एयरटेल की लाइन है हर फ्रेंड ज़रूरी होता है. ऐसे ही हर रिश्ता ख़ास होता है.दादा-दादी, नाना-नानी तो किस्से-कहानियों का ज़खीरा होते हैं. बात-बात में कहानीहोगी. मुहावरे होंगे. मिसालें होंगी. ठीक है उनकी जिंदगी का अनुभव है. मगर खानदानमें एक ऐसी शख्सियत भी होती है. जो होती तो मौजूदा ज़माने की है. मगर उसकी बातेंदादा-दादी तो छोड़िए परदादा से भी पुरानी होती हैं. ये शख्सियत ऐसी है जो कभी बिजलीबनकर कड़कती है. तो कभी मोहब्बत की चाश्नी ऐसे उडेलती है कि आप मिठास से बाहर हीनहीं आ पाएंगे. और जब तक उस चाश्नी की मिठास ख़त्म होगी आप खुद को ठगा हुआ महसूसकरेंगे. इस शख्सियत की बातें सुनकर कभी आपको 'नागिन' सीरियल याद आएगा. कभी 'घर-घरकी कहानी.' खानदान की ये शख्सियत है- 'फुफ्फो' यानी पापा की बहन.वल्लाह! होती तो बहन है, मगर जब फुफ्फो बनती है. तो रायता बनकर फैल जाती है. अगरपापा से बड़ी हो, तो समझो फिर बच्चों की खैर नहीं. हर बात में टोका-टाकी, हर बात मेंटांग अड़ाई. अगर उनकी इस हरकत की वजह से कोई बात छिपा लो, और फिर कहीं और से पता चलजाए तो समझो खैर नहीं. मुंह ऐसे फूल जाता है कि मुझे तो केजरीवाल की ये तस्वीर यादआ जाती है.उसे मनाना ऐसे जैसे अन्ना को अनशन से उठाना, मतलब ये कि पहले उसकी मांग पूरी होगीतभी वो फिर से घर में कदम रखेगी, वो भी दोबारा से मुसीबत बनने के लिए. कुछ बातेंपॉइंटर में समझानी आसान होंगी, नहीं तो आपको लगेगा कि फुफ्फो से ज्यादा मैं आपकोपका रहा हूं. शुक्र है मुझे इस बात का एहसास जल्दी हो गया. नहीं तो लोग इसेपढ़ते-पढ़ते न जाने कितनी गालियां बक चुके होते. सही कहा न मैंने. हम्म! जैसे आप पढ़तेरहे और मन ही मन बुदबुदाते रहे कि क्या बकवास कर रहा है. ऐसे ही फुफ्फो की सुननीपड़ती हैं और मन में ये ही सब चलता है. ऐसी ऐसी दकियानूसी बातें लगता ही नहीं हमडिजिटल युग में हैं. जब फुफ्फो घर आती हैं. तो ऐसा लगता है जैसे पापा की बहन नहींबल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी आई हो. सारी आज़ादी छिन जाती है. सब फुफ्फो के गुलाम. पापाभी उनकी हर बात में हां में हां मिलाते है. डर लगा रहता है कहीं फुफ्फो नाराज़ न होजाएं. मनाना मुश्किल होता है.जब फुफ्फो घर आ जाती हैं. तो गर्दन ऐसे काम करती है. Source Parhlo.comअपनी हदों में रहो, इतना छोटा जम्पर पहनकर घूम रही होफुफ्फो के तरकश में सबसे ज्यादा तीर भतीजी (भाई की लड़की) के लिए होते हैं. अगरभतीजी ने अपनी पसंद के कपडे पहन रखें हैं. तो ये फुफ्फो को नागवार गुज़रता है. भलेही खुद ने डीप गले का जम्पर, तंग पजामा पहन रखा हो, लेकिन भतीजी ने जींस या स्लैग्सपहन रखी है. तो देखते ही बोलेंगी- 'भय्या रे हमारे भाई ने तो अपने बच्चों को कुछज्यादा ही छूट दे रखी है, पहनावा तो देखो लड़की ने क्या कर रखा है. हमारी भाभी भीलुल ही है जो बच्चों को नहीं समझाती हैं. चलो भाई तो काम पर रहता है. कम से कमतुम्हें तो नजर बनाके रखनी चाहिए.' अब आप ही बताओ जब ऐसी तानाकशी होगी तो 'फूफीकमीशन वापस जाओ' के नारे क्यों न बुलंद होंगे. बात बच्चों की होगी मगर भाभी को ऐसेनिशाने पर लेंगी जैसे खुद के बच्चे इशारों पर चलते हैं. एक बात जो उनकी ज़बान सेसबसे ज्यादा निकलती है. वो ये कि 'हमारे टाइम में' हर बात में वो अपना टाइम घुसादेती हैं. जैसे हमारे टाइम में ऐसे कपड़े नहीं पहने जाते थे. और भाई के सामने तो कभीबिना दुपट्टे के भी नहीं आये. और इनको देखो कैसी मटकती फिरती हैं.फुफ्फो की नसीहत.क्या करूं, कीड़े निकालने की आदत से हूं मजबूरफुफ्फो घर आईं. कोई बात नहीं झेल लिया जाएगा. पता है इतने दिन की परेशानी है. मगरफुफ्फो इतने दिन पता नहीं कितने दिन बना देती हैं. और कुछ नहीं तो दस्तरख्वान पर हीशुरू हो जाती हैं. 'ओह्ह...! भय्या कैसे खा लेते हो इतनी मिर्च. जब हम थे तो भाईज़रा सी मिर्च तेज़ होने पर बर्तन उलटे कर देता है. अब कैसे खा लेता है इतनी मिर्चें.खाना वैसे तो ठीक बना है बस मिर्चें तेज़ कर दीं और नमक तो ऐसा लगता है जैसे भाभीडालना ही भूल गई हैं. हम होते थे तो खाने में कुछ मीठा ज़रूर बनाते थे. कभी आलस नमाना दौड़ दौड़ के सब पका लेते थे. इतने दिन बाद आना हुआ है, कम से कम खीर ही बना लीहोती.' फुफ्फो की ये सब बातें सुनकर ऐसा लगता है जैसे मिर्च में मिर्च न हों, बल्किफुफ्फों की ज़बान में मिर्चें हो. जो पापा और अम्मी के बीच झगड़ा करा दें. ये सबबोलते हुए पता नहीं वो ये बात कैसे भूल जाती हैं कि वो भी किसी की भाभी हैं.सबसे खतरनाक होता है, जब फुफ्फो अपने बेटे का रिश्ता लेकर आ जाती हैंदुर्लभ से भी दुर्लभतम जो वो कह लीजिए. ये घड़ी वही होती है, जब फुफ्फो अपने बेटे कारिश्ता लेकर घर आ बैठती हैं. लड़की की मर्ज़ी पूछना तो बहुत बड़ी बात. ये भी नहींदेखती कि भाई या भाभी की मर्ज़ी है या नहीं. बस बेटे की शादी भतीजी से करनी है तोकरनी है. दो टूक लहजे में भाई से कहती हैं, देख तू चाहे मना कर या हां कर मुझे अपनेबेटे चमन के लिए नाज़िया को ले जाना है तो ले जाना है. अगर तू नहीं करता है तो आज सेजीना मरना तुझसे ख़त्म. अब बताओ. इस जोर जबरी को गुंडागर्दी या नेतागीरी न कहा जाएतो फिर आप ही बता दो क्या कहा जाए. चाहे कुछ भी कर अगर फुफ्फो ने ठान लिया बेटे केसाथ भतीजी की शादी करानी है तो चाहे फिर कोई भी आ जाए उसके इरादे को नहीं बदल सकता.ऐसे में उस लड़की की हालत खस्ता हो जाती है. जो फुफ्फो के आने पर अपने ऊंचे कुरते,स्लैग्स, जींस को अलमारी में रख देती है. और दुपट्टा संभाले रहती है. और फुफ्फो केजाने तक सहमी रहती है. ऐसे में उसकी क्या हालत होगी, जब उसकी शादी बिना पूछे फुफ्फोके बेटे के साथ करा दी जाएगी. अब तक फुफ्फो के तानो से लाचार थी. अब सास बनने केबाद उस बेचारी पर क्या गुज़रेगी. ये तो उसके लिए उम्रकैद सुनाना हो गया. वो भी बिनकुछ किए.जब फुफ्फो के बेटे का रिश्ता आता है तो लड़की की हालत.फुफ्फो कहेगी, 'देख मैं तुझसे दहेज में कुछ नहीं मांग रही, अपनी भतीजी को मैं एकसुर्ख जोड़े में ही ले जाउंगी. तू भी ज़िम्मेदारी से फ़ारिग हो जाएगा.' और जब हां होजाए तो फुफ्फो गिनाने लग जाती है अब तो हमारा डबल हक़ है लेने का. अभी तक फुफ्फो कोदेते थे अब बेटी को भी देना पड़ेगा. और फिर दहेज लेने का अंदाज़ होगा. मेरी ससुरालमें बेइज्ज़ती न हो जाए भय्ये इस बात का ध्यान रखिये. खाना स्टैंडिंग में ही रखना.और सामान पहले ही भिजवा देना ताकि सब सेट हो जाए. ब्याह वाले दिन बहुत काम हो जाताहै. और हमारे जेठ की लड़की की शादी हुई उसने ये दिया है , वो दिया है. वैसे तो ये हरशादी वाले घर में होती हैं. मगर फुफ्फो की ज़बान बिना हिचक के चलती है.त्योहार पर कितने पैसे दे दो मगर कपड़े न बनाओ तो बस खैर नहींचाहे ईद हो या फिर बकरीद. या फिर हो कोई और त्योहार. भाई-भतीजे चाहे कितने भीत्योहार के पैसे दे दें. बस कपड़े न दें. तो नई कथा शुरू. फुफ्फो की ज़बान है रोक कौनसकता है. कहती हैं, 'लो जी! हमारा भय्या त्योहार पर एक जोड़ा बना दिया करता था, अबके वो भी खतम. भय्या बहुएं आने के बाद सब बदल जाते हैं.' देख लिया. त्योहार दियाभय्ये ने. मगर तीर चला भाभी पर. अरे फुफ्फो इतने पैसे जो भाई ने दिए थे उनसे एकजोड़ा खरीद लोगी तो कोई सितम न हो जाएगा.फुफ्फो से प्यारा कोई नहींऐसा भी नहीं है कि फुफ्फो बहुत जल्लाद टाइप होती है. या फिर सौतन सी होती है. हांइतना ज़रूर है कि जब वो घर आती है तो कुछ दिन के लिए घर में राष्ट्रपति शासन सा लगादेती है. अब तक घर में अम्मी पापा की सत्ता थी. मगर फुफ्फो के आते ही साड़ी पॉवरफुफ्फो के हाथ में. लेकिन एक दूसरा पहलु भी है प्यार का पहलू. मोहब्बत की चाश्नीहोती हैं कुछ फुफ्फो. भतीजे को देखकर ऐसे खिलती है, जैसे चांद के पास का तारा ये हीहो. और भतीजी को देखकर ऐसे तंज़ करती है जैसे वो भतीजी न हो बल्कि सौतन हो. भतीजी परप्यार दिखाएंगी. मगर तानाकशी करना नहीं भूलेंगी. हर ताना हमारे टाइम वाले डायलॉग सेही शुरू होता है.जब फुफ्फो मिलती हैं तो प्यार भी ऐसे जताती हैं.प्यारी फुफ्फो आप मान लीजिये आप अंग्रेजों के ज़माने की फुफ्फो बन जाती हैं. ज़मानाबदल चुका है. बच्चे जींस से लकर चड्डी तक अपनी पसंद से खरीदते हैं. फिर क्यों आपअपनी टांग अड़ाकर किसी की जिंदगी में रोड़ा बनती हो. काहे शादी जैसे अहम फैसलों मेंजोर ज़बरदस्ती करती हो. जी लेने दो उन्हें भी अपनी जिंदगी. और खुद भी जियो. वैसे सभीफुफ्फो ऐसी नहीं होती हैं. बहुत प्यारी भी होती हैं. सबकुछ न्योछावर करने वाली. कुछअच्छी दोस्त बन जाती हैं. तो कुछ अपने फायदे के लिए दोस्त बना लेती हैं. और हांसबसे अहम बात. मेरी फुफ्फो बहुत अच्छी हैं. मेरा लाल मेरा लाल करती हैं. ये बातइसलिए कह रहा हूं कभी ये रिपोर्ट फुफ्फो तक पहुंच जाए. और पता चला मैं ही रिमांड परले लिया गया हूं.--------------------------------------------------------------------------------अपनी प्यारी बेटी से ये बातें कभी मत कहनाझूठ बोलना गुनाह है, और सबसे ज्यादा झूठ ‘खुदा की कसम’ खाकर ही बोला गयादहेज के लुटेरों, ‘मेहर’ देते वक्त ही शरीयत क्यों याद आती है?