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"जब वीकेंड का मतलब होता था DD1 वाली फिल्म"

पांच दिन काम, दो दिन डिस्को. लेकिन मन तो अभी भी बचपन वाले वीकेंड पर अटका है.

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3 मई 2016 (अपडेटेड: 3 मई 2016, 03:05 PM IST)
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दूरदर्शन पर भी आएगा आईपीएल.
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छ: घंटे का स्कूल होता था बचपन में. उसके बाद होमवर्क करने का प्रेशर. आजकल की नौकरियों जितना. ट्यूशन जाओ तो उधर सर की डांट झेलो वो अलग. तब के सोर्स ऑफ एंटरटेनमेंट थे, क्रिकेट, छुपन-छुपाई, वीडियो गेम और टीवी. स्कूल और होमवर्क के प्रेशर को बैलेंस करते थे ये सब. लेकिन हफ्ते में एक दिन, एक्साइटमेंट लेवल थोड़ा हाई होता था. उस एक्साइटमेंट के लिए पूरा हफ्ता इंतज़ार करते. वो दिन होता था फ्राइडे यानि शुक्रवार. और उसी दिन में छिपी होती थी वीकएंड की मस्ती. मेरे लिए वही था वीकेंड कल्चर. Cinema Banner ऐसा क्या होता था शुक्रवार को? ये खुशी तो होती ही थी कि अगले दो दिन छुट्टी है, पर रात 9.30 टीवी देखने का चाव इसमें चार चांद लगाता था. टीवी पर आती थी बॉलीवुड फिल्म. सारी खुशी, एक्साइटमेंट और चाव उसी फिल्म में छिपा होता था. केबल था नहीं घर पर. तो उन वीकेंड्स पर दूरदर्शन ही हमारा 'ज़ी सिनेमा' होता था. फ्राइडे, सेटरडे रात 9.30 और संडे 4 बजे.
मेरा पड़ोसी है गगन, मेरा हमउम्र. शुक्र की शाम हम दोनों ऐसे खुश होते थे की इधर उधर कूदते फिरते. बोलते थे, 'पता है आज फलानी फिल्म आएगी रात को!' फ्राइडे आता ही खुशियां लेकर था. वो मेरा हफ्ते का सबसे गुडी-गुडी दिन होता था. अंदर से ही खुशी होती थी. और अगर वीक डे में कभी एड में बता देते कि कौन सी फिल्म फ्राइडे को आएगी तो बस फिर तो वारे-न्यारे. दूरदर्शन ने ऐसी आदत डाली थी पुरानी फिल्मों की कि तीन-चार साल पुरानी फिल्म भी आ रही होती, तो मैं सबको बताता फिरता कि पता है आज नई फिल्म आएगी रात को.
उन वीकेंड्स को थैक्यू. वो ना होते तो हम जितेन्द्र, धर्मेंद्र अौर अमिताभ जैसे सुपर स्टार्स की फिल्मों से वंचित रह जाते. लेकिन फिल्म देखने की एक शर्त भी होती थी. शर्त ये कि सारा होमवर्क दिन में खत्म हो जाना चाहिए. उस दिन घर जाते ही काम करना भी बुरा नहीं लगता था. बस बुरा तब लगता था जब पापा गुस्सा होकर कह देते थे कि बंद कर दो टीवी और मैथ्स की बुक ले आओ. बस तब तो इतना गुस्सा आता था कि पूछो मत. जिन तीन घंटे के लिए हम पूरा हफ्ता इंतज़ार करते थे वो पापा के गुस्से की बलि चढ़ जाते थे. कई बार तो ऐसा भी होता कि रात को खाने के बाद मम्मी पापा वॉक करने जाते तो दीदी और मैं पीछे से टीवी चला लेते. धीमी-धीमी आवाज़ में फिल्म देखते ताकि पापा के पैर जब घर की सीढ़ी पर पड़ें तो हमें पता चल जाए. फिर भी बहुत बार पकड़े गए. पर हम कहां हटने वाले थे. जब पापा वीकेंड पर ब्यास चले जाते तो एेश हो जाती थी. मम्मी थोड़ी लीनिएंट हैं तो कम ही मनाना पड़ता था फिल्म देखने के लिए. हां, शर्तों का पहाड़ तो वो भी लगा देती थीं. कहतीं, फिल्म देखोगे तो सुबह देर तक सोना नहीं है. कल हिंदी के दो चैप्टर्स खत्म करने हैं. पर वो सब मैनेज हो जाता था उस तीन घंटे के स्वर्ग के लिए. फिर आया घर में केबल. होने लगी फिल्मों की भरमार. शुरूआत में बड़ा अच्छा लगा. लगा कि वाह, एक के बाद एक फिल्म और इतने सारे ऑप्शंस. लेकिन ये ऑप्शंस ही तो मज़ा किरकिरा कर देते हैं. स्लो पॉएज़न की तरह. हो गया उस फ्राइडे मूवी का सत्यानाश, अौर उसके साथ हमारे बचपन का. अब तो यादें रह गई हैं बस. रजाई में मम्मी-पापा के साथ बैठ जाना और फिर टस से मस ना होना. विज्ञापन भी तो कम आते थे दूरदर्शन पर. देखना शुरू करते तो फिर सीधा फिल्म खत्म होने के बाद ही बैड से उठते. वीकेंड का जश्न फ्राइडे रात साढ़े नौ से शुरु होता और संडे को चार बजे वाली फिल्म के साथ खत्म होता. और हां, सिनेमा का हैंग ओवर भी रहता पूरे हफ्ते. लेकिन आज कल क्या हो रहा है? पांच दिन काम करेंगे. वीकेंड पर दोस्त बुला लेंगे कि चल डिस्को चलते हैं. कुछ पिएंगे, नाचेंगे, कुछ हल्ला करेंगे और फिर बस. मुझे तो नहीं भाता ये सब. शायद इसलिए कि बचपन वाले उस मूवी वीकेंड की आदत नहीं गई आज तक. हां यही होगा. तभी तो अब भी वीकेंड पर अपने दोस्त के घर जाना होता है तो हफ्ता भर लिस्ट बना रहे होते हैं कि कौन सी फिल्म देखेंगे. दोस्त मिल जाते हैं. फिल्म चल जाती है कोई पुरानी अौर बस, बचपन ज़िन्दा हो जाता है.

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