घातक कथाएं कानपुर से शुरू होना चाहती हैं और पोरबंदर में खत्म. इसे यूं भी कह सकतेहैं कि जहां महात्मा गांधी का जन्म हुआ, वे वहां मरना चाहती हैं. कानपुर से पोरबंदरके बीच वे चे ग्वेरा की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भटकना चाहती हैं. चे अर्जेंटीनामें जन्मा, ग्वाटेमाला में समाज-सेवक बना, क्यूबा में क्रांति की और बोलिविया मेंमारा गया. घातक कथाकार की प्रतिष्ठा एक कथाकार के रूप में नहीं है. वह मूलत: कवि हैऔर आततायियों को सदा यह यकीन भी दिलाता रहता है कि वह अब तक मूलतः कवि है, भले हीवक्त के थपेड़ों ने उसे कविता में नालायक बनाकर छोड़ दिया है. बावजूद इस प्रतिष्ठा केउसे यह खुशफहमी है कि एक कथाकार के रूप में उसकी प्रतिभा वैसे ही असंदिग्ध है— जैसेनेपोलियन की आकृति-विज्ञान में, मेजाफेंटी की भाषाओं में, लॉस्कर की शतरंज में औरबुसोनी की संगीत में. घातक कथाकार का कानपुर एक बदसूरत जगह है जहां गलियां हर बरसातमें डूब जाती हैं और गंदले पानी में ईंटों को रखकर उन्हें पार किया जाता है.बौछारें छतों को छीन लेती हैं और कीचड़ बारिशों के बाद भी बना रहता है. वह उत्तरप्रदेश का एक ऐसा महानगर है जिसके घूमने लायक हिस्से को एक घंटे में पैदल पूरा घूमाजा सकता है. इसे कभी भारत का ‘मैनचेस्टर’ कहा जाता था. वह मिलों-कारखानों केशोर-शराबे में घटता हुआ परतंत्र भारत का कानपुर था. इसकी अंग्रेजी स्पेलिंग Kanpurनहीं Cownpore थी. तब यहां बहुत सारी मिलें थीं, इतनी कि बहुत सारे मजदूर बिहार औरबंगाल से आते थे फिर भी कम पड़ते थे. सुदूर भारतीय ग्रामों से आए हुए ये मजदूरगुलाबबाई की नौटंकियों के सबसे बड़े दर्शक थे. वे रौनकें नामालूम कब कानपुर से उठगईं. भारत आजाद हुआ और कानपुर के चौराहे शहीद स्मारकों से भर गए. भारत के बहुत सारेशहरों की तरह कानपुर में ऐसा रस्मन नहीं हुआ. यह एक स्वाभाविक स्मृति और श्रद्धाथी, क्योंकि कानपुर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह अध्याय है, जिसमेंकई इंकलाबी गाथाएं सांस ले रही हैं. एक वक्त का कानपुर कला, साहित्य और संस्कृति काकेंद्र था, लेकिन घातक कथाकार के कानपुर के बारे में बेशक यह कहा जा सकता है किकानपुर में जो कुछ भी अच्छा था, वह उस तक आते-आते अतीत हो गया और कानपुर के प्रतिआकर्षण केवल कनपुरियों में ही बचा रह गया. वे इसे अपने संयुक्त परिवार का एक भागसमझते थे और अक्सर इस बूढ़े-बीमार सदस्य से लड़ते-झगड़ते रहते थे. वे इसका उपचार भीकराते थे. वे नहीं चाहते थे कि वह मरे, लेकिन वह मर रहा था. जल-विद्युत आपूर्ति कीसमस्या से सतत् जूझते हुए इस नगर को वे जनरेटरों के शोर और काले धुएं के बीच छोड़करचले जाते थे. एक बेहाल व्यापार, तमाम बैठकें, लफ्फाजियां, छोटे-छोटे बाजारों की बड़ीधक्कमपेल, एक दूसरे का मजाक उड़ाकर हंसते हुए लोग, फूलबाग में लगने वाला सर्कस,नेताओं के भाषण, महंतों के बोल-वचन और उभरते हुए क्रिकेटरों को वे ब्लैक लिस्टेडग्रीन पार्क की पीली घास पर छोड़कर चले जाते थे. रोज शाम पतंगबाजी, घंटाघर से उठतीरेलगाड़ियों की आवाजें, दूर और दूर होती जा रही गंगा, सात-सात दिनों तक चलने वालीहोली और दीवाली, जब मन आए तब बाजार बंद कर देने की मौज को वे मूत्र की गंध के बीचछोड़कर चले जाते थे. चिकाईबाजों, स्मैकियों, छैलों, छलियों और छुटभैये नेताओं को वेहर हाल में खुश रहने की कोशिश में जुटी थकी मानवाकृतियों के बीच छोड़कर चले जाते थे.वे चले जाते थे, लेकिन पर्व-त्योहारों में लौटकर इसके पास आते थे. इसका आशीर्वादलेते थे. इसका शोर, इसका धुआं, इसकी गंध, इसकी खांसी और इसकी आहें लेते थे. रावण कोजलाने के बाद प्रतिवर्ष कानपुर घंटाघर से परेड ग्राउंड तक सजता था— भरत मिलाप केलिए. राम गली-गली में घूमते थे — सीता, लक्ष्मण और हनुमान को साथ लिए, रंग-बिरंगीरोशनियों और बैंड-बाजों के कोलाहल में — कलक्टरगंज, नयागंज, जनरलगंज, चूनामंडी,धनकुट्टी, हटिया, सब्जी मंडी, बादशाही नाका, कुली बाजार, कोयला बाजार, बूचड़खाना,लाटूश रोड, मूल गंज, नई सड़क, बड़ा चौराहा, सिविल लाइंस, नवीन मार्किट, परेड... सारेधर्मों और सारी जातियों के लोग इस कदर इस रौनक में खोए रहते थे कि यह उल्लास किसीकी बपौती नहीं लगता था. वे आते क्योंकि सारे संसार में इस तरह की रौनकें तलाश करनाबहुत मुश्किल था. वे नए-नए नगरों में नई-नई रंगीनियों से गुजरते, लेकिन कानपुरभुलाए नहीं भूलता. वह आंख से आंसू बनकर बहता, सीने में तेज दर्द की तरह रहता. वेसंसार में कहीं भी चले जाते, वह धूल की तरह उनसे चिपका रहता. वह रोज उनसे छूटता कुछदेर, बहुत देर उनसे चिपकने के लिए. वे होली पर आते. सब जगह होलियां बीत जातीं, मगरकानपुर में नहीं. कानपुर में होली जलने के बाद सात-आठ रोज तक जलती सुलगती चलतीरहती. गंगा किनारे मेला लगता तब वह खत्म होती. होली से भी ज्यादा रंग खेला जातागंगा मेला के रोज. यह पुराने कानपुर का रंग-ओ-रुख था. नई बसावटें इससे अंजान थीं.उन्हें नहीं मालूम था कि नागपंचमी को पुराने कानपुर में गुड़िया क्यों कहते हैं औरक्यों इस दिन साल भर में सबसे ज्यादा पतंगों से ढंका रहता है व्योम. बरसात केमहीनों में कानपुर में सबसे ज्यादा पतंगें उड़तीं, जैसे आसानियां इस शहर का शगल हीनहीं थीं. नई-नई रोशनियां रोज चली आ रही थीं, रोने की जगहों को कम करती हुईं...लेकिन कानपुर की सबसे बदनाम गलियां कटियाबाजी के उजाले से ही आबाद थीं. कानपुर कानिकाला आदमी भी कानपुर में ही रहता है. कनपुरियापन मुंह खोलने पर नजर आता है औरमुंह नहीं खोलने पर भी. कानपुर ने गुटखे (पान मसाला) का आविष्कार किया जिसके चलतेकनपुरियों को दूर से पहचानना आसान हो गया. वे विश्वग्राम के कोनों को लाल करते चलेजा रहे हैं. वे क्या कहना चाह रहे हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा क्योंकि उनके मुंहमें गुटखा भरा हुआ है, जिसके कण उनके होंठों पर तैर रहे हैं. कानपुर बहुत सारेदिखावे, बहुत सारे प्रकट विकास, बहुत सारे बन चुके और बन रहे मॉल्स के बावजूद एकगरीब और पिछड़ा हुआ शहर है. यह बिजली के तारों और बेशुमार रिक्शेवालों से भरा हुआशहर है. बाराबंकी, सीतापुर, बांदा, कन्नौज और उन्नाव जैसे जनपदों से आए इनरिक्शेवालों की रोज शाम यहां लगने वाले जाम में एक बड़ी भागीदारी है. इनके अपने दुःखहैं और सवारियों के अपने कान. इस सब पर भी कानपुर में देखने को कुछ भी नहीं है. कोईदेखना भी चाहे तो क्या देखेगा... कानपुर में कोई हवाई अड्डा नहीं है, कोई बहुत बड़ाबस अड्डा भी नहीं है, कोई नामचीन पार्क भी नहीं है, कोई भव्य मंदिर भी नहीं है, कोईमशहूर अस्पताल भी नहीं है, कोई ऐतिहासिक विश्वविद्यालय नहीं है. कहने को झकरकटी हैजहां बसें बहुत कम हैं, कीचड़ बहुत ज्यादा। कहने को कंपनी बाग है, लेकिन अब वहां वहबरगद नहीं है जिस पर सन् 1857 के 170 बागियों को एक साथ लटकाकर फांसी दी गई. कहनेको सिंघानिया फैमिली का बनवाया जे.के. मंदिर है जिसका कृत्रिम ताल अब एक नाले-सानजर आता है. कहने को उर्सला और हैलट हैं, लेकिन गंभीर रूप से बीमार अब तक इन्हेंलेकर गंभीर नहीं हो पाए हैं. कहने को आईआईटी भी है और उससे कुछ दूर कानपुरविश्वविद्यालय भी — जिसका नाम बदलकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय कर दिया — लेकिन इन जगहों पर वह कानपुर नहीं है जिसे एकघंटे में पैदल पूरा घूमा जा सकता है. नई बसावटों को शहर से जोड़ तो दिया जाता है,लेकिन वे शहर का आईना कतई नहीं होतीं... क्योंकि इन बसावटों का कोई इतिहास नहींहोता. बस एक सतत् वर्तमान होता है, जहां नियमित जड़ताएं एक गतिवान् और तयशुदादिनचर्या में मानवीय व्यक्तित्व को प्रतिदिन एक स्मृतिहीनता में ध्वस्त करती रहतीहैं. इसलिए ही किसी शहर के सबसे पुराने भूगोल को किसी शहर को समझने में सहायक समझाजाता है. कभी फैजाबाद लखनऊ से भी ज्यादा रंगीन था और कानपुर दिल्ली से भी ज्यादाहिंसक और बदतमीज. कभी इलाहाबाद रानीखेत से भी ज्यादा रूमानी था और गोरखपुर में पहलेइतनी धूल नहीं थी. बनारस वह कभी गया नहीं, लेकिन कभी नोएडा में जंगल था. घातककथाकार का भी कोई इतिहास नहीं है. बस एक सतत् वर्तमान है, जहां नियमित जड़ताएं एकगतिवान् और तयशुदा दिनचर्या में उसके व्यक्तित्व को प्रतिदिन एक स्मृतिहीनता मेंध्वस्त कर रही हैं. वह नगर में नया बसा हुआ है, जैसे-जैसे वर्तमान उसे रगड़ेगा, वहइतिहास अर्जित करेगा. वह गाजियाबाद में पैदा होगा, कानपुर में जवां होगा, दिल्लीमें क्रांति करेगा और पोरबंदर में मारा जाएगा. वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भटकेगा औरसब जगहों पर कानपुर खोजेगा, लेकिन उसे कानपुर के लोग मिलेंगे, कानपुर नहीं. वहउन्हें बताएगा : जब भठिहारखाने से उड़ती थी चरस की खुशबू तब ‘भों#$ के...’ कहकरचिल्लाने वाले कानपुर के ही थे. ‘काम मेरा कुछ और है जो काबिले-गौर है’ कहकर सांडेका तेल बेचने वाले भी कानपुर के ही थे. कानपुर सेंट्रल के प्लेटफॉर्म नंबर आठ पररुकी विक्रमशिला एक्सप्रेस की स्लीपर बोगी की विंडो सीट पर किसी तसव्वुर में खोईस्त्री के कान का झुमका खींचकर भाग जाने वाले भी कानपुर के ही थे. नकली दाढ़ी-मूंछलगाकर कार-सेवा में जाने वाले भी कानपुर के ही थे. मुसलमानों को मंदिरों में छुपानेवाले भी कानपुर के ही थे. भाई को भाई से लड़ाने वाले भी कानपुर के ही थे. फिर‘कम्प्रोमाइज’ करवाने वाले भी कानपुर के ही थे. रावतपुर से कल्याणपुर और कल्याणपुरसे रावतपुर तक बदरंग टैम्पो में फुल वाल्यूम में ‘इश्क आसां नहीं बड़ा मुश्किल हैकाम...’ बजाने वाले भी कानपुर के ही थे. बॉबी देओल को स्टार बनाने वाले भी कानपुरके ही थे. सुबह पांच बजे शाखा में चलने के लिए मां की गाली देकर जगाने वाले भीकानपुर के ही थे. ‘ये बम किस पर फटेंगे’ कहकर दोपहर में पी.पी.एन. की छात्राओं कोउनके घर तक छोड़ने वाले भी कानपुर के ही थे. शाम गए भांग के नशे में नए असलहों काट्रायल लेते हुए धोखे से जख्मी होने या कर देने वाले भी कानपुर के ही थे. रात मेंबड़े पैमाने पर बिजली, आंखों से सुरमा और नींद और सपने और आंसू चुराने वाले भीकानपुर के ही थे. ...लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं आएगा और इस तरह वह आंसुओं के साथअकेला होता जाएगा. वह जबसे पैदा हुआ है, तब से ही रो रहा है. वह रो रहा है यह उसेतब ज्ञात हुआ जब कुछ रुदनवादियों ने उसकी सराहना आरंभ की. वर्ना उसे रोना कहां आताथा. लेकिन वह रो रहा है और अच्छा रो रहा है, यह ज्ञात होने पर वह लगभग चार दशकपुराने अपने व्यक्तित्व की जांच करने लगेगा और पाएगा कि वह जबसे पैदा हुआ है, तब सेही रो रहा है. संपादकों ने रचनाएं लौटा दीं तो रोया, छाप दीं तो भी रोया. कवि मानागया तो रोया कि कथाकार को तवज्जोह नहीं मिली. कथाकार माना गया तो कवि न माने जानेपर रोया. कवि-कथाकार कहा तो विचारक और क्रांतिकारी न कहे जाने पर रोया. पुरस्कारनहीं मिला तब तो रोया ही, मिला तब भी रोया. अकादमिक दुनिया से बेदखली पर रोया,दाखिल हुआ तब भी रोया. रुदनवादी अब उसके सबसे बड़े निंदक हैं. उनका आरोप है कि वहअपने रुदन में अतिवादी है. उसके पास अब उसका एक भी हमउम्र नहीं. वह अपने कुछ कमउम्रप्रशंसकों के साथ इस गर्म अंधकार में एक कंदील की रौशनी में आलोकधन्वा की इस कविताका पाठ कर रहा है : तब वह ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगा जब मैं उसके किनारों से वापसआया वे स्त्रियां अब अधिक दिखाई देती हैं जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा वे जानवर जोसुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे और उन्हें इंतजार करना नहीं आता था और वे पहलेछाते बादल जिनसे बहुत करीब थे समुद्र मुझे ले चला उस दोपहर में जब पुकारना भी नहींआता था जब रोना ही पुकारना था जहां विस्मय तरबूज की तरह जितना हरा उतना ही लालhttps://www.youtube.com/watch?v=zWzFoUnNazc