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अखिलेश यादव जिस अतीक अहमद पर भिड़े, उसकी असली कहानी क्या है?

तारीख 24 फरवरी, 2023, दिन शुक्रवार और प्रयागराज का धूमनगंज. शाम के साढ़े 5 बजे राजू पाल हत्याकांड में गवाह उमेश पाल हमला पर हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गई.

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28 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 28 फ़रवरी 2023, 09:30 PM IST)
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आतीक अहमद (फोटो: इंडिया टुडे)
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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ. कुछ गुंडे यहां से एक बिजनेसमैन को किडनैप करते हैं. 300 किलोमीटर दूर देवरिया ले जाते हैं. वो भी ऐसी-वैसी जगह नहीं, सीधे जेल में. देवरिया जेल में बिजनेसमैन की पिटाई की जाती है. प्रॉपर्टी के लिए सादे कागज पर साइन करवाए जाते हैं. पूरी घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल किया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि लोगों में दहशत बनी रहे. ये घटना है 26 दिसंबर 2018 की. बिजनेसमैन जिन्हें पीटा गया, वो थे मोहित जायसवाल. मोहित ने आरोप लगाया था कि उनका अपहरण अतीक अहमद ने करवाया था. वारदात के बाद मोहित ने एक टीवी चैनल से कहा था,

"जेल के अंदर ले जाकर मुझे डंडों से मारा गया. 15-20 आदमियों ने पकड़कर मुझे बहुत मारा. खाली पेपर पर साइन करवाए. मुझसे मेरी SUV छीन ली गई. कहा गया कि तुम जेल के अंदर हो इसलिए तुम्हारी हत्या नहीं हो सकती. नहीं तो मार देते."

इस घटना के बाद अतीक अहमद को देवरिया से बरेली जेल भेजा गया. वहां के जेल प्रशासन ने अतीक को रखने से इनकार कर दिया. लोकसभा चुनाव सामने थे. अतीक को कड़ी सुरक्षा में रखना ज़रूरी था. सो इलाहाबाद के नैनी जेल में शिफ्ट कर दिया गया. उधर देवरिया जेल कांड का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. कोर्ट ने CBI को मुकदमा दर्ज कर जांच का आदेश दिया. अतीक अहमद और बेटे के अलावा 4 सहयोगियों और 10-12 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ. 23 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को आदेश दिया कि अतीक अहमद को यूपी के बाहर शिफ्ट किया जाए. उसके बाद यूपी सरकार ने 3 जून 2019 को उसे अहमदाबाद की साबरमती जेल में शिफ्ट कराया.

आज हम इस घटना की याद आपको इसलिए दिला रहे हैं क्योंकि अतीक अहमद फिर चर्चा में है.

तारीख 24 फरवरी, 2023, दिन शुक्रवार और प्रयागराज का धूमनगंज.  शाम के साढ़े 5 बजे के आसपास ये इलाका गोलियों और बमों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. लोगों ने ऐसी फायरिंग और बमबाजी केवल फिल्मों में देख रखी थी. बारुद का धुंआ छंटा तो पता चला कि ये हमला राजू पाल हत्याकांड में गवाह उमेश पाल पर हुआ है. 18 साल पहले करीब 500 मीटर दूर बिल्कुल इसी इलाके में इसी तरह से राजू पाल की हत्या हुई थी. उमेश इसके गवाह थे. दोनों हमलों में बहुत सारी चीजें कॉमन थी. जगह भी लगभग वही थी. स्टाइल भी वही था और आरोप भी उसी व्यक्ति पर लगा जिस पर राजू पाल की हत्या का आरोप था. अतीक अहमद.

राजू पाल की हत्या के अलावा अतीक पर गवाहों के अपहरण का आरोप भी था. गवाहों को डरा धमका कर बयान बदलने का भी आरोप था. खुद उमेश पाल ने पहले अतीक के समर्थन में गवाही दे दी थी. बाद में आरोप लगाया था कि अतीक ने उसका अपहरण कर लिया था और दबाव में गवाही बदलवाई. इसी मामले की आखिरी सुनवाई अगले सोमवार यानी 27 फरवरी को होनी थी. लेकिन इससे 3 दिन पहले ही उमेश पर हमला हो गया. उमेश कोर्ट से अपने घर वापस लौटे थे. जैसे ही गाड़ी से उतरे पूरी प्लानिंग के साथ आए हमलावरों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं. उमेश गली में भागे तो उन्हें दौड़ाकर गोली मारी गई. उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई. उमेश को पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी. साथ में दो गनर थे. इस हमले में एक गनर की भी मौत हो गई. जबकि दूसरे का इलाज पीजीआई लखनऊ में चल रहा है.  

25 फरवरी को उमेश पाल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई. रिपोर्ट में पता चला है कि बदमाशों ने उमेश को 7 गोलियां मारी थीं. इसमें से 6 गोलियां उसके शरीर को पार कर गईं और एक गोली शरीर के अंदर फंसी रह गई. उमेश की पत्नी जया पाल ने हत्या के मामले में अहमदाबाद जेल में बंद अतीक अहमद, पत्नी शाइस्ता परवीन, बरेली जेल में बंद पूर्व विधायक अशरफ, अतीक के बेटों और अन्य सहयोगियों के खिलाफ धूमनगंज थाने में FIR दर्ज कराई है.

उमेश पाल पर हुआ हमला इतना भयावह था कि सीसीटीवी फुटेज आया तो हड़कंप मच गया. 24 घंटे के भीतर उमेश पाल की हत्या का मामला प्रयागराज से लखनऊ तक पहुंच गया. विधानसभा में नेता विपक्ष अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच जमकर बहस हुई. सीएम योगी ने इस दौरान माफियाओं को मिट्टी में मिलाने की बात कही.

अतीक पर विधानसभा में गहमागहमी हुई तो परिवार को डर सताने लगा. अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन ने  27 फरवरी को सीएम योगी को चिट्ठी लिख मामले की CBI से जांच कराने की मांग की. शाइस्ता ने लिखा,

"जब से बसपा ने मुझे प्रयागराज से मेयर पद का उम्मीदवार घोषित किया है, आपकी सरकार में एक स्थानीय नेता, एक कैबिनेट मंत्री ने हमारे खिलाफ साजिश रची है. इसी साजिश के तहत एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई है. जिसका आरोप मेरे पति पर लगना स्वाभाविक था. प्रयागराज पुलिस कमिश्नर रमित शर्मा और  STF के एडीजी अमिताभ यश ने मेरे पति की हत्या की सुपारी ली है. आप दखल दें नहीं तो मेरे पति और देवर की हत्या हो जाएगी."

शाइस्ता परवीन ने अपने पति, देवर और बेटों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही पेश करने की मांग की है.

27 फरवरी को प्रयागराज पुलिस कमिश्नर रमित शर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. बताया कि पुलिस ने एनकाउंटर में अरबाज नाम के एक आरोपी को मार गिराया है. उमेश पाल की हत्या में जिस क्रेटा कार का इस्तेमाल किया गया था, उसे अरबाज़ ही चला रहा था. इसके अलावा पुलिस कमिश्नर ने बताया कि हत्या की प्लानिंग करने वाले सदाकत खान को गिरफ्तार कर लिया गया है. सदाकत इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मुस्मिल बोर्डिंग हॉस्टल में अवैध रूप से रहता था. उसी के कमरे में उमेश पाल की हत्या करने की साजिश की गई.

सदाकत गिरफ्तार हुआ तो BJP ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ उसकी एक फोटो शेयर कर दी. अपराधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.

जवाब में समाजवादी पार्टी ने भी BJP के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया के साथ सदाकत की फोटो शेयर कर दी. इसके अलावा इस मामले में  स्थानीय BJP नेता राहिल हसन के भाई की गिरफ्तारी की बात भी कही. समाजवादी पार्टी ने ट्वीट कर कहा,

"सदाकत वर्तमान में BJP का सदस्य था जिसकी फोटो सपा के साथ जोड़ी जा रही है. BJP की पूर्व विधायक नीलम करवरिया के घर पर नीलम के पति उदयभान करवरिया के साथ सदाकत की फोटो BJP के साथ इस घटनाक्रम का कनेक्शन बताती हैं. इससे पहले भी एक BJP नेता राहिल इस केस का मास्टरमाइंड पकड़ा जा चुका है."

यानी दोनों तरफ से ये तुम्हारा, ये तुम्हारा हो रहा है. चूंकि अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन बहुजन समाज पार्टी से जुड़ी हैं इसलिए बसपा सुप्रीमो मायावती पर भी सवाल उठे. मायावती ने सारे सवालों का जवाब 27 फरवरी को किए गए ट्वीट में दिया. मायावती ने कहा कि अगर जांच में शाइस्ता परवीन दोषी साबित होती हैं तो उन्हें पार्टी से निष्कासित किया जायेगा. अब यहां सवाल ये उठता है कि आखिर जिस गैंग्स्टर पर इतने गंभीर आपराधिक आरोप हैं, उसे राजनीतिक दल लगातार संरक्षण क्यों दे रहे हैं? क्या है अतीक अहमद की कहानी?

शुरुआत 70 के दशक से. प्रयागराज तब इलाहाबाद हुआ करता था. इलाहाबाद में उन दिनों नए कॉलेज बन रहे थे. उद्योग लग रहे थे. खूब ठेके बंट रहे थे. नए लड़कों में अमीर बनने का चस्का लगना शुरू हो गया था. वो अमीर बनने के लिए कुछ भी करने को उतारू थे. कुछ भी मतलब, कुछ भी. हत्या और अपहरण भी. इलाहाबाद में एक मोहल्ला है चकिया. साल था 1979. इस मोहल्ले का एक लड़का हाई स्कूल में फेल हो गया. उसके पिता इलाहाबाद स्टेशन पर तांगा चलाते थे, लेकिन अमीर बनने का चस्का तो उसे भी था. 17 साल की उम्र में हत्या का आरोप लगा और इसके बाद उसका धंधा चल निकला. खूब रंगदारी वसूली जाने लगी. नाम था अतीक अहमद. फिरोज तांगेवाले का लड़का.

पुराने शहर में उन दिनों चांद बाबा का खौफ हुआ करता था. पुराने जानकार बताते हैं कि पुलिस भी चौक और रानीमंडी की तरफ जाने से डरती थी. अगर कोई खाकी वर्दी वाला चला गया तो पिटकर ही वापस आता. लोग कहते हैं कि उस समय तक चकिया के इस 20-22 साल के लड़के अतीक को ठीक-ठाक गुंडा माना जाने लगा था. पुलिस और नेता दोनों उसे शह दे रहे थे. वे चांद बाबा के खौफ को खत्म करना चाह रहे थे. इसके लिए खौफ के बरक्स खौफ को खड़ा करने की कवायद की गई. और इसी कवायद का नतीजा था अतीक का उभार, जो आगे चलकर चांद बाबा से ज्यादा पुलिस के लिए खतरनाक होने वाला था.

ये तब की बात की बात है जब प्रदेश में वीर बहादुर सिंह की सरकार थी. केंद्र में थे राजीव गांधी. साल 1986. अब तक चकिया के लड़कों का गैंग चांद बाबा से ज्यादा उस पुलिस के लिए ही खतरनाक हो चुका था, जिसे पुलिस ने शह दी थी. अब पुलिस अतीक और उसके लड़कों को गली-गली खोज रही थी. एक दिन पुलिस अतीक को उठा ले गई. बिना किसी लिखा-पढ़ी के. थाने नहीं ले गई. किसी को कोई सूचना नहीं. लोगों को लगा कि अब काम खत्म है. परिचितों ने खोजबीन शुरू की. नेताओं को फोन गया और पुलिस ने अतीक को छोड़ दिया.

अतीक अब पुलिस के लिए नासूर बन चुका था. वो उसे ऐसे ही नहीं छोड़ना चाहती थी. अतीक को भी भनक लग गई थी. एक दिन भेष बदलकर अपने एक साथी के साथ कचहरी पहुंचा. बुलेट से. और एक पुराने मामले में जमानत तुड़वाकर सरेंडर कर दिया. जेल जाते ही पुलिस उस पर टूट पड़ी. उसके खिलाफ NSA लगा दिया. बाहर लोगों में मैसेज गया कि अतीक बर्बाद हो गया. लोगों में सहानुभूति पैदा हो गई. एक साल बाद अतीक जेल से बाहर आ गया. जेल से आते ही उसने इस सहानुभूति का फायदा उठाया. लेकिन अब बचने के लिए सियासत ही काम आ सकती थी. और ऐसा ही हुआ. 1989 में यूपी में विधानसभा के चुनाव हुए. इलाहाबाद पश्चिमी से अतीक ने निर्दलीय पर्चा भरा.

सामना चांद बाबा से था. चांद बाबा और अतीक में कई बार गैंगवार हो चुकी थी. अपराध जगत में अतीक की तरक्की चांद बाबा को अखर रही थी. यही कारण था कि चांद बाबा ने सीधी चुनौती दी. वो चुनाव हार गए. अतीक अहमद विधायक बन चुका था. रिजल्ट से पहले ही उनकी हत्या भी हो गई. बीच चौराहे, भरे बाजार. धीरे-धीरे, एक-एक करके चांद बाबा का पूरा गैंग खत्म हो गया. कुछ मार दिए गए. बाकी भाग गए. बाबा का दौर खत्म हो चुका था. अब भाई का दौर आ गया था. चांद बाबा की हत्या के बाद अतीक का खौफ इस कदर फैला कि लोग इलाहाबाद पश्चिमी सीट से टिकट लेने से खुद ही मना कर देते. 

यही कारण था कि अतीक ने निर्दलीय रहकर 1991 और 1993 में भी लगातार चुनाव जीते. इसी बीच सपा से नजदीकी बढ़ी. 1996 में सपा के टिकट से चुनाव लड़ा और चौथी बार विधायक बना. 1999 में अपना दल का हाथ थामा. प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा. लेकिन जीत नहीं पाया. 2002 में अपना दल से ही चुनाव लड़ा पुरानी सीट से और 5वीं बार शहर पश्चिमी से विधानसभा में पहुंच गया.

अतीक को अब विदेशी गाड़ियों का चस्का लग गया था. कुछ ही दिन में उसने भी विदेशी गाड़ी खरीद ली. गाड़ियों के बाद नंबर था हथियारों का. चकिया के रहने वाले लोग बताते हैं कि अतीक को दो ही चीजों का शौक रहा. हथियार और विदेशी गाड़ी. दर्जनों विदेशी लग्जरी गाड़ियां अब तक उसके काफिले में रहीं.

अतीक चकिया या इलाहाबाद तक ही सीमित नहीं रहना चाहता था. यही कारण था कि वो विरोधियों को खत्म कर देता था. चाहे वो चांद बाबा हो या फिर राजू पाल. 2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी. अतीक की सपा में वापसी हुई. 2004 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर से चुनाव लड़ा. और संसद पहुंच गया. इलाहाबाद पश्चिमी की सीट खाली हुई. अतीक ने अपने भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ को वहां से मैदान में उतारा. लेकिन जिता नहीं पाया. 4 हजार वोटों से जीतकर विधायक बने बसपा के राजू पाल. वही राजू पाल, जिसे कभी अतीक का दाहिना हाथ कहा जाता था. राजू पर भी उस समय 25 मुकदमे दर्ज थे. ये हार अतीक को बर्दाश्त नहीं हुई. अक्टूबर 2004 में राजू विधायक बने. अगले महीने नवंबर में ही राजू के ऑफिस के पास बमबाजी और फायरिंग हुई. लेकिन राजू पाल बच गए. दिसंबर में भी उनकी गाड़ी पर फायरिंग की गई. राजू ने सांसद अतीक से जान का खतरा बताया.

दिसंबर के बाद आई जनवरी. गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले 25 जनवरी 2005 को विधायक राजू पाल SRN हॉस्पिटल से धूमनगंज की तरफ निकले. टोयोटा क्वालिस गाड़ी से. गाड़ी नेहरू पार्क के पास पहुंची तो सामने एक स्कार्पियो आ गई. जब तक कोई कुछ समझ पाता पूरा इलाका बम-गोलियों से दहल उठा था. राजू पाल खून से लथपथ थे. कई गोलियां लगीं थीं. फायरिंग करने वाले फरार हो गए. पीछे की गाड़ी में बैठे समर्थकों ने राजू पाल को एक टेंपो में लादा और अस्पताल की ओर लेकर भागे. फायरिंग करने वालों को लगा कि राजू पाल अब भी जिंदा है. एक बार फिर से टेंपो को घेरकर फायरिंग शुरू कर दी गई. करीब पांच किलोमीटर तक टेंपो का पीछा किया गया और गोलियां मारी गईं. अंत में जब राजू पाल जीवन ज्योति अस्पताल पहुंचे, उन्हें 19 गोलियां लग चुकी थीं. डॉक्टरों ने उनको मृत घोषित कर दिया. उनके साथ मौजूद रहे 2 और लोगों की मौत हो गई.

आरोप लगा अतीक पर. राजू की पत्नी पूजा पाल ने अतीक, भाई अशरफ, फरहान और आबिद समेत कई लोगों पर नामजद मुकदमा दर्ज करवाया. फरहान के पिता अनीस पहलवान की हत्या का आरोप राजू पाल पर था. 9 दिन पहले ही राजू की शादी हुई थी. बसपा समर्थकों ने पूरे शहर में तोड़फोड़ शुरू कर दी. बहुत बवाल हुआ. राजू पाल की हत्या में नामजद होने के बावजूद अतीक सत्ताधारी सपा में बने रहे. 2005 में उपचुनाव हुआ. बसपा ने पूजा पाल को उतारा. सपा ने दोबारा अशरफ को टिकट दिया. पूजा पाल के हाथों की मेंहदी भी नहीं उतरी थी, और वो विधवा हो गई थीं. 30 जनवरी को प्रशासन ने पूजा के पास 2 लाख रुपया मुआवजा भेजा. पूजा ने इसे लेने से इनकार कर दिया और कहा,

'मुझे अपने पति के हत्यारों का सिर चाहिए, पैसा नहीं.'

लोग बताते हैं, पूजा मंच से अपने हाथ दिखाकर रोने लगती थीं. लेकिन पूजा को जनता का समर्थन नहीं मिला. लोग कहते हैं कि ये अतीक का खौफ था. अशरफ चुनाव जीत गया. लेकिन ये अतीक परिवार के राजनीतिक पतन की शुरुआत थी.

2007 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए. इलाहाबाद पश्चिमी से एक बार फिर पूजा पाल और अशरफ आमने-सामने थे. इस बार पूजा ने अशरफ को पछाड़ दिया. अतीक का किला ध्वस्त हो चुका था. मायावती की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी. सपा ने अतीक को पार्टी से बाहर कर दिया. मायावती सरकार ने ऑपरेशन अतीक शुरू किया. अतीक को मोस्ट वांटेड घोषित करते हुए गैंग का चार्टर तैयार हुआ. पुलिस रिकॉर्ड में गैंग का नाम दर्ज हुआ आईएस ( इंटर स्टेट) 227. उस वक्त गैंग में 120 से ज्यादा मेंबर थे. 1986 से 2007 तक अतीक पर एक दर्जन से ज्यादा मामले केवल गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज किए गए. अतीक पर 20 हजार का इनाम घोषित किया गया. उसकी करोड़ों की संपत्ति सीज कर दी गई. बिल्डिंगें गिरा दी गईं. खास प्रोजेक्ट अलीना सिटी को अवैध घोषित करते हुए ध्वस्त कर दिया गया. इस दौरान अतीक फरार रहा. एक सांसद, जो इनामी अपराधी था, उसे फरार घोषित कर पूरे देश में अलर्ट जारी कर दिया गया. एक दिन दिल्ली पुलिस ने कहा, हमने अतीक को गिरफ्तार कर लिया है. दिल्ली के पीतमपुरा के एक अपार्टमेंट से. यूपी पुलिस आई और अतीक को ले गई. जेल में डाल दिया.

2012 का विधानसभा चुनाव अतीक ने जेल से लड़ा. अपना दल के टिकट पर. अतीक के पास गढ़ बचाने का अंतिम मौका था. अतीक खुद पूजा पाल के सामने उतरे. लेकिन जीत नहीं पाए. राज्य में सपा की सरकार बनी और अतीक ने फिर से अपनी हनक बनाने की कोशिश की. इलाहाबाद के कसारी-मसारी इलाके में कब्रिस्तान की जमीन कब्जाने का आरोप उन पर लगा. आरोप हैं कि खुद खड़े होकर उन्होंने कई घर बुलडोजर से गिरवा दिए. जमीनों पर कब्जे के ऐसे खूब आरोप लगे. लेकिन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव एक बार फिर से अतीक पर मुलायम हो गए. सुलतानपुर से टिकट दे दिया. विरोध हो गया पार्टी में. टिकट बरकरार रहा, हालांकि सीट बदल गई. चले गए श्रावस्ती. चुनाव प्रचार किया. एक दिन सपा कार्यकर्ताओं को संबोधित भी किया. कहा-

''मेरे खिलाफ 188 मामले दर्ज हैं. मैंने अपना आधा जीवन जेल में बिताया है, लेकिन मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है. मैं अपने कार्यकर्ताओं के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं.''

लेकिन अतीक का संबोधन चुनाव में काम नहीं आया. चुनाव लड़े और हार गए. फिर अखिलेश यादव से रिश्ते भी खराब हो गए. उसके बाद सपा में अंदर-बाहर आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया.

इसी बीच 25 सितंबर 2015 को इलाहाबाद पश्चिमी के मारियाडीह गांव में ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर दो लोगों की हत्या कर दी गई. मारियाडीह के प्रधान आबिद की चचेरी बहन अल्कमा और ड्राइवर सुरजीत मारे गए. आरोप लगा कम्मू और जाबिर नाम के दो भाईयों पर. कम्मू-जाबिर और आबिद प्रधान में पुरानी रंजिश थी. ये दोनों भी पहले अतीक के ही साथ थे. लेकिन बाद में अलग हो गए थे. जाबिर बसपा से चुनाव लड़ने की तैयारी में था. आबिद प्रधान और उसका भाई फरहान राजू पाल हत्याकांड में आरोपी हैं. अतीक के शूटर कहे जाते हैं. कम्मू और जाबिर ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया और जेल चले गए.

मुलायम सिंह यादव परिवार की आपसी खींचतान के बीच दिसंबर 2016 में उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी हुई. इसमें अतीक को कानपुर कैंट से उम्मीदवार बनाया गया था. 14 दिसंबर को अतीक और उसके 60 समर्थकों पर इलाहाबाद के शियाट्स कॉलेज में तोड़फोड़ और मारपीट का आरोप लगा. अतीक एक निलंबित छात्र की पैरवी करने कॉलेज गए थे. उन्होंने कॉलेज के अधिकारियों को भी धमकाया. इसका वीडियो वायरल हो गया. अभी मामला चल ही रहा था कि 22 दिसंबर को अतीक 500 गाड़ियों के काफिले के साथ कानपुर पहुंचा. जिधर से काफिला गुजरता, जाम लग जाता. मीडिया में खूब हल्ला मचा. अखिलेश यादव सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके थे. उन्होंने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी में अतीक के लिए कोई जगह नहीं. बाहर कर दिए गए, वहीं शियाट्स मामले में हाई कोर्ट ने सख्ती कर दी. पुलिस को फटकार लगाई और अतीक को गिरफ्तार करने का आदेश दिया. फरवरी 2017 में अतीक को गिरफ्तार कर लिया गया. हाईकोर्ट ने सारे मामलों में उसकी जमानत रद्द कर दी. इसके बाद से अब तक अतीक जेल में ही है.

2017 में जब योगी सरकार आई तो मारियाडीह डबल मर्डर की फिर से जांच शुरू की गई. पुलिस ने खुलासा किया तो सब चौंक गए. पुलिस ने आरोप लगाया कि अल्कमा की हत्या अतीक, अशरफ और आबिद प्रधान ने कराई है. दरअसल अतीक को लग रहा था कि अगर जाबिर चुनाव जीत गया तो उसका वर्चस्व खत्म हो जाएगा. इसलिए अल्कमा को मारने की साजिश रची गई. अल्कमा ने गैर बिरादरी में शादी कर ली थी. इस कारण से आबिद प्रधान और उसका परिवार भी खफा था. अतीक, अशरफ और आबिद ने एक तीर से दो निशाना लगाने की साजिश रची. बकरीद के अगले दिन मारियाडीह में अल्कमा की गाड़ी पर ताबड़तोड़ फायरिंग की गई. अल्कमा और ड्राइवर सुरजीत की मौत हो गई. केस चलता रहा. इस बीच फूलपुर लोकसभा के लिए उपचुनाव घोषित हो गए. इस सीट से बीजेपी सांसद केशव प्रसाद मौर्य यूपी के डिप्टी सीएम बन गए थे. सांसदी से इस्तीफा दे दिया था. जेल में बैठा अतीक भी वहां से चुनाव लड़ गया. निर्दलीय. वोट पाए 48 हजार. चुनाव हार गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में अतीक ने बनारस से पर्चा भरा. 855 वोट मिले. जमानत जब्त हुई. 2022 के विधानसभा चुनाव में अतीक या परिवार का कोई सदस्य मैदान में नहीं उतरा.

अतीक पर अब तक लगभग 250 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं. मायावती के शासनकाल में एक ही दिन में अतीक पर 100 मुकदमे दर्ज हुए थे. बाद में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था. अधिकतर मामलों में सबूत के अभाव और गवाहों के मुकरने की वजह से अतीक बरी भी हो चुका है. फिलहाल अतीक के खिलाफ 40 से ज्यादा मुकदमे एक्टिव हैं.  इनमें से कई मुकदमे कोर्ट में पेंडिंग हैं, जबकि ग्यारह मामलों में अभी जांच पूरी नहीं हो सकी है. बरेली जेल में बंद अतीक के भाई अशरफ पर 53 मुकदमे दर्ज हैं. योगी सरकार बनने के बाद अतीक अहमद और उसके रिश्तेदारों-करीबियों की करीब 1 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति या तो जब्त हो चुकी है या बुल्डोजर से ध्वस्त की जा चुकी है. लेकिन ये विडंबना ही है कि करीब 4 दशक के आपराधिक इतिहास वाले अतीक को अब तक एक भी मामले में सजा नहीं मिली है.

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