होली मुगल बादशाह भी मनाते थे! बाबर से लेकर अकबर और बहादुर शाह ज़फर तक कैसे बदला माहौल?
बाबर ने जब लोगों को होली मनाते देखा तो वह दंग रह गया. इतना चौंका कि उसने अपने पसंदीदा रंग के लिक्विड, यानी वाइन से एक पूल भर दिया. वहीं, बादशाह अकबर को पिचकारी इकट्ठा करने का शौक था.

होली एक ऐसा त्योहार है, जिसके इर्द-गिर्द कई कहानियां जुड़ी हुई हैं—उत्तर भारत में अलग, दक्षिण भारत में अलग. शायद ही कोई त्योहार हो, जिसके तार मुग़ल बादशाहों से इस हद तक जुड़े हों. एक बादशाह ने तो इसे लाल किले का आधिकारिक त्योहार बना दिया था. अकबर कैसे होली खेलते थे? बाबर ने किस खास रंग से होली खेली? और सूफी संत होली के बारे में क्या-क्या कह गए? आइए जानते हैं.
होली को लेकर देश में अलग-अलग मान्यताएं हैं. उत्तर भारत में इसे हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका की कथा से जोड़ा जाता है, जबकि दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु, में होली को कामदेव की कहानी से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि कामदेव ने फूलों के बाण से भगवान शिव के ध्यान को भंग करने का प्रयास किया था.
वहीं, होलिका दहन को बुराई के अंत का प्रतीक माना जाता है. बदलते मौसम के साथ आग जलाने के ऐसे प्राचीन त्योहार दुनिया भर में किसी न किसी रूप में मनाए जाते हैं. आइए, जानते हैं ऐसे ही कुछ प्रचलित रिवाजों के बारे में.
अपनी किताब ‘आलम में इंतिखाब दिल्ली’ में महेश्वर दयाल लिखते हैं—
बसंत पंचमी के आते ही होली के त्योहार की शुरुआत हो जाती थी. लोग पिचकारियां और गुलाल लेकर तैयार होते थे. पलाश या धाक के फूलों को मिट्टी के बर्तनों में जमा किया जाता था. मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण भी ऐसे ही फूलों से होली खेलते थे. ये फूल इसी महीने में खिलते थे, और सभी रंग प्राकृतिक होते थे—इन्हें पौधों या फूलों से तैयार किया जाता था.
अकबर की होलीमुग़ल बादशाह अकबर के शासनकाल में भी होली मनाई जाती थी. इंडियन एक्सप्रेस के एक आर्टिकल के मुताबिक, मुग़ल शासकों ने भारतीय त्योहारों को खुलकर मनाया. इतिहासकार जकाउल्ला लिखते हैं कि बाबर जब लोगों को होली मनाते देखता तो वह अचंभित रह जाता. इतना कि उसने अपने पसंदीदा रंग के लिक्विड, यानी वाइन, से एक पूल भर दिया.
‘आइने अकबरी’ में अबुल फज़ल लिखते हैं कि अकबर को पिचकारी इकट्ठा करने का शौक था. होली उन चुनिंदा अवसरों में से एक थी जब बादशाह अकबर किले से बाहर आकर आम लोगों के साथ होली खेलते.
‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ में भी इसका जिक्र मिलता है कि जहांगीर भी होली खेलते थे और संगीत समारोह का आयोजन करते थे. शाहजहां लाल किले के झरोखों से होली का जश्न देखते थे. उन्होंने ही होली को ईद-ए-गुलाबी नाम दिया था.
बहादुर शाह जफर ने एक कदम आगे बढ़कर होली को लाल किले का आधिकारिक त्योहार बना दिया और "होरी" नाम की नई उर्दू शायरी को बढ़ावा दिया. एक मौके पर बहादुर शाह जफर भी होली समारोह में शामिल हुए और एक गाना भी लिखा.
माने, मैं भाग नहीं पाऊंगा, मैं भाग नहीं सकता. अब मैं यहीं खड़ा हूं, यह देखने के लिए कि मुझे कौन भिगा सकता है. वहीं, 'तुजुक-ए-जहांगीरी' में जहांगीर होली के बारे में लिखते हैं—
चूंकि हिंदुओं की यह परंपरा है कि वे अपने मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं, इसलिए वर्ष की अंतिम रात को आग जलाना पुराने वर्ष को जलाने का प्रतीक है, जैसे कि वह एक शव हो.
लाल किले की होलीहोली लाल किले में भी काफी उत्साह से मनाई जाती थी. इसे ईद-ए-गुलाबी या अरग-ए-पाशी, यानी फूलों की बारिश, कहा जाता था. इसमें सभी शामिल होते. लाल किले के पीछे, यमुना के किनारे मेले लगते. भारी भीड़ जमा होती, दफ़, नफ़ीरी वगैरह बजाए जाते और नृत्यांगनाएँ नृत्य करतीं. संगीतकार और कलाकार दूर-दूर से आते और लाल किले के नीचे अपनी कलाबाजियाँ दिखाते.
सम्राट, राजकुमार और राजकुमारियों की नकल उतारी जाती, और कोई इसका बुरा नहीं मानता था. रानियाँ, राजकुमारियाँ और राजसी महिलाएँ झरोखों से इस सबका आनंद लेतीं. बादशाह कलाकारों को अच्छा-खासा इनाम भी देते थे.
रात को लाल किले में एक भव्य समारोह आयोजित होता. नाच-गाना पूरी रात चलता. देशभर से मशहूर तवायफ़ें आतीं. मनोरंजन करने वालों की टोली शाहजहानाबाद से होते हुए, सभी हवेलियों में रईसों का मनोरंजन करते हुए गुजरती.
एक उर्दू अखबार 'जाम-ए-जहानुमा' ने साल 1844 में लिखा कि बहादुर शाह जफर होली के लिए खास इंतज़ाम करते थे. टेसू के फूलों से बने रंगों से होली खेलने का जिक्र किया जाता है.
मीर तकी मीर, नवाब आसिफ-उद-दौला के होली खेलने पर लिखते हैं:
माने असिफुद दौला होली खेलते हैं, राजा और जनता सब रंगों में डूबे खुश हो रहे हैं. मुस्लिम शासकों से इतर सूफी संत भी भाइचारे का संदेश पहुंचाने के लिए इस त्योहार का इस्तेमाल करते थे. खुसरो इस त्योहार को पसंद तो करते ही थे, साथ ही इस मौके के लिए कुछ लाइनें भी उन्होंने लिखीं,
होली मनाने की यह परंपरा सूफी परंपरा में इतनी गहरी छाप छोड़ती है कि आज भी तमाम सूफी दरगाहों में 'रंग' मनाया जाता है. इसके अलावा, 18वीं सदी के कवि क़ायम ने होली के नटखट मिज़ाज के बारे में लिखा है. ग़ालिब उन्हें अपना उस्ताद मानते थे.
अपनी कविता ‘चांदपुर की होली’ में क़ायम नशे में धुत एक ऐसे मौलवी की बात करते हैं, जो मस्जिद का रास्ता भूल गया होता है. यह होली का माहौल है—चाहे वह शराबी हो या न पीने वाला, सब होली के रंग में झूमते हैं. यह त्योहार सभी को समान बना देता है.
क़ायम ने अपनी कविता में यही भाव व्यक्त किया है. कविता के अंत में वे कामना करते हैं कि जब तक यह दुनिया बनी रहे, तब तक इलाही, होली का त्योहार यूँ ही मनाया जाता रहे.
वीडियो: JDU MLA Gopal Mandal की बेशर्मी वाली होली का वीडियो वायरल

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