इस्लाम में रहकर उसकी आलोचना करनेवाले उसके दुश्मन नहीं, सबसे बड़े हमदर्द हैं
जाकिर नाइक से हसन निसार तक का सफ़र तय करने में थोड़ा वक़्त तो लगेगा, लेकिन हो जाएगा.
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पाकिस्तानी विचारक हसन निसार इस्लाम की बेबाक आलोचना के लिए मशहूर हैं.
(Image:alchetron.com)
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मुसलमानों की बुनियादी ख़ामी यही है कि उसने हर उस शख़्स को दुश्मन माना, जिसने अंदर रह कर आलोचना की जगह तलाशनी चाही. लीक से हट कर एक लाइन बोल दो बस! मज़हब तुरंत हमलावर मुद्रा में आ जाता है. कोई ये नहीं समझता कि इन सब आलोचकों की मंशा आपको नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उस शर्मिंदगी से बचाना है, जो आपका मुकद्दर बनती जा रही है.

बेघर रोहिंग्या मुसलमानों को जब भारत जैसा देश शरण देते हिचक रहा है, तो कहीं न कहीं इसके पीछे वो अविश्वास भी है. (Image: Reuters)
आप ख़ुद अक्षम हैं तो कम से कम उन चंद आवाज़ों को बेख़तर हो के बोलने दीजिए, जिन्हें आप क़ौम का दुश्मन मानते हैं पर जो हैं नहीं. आलोचना और इंसल्ट में फर्क है दोस्तो. तनक़ीद के लिए जिनका ज़हन खुला नहीं है, उनका पिछड़ जाना लाज़मी है. 'निंदक नियारे राखिए' का संदेश इस मुल्क में यूं ही नहीं मशहूर! आलोचना ही निखारती है.
तीन तलाक़ वाले फैसले का क्रेडिट चाहे जो लूट ले जाए लेकिन ये उन मुस्लिम महिलाओं की ही जीत है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी निरंतर बोला. मैंने हमेशा कहा है कि भारत का मुसलमान दुनिया में सबसे समझदार मुसलमान लगता है मुझे. मज़हब में ज़रूरी तब्दीलियों की राह इस मुल्क से ही निकलने की उम्मीद है. आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों. ज़ाकिर नाइक से हसन निसार तक का सफर थोड़ा धीमा हो सकता है, लेकिन तय ज़रूर होगा.

हसन निसार जैसे आलोचकों की इस्लाम को सख्त ज़रूरत है. (image: Maloomaat.)
तीन साल पहले जब मैंने फेसबुक पर लिखना शुरू किया था, तो इक्का-दुक्का मुस्लिम साथी हमख़याल मिलते थे. डर भी लगता था. आज दर्जनों दोस्त अपनी जगह अच्छा काम कर रहे हैं. लिख भी रहे हैं, ज़मीन पर भी काम कर रहे हैं. ब्लड डोनेशन कैम्प लगाने से लेकर बिहार की बाढ़ में घुटनों पानी मे खड़े होकर मदद करते साथी इसी फेसबुक पर ही देखे हैं. नाउम्मीदी जैसा कुछ नहीं.

जाकिर नाइक, उन रहनुमाओं में से एक जिन्हें पता ही नहीं है कौम की भलाई किस चीज़ में हैं.
हर आलोचक दुश्मन नहीं होता. काफ़िर, मुनाफ़िक़, गद्दार, राफजी भी नहीं. हर वो मुस्लिम युवा जो अंदर से तनक़ीद का हामी है, वो क़ौम का शत्रु नहीं, सबसे बड़ा ख़ैरख़्वाह है. बाकी दुनिया और आपके बीच पनपती अविश्वास की खाई पर बिछा पुल है. ऐसे पुलों की तादाद जितनी बढ़े वो हक़ में है. मज़हब के हक़ में. इंसानियत के हक़ में.
उस मस्जिद की कहानी देखिए जहां पीएम मोदी गए थे:
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दुनिया का इस्लाम मे बढ़ता अविश्वास पता नहीं क्यों आपको परेशान नहीं करता! वजह चाहे जो हो लेकिन बेयक़ीनी का आलम है तो है. इससे मुंह तो नहीं चुराया जा सकता न! प्रोपेगंडा हो, किसी और की करतूत का बिल आपके नाम फट रहा हो, कोई ख़ास तबक़ा आपके ख़िलाफ़ माहौल बना रहा हो या कट्टरता को अपनी ज़मीन देने की आपकी खुद की जहालत हो. कुछ भी हो, चीज़ें बदशक्ल होने की हद तक बिगड़ी तो हैं ही.इन्हें सुधारने का ज़िम्मा कोई आसमान से उतर कर नहीं लेने वाला. आपको ही पंजे झाड़ के इस काम में लग जाना होगा. इरफान, शमी, ज़ायरा की ट्रोलिंग में ऊर्जा खर्चने की जगह कुछ ऐसा लिखिए-पढ़िए, जिससे आप बता सकें कि आपकी जो ब्रांडिंग हो रही है, वो ग़लत है.

बेघर रोहिंग्या मुसलमानों को जब भारत जैसा देश शरण देते हिचक रहा है, तो कहीं न कहीं इसके पीछे वो अविश्वास भी है. (Image: Reuters)
आप ख़ुद अक्षम हैं तो कम से कम उन चंद आवाज़ों को बेख़तर हो के बोलने दीजिए, जिन्हें आप क़ौम का दुश्मन मानते हैं पर जो हैं नहीं. आलोचना और इंसल्ट में फर्क है दोस्तो. तनक़ीद के लिए जिनका ज़हन खुला नहीं है, उनका पिछड़ जाना लाज़मी है. 'निंदक नियारे राखिए' का संदेश इस मुल्क में यूं ही नहीं मशहूर! आलोचना ही निखारती है.
तीन तलाक़ वाले फैसले का क्रेडिट चाहे जो लूट ले जाए लेकिन ये उन मुस्लिम महिलाओं की ही जीत है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी निरंतर बोला. मैंने हमेशा कहा है कि भारत का मुसलमान दुनिया में सबसे समझदार मुसलमान लगता है मुझे. मज़हब में ज़रूरी तब्दीलियों की राह इस मुल्क से ही निकलने की उम्मीद है. आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों. ज़ाकिर नाइक से हसन निसार तक का सफर थोड़ा धीमा हो सकता है, लेकिन तय ज़रूर होगा.

हसन निसार जैसे आलोचकों की इस्लाम को सख्त ज़रूरत है. (image: Maloomaat.)
तीन साल पहले जब मैंने फेसबुक पर लिखना शुरू किया था, तो इक्का-दुक्का मुस्लिम साथी हमख़याल मिलते थे. डर भी लगता था. आज दर्जनों दोस्त अपनी जगह अच्छा काम कर रहे हैं. लिख भी रहे हैं, ज़मीन पर भी काम कर रहे हैं. ब्लड डोनेशन कैम्प लगाने से लेकर बिहार की बाढ़ में घुटनों पानी मे खड़े होकर मदद करते साथी इसी फेसबुक पर ही देखे हैं. नाउम्मीदी जैसा कुछ नहीं.

जाकिर नाइक, उन रहनुमाओं में से एक जिन्हें पता ही नहीं है कौम की भलाई किस चीज़ में हैं.
हर आलोचक दुश्मन नहीं होता. काफ़िर, मुनाफ़िक़, गद्दार, राफजी भी नहीं. हर वो मुस्लिम युवा जो अंदर से तनक़ीद का हामी है, वो क़ौम का शत्रु नहीं, सबसे बड़ा ख़ैरख़्वाह है. बाकी दुनिया और आपके बीच पनपती अविश्वास की खाई पर बिछा पुल है. ऐसे पुलों की तादाद जितनी बढ़े वो हक़ में है. मज़हब के हक़ में. इंसानियत के हक़ में.
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