The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Filmy kisse- Love for Govinda and a teenage love story gone wrong even before it could start

सच्चा प्यार खोजने का सही तरीका ईशा देओल से सीखा

'न तुम जानो न हम' के बाद कितनी किताबें छान डालीं. कि काश किसी के आखिरी पन्ने पे वो नंबर मिल जाए जिससे मैं प्यार कर सकूं.

Advertisement
pic
3 मई 2016 (अपडेटेड: 3 मई 2016, 01:23 PM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more

1.

हमारे पापा मम्मी को फ़िल्में देखने का बहुत शौक रहा था. इसलिए हमने सिनेमा हॉल में पहली पिच्चर शायद छह महीने में देखी थी. लेकिन हमारी याद में हमारी पहली फिलिम  गोविंदा की 'गैंब्लर' थी. गोविंदा से हमारा प्यार पहली नज़र का था. 'माधुरी दीक्षित मिली रस्ते में, खाए चने हमने सस्ते में' https://www.youtube.com/watch?v=6HnW7CGcFDw ये गाना पहले पिच्चर  में और फिर हर संडे रंगोली में खूब देखा.  देखकर गोविंदा से प्यार  बढ़ता जाता था. गोविंदा कहता, मैं अपनी शादी में जाऊं मेरी मर्ज़ी मैं बीच सड़क बिस्तर लगवाऊं मेरी मर्ज़ी लगा था इससे ज्यादा कूल आदमी पूरी दुनिया में नहीं होगा. छोटे से थे हम. बड़े होकर हमको गोविंदा ही बनना था. इतना गज़ब कोई कैसे हो सकता है. जो माधुरी दीक्षित को बोल सकता है 'मेरे घर मत आना'. जिस माधुरी के लिए मेरे चाचा पागल हुआ करते थे. गोविंदा उसको भी शादी के लिए मना कर सकता है. और जो क़ुतुब मीनार पर घर बनवा सकता है. झूठ भी नहीं बोलता. सारी बातें सच बताता है. कमाल का होगा वो.
स्कूल के फैंसी ड्रेस में हम भी गोविंदा बने. राजा बाबू वाले. कुरता पजामा. चश्मा. वैसी ही टोपी. डांस भी किया. "पकचिक पक राजा बाबू, चल गया कोई जादू...." खूब शाबाशी मिली. पर एक टीचर ने मम्मी से कह दिया. इसको किसी हीरोइन का रोल करना चाहिए था. पहली बार एहसास हुआ. बड़े होकर गोविंदा नहीं बन पाएंगे. घर वालों ने समझाया. हीरोइन बन जाना. पर हमको गोविंदा बनना था.  खूब रोये.
कुछ दिनों तक लड़की होने पर बहुत गुस्सा आया. दो तीन सालों तक गोविंदा की मिमिक्री करते थे. अब ना गोविंदा से प्यार है. ना उसकी फिल्मे देखते हैं. लेकिन अभी भी कभी एफएम पर गोविंदा का कोई गाना आ जाये. वही वाला डांस करने का मन करने लगता है. 'मेरी मर्ज़ी'.   Cinema Banner  

2.

एक फिल्म आई थी, 'ना तुम जानो ना हम'. ऋतिक रौशन थे. ईशा देओल थीं. मासूम सा प्यार दिखाया था उस पिच्चर में. एक किताब के पीछे लिखा एक पीओ बॉक्स नंबर. चिट्ठियों का आदान-प्रदान. अनदेखा, अनजाना सा प्यार. ह
हमारी टीनेज शुरू हो ही रही थी. ऐसा लगा ये वाली फिल्म हमारे लिए ही बनाई गई है. खलबली मच गई थी दिमाग़ में. अपने साथ दो और दोस्तों को शामिल कर लिया. हम लोग हर फ्री पीरियड में स्कूल की लाइब्रेरी जाने लगे. ढेर सारी बुक्स निकाल कर उनके पीछे कोई नंबर ढूंढने लगे. 2003 में सच्चा प्यार ढूंढ़ने का ये सबसे अच्छा तरीका लग रहा था.
सफल होने की गारंटी ईशा दीदी दे चुकी थीं. एक महीने तक खोजबीन चली. फिर एक हिस्ट्री की पीली सी किताब के पीछे एक नंबर मिला. लगा, गड़ा हुआ खजाना मिल गया. दिल में एक ही गाना बज रहा था. 'मुझे ऐसा लगा वो मिल गया, आहा आहा, मुझे ऐसा लगा ये दिल गया, आहा आहा'. इश्क का एहसास ही बहुत हिम्मत दे देता है. उसी दिन पीसीओ से उस नंबर पर फ़ोन किया. थोड़ी देर बात की. पता चला वो हमारी सोशल स्टडीज़ की मैम के घर का नंबर है. शायद जल्दीबाज़ी में किसी ने किताब पर नोट कर लिया होगा. किताब वापस लाइब्रेरी चली गयी. मिली हम लोगों को. फोन पर उनके पति ने बात की थी. दिल टूट गया हमारा. फिल्म में तो ऐसा नहीं हुआ था. अगले दिन हम तीनों को कायदे से डांट पड़ी. बहुत देर तक.
पर न फिल्म का कीड़ा उतरा न इश्क का. लेकिन कई दिनों तक लाइब्रेरी से दूरी जरूर बनी रही.

Advertisement

Advertisement

()