.आज नन्हकूसिंह का मन उखड़ा था. बूटी कई बार छानने पर भी नशा नहीं. एक घण्टे मेंदुलारी सामने आ गयी. उसने मुस्कराकर कहा-‘‘क्या हुक्म है बाबू साहब?’’ ‘‘दुलारी! आजगाना सुनने का मन कर रहा है.’’ ‘‘इस जंगल में क्यों?-उसने सशंक हँसकर कुछ अभिप्रायसे पूछा. ‘‘तुम किसी तरह का खटका न करो.’’-नन्हकूसिंह ने हँसकर कहा. ‘‘यह तो मैं उसदिन महारानी से भी कह आयी हूँ.’’ ‘‘क्या, किससे?’’ ‘‘राजमाता पन्नादेवी से ’’-फिरउस दिन गाना नहीं जमा. दुलारी ने आश्चर्य से देखा कि तानों में नन्हकू की आँखे तरहो जाती हैं. गाना-बजाना समाप्त हो गया था. वर्षा की रात में झिल्लियों का स्वर उसझुरमुट में गूँज रहा था. मंदिर के समीप ही छोटे-से कमरे में नन्हकूसिंह चिन्ता मेंनिमग्न बैठा था. आँखों में नीद नहीं. और सब लोग तो सोने लगे थे, दुलारी जाग रही थी.वह भी कुछ सोच रही थी. आज उसे, अपने को रोकने के लिए कठिन प्रयत्न करना पड़ रहा था;किन्तु असफल होकर वह उठी और नन्हकू के समीप धीरे-धीरे चली आयी. कुछ आहट पाते हीचौंककर नन्हकूसिंह ने पास ही पड़ी हुई तलवार उठा ली. तब तक हँसकर दुलारी नेकहा-‘‘बाबू साहब, यह क्या? स्त्रियों पर भी तलवार चलायी जाती है!’’ छोटे-से दीपक केप्रकाश में वासना-भरी रमणी का मुख देखकर नन्हकू हँस पड़ा. उसने कहा-‘‘क्यों बाईजी!क्या इसी समय जाने की पड़ी है. मौलवी ने फिर बुलाया है क्या?’’ दुलारी नन्हकू केपास बैठ गयी. नन्हकू ने कहा-‘‘क्या तुमको डर लग रहा है?’’ ‘‘नहीं, मैं कुछ पूछनेआयी हूँ.’’ ‘‘क्या?’’ ‘‘क्या,......यही कि......कभी तुम्हारे हृदय में....’’ ‘‘उसेन पूछो दुलारी! हृदय को बेकार ही समझ कर तो उसे हाथ में लिये फिर रहा हूँ. कोई कुछकर देता-कुचलता-चीरता-उछालता! मर जाने के लिए सब कुछ तो करता हूँ, पर मरने नहींपाता.’’ ‘‘मरने के लिए भी कहीं खोजने जाना पड़ता है. आपको काशी का हाल क्या मालूम!न जाने घड़ी भर में क्या हो जाय. उलट-पलट होने वाला है क्या, बनारस की गलियाँ जैसेकाटने को दौड़ती हैं.’’ ‘‘कोई नयी बात इधर हुई है क्या?’’ ‘‘कोई हेस्ंिटग्ज आया है.सुना है उसने शिवालयघाट पर तिलंगों की कम्पनी का पहरा बैठा दिया है. राजा चेतसिंहऔर राजमाता पन्ना वहीं हैं. कोई-कोई कहता है कि उनको पकड़कर कलकत्ता भेजने....’’‘‘क्या पन्ना भी....रनिवास भी वहीं है’’-नन्हकू अधीर हो उठा था. ‘‘क्यों बाबू साहब,आज रानी पन्ना का नाम सुनकर आपकी आँखों में आँसू क्यो आ गये?’’ सहसा नन्हकू का मुखभयानक हो उठा! उसने कहा-‘‘चुप रहो, तुम उसको जानकर क्या करोगी?’’ वह उठ खड़ा हुआ.उद्विग्न की तरह न जाने क्या खोजने लगा. फिर स्थिर होकर उसने कहा-‘‘दुलारी! जीवनमें आज यह पहला ही दिन है कि एकान्त रात में एक स्त्री मेरे पलँग पर आकर बैठ गयीहै, मैं चिरकुमार! अपनी एक प्रतिज्ञा का निर्वाह करने के लिए सैकड़ों असत्य, अपराधकरता फिर रहा हूँ. क्यों? तुम जानती हो? मैं स्त्रियों का घोर विद्रोही हूँ औरपन्ना! .... किन्तु उसका क्या अपराध! अत्याचारी बलवन्तसिंह के कलेजे में बिछुआ मैंन उतार सका. किन्तु पन्ना! उसे पकड़कर गोरे कलकत्ते भेज देंगे! वही ....’’नन्हकूसिंह उन्मत्त हो उठा था. दुलारी ने देखा, नन्हकू अन्धकार में ही वट वृक्ष केनीचे पहुँचा और गंगा की उमड़ती हुई धारा में डोंगी खोल दी-उसी घने अन्धकार में.दुलारी का हृदय काँप उठा. 3 16 अगस्त सन् 1781 को काशी डाँवाडोल हो रही थी.शिवालयघाट में राजा चेतसिंह लेफ्टिनेण्ट इस्टाकर के पहरे में थे. नगर में आतंक था.दूकानें बन्द थीं. घरों में बच्चे अपनी माँ से पूछते थे-‘माँ, आज हलुए वाला नहींआया.’ वह कहती-‘चुप बेटे!’ सडक़ें सूनी पड़ी थीं. तिलंगों की कम्पनी के आगे-आगेकुबरा मौलवी कभी-कभी, आता-जाता दिखाई पड़ता था. उस समय खुली हुई खिड़कियाँ बन्द होजाती थीं. भय और सन्नाटे का राज्य था. चौक में चिथरूसिंह की हवेली अपने भीतर काशीकी वीरता को बन्द किये कोतवाल का अभिनय कर रही थी. इसी समय किसी नेपुकारा-‘‘हिम्मतसिंह!’’ खिडक़ी में से सिर निकाल कर हिम्मतसिंह ने पूछा-‘‘कौन?’’‘‘बाबू नन्हकूसिंह!’’ ‘‘अच्छा, तुम अब तक बाहर ही हो?’’ ‘‘पागल! राजा कैद हो गयेहैं. छोड़ दो इन सब बहादुरों को! हम एक बार इनको लेकर शिवालयघाट पर जायँ.’’‘‘ठहरो’’-कहकर हिम्मतसिंह ने कुछ आज्ञा दी, सिपाही बाहर निकले. नन्हकू की तलवार चमकउठी. सिपाही भीतर भागे. नन्हकू ने कहा-‘‘नमकहरामों! चूडिय़ाँ पहन लो.’’ लोगों केदेखते-देखते नन्हकूसिंह चला गया. कोतवाली के सामने फिर सन्नाटा हो गया. नन्हकूउन्मत्त था. उसके थोड़े-से साथी उसकी आज्ञा पर जान देने के लिए तुले थे. वह नहींजानता था कि राजा चेतसिंह का क्या राजनैतिक अपराध है? उसने कुछ सोचकर अपने थोड़े-सेसाथियों को फाटक पर गड़बड़ मचाने के लिए भेज दिया. इधर अपनी डोंगी लेकर शिवालय कीखिडक़ी के नीचे धारा काटता हुआ पहुँचा. किसी तरह निकले हुए पत्थर में रस्सी अटकाकर,उस चञ्चल डोंगी को उसने स्थिर किया और बन्दर की तरह उछलकर खिडक़ी के भीतर हो रहा. उससमय वहाँ राजमाता पन्ना और राजा चेतसिंह से बाबू मनिहारसिंह कह रहे थे-‘‘आपके यहाँरहने से, हम लोग क्या करें, यह समझ में नहीं आता. पूजा-पाठ समाप्त करके आप रामनगरचली गयी होतीं, तो यह ....’’ तेजस्विनी पन्ना ने कहा-‘‘अब मैं रामनगर कैसे चलीजाऊँ?’’ मनिहारसिंह दुखी होकर बोले-‘‘कैसे बताऊँ? मेरे सिपाही तो बन्दी हैं.’’ इतनेमें फाटक पर कोलाहल मचा. राज-परिवार अपनी मन्त्रणा में डूबा था कि नन्हकूसिंह काआना उन्हें मालूम हुआ. सामने का द्वार बन्द था. नन्हकूसिंह ने एक बार गंगा की धाराको देखा-उसमें एक नाव घाट पर लगने के लिए लहरों से लड़ रही थी. वह प्रसन्न हो उठा.इसी की प्रतीक्षा में वह रुका था. उसने जैसे सबको सचेत करते हुए कहा-‘‘महारानी कहाँहै?’’ सबने घूम कर देखा-एक अपरिचित वीर-मूर्ति! शस्त्रों से लदा हुआ पूरा देव!चेतसिंह ने पूछा-‘‘तुम कौन हो?’’ ‘‘राज-परिवार का एक बिना दाम का सेवक!’’ पन्ना केमुँह से हलकी-सी एक साँस निकल रह गयी. उसने पहचान लिया. इतने वर्षों के बाद! वहीनन्हकूसिंह. मनिहारसिंह ने पूछा-‘‘तुम क्या कर सकते हो?’’ ‘‘मै मर सकता हूँ! पहलेमहारानी को डोंगी पर बिठाइए. नीचे दूसरी डोंगी पर अच्छे मल्लाह हैं. फिर बातकीजिए.’’-मनिहारसिंह ने देखा, जनानी ड्योढ़ी का दरोगा राज की एक डोंगी पर चारमल्लाहों के साथ खिडक़ी से नाव सटाकर प्रतीक्षा में है. उन्होंने पन्ना सेकहा-‘‘चलिए, मैं साथ चलता हूँ.’’ ‘‘और...’’-चेतसिंह को देखकर, पुत्रवत्सला ने संकेतसे एक प्रश्न किया, उसका उत्तर किसी के पास न था. मनिहारसिंह ने कहा-‘‘तब मैंयहीं?’’ नन्हकू ने हँसकर कहा-‘‘मेरे मालिक, आप नाव पर बैठें. जब तक राजा भी नाव परन बैठ जायँगे, तब तक सत्रह गोली खाकर भी नन्हकूसिंह जीवित रहने की प्रतिज्ञा करताहै.’’ पन्ना ने नन्हकू को देखा. एक क्षण के लिए चारों आँखे मिली, जिनमें जन्म-जन्मका विश्वास ज्योति की तरह जल रहा था. फाटक बलपूर्वक खोला जा रहा था. नन्हकू नेउन्मत्त होकर कहा-‘‘मालिक! जल्दी कीजिए.’’ दूसरे क्षण पन्ना डोंगी पर थी औरनन्हकूसिंह फाटक पर इस्टाकर के साथ. चेतराम ने आकर एक चिठ्ठी मनिहारसिंह को हाथ मेंदी. लेफ्टिनेण्ट ने कहा-‘‘आप के आदमी गड़बड़ मचा रहे हैं. अब मै अपने सिपाहियों कोगोली चलाने से नहीं रोक सकता.’’ ‘‘मेरे सिपाही यहाँ कहाँ हैं, साहब?’’-मनिहारसिंहने हँसकर कहा. बाहर कोलाहल बढऩे लगा. चेतराम ने कहा-‘‘पहले चेतसिंह को कैद कीजिए.’’‘‘कौन ऐसी हिम्मत करता है?’’ कड़ककर कहते हुए बाबू मनिहारसिंह ने तलवार खींच ली. अभीबात पूरी न हो सकी थी कि कुबरा मौलवी वहाँ पहुँचा! यहाँ मौलवी साहब की कलम नहीं चलसकती थी, और न ये बाहर ही जा सकते थे. उन्होंने कहा-‘‘देखते क्या हो चेतराम!’’चेतराम ने राजा के ऊपर हाथ रखा ही थी कि नन्हकू के सधे हुए हाथ ने उसकी भुजा उड़ादी. इस्टाकर आगे बढ़े, मौलवी साहब चिल्लाने लगे. नन्हकूसिंह ने देखते-देखते इस्टाकरऔर उसके कई साथियों को धराशायी किया. फिर मौलवी साहब कैसे बचते! नन्हकूसिंह नेकहा-‘‘क्यों, उस दिन के झापड़ ने तुमको समझाया नहीं? पाजी!’’-कहकर ऐसा साफ जनेवामारा कि कुबरा ढेर हो गया. कुछ ही क्षणों में यह भीषण घटना हो गयी, जिसके लिए अभीकोई प्रस्तुत न था. नन्हकूसिंह ने ललकार कर चेतसिंह से कहा-‘‘आप क्या देखते हैं?उतरिये डोंगी पर!’’-उसके घावों से रक्त के फुहारे छूट रहे थे. उधर फाटक से तिलंगेभीतर आने लगे थे. चेतसिंह ने खिडक़ी से उतरते हुए देखा कि बीसों तिलंगों की संगीनोंमें वह अविचल खड़ा होकर तलवार चला रहा है. नन्हकू के चट्टान-सदृश शरीर से गैरिक कीतरह रक्त की धारा बह रही है. गुण्डे का एक-एक अंग कटकर वहीं गिरने लगा. वह काशी कागुंडा था!