इस बात में कितना दम है कि आनंदपाल के मामले में सीबीआई जांच होगी?
किसी भी राज्य सरकार की अनुशंसा भर से मामले में सीबीआई जांच शुरू नहीं हो जाती. इसके कई चरण होते हैं.

राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर की जांच के मामले में राज्य सरकार का रुख नरम पड़ गया है. आखिरकार सरकार ने लंबे समय से चल रही सीबीआई जांच की मांग को आज मान लिया गया है. लोकेंद्र सिंह कालवी के नेतृत्व वाली सर्वसमाज संघर्ष समिति के सदस्यों और सरकार के बीच हुई शांति वार्ता के बाद अब आंदोलन वापिस ले लिया गया.
इससे पहले 13 जुलाई को आनंदपाल सिंह की मौत के 19 दिन बाद सरकार ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया था. यह अंतिम संस्कार उनके परिजनों की मर्जी के खिलाफ हुआ था. पुलिस की इस कार्रवाही के पीछे आनंदपाल के गांव सांवराद(नागौर) में हुआ राजपूत समाज का जुटान था. 12 जुलाई श्रद्धांजलि सभा के नाम पर एक लाख से ज्यदा लोग इकठ्ठा हुए थे. यह जुटान शाम ढलते-ढलते हिंसक हो गया था. इसके बाद राज्य सरकार के कान खड़े हो गए थे. इस जबरन करवाए गए अंतिम संस्कार के खिलाफ राजपूत संगठनों ने 22 तारीख को जयपुर में महारैली बुलाई थी. सरकार ने इसे मद्देनजर रखते हुए आज ही आंदोलनकारियों की लगभग सभी मांगे मान ली हैं.

ये हैं वो मांगे जो मान ली गई हैं
सर्वसमाज समिति की तरफ से लोकेंद्र कालवी सहित कुल 11 लोग समझौता बैठक में थे. सरकार की तरफ से गृहमंत्री गुलाब कटारिया, पंचायती राज मंत्री राजेंद्र राठौड़ और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष अशोक परनामी इस बैठक में मौजूद थे. इसमें कुल सात मुद्दों पर सहमति बनी.
1. आनंदपाल के एनकाउंटर के मामले में राज्य सरकार द्वारा सीबीआई जांच की अनुशंसा की जाएगी.
2 राज्य सरकार इस मामले में दर्ज मुकदमों में सरकार कोई द्वेषपूर्ण कार्रवाही नहीं करेगी.
3 आनंदपाल की पुत्री के भारत आने पर सरकार की तरफ से कोई कठिनाई नहीं पैदा की जाएगी. आनंदपाल की बेटी चरणजीत फिलहाल दुबई में हैं और पढ़ाई कर रही हैं.
4 श्रवण सिंह के परिवार पर सरकारी निगरानी नहीं रहेगी. परिवार को उनका मकान लौटा दिया जाएगा. आनंदपाल ने इसी मकान में शरण ली थी.
इसके अलावा कमांडो सुरेंद्र सिंह को सहायता देने, आंदोलन के दौरान मृतकों, घायलों को मुआवजा दिए और परिवार को आनंदपाल के प्रथम पोस्टमार्टम की रिपोर्ट सौंपने की बात कही गई है.

यह समझौता जितना सपाट दिख रहा है, दरअसल उतना है नहीं. राज्य सरकार ने सीबीआई जांच की अनुशंसा करने की बात मान ली है, इसका यह मतलब नहीं है कि इस मामले में सीबीआई जांच होगी ही. यह जांच एजेंसी पर निर्भर करता है कि वो इस मामले को अपने हाथ में लेती है या नहीं. सीबीआई राज्य सरकार की अनुशंसा मानने के लिए बाध्य नहीं है.
ऐसे करती है सीबीआई जांच
किसी केस का सीबीआई जांच तक पहुंचने का सफ़र लंबा है. 2009 में निर्मल सिंह कोहलान बनाम पंजाब राज्य में फैसला सुनाते हुए सप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के लिए गाइड लाइन दी थी. इस गाइड लाइन के मुताबिक ये लोग सीबीआई जांच के आदेश दे सकते हैं- #भारत के प्रधानमंत्री, #कैबिनेट मिनिस्टर, #राज्य का मुख्यमंत्री, #राज्य सरकार #हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट
किसी भी राज्य सरकार के आदेश देने भर से मामले में सीबीआई जांच शुरू नहीं हो जाती. इसके कई चरण होते हैं. इसमें 10 से लेकर 1 महीने तक का समय लग जाता है-
1. राज्य सरकार किसी भी मामले की जांच की अनुशंसा केंद्रीय गृह मंत्रलय को भेजती है. 2. गृह मंत्रालय अगर मामले को सीबीआई जांच लायक समझता है तो वो फाइल को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग(DoPT) को बढ़ा देता है. 3.DoPT सीबीआई से पूछता है कि क्या वो इस मामले की जांच करना चाहती है. अगर सीबीआई का जवाब सकारात्मक होता है, तब जाकर मामले में सीबीआई जांच होती है.
दूसरी गौर करने लायक बात यह है कि इस पूरे आंदोलन में नेतृत्व के स्तर पर दो फाड़ था. एक धड़े का नेतृत्व लोकेंद्र कालवी कर रहे थे और दूसरे का सुखदेव गोगामेड़ी. लोकेंद्र कालवी पर वसुंधरा समर्थक होने के आरोप लगते रहे. लोकेंद्र कालवी के नेतृत्व वाले धड़े ने आंदोलन वापस लेने की बात कही है. यहां यह साफ़ नहीं हो पाया है कि दूसरा धड़ा इस बात से कितना सहमत है. सुखदेव गोगामेड़ी पर राज्य सरकार की तरफ से विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज है और वो फिलहाल फरार चल रहे हैं. इस समझौते में उनके तथा दूसरे आंदोलनकारियों पर राज्य सरकार की तरफ से दायर मुकदमों पर किसी किस्म की रियायत की बात नहीं कही गई है. ऐसे में इस समझौते को कितना स्वीकार किया जाता है इस पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

वसुंधरा राजे के पिछले कार्यकाल के पूरा होने से एक साल पहले 2007 में गुर्जर आंदोलन शुरू हुआ था. उस समय भी वसुंधरा राजे प्रशासन की तरफ बुरे मैनेजमेंट का नमूना पेश किया गया था. नतीजतन 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी पूर्वी राजस्थान में साफ़ हो गई थी. यह उनके हार की बड़ी वजह बनी थी. इस बार भी विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले राजपूत आंदोलन खड़ा हुआ है और वसुंधरा सरकार फिर से उन्ही स्थितियों में घिरती नजर आ रही है. यहां सवाल यह है कि अगर आंदोलनकारियों की सभी मांगों को माना ही जाना था तो इस मामले को इतना बढ़ाने की जरुरत कहां थी. इस बदइंतजामी का विधानसभा चुनाव पर क्या असर पड़ेगा यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन यहा यह साफ़ है कि पूरे मामले में निपटने के स्तर पर प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व से कुछ बड़ी भूलें हुई हैं.
आनंदपाल से जुड़े वीडियो-
https://www.youtube.com/watch?v=S5pqirsyK4o https://www.youtube.com/watch?v=zZ5Q43bwC_c https://www.youtube.com/watch?v=zGk0lWzhrioये भी पढ़ें
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