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जर्मनी चुनाव: तो आखिरकार पुतिन ने मर्केल को पटखनी दे ही दी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार किसी दक्षिणपंथी पार्टी को जर्मनी की संसद में एंट्री मिली है.

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25 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 25 सितंबर 2017, 03:06 PM IST)
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मर्केल की रिफ्यूजी पॉलिसी की दुनियाभर में भले काफी तारीफ हुई हो, लेकिन इसके कारण जर्मनी के अंदर उन्हें काफी विरोध झेलना पड़ा.
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हारकर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं. जीतकर हारने वाले को क्या कहते हैं? एंजेला मर्केल.
जर्मनी. दुनिया के सबसे मजबूत देशों में से एक. 24 सितंबर को वहां चुनाव हुआ. चुनाव के नतीजे लोगों को हैरान कर रहे हैं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार किसी कट्टरपंथी दक्षिणपंथी पार्टी को संसद में एंट्री मिली है. एंट्री के पीछे सबसे बड़ा हाथ है जंग का. न सीरिया में जंग छिड़ती, न लाखों लोगों को बेघर होकर देश छोड़ना पड़ता, न वे शरणार्थी बनकर यूरोप पहुंचते, न जर्मनी इंसानियत दिखाकर उन्हें अपनाता और न इन शरणार्थियों की आड़ में दक्षिणपंथी विचारधारा को जड़ जमाने का मौका मिलता. लोग कह रहे हैं, दुनियाभर में दक्षिणपंथी राजनीति हावी हो रही है. हमारा मानना है कि बाकी राजनैतिक पार्टियां लोगों की चिंताओं का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रहीं. तभी तो अच्छा काम करके भी मर्केल की पार्टी का वोट 8 फीसदी घट जाता है.
जर्मनी में सैकड़ों लोग दक्षिणपंथी पार्टी AfD के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़कों पर उतर आए हैं.
जर्मनी में सैकड़ों लोग दक्षिणपंथी पार्टी AfD के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़कों पर उतर आए हैं. उनका कहना है कि पार्टी को मिले 13 फीसदी वोट जर्मनी का मिजाज़ नहीं बताते.

जो बात अभी जर्मनी में है, वो अमेरिका, रूस और चीन में भी नहीं

जर्मनी कोई आम देश नहीं है. ट्रंप के शासन में अमेरिका की गंभीरता दिनों-दिन घट रही है. उसका मखौल उड़ाया जा रहा है. ट्रंप और उनके बहाने अमेरिका ज्यादातर उल्टी-सीधी बातों पर खबरों में रहते हैं. ट्रंप 'अमेरिका फर्स्ट' कहते हैं. उनको बस अमेरिका से मतलब है. अमेरिका के फायदे-नुकसान के अलावा उनको किसी से कोई लेना-देना नहीं है. व्लादिमीर पुतिन के राज में रूस खूब जंग लड़ रहा है. खूब व्यस्त है. सीरिया में लड़ रहा है. यूक्रेन में लड़ रहा है. चीन की आक्रामकता के कहने ही क्या.
दक्षिणी चीन सागर, पूर्वी चीन सागर सब जगह तनाव बनाकर रखा है. बड़ी आर्थिक ताकत तो है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समस्याओं में कोई बेहतर भूमिका निभाने के लक्षण नहीं हैं उसके. जर्मनी की बात अलग है. अर्थव्यवस्था मजबूत है. नागरिकों के अधिकारों को लेकर बेहद उदार है. लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरे तक जमी हुई हैं. ब्रेक्जिट के कारण यूरोप में उसकी भूमिका और प्रभाव में और विस्तार हुआ है. सीरिया युद्ध के समय उसने 10 लाख से ज्यादा शरणार्थियों को अपनाया. पेरिस क्लाइमेट डील पर फ्रांस के साथ-साथ जर्मनी भी काफी गंभीरता दिखा रहा है. ये सब जर्मनी का कद बढ़ाते हैं और इसीलिए जर्मनी के चुनाव अहम हैं.
चुनाव नतीजों के मुताबिक, एंजेला मर्केल की पार्टी को 2013 के मुकाबले करीब 8 फीसद मतों का नुकसान हुआ है. ये सिर के बल उल्टी हुई उनकी तस्वीर जर्मनी के बदले मूड जैसी ही है शायद.
चुनाव नतीजों के मुताबिक, एंजेला मर्केल की पार्टी को 2013 के मुकाबले करीब 8 फीसदी मतों का नुकसान हुआ है. ये सिर के बल उल्टी हुई उनकी तस्वीर जर्मनी के बदले मूड जैसी ही है शायद.

इतिहास से किसी ने सबसे ज्यादा सीख ली है तो वो जर्मनी ही है

जर्मनी ने अपने इतिहास से सीखा है. सिस्टम को ऐसा बनाया है कि फिर कभी कोई हिटलर न पैदा हो. पैदा हो भी, तो उसे सत्ता न मिले. 1933 की बात है. राष्ट्रपति हिंडनबर्ग ने अडोल्फ हिटलर को चांसलर बना दिया. हिटलर की नाजी पार्टी गठबंधन सरकार का हिस्सा थी. वोन पोपेन वाइस चांसलर थे. उनका काम था हिटलर को बेलगाम होने से रोकना. कुछ ही महीनों में हिटलर ने संवैधानिक सरकार को साफ कर दिया. नागरिकों के अधिकार खत्म कर दिए. लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया. जर्मनी में एक पार्टी का दौर शुरू हुआ. नाजी सत्ता का दौर. दूसरा विश्व युद्ध. दुनिया भूले न भूले, जर्मनी कभी नहीं भूलेगा ये इतिहास. इस शर्मिंदगी और तबाही से फिर न गुजरना पड़े, इसकी तैयारी की गई. सिस्टम में जगह-जगह फिल्टर लगाए गए. ताकि सत्ता बेलगाम न हो पाए.
हिटलर से जर्मनी ने बहुत सबक सीखा है. शायद दोनों विश्व युद्धों से जर्मनी ने जितनी सीख ली है, उतनी दुनिया के किसी और देश ने नहीं ली.
हिटलर से जर्मनी ने बहुत सबक सीखा है. शायद दोनों विश्व युद्धों से जर्मनी ने जितनी सीख ली है, उतनी दुनिया के किसी और देश ने नहीं ली.

पहला चुनाव: 14 अगस्त, 1949

जर्मनी का बंटवारा हो चुका था. पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी. बीच में खड़ी थी बर्लिन की दीवार. ताकि पूरब के लोग पश्चिम न जा सकें. 14 अगस्त, 1949 को पश्चिमी जर्मनी ने पहली संसद के लिए वोट डाला. 1933 के बाद पहली बार जर्मनी में चुनाव हुआ था. बंटवारे के बाद का पहला चुनाव था. सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी (SPD) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. कुल 131 सीटें. ये जर्मनी की सबसे पुरानी पार्टी भी है. 115 सीटों के साथ क्रिश्चन डेमोक्रैटिक यूनियन (CDU) दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. मौजूदा चांसलर एंजेला मर्केल इसी CDU की नेता हैं. 2006 से सत्ता में हैं. क्रिश्चन सोशल यूनियन इन बवारिया (CAC) CDU का ही हिस्सा है. CDU की बहन समझ लीजिए. इन्हें एकसाथ CDU/CSU लिखते हैं.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के सिस्टम को इस तरह बुनने की कोशिश की गई, ताकि फिर कभी कोई नेता हिटलर न बन पाए.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के सिस्टम को इस तरह बुनने की कोशिश की गई, ताकि फिर कभी कोई नेता हिटलर न बन पाए.

मौजूदा चुनाव के बाद क्या है स्थिति

मर्केल CDU और SPD गठबंधन सरकार की मुखिया थीं. फिलहाल SPD के सबसे बड़े नेता हैं मार्टिन शुल्ज. इस चुनाव में मर्केल की पार्टी को 33 फीसदी वोट मिले. शुल्ज की पार्टी को 20.5 फीसदी वोट मिले. ये दोनों जर्मनी की सबसे बड़ी दो पार्टियां हैं. गठबंधन सरकार में थे दोनों. शुल्ज ने मर्केल के साथ दोबारा गठबंधन बनाने से इनकार किया है. उन्हें मर्केल से कई शिकायतें हैं. नाराज़ भी हैं. मानते हैं कि मर्केल की गलतियों के कारण ही दक्षिणपंथी धड़े को बढ़त मिली है. ऑल्टरनेटिव फुर डॉइचलैंड. यानी ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) पार्टी. दक्षिणपंथी. 13 फीसदी वोटों के साथ उसकी बोहनी हुई है. शुल्ज को लगता है कि मर्केल के ही कारण AfD को संसद में एंट्री मिली है. अगर AfD को सीटें न मिलतीं, तो इस बार का जर्मन चुनाव काफी बोरिंग होता. वही मर्केल. वही सरकार. जो नयापन है, वो इसी AfD के कारण है.
सीरिया के युद्ध में जर्मनी की कोई भूमिका नहीं थी. लेकिन जब हजारों-लाखों शरणार्थी जान बचाकर उसके दरवाजे पर पहुंचे, तो जर्मनी ने उनका स्वागत किया.
सीरिया के युद्ध में जर्मनी की कोई भूमिका नहीं थी. लेकिन जब हजारों-लाखों शरणार्थी जान बचाकर उसके दरवाजे पर पहुंचे तो जर्मनी ने उनका स्वागत किया.

किस पार्टी को कितनी सीटें मिली हैं

लेफ्ट पार्टी: 69 सीट SPD: 153 सीट ग्रीन पार्टी: 67 सीट फ्री डेमोक्रैटिक पार्टी (FDP): 80 सीट CDU/CSU: 246 सीट AfD: 94 सीट

जर्मन नागरिक दो वोट डालते हैं

जर्मनी की संसद को दो हिस्सों में बांटा जाता है. एक हिस्सा 'फर्स्ट पास्ट द पोस्ट' तरीके से उम्मीदवारों को चुनता है. इसमें उस निर्वाचन क्षेत्र से सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाता है. इन्हें कॉन्स्टिट्यूऐंसी रिप्रजेंटेटिव कहते हैं. संसद का दूसरा हिस्सा 'प्रप्रोशनल रिप्रेजेंटेशन' के नाम होता है. इसमें पार्टी को वोट जाता है.
इसमें चुने जाने वाले पार्टी डेलिगेट्स कहा जाता है. वोटर के मतपत्र पर दो ऑप्शन होते हैं. एक, अपने जिले का प्रतिनिधि चुनने के लिए. दूसरा, राजनैतिक पार्टी चुनने के लिए. जर्मनी में 299 निर्वाचन क्षेत्र हैं. संसद में कम से कम 598 सीटें होती हैं. 299 डायरेक्ट वोट से चुने जाते हैं. बाकी के 299 सीटों को भरने के लिए वोटर सेकंड वोट देता है. निर्वाचन क्षेत्र प्रति ढाई लाख की आबादी से बांटा जाता है. यहां जीतने वाले हर एक उम्मीदवार को संसद में एक सीट मिलती है. जर्मनी की बुंडेस्टैग (संसद के लिए इस्तेमाल होने वाला स्थानीय शब्द) के बाकी 299 सीटों के लिए वोटर दूसरा वोट डालते हैं. ये वोट राजनैतिक पार्टी को दिया जाता है. इससे ये भी तय होता है कि किस पार्टी को संसद में कितनी भागीदारी मिलेगी. जिन जिलों की आबादी ज्यादा है, उसे संसद में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलता है.
ये सच है कि जर्मनी में शरणार्थियों के खिलाफ माहौल मजबूत होता गया. लेकिन ये भी सच है कि एक बहुत बड़ा तबका, शायद बहुसंख्यक आबादी इन शरणार्थियों के लिए सहिष्णु है.
ये सच है कि जर्मनी में शरणार्थियों के खिलाफ माहौल मजबूत होता गया लेकिन ये भी सच है कि एक बहुत बड़ा तबका, शायद बहुसंख्यक आबादी इन शरणार्थियों के लिए सहिष्णु है.

ओवरहैंग सीट्स: संसद में सीटों की संख्या तय नहीं होती

ये खासा दिलचस्प है. जर्मनी की संसद में कम से कम 598 सीटें होती हैं, लेकिन ये फिक्स नहीं होती. बढ़ाई जा सकती हैं. ऐसा होता है ओवरहैंग सीट्स की स्थिति में. मसलन, मतदाताओं के फर्स्ट वोट से एक पार्टी के उम्मीदवारों को कम सीटें मिलीं. लेकिन वोटर्स के सेकेंड वोट से पार्टी को जो वोट मिला, उसका प्रतिशत ज्यादा है. हर जिले में जीतने वाले उम्मीदवार को एक सीट मिलना तय होता है. तो अब दोनों वोट्स के अनुपात के बीच अंतर होगा. इसी को 'ओवरहैंग सीट्स' कहते हैं. इस गैप को पाटा जाता है. इस चक्कर में कई बार बाकी पार्टियों को भी ज्यादा सीटें मिल जाती हैं. इसकी वजह से संसद की सीटें बढ़ा दी जाती हैं.
चुनाव के पहले माना जा रहा था कि मर्केल के जीतने की राह कमोबेश काफी आसान होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
चुनाव के पहले माना जा रहा था कि मर्केल के जीतने की राह कमोबेश काफी आसान होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

संसद में घुसने के लिए पार्टी को कम से कम 5 फीसदी सेकेंड वोट जीतने होंगे

ये एक अहम फिल्टर है. किसी राजनैतिक पार्टी के संसद के अंदर एंट्री करने की जरूरी शर्त है. पार्टी को कम से कम 5 फीसदी सेकेंड वोट चाहिए होते हैं. इसके पीछे भी जर्मनी के इतिहास की कड़वी यादें हैं. मई 1928 के चुनाव में हिटलर की नाजी पार्टी को केवल 12 सीटें मिली थीं. वोट प्रतिशत के हिसाब से केवल 2.6 फीसदी मत. उस दलदल में दोबारा न फंसना पड़े, इसलिए ये अब चुनाव सिस्टम में जगह-जगह फिल्टर्स लगे हैं. उनमें से ही एक ये 'फाइव पर्सेंट स्पिंल्टर' भी है. कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों को संसद से बाहर रखने में ये फिल्टर काफी काम आ रहा था. हालांकि इस बार AfD की संसद में एंट्री हो गई है. जाहिर है, फिल्टर इस बार काम नहीं आया.
दक्षिणपंथी धड़े उभर रहा है, ये बात पिछले कुछ समय से साफ दिख रही थी. लेकिन AfD को 13 फीसद वोट मिल जाएंगे, इसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी.
दक्षिणपंथी धड़ा उभर रहा है, ये बात पिछले कुछ समय से साफ दिख रही थी. लेकिन AfD को 13 फीसदी वोट मिल जाएंगे, इसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी.

कैसे चुना जाता है चांसलर?

चांसलर यानी सरकार का मुखिया. वो शख्स जो सरकार की कमान संभालता है. जर्मनी के मतदाता सीधे-सीधे अपना चांसलर नहीं चुनते. चुनाव डलने के एक महीने के भीतर-भीतर नई संसद को बैठक करनी होती है. जिस पार्टी को सबसे ज्यादा जनाधार मिलता है, उसका टॉप नेता चांसलर पद का दावेदार होता है. इस शख्स को राष्ट्रपति चांसलर पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करते हैं. फिर चुनाव होता है. संसद के नए चुने गए सदस्य गुप्त वोट डालते हैं. इसमें चांसलर के नाम पर मोहर लगाई जाती है. इससे पहले के तीन चुनावों में CDU को सबसे ज्यादा वोट मिले. उनकी चांसलर पद की दावेदार थीं एंजेला मर्केल. जर्मनी में चांसलर बनने की कोई सीमा नहीं है. आप कितनी भी बार इस पद पर चुने जा सकते हैं. हालांकि अब तक सबसे ज्यादा समय तक समय तक चांसलर बनने का रेकॉर्ड हेल्मुट कोल के नाम है. वो 16 साल तक इस पद पर रहे थे.
लोग काफी नाराज हैं. AfD पार्टी के मुख्यालय और उसके नेताओं की सुरक्षा बढ़ा दी गई है.

लोग काफी नाराज हैं. AfD पार्टी के मुख्यालय और उसके नेताओं की सुरक्षा बढ़ा दी गई है.

जर्मनी की सरकार का 'जमैका गठबंधन' से क्या लिंक है?

अगर CDU और SPD का गठबंधन नहीं होता है, तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में 'जमैका गठबंधन' की उम्मीद बन सकती है. ये जर्मन राजनीति का एक खास शब्द है. जमैका के झंडे पर तीन रंग होते हैं- काला, पीला और हरा. इस गठबंधन में CDU/CSU, फ्री डेमोक्रैटिक पार्टी (FDP) और ग्रीन पार्टी. काला रंग CDU/CSU होते हैं. काला रंग होता है CDU/CSU का. पीला FDP का और हरा ग्रीन पार्टी का. तीनों रंगों को मिला दीजिए, तो बन जाएगा जमैका का झंडा. हालांकि राष्ट्रीय संसद में इस फॉर्म्युला पर कभी काम नहीं हुआ. इनके आपसी सिद्धांत भी अलग-अलग हैं. FDP और ग्रीन्स पार्टी में पर्यावरण के मुद्दों पर सहमति नहीं है. यूरोजोन में बदलाव को लेकर FDP की अलग सोच है. हालांकि भारत में हमने अलग-अलग विचारधारा की पार्टियों को खूब हाथ मिलाते देखा है. लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी (PDP) का गठबंधन. BJP और बहुजन समाज पार्टी (BSP) का गठबंधन. देखना होगा कि जर्मनी इस फार्म्युले को कितना साध पाता है. हालांकि ग्रीन पार्टी की नेता रीने कुंस्त ने इसका संकेत भी दिया है.
CDU/CSU और SPD गठबंधन इस बार भी बन पाएगा, इस बात की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं दिखती. SPD के नेताओं ने इन संभावनाओं से साफ इनकार किया है.

CDU/CSU और SPD गठबंधन इस बार भी बन पाएगा, इस बात की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं दिखती. SPD के नेताओं ने इन संभावनाओं से साफ इनकार किया है.

इस बार चुनाव में बड़े मुद्दे क्या थे?

2015 में एंजेला मर्केल ने 10 लाख से ज्यादा शरणार्थियों को जर्मनी में जगह दी. जर्मनी की बहुत तारीफ हुई. लेकिन मर्केल को ये काफी महंगा पड़ा. ये रिफ्यूजी संकट जर्मनी में सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना. मर्केल ये सब जानती हैं. वो पहले भी जानती थीं कि लोग नाराज हैं. लेकिन वो अड़ी रहीं. पिछले दो साल के दौरान जर्मनी का माहौल काफी बदला है. शरणार्थियों पर हमले की कई घटनाएं सामने आईं. दिख रहा था कि एक बड़ा धड़ा शरणार्थियों से नाखुश है. मर्केल अब भी अपने फैसले के साथ खड़ी हैं. कह रही हैं कि शरणार्थियों को अपनाने के सिवा कोई और चारा नहीं था. कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ये चुनाव एक तरह से मर्केल की रिफ्यूजी पॉलिसी पर लोगों का जनमत संग्रह है.
मर्केल ने माना कि AfD समर्थकों से बात किए जाने की जरूरत है. नतीजों के बाद वो भले अपने वोटर्स का शुक्रिया जताने आगे आईं, लेकिन उनकी उदासी साफ झलक रही थी.
मर्केल ने माना कि AfD समर्थकों से बात किए जाने की जरूरत है. नतीजों के बाद वो भले अपने वोटर्स का शुक्रिया जताने आगे आईं, लेकिन उनकी उदासी साफ झलक रही थी.

दक्षिणपंथी AfD को मिला वोट मामूली बात नहीं है

AfD यानी ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी. 6 फरवरी, 2013 को बनी. केवल चार साल पुरानी पार्टी. अब 13 फीसदी वोट पाकर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. नाजी दौर के बाद ये पहली बार होगा जब कट्टरपंथी दक्षिणपंथी विचारधारा की कोई पार्टी संसद पहुंचेगी. 2013 के चुनाव में उसे 8 पॉइंट मिले थे, लेकिन कुल वोट प्रतिशत 5 फीसदी से कम था. नतीजा, संसद में एंट्री नहीं मिली. AfD को इतना वोट मिलना काफी मायने रखता है. उसे वोट देने वाले 35 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिन्होंने पहली बार मतदान किया है. AfD के टॉप नेता ऐलेक्जेंडर गोलैंड बहुत खुश हैं. ये पार्टी लगातार मर्केल की रिफ्यूजी पॉलिसी का विरोध करती आ रही थी. अब उन्हें लग रहा है कि जनता भी उसके साथ है.
एंजेला मर्केल और रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के रिश्ते काफी कड़वे माने जाते हैं. पुतिन की सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के साथ गहरी दोस्ती है. सीरिया युद्ध के कारण जो रिफ्यूजी संकट पैदा हुआ, वो मर्केल की लोकप्रियता गिरने का सबसे बड़ा कारण बना.
एंजेला मर्केल और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के रिश्ते काफी कड़वे माने जाते हैं. पुतिन की सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के साथ गहरी दोस्ती है. सीरिया युद्ध के कारण जो रिफ्यूजी संकट पैदा हुआ, वो मर्केल की लोकप्रियता गिरने का सबसे बड़ा कारण बना.

जर्मनी की जनता सोशल मीडिया पर उंगलियां घिस रही है: हम कट्टर नहीं हैं
नतीजे आने के बाद जर्मनी के नागरिक सोशल मीडिया की शरण में हैं. ट्विटर और फेसबुक पर उंगलियां घिस रहे हैं. दुनिया को यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. कि वो कट्टर नहीं. जिन 13 फीसद लोगों ने AfD को वोट दिया, उनसे खुद को अलग साबित करने में लगे हैं. लिख रहे हैं, देश की 87 फीसद जनता ने दक्षिणपंथियों को नकार दिया. 13 फीसद झांसे में आ गए.
नतीजे आने के बाद जगह-जगह रैलियां निकाली जा रही हैं. सैकड़ों लोग AfD के विरोध में मार्च कर रहे हैं. नारे गूंज रहे हैं- नाजियों, चले जाओ. हालांकि जर्मनी में चुनावों के साथ एक और दिलचस्प बात है. नागरिक चाहें, तो चुनाव के नतीजों को चुनौती दे सकते हैं. आगे क्या होता है, ये आगे की बात है. अभी का सच तो AfD ही है. भले अब कितनी भी रैलियां निकलें, लेकिन AfD की बोहनी तो हो ही गई है.


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