मडगांव (गोवा) के रवींद्र भवन में कल से शुरू हुए 'संगमन' के नए यानी 22वें संस्करणके बारे में बात इस तरह नहीं शुरू की जा सकती कि उसमें किसी दीप-प्रज्ज्वलन, किसीबीज-वक्तव्य या किसी माल्यार्पण का जिक्र चला आए. 'संगमन' अब तक इससे अछूता रहा हैऔर अपने नए संस्करण में भी उसने अपनी इस विशिष्टता को बरकरार रखा.संगमन-22 के करीब चार घंटे लंबे पहले सत्र के बारे में बात इस तरह भी नहीं शुरू कीजा सकती कि उसमें सत्र में 'ये-ये वक्ता मंच पर थे' जैसा वाक्य चला आए. संगमन अब तकइससे भी अछूता रहा है. रचनाकारों को रचनाकारों की तरह बरतते हुए उसने उनके बीचबराबरी का समान वितरण किया है. यहां वैसे तो कोई मंच होता ही नहीं, और अगर कभी होभी, तो उस पर केवल वही होता है, जो अपने विचार रख रहा होता है.संगमन का 22वां संस्करण (फोटो क्रेडिट: पलाश अग्नि)यहां तक आते-आते इस कार्यक्रम की संकल्पना कुछ स्पष्ट हो चली होगी, इसलिए अब इस तरहशुरुआत की जा सकती है कि 'आरोह 2020: आकलन और दायित्व' विषय पर केंद्रित संगमन-22के पहले सत्र का संचालन करते हुए कोंकणी भाषा से संबद्ध अनंत अग्नी बहुत सादगीपूर्णऔर संक्षिप्त नज़र आए. उनके सहज संचालन में एक संगतकार-की सी गति थी. दिए गए विषयपर बहुत विस्तार से बोलने के लिए प्रस्तुत वक्ताओं के बीच यह अग्नी का कौशल ही रहाकि कुछ देर से शुरू हुए सत्र को तय समय पर संपन्न किया जा सका.संगमन परिवार के सदस्य कमलेश भट्ट कमल ने 'संगमन' के परिचय में इसके सचल होने कोइसकी विशेषता बताया. उन्होंने कहा कि इसके सत्र बहुत अनौपचारिक होते हैं.संगमन में बोलते कमलेश भट्ट कमल (फोटो क्रेडिट: स्नेहा सबनिस)इसके बाद कोंकणी भाषा मंडल के अध्यक्ष चेतन आचार्य ने कहा कि कोंकणी भाषा, संस्कृतिऔर समाज का अन्य भाषाओं से भी संवाद हो सके, इसलिए हम 'संगमन' से जुड़ रहे हैं.कोंकणी को एक उपेक्षित भाषा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके अधिकारों के लिए हमेंबहुत लड़ना पड़ा है और यही वजह है कि ये भाषा आज इतनी ज़िंदादिल लगती है.युवा रचनाकारों, पाठकों और शोधार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति में चेतन आचार्य केबाद जब प्रतिष्ठित मराठी लेखक राव साहेब कसबे ने बोलना शुरू किया, तो लगा कि वोपर्याप्त विषयांतर नहीं, पर्याप्त विषयांतरों में चले गए हैं. उनके पास कहने कोबहुत कुछ था और यों लगा कि सवा घंटे बोलने के बाद भी वो बहुत कम ही कह पाए.उन्होंने संसारभर में व्याप्त अराजकता का जिक्र किया. धर्म, जाति और गरीबी को इसअराजकता की बुनियाद मानते हुए उन्होंने कहा कि एक वक्त नीत्शे ने कहा था कि 'गॉड इजडेड', आज लगता है कि 'मैन इज डेड, ओनली काऊ इज अलाइव'.संगमन में बोलते राव साहब (फोटो क्रेडिट: पलाश अग्नि)राव साहेब अपने कहे को अपने अनुभवों के साथ-साथ वेद, उपनिषद्, गांधी, आंबेडकर आदिसे पुष्ट करते चल रहे थे. इसके अतिरिक्त भी कई स्रोत-संदर्भों से संपन्न उनकेवक्तव्य में मौजूदा राजनीति से लेकर मनुष्य की उत्क्रांति, विकासक्रम, उसका उत्थान,पतन सब कुछ खुलता चला गया. अपने वक्तव्य को उन्होंने इस बिंदु पर खत्म किया कि उनकीदिलचस्पी इसमें नहीं है कि गांधी और आंबेडकर के सपनों का भारत कैसा होगा, उनकीदिलचस्पी इसमें है कि आज के युवाओं के सपनों का भारत कैसा होगा.विचारों की उत्तेजना से भरे इस वक्तव्य के बाद रंगकर्मी संदेश प्रभुदेसाई नेस्ट्रीट थिएटर को संसार का एक पवित्रतम स्पेस बताते हुए उसे 'फर्स्ट थिएटर'मानने-कहने पर जोर दिया. इसके लिए उनका तर्क स्ट्रीट थिएटर को ही जन-रंगमंच माननेके आग्रह से आंदोलित था. जन-रंगमंच के इतिहास और भूमिका से अच्छी तरह परिचित संदेशने अपना वक्तव्य अंग्रेजी में दिया.मीडिया की स्थिति पर अपने विचार रखने के लिए आए एम.जे. पांडे ने मीडिया को बिका हुएकहने के रूढ़ मुहावरे पर बहुत तार्किक प्रहार किए. उन्होंने कहा कि मीडिया बिकी हुईनहीं, बेचने वाली चीज है. तथ्य और आकड़ों की रोशनी से भरे हुए इस वक्तव्य मेंउन्होंने आगे कहा कि इश्तिहार देने वालों को ग्राहक देना मीडिया का काम है. आज सारीपूंजी एक ही पार्टी को सपोर्ट कर रही है. स्वरों की भिन्नता गायब हो चुकी है.'स्क्रॉल' और 'वायर' की फंडिंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आज विपक्ष औरपक्ष एक ही पूंजी-तंत्र से संचालित हो रहे हैं. इंटरनेट ने कंज़्यूमर को प्रड्यूसरबना दिया और गूगल और फेसबुक सूचना के सबसे बड़े संवाहक बन गए हैं. एम.जे. पांडे कापूरा वक्तव्य ही उद्धृत करने योग्य है, इसलिए इसे फिलहाल यहीं छोड़ते हुए आगे बढ़नाहोगा.संगमन में मीडिया पर बोलते एमजे पांडेय (फोटो क्रेडिट: स्नेहा सबनिस)ये 'संगमन' के पहले सत्र की सफलता ही है कि कोंकण के एक गांव में पत्रकारिता औरस्त्री-मुद्दों पर काम कर रहीं युवा कार्यकर्ता नमन सावंत का लिखित पर्चा भी लगभगपूरा उद्धृत करने योग्य है. स्त्री की प्राचीन और नवीन उपस्थितियों पर विचार करतेहुए नमन के वक्तव्य में एक अनूठा स्त्री-आवेग मौजूद था. इस वक्तव्य का प्रत्येकवाक्य संघर्ष, अनुभव और अध्यवसाय की उत्तेजना से आप्लावित था.संगमन में नमन (फोटो क्रेडिट: स्नेहा सबनिस)'संगमन' के पहले दिन के पहले सत्र का समापन प्रख्यात मराठी लेखक सतीश कालसेकर केवक्तव्य से हुआ. वो मराठी में बोले और मराठी जानने वालों के मुताबिक वो अपने विषयऔर प्रतिष्ठा के अनुरूप ही बोले.'संगमन' के बारे में और जानने के लिए: www.sangamankar.comपर जा सकते हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये अविनाश मिश्र ने लिखा है. घातक कानपुर के सरल अविनाश. शेखर के नाम से फेसबुक परधमाल मचाए रखते हैं. हिंदी साहित्य के भविष्य हैं. पर हमारी नजर में अगर हिंदीपुरातत्व की खुदाई हो, तो उसमें भी शेखर जैसे ही नजर आएंगे. बहुत मीठा बोलते हैं परकर्कश तर्कों के साथ. किसी भी किताब का जिक्र आए, तो हम इनकी तरफ देखते हैं कि इनकोतो पता ही होगा. साहित्य से जुड़े हर सवाल का जवाब शेखर को माना जाता है. शेखर कीखूबी ही शेखर की दुश्वारी है.--------------------------------------------------------------------------------पढ़िए, अविनाश की कलम से निकले कुछ लल्लनटॉप आर्टिकल:भुज डायरी: ऑमलेट में बनता पाकिस्तान देखता एक संतआत्महत्या पर एक निबंधएक और जिंदगी ‘सिर्फ तुम’ की 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