सर्दियां आ गई हैं. जाहिर सी बात है ऊनी कपड़ों की जरूरत बढ़ गई है. इसीलिए मैंशॉपिंग करने पहुंची. लगभग हर साल एक-आधा ऊनी कपड़ा लेना पड़ता है. क्योंकि कोई श्रिंकहो जाता है तो कोई फट जाता है. जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही हूं, कपड़े बदल रहे हैं.मेरे भी और बाज़ार के भी. कपड़ों की गर्माहट घट रही है. कपड़े खरीदने का कल्चर अबगारमेंट्स की दुकानों से मॉल में शिफ्ट हो गया है. होना ही था. कपड़ों के दाम बढ़ेहैं, बढ़ने ही थे. लेकिन साल-दर-साल ऊनी कपड़ों की क्वॉलिटी में एक अजीब सी गिरावटदिखती है. मैं बात कर रही हूं लड़कियों के सेक्शन की. एक स्वेटर 5 हजार में खरीदूं,ये मैं अफोर्ड नहीं कर सकती. इसलिए ऐसे स्टोर में जाती हूं जहां ठीक-ठाक गर्म कपड़ेमिल जाएं. पैंटालून्स, लाइफस्टाइल, ग्लोबस जैसे मिडिल क्लास स्टोर में जाती हूं तोदेखती हूं कि लड़कियों के स्वेटर बड़े ही झीने से होते हैं. पतले से. पूरा स्टोरघूमने के बाद भी एक ऐसा स्वेटर नहीं मिलता, जिसे खरीदकर लगे कि हां, इसमें 2 हजारलगाए हैं. इसके दम पर जनवरी की सुबहें काटी जा सकती हैं. कुछेक जैकेट अगर गर्म सेदिखते भी हैं, तो उन्हें देखकर साफ़ पता चलता है कि ध्यान इनकी गर्माहट पर नहीं,लुक्स पर दिया गया है. और इसीलिए मैं और मेरी कई सहेलियां मेन्स सेक्शन से विंटरवियर खरीदती हैं. अभी एक शोरूम में घुसी. शोरूम स्पोर्ट्सवियर का था. सोचा जैकेटलूंगी. स्टोर में आधे से ज्यादा कपड़े लड़कियों के थे. जिनमें से कुछ ही कपड़े थे, जोगरम थे. और जो गरम थे, उनमें दो ही रंग थे: गुलाबी और लाल. हैरतंगेज ये था कि लड़कोंके सेक्शन में मुझे एक भी लाल या गुलाबी कपड़ा नहीं दिखा. यहां तक कि तौलियों औररुमालों में भी नहीं. दिखता भी कैसे, आखिरकार ये 'स्पोर्ट्स' की दुकान थी. औरस्पोर्ट्स वाले जनाना रंग नहीं पहनते. है न? रंग तो एक बात है. कम्फर्ट के लेवल परभी देखें तो औरतों और पुरुषों के कपड़ों में बहुत फर्क है. लड़कियों की जैकेट और शर्टदेखती हूं तो कोका-कोला की बोतल की तरह कटी हुई दिखती हैं. जैसे ख़ास औरतों का'फिगर' दिखाने के लिए बनाई गई हों. औरतों के ट्राउजर्स देखती हूं तो वो भी ऐसे बनेहोते हैं कि जांघों से टांगों के निचले हिस्से की ओर पतले होते जाते हैं. कि लड़कीकी टांगों का शेप पता चले. बात जेबों की. मेरे कुर्तों में जेबे हों, इसके लिए एकलंबे समय तक मैं कुर्ते रेडीमेड खरीदने के बजाय सिलवाती आई हूं. उस पर भी दर्जी कोबताना पड़ता है कि जेब सिलनी हैं. क्योंकि उनके दिमाग में एक ऐसा डिजाइन फिट है किलड़की का कुर्ता है, जेबें क्यों ही सिलनीं. लड़कियों के ट्राउजर्स हैं तो इसमेंजेबें क्यों ही हों. ये कोई फैशन स्टेटमेंट नहीं है. ये कपड़ों का इतिहास है. जो उससमय से चला आ रहा है जब औरतों को घर के बाहर नहीं निकलना होता है. लेकिन समय के साथकपड़े नहीं बदले. और आज भी कपड़ों में लड़कियों को जेबें नहीं मिलतीं. मिलती भी हैं तोइतनी बड़ी नहीं होतीं कि उनमें फ़ोन, चाबी और जरूरत की 2-4 चीजें आ जाएं. जेबें तो बसएक उदाहरण हैं. लड़कियों के रुमाल, वॉलेट, बेल्ट घड़ियां, सब छोटी-छोटी होती हैं.बीते दिनों एक चाय वाले ने मुझसे पूछ भी लिया. मैडम आप लड़कों वाला पर्स क्यों रखतीहैं. तब, जब उसको पैसे देने के लिए मैंने जेब से एक भूरा 'मेन्स' वॉलेट निकाला.मेरा जवाब बस इतना सा था कि जेब में आ जाता है, इसलिए. लड़कियों के बैग इतने बड़ेहोते हैं, जैसे वो ये सोचकर बनाए गए हों कि इसमें वो लिपस्टिक, काजल और परफ्यूमलेकर ही चलती होंगी. और चूंकि उनसे ये अपेक्षित नहीं है कि वो लैपटॉप लेकर चलतीहोंगी, मॉल और सिनेमा में उनके बैग्स बड़ी आसानी से घुसने दिए जाते हैं. बल्किपुरुषों से उनको जमा करा लिया जाता है. और हां, कपड़ों और एक्सेसरीज का ये भेद देखनेके लिए आप किड्स सेक्शन में ही जा सकते हैं. जहां 0-5 उम्र वाले बच्चों के हीसेक्शन अलग-अलग दिख जाते हैं. मुमकिन है लड़कियों वाले कपड़ों पर तितली बनी हो औरलड़कों वाले पे कोई मशीन. जब 6 महीने की ही उम्र से आप लड़कियों को गुड़ियों और लड़कोंको मशीनों की दुनिया में डालेंगे, तो यकीनन लड़कियां हद से ज्यादा कमज़ोर और लड़केसंवेदनहीनता की हद तक कठोर निकलेंगे. कपड़े हमारे समाज का एक बड़ा और जरूरी हिस्साहैं. कपड़े हमारी जरूरत हैं. और मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर किसी दिन बाजार ये साबितकर दे कि लड़कियों को तो सर्दी लगती ही नहीं.