खाड़ी देशों को US-इजरायल से ज्यादा भरोसा यूक्रेन पर? वजह ये 'मामूली' इंटरसेप्टर्स हैं
मिडल ईस्ट में अब अमेरिकी पैट्रियट या इजरायली आयरन डोम से ज्यादा चर्चा यूक्रेन के 'स्टिंग' और 'बुलेट' इंटरसेप्टर्स की हो रही है. जानिए क्यों खाड़ी देश इन सस्ते और देसी जुगाड़ वाले हथियारों पर फिदा हैं और कैसे ये छोटे ड्रोन युद्ध की तस्वीर बदल रहे हैं.

दुनिया के नक्शे पर एक तरफ वो देश हैं जिनके पास पैसा बेहिसाब है, जैसे सऊदी अरब और यूएई. दूसरी तरफ वो देश हैं जो पिछले दो साल से भयंकर युद्ध झेल रहे हैं, जैसे यूक्रेन. अब आप सोचेंगे कि भला अरब के अमीर देशों को युद्ध से टूटे यूक्रेन से क्या चाहिए होगा? जवाब है- 'सुरक्षा'. लेकिन ये वो सुरक्षा नहीं है जो करोड़ों डॉलर की मिसाइलों से मिलती है. ये सुरक्षा है उन छोटे और जानलेवा ड्रोन्स से, जिन्होंने हाल के दिनों में खाड़ी देशों की रातों की नींद उड़ा रखी है.
समाचार एजेंसी ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक खाड़ी देशों को अब अमेरिका के महंगे 'पैट्रियट' मिसाइल डिफेंस सिस्टम या इजरायल के हाई-टेक 'आयरन डोम' से ज्यादा भरोसा यूक्रेन के छोटे, सस्ते और मारक इंटरसेप्टर्स पर होने लगा है. इनमें दो नाम सबसे ज्यादा गूंज रहे हैं- 'स्टिंग' (Sting) और 'बुलेट' (Bullet). ये नाम सुनने में मामूली लग सकते हैं, लेकिन इनकी मारक क्षमता ने बड़े-बड़े डिफेंस एक्सपर्ट्स को हैरान कर दिया है.
'स्टिंग' (Sting): ड्रोन का काल
'स्टिंग' यूक्रेन का वो हथियार है जिसे खासतौर पर रूस के 'शाहेद' (Shahed) जैसे कामिकेज़ ड्रोन्स का शिकार करने के लिए डिजाइन किया गया है. ‘कीव इंडिपेंडेंट’ के मुताबिक यह एक क्लासिक FPV (First Person View) इंटरसेप्टर है.
कैसे काम करता है: स्टिंग ड्रोन को एक ऑपरेटर VR गॉगल्स के जरिए कंट्रोल करता है. इसमें लगा AI-असिस्टेड कैमरा दुश्मन के ड्रोन को दूर से ही पहचान लेता है. यह एक 'गाइडेड मिसाइल' की तरह काम करता है, जिसे बीच हवा में मोड़ा जा सकता है.
रेंज और ऊंचाई: इसकी ऑपरेशनल रेंज करीब 10 से 15 किलोमीटर तक होती है. यह 3 किलोमीटर (करीब 10,000 फीट) की ऊंचाई तक जाकर दुश्मन को निशाना बना सकता है, जहां आमतौर पर सुसाइड ड्रोन्स उड़ते हैं.
स्पीड और एक्युरेसी: इसकी टॉप स्पीड 160 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा है. इसकी एक्युरेसी का राज इसका 'लॉकिंग सिस्टम' है. एक बार ऑपरेटर ने टारगेट लॉक कर दिया, तो ये साये की तरह उसका पीछा करता है और सीधे उससे टकरा जाता है.
'बुलेट' (Bullet): हवा में उड़ती गोली
अगर 'स्टिंग' एक शिकारी कुत्ता है, तो 'बुलेट' हवा में चलती वो गोली है जिससे बचना नामुमकिन है. Jane's Defence Weekly के मुताबिक यह स्टिंग के मुकाबले ज्यादा तेज और ज्यादा घातक है.
बनावट और तकनीक: बुलेट को एयरोडायनामिक तरीके से एक छोटी मिसाइल जैसा शेप दिया गया है, लेकिन इसमें पंख (Rotors) लगे होते हैं. यह वर्टिकल टेक-ऑफ कर सकता है, यानी इसे किसी रनवे की जरूरत नहीं है.
मारक क्षमता (Lethality): बुलेट में हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड लगा होता है. यह सिर्फ टकराता नहीं है, बल्कि टारगेट के पास पहुंचते ही फट जाता है, जिससे दुश्मन का ड्रोन मलबे में तब्दील हो जाता है.
स्पीड का बादशाह: इसकी रफ्तार 200 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है. यह इसे उन ड्रोन्स के खिलाफ सबसे कारगर बनाता है जो बहुत तेजी से अपनी दिशा बदलते हैं. खाड़ी देशों को इसकी यही तेजी पसंद आ रही है.
खाड़ी देशों की टेंशन क्या है?
सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के पास दुनिया के सबसे बेहतरीन डिफेंस सिस्टम हैं. लेकिन उनकी सबसे बड़ी सिरदर्दी 'यमन के हूती विद्रोही' या 'ईरान समर्थित गुट' हैं. ये गुट अब महंगी मिसाइलों की जगह छोटे-छोटे सुसाइड ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. जब ये ड्रोन्स झुंड (Swarm) में आते हैं, तो करोड़ों के पैट्रियट सिस्टम फेल होने लगते हैं.
पैट्रियट मिसाइल एक साथ 50 ड्रोन्स को निशाना नहीं बना सकती, और अगर बना भी ले, तो एक दिन के हमले को रोकने का खर्च अरबों में पहुंच जाएगा. अलजजीरा की मानें तो खाड़ी देशों को ऐसा हथियार चाहिए जो कौड़ियों के दाम में आए और दुश्मन के ड्रोन को घर में घुसने से पहले ही खत्म कर दे. यहीं पर यूक्रेन के 'स्टिंग' और 'बुलेट' की एंट्री होती है.
US और इजरायल से मोहभंग क्यों?
अमेरिका और इजरायल के हथियार बेहतरीन हैं, इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन उनके साथ दो बड़ी दिक्कतें हैं. पहली- कीमत. दूसरी- सप्लाई और राजनीति. अमेरिका कई बार मानवाधिकारों या अपनी घरेलू राजनीति के चलते हथियारों की सप्लाई रोक देता है. वहीं इजरायल के साथ संबंध रखना खाड़ी देशों के लिए आज भी एक पेचीदा राजनीतिक मसला है.
यूक्रेन के साथ ऐसा कोई चक्कर नहीं है. ‘फॉरेन पॉलिसी मैगजीन' के मुताबिक यूक्रेन को पैसा चाहिए और अपनी इंडस्ट्री को जिंदा रखना है. यूक्रेन के ये इंटरसेप्टर्स 'बैटल-टेस्टेड' हैं. यानी इन्हें लैब में नहीं, बल्कि असली युद्ध के मैदान में रूस के ड्रोन्स के खिलाफ परखा गया है. जब खाड़ी देशों ने देखा कि यूक्रेन के ये छोटे ड्रोन्स रूस के खतरनाक हथियारों को धूल चटा रहे हैं, तो उनका झुकाव कीव की तरफ बढ़ गया.
असली खेल क्या है?
अगर हम इसे थोड़ा गहराई से समझें, तो ये सिर्फ हथियारों की खरीद-बिक्री नहीं है. ये ग्लोबल डिफेंस मार्केट में आ रहा एक बड़ा बदलाव है. अब तक माना जाता था कि जिसके पास सबसे महंगी मिसाइल है, वो सबसे सुरक्षित है. लेकिन यूक्रेन ने साबित कर दिया कि 'लो-टेक' समाधान भी 'हाई-टेक' खतरों को रोक सकते हैं.
‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट ‘द फ्यूचर ड्रोन वॉरफेयर’ के मुताबिक खाड़ी देश अब अपनी रक्षा नीति में 'कॉस्ट-इफेक्टिवनेस' यानी किफायती समाधान ढूंढ रहे हैं. वे समझ गए हैं कि भविष्य के युद्ध ड्रोन्स से लड़े जाएंगे, और ड्रोन्स का मुकाबला ड्रोन्स से ही हो सकता है. यूक्रेन इस समय 'ड्रोन वॉरफेयर' की यूनिवर्सिटी बन चुका है, और खाड़ी देश वहां के सबसे होनहार छात्र (या खरीदार) बनना चाहते हैं.
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क्या होगा इसका असर?
अगर सऊदी अरब या यूएई बड़े पैमाने पर यूक्रेनी इंटरसेप्टर्स को अपनाते हैं, तो इसके तीन बड़े असर होंगे. पहला- यूक्रेन की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी. दूसरा- मिडल ईस्ट में अमेरिका और इजरायल के हथियारों का एकाधिकार (Monopoly) कम होगा. तीसरा- ईरान और उसके समर्थित गुटों को अपनी रणनीति पूरी तरह बदलनी होगी क्योंकि अब उनके सस्ते ड्रोन्स भी सुरक्षित नहीं रहेंगे.
आने वाले समय में हम देख सकते हैं कि खाड़ी देशों में यूक्रेन की डिफेंस कंपनियों के ऑफिस खुलें और शायद वहां इन ड्रोन्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स भी लगें. ये डिफेंस की दुनिया में एक नए युग की शुरुआत है जहां 'महंगा' हमेशा 'बेहतर' नहीं होता.
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