पोलैंड की एक औरत ने कहानी-2 के कागज वाले सीन से सब खोल दिया
सब कुछ बहुत साफ, सफेद या स्याह है. लोग बस अच्छे या बुरे हैं, बीच में कुछ नहीं है.
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फोटो - thelallantop
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तत्याना षुर्लेई पोलैंड से हैं. वह एक Indologist और फिल्म-आलोचक हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University से The Courtesan Figure in Indian Popular Cinema :Tradition, Stereotype, Manipulation नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ा रही हैं और बीच-बीच में भारत घूम रही हैं. फिल्म 'कहानी 2' देखकर पुरानी कहानी से उसे मिलाते हुए हमें कुछ लिख भेजा है. हम आपको पढ़ा रहे हैं.
गए हफ्ते अपनी अद्भुत ‘कहानी’ के चार साल बाद सुजॉय घोष ने अन्याय से लड़नेवाली और बेकसूरों को बचानेवाली दुर्गा देवी जैसी एक और मजबूत औरत की ‘नई कहानी’ दिखाई. विद्या बालन इसमें भी मुख्य किरदार में हैं और कहानी को फिर से बंगाली पृष्ठभूमि में फिल्माने के अलावा कहानी-2 का अपने मशहूर पूर्वज से ज्यादा संबंध नहीं है. फिल्म का नाम फिर से कहानी है, इसीलिए बहुत सारे समीक्षक इसमें कोई न कोई निरंतरता देखना चाहते हैं. वे पुरानी वाली ‘कहानी’ से इसकी तुलना करना चाहते हैं. यह अजीब नहीं है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि समीक्षकों की यह तुलना नई ‘कहानी’ के लिए ज्यादा कारगर नहीं है. सारी समीक्षाओं में हम यह पढ़ सकते हैं कि नई कहानी में घटनाओं का पूर्वानुमान संभव है और पुरानी कहानी में जितना तनाव था, उतना नयी में नहीं है. लेकिन यह तर्क क्या सचमुच जायज है? नई कहानी में सस्पेंस जरूर है, लेकिन पुरानी से अलग प्रकार का है. साल 2012 में बनी ‘कहानी’ में अंतिम मिनट तक सस्पेंस था. सुजॉय घोष की नई कहानी की नायिका जिसका नाम विद्या सिन्हा या वास्तव में दुर्गा रानी सिंह है, अपनी ‘पूर्वाधिकारी’ से बिल्कुल अलग स्त्री है. आत्मविश्वासपूर्ण विद्या वेंकटेसन बागची जो पुरानी कहानी की नायिका थी और कम्प्यूटर-स्पेशलिस्ट थी. वह खाली समय में हैकर भी बन जाती थी. कोलकाता के पुलिस ऑफिसर उसके खिलौने बन जाते थे.
नई कहानी की नायिका दुर्गा ज्यादा तन्हा और खामोश है. उसे लोगों का डर है. वह पुरानी कहानी की नायिका के मुकाबले लगभग अदृश्य लगती है. नीले और भूरे कपड़े पहने हुए वह कभी-कभी पृष्ठभूमि का हिस्सा लगती है. जब उसे पता चलता है कि मिली नाम की एक छोटी लड़की यौन उत्पीड़ित है, वह तन्हा और खामोश औरत सारे समाज से लड़ने के लिए तैयार है.पुरानी कहानी की नायिका सबसे पहले बदला लेने के बारे में सोचती है. उसे भी यह फिक्र नहीं थी कि उसका क्या होगा क्योंकि पति और बच्चे को खोने के बाद उसका कोई नहीं था जिसके लिए वह जी सकती थी. दुर्गा की स्थिति इसके ठीक उलट है. वह जीना चाहती है क्योंकि वह अच्छी तरह यह जानती है कि उसका जिंदा रहना मिली के लिए सबसे जरूरी चीज है. दोनों औरतें अपने लक्ष्य के लिए बहुत कुछ कर सकती हैं, लेकिन दुर्गा विद्या से ज्यादा खो सकती है, इसलिए नई कहानी का सस्पेंस इतना अलग है. पुरानी कहानी में आखिर तक मालूम नहीं था कि आखिर में क्या होगा. लेकिन इस बार सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो होने वाला है, वह होगा कैसे. दर्शकों को यहां अच्छी तरह मालूम है कि अब क्या होगा, लेकिन यह पता नहीं है कि इस बार नायिका जो करने वाली है, वह कैसे करेगी. दुर्गा बार-बार मिली को बताती है कि जब तक मैं जिंदा हूं तुझे कुछ नहीं होगा. यह कहना फिल्म के शुरू में ही आ जाता है. यह न सिर्फ मिली को बल्कि हर दर्शक को भी बेफिक्र करता है. इसे सुनने के बाद दर्शकों को यह यकीन हो जाता है कि जब तक फिल्म चल रही है मिनी और दुर्गा को कुछ नहीं होगा क्योंकि अपनी मां के बिना मिनी अकेले नहीं रह पाएगी. फिल्म के अंत में दुर्गा के पागलपन को देखकर दर्शक इसका विश्वास भी नहीं करते हैं कि वह सचमुच घर को जलाने वाली है क्योंकि उस पल तक पहुंचकर वे दुर्गा को इतना जानते हैं कि उन्हें मालूम है कि वह मिली को कुछ नहीं करेगी और पुरानी कहानी वाली नायिका की तरह आत्मसमर्पण कभी नहीं करेगी. फिल्म की सारी योजनाओं में यह बहुत अच्छी लगती है कि दुर्घटना में घायल होकर दुर्गा तुरंत अपनी बेटी की मदद नहीं कर सकती है. फिल्म के बड़े हिस्से में दुर्गा अस्पताल के बिस्तर पर बेहोश लेटती है, लेकिन अचल होने के बावजूद वह निष्क्रिय नहीं है. उसका नकली नाम न सिर्फ पुलिस ऑफिसर इंदरजीत सिंह में उत्सुकता पैदा करता है बल्कि दर्शकों में भी. पुरानी कहानी में एक शक्ल की दो औरतें असल में एक ही औरत है, लेकिन इस बार दर्शक को इसके बारे में बहुत जल्दी पता चलता है कि अस्पताल में कोमा में पड़ी विद्या सिन्हा वास्तव में एक खूनी और किडनैपर दुर्गा रानी सिंह है और जिसकी पुलिस को तलाश है. इसके अतिरिक्त, चूंकि अब तक दर्शक सिर्फ विद्या को जानता है इसीलिए तुरंत फ्लैशबैक में दुर्गा की कहानी दी जाती है. अगर कोई सोचता था कि फिल्म का रहस्य यहां होगा कि दुर्गा और विद्या कौन हैं तो उसको बहुत जल्दी पता चल जाता है कि फिल्म का मुख्य मुद्दा यह नहीं है क्योंकि तुरंत ही यह पता चल जाता है है कि दुर्गा कलिम्पोंग में रहने वाली एक औरत थी जिसने अपने बॉयफ्रेंड की पसंदीदा अभिनेत्री, विद्या सिन्हा से प्रेरित होकर अपना नाम बदल लिया और छोटी लड़की का अपहरण करने के बाद उसके साथ कोलकाता के पास रहने लगी. बच्चों के प्रति सेक्सुअल एब्यूज दिखाने वाले लंबे फ्लैशबैक में दर्शक पूरी दुनिया को दुर्गा की आंखों से देखता है. नई कहानी की नायिका बहुत जल्द यह फैसला करती है कि अच्छा कौन और बुरा कौन, और उसे दर्शकों को भी यह बताने से कोई समस्या नहीं है. यहां यह सोचने के लिए ज्यादा स्पेस नहीं है कि जिन लोगों को दुर्गा अपराधी समझती है, वे शायद निर्दोष हैं क्योंकि सब कुछ बहुत साफ, सफेद या स्याह है और लोग बस अच्छे या बुरे हैं, बीच में कुछ नहीं हैं. यहां संगीत की सहायता से दर्शक जानते हैं कि किससे डरना चाहिए और किस पर भरोसा करना चाहिए. यह राह पुरानी कहानी से बिल्कुल अलग है, इसलिए बहुत फ्रेश है. निर्देशक का आइडिया है कि सब कुछ दुर्गा की आंखों से ही देखना है. दर्शक को मालूम है कि जो आदमी कागज का जानवर बनाने वाला है, वह छोटी लड़की को एब्यूज करता है इसलिए उसके हाथों में जो गुलाबी कागज है, अचानक परवर्ट लगता है. आदमी धीरे-धीरे कागज को सहलाता है और अंत में मासूम आकार बनाने से पहले उसके अलग-अलग योनि जैसे आकार बनाता है और इन आकारों के कागज पर आदमी का हर स्पर्श दुर्गा के लिए उसके शरीर पर स्पर्श जैसा लगता है. एक सीधा कागज का खेल अचानक इतना परवर्ट बन जाता है कि दर्शक आसानी से यह महसूस कर सकता है कि छोटी लड़की के लिए अपने चाचा से ‘खेलना’ कितना हॉरर भरा है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि छोटे शहर के बड़े आदमी पर आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा. फिर भी दिलचस्प बात यह है कि औरतें नहीं, आदमी ज्यादा आसानी से दुर्गा की कहानी में विश्वास करते हैं. दुर्गा अपनी इस खोज के बारे में सबसे पहले स्कूल की प्रिंसिपल को बताती है और बाद में पुलिस इंस्पेक्टर को और दोनों का रिएक्शन बिल्कुल अलग है. छोटी मिनी की डेमोनिक (राक्षसी) दादी, जो बच्चों को खाने वाली बंगाली फोकलोर की डायनों जैसी है, सुनना नहीं चाहती है कि उसका प्यारा बेटा कुछ गलत करता है और एब्यूज के बारे में जानकर भी बच्ची की मदद नहीं करती है. नई कहानी में ऐसी औरतों को देखकर हम भी इस बारे में सोच सकते हैं कि अगर दुर्गा से बचपन में ऐसा ही एब्यूज नहीं होता तो शायद वह भी अनजान छोटी लड़की को कभी मदद नहीं देती. छोटे शहर से आए बड़े लोगों के विरोध का संदर्भ नई कहानी के एक दृश्य में बहुत दिलचस्प है. इस दृश्य में दुर्गा मिनी की दादी को सच बताती है. वह बूढ़ी औरत के शॉक का गलत अर्थ लेती है और यह सोचकर कि अब दादी छोटी लड़की की मदद करेगी, एक शांत से रस्ते पर रुकती है और पीछे चर्च से आती हुई एक धार्मिक गीत सुन रही है. क्या इस दृश्य में इसाई चर्च को लाना सिर्फ एक संयोग है या इसका कोई ज्यादा गहरा मतलब भी है? क्या इस मेटाफर के जरिए निर्देशक यह दिखाना चाहता है कि बच्चों का सेक्सुअल एब्यूज करने वाले बड़े लोगों से लड़ना दुनिया में हर जगह में बहुत ही मुश्किल और अक्सर आशाहीन है? फिल्मकार का एब्यूज के बारे में एक स्पष्ट ख्याल है कि जब तक समाज को बड़े लोगों से डर होगा तब तक कुछ नहीं बदलेगा. इसलिए दुर्गा लड़ाई से इंकार करती है और उसे कलिमपोंग से भागना ज़्यादा आसान लगता है. पुरानी कहानी की तरह नई कहानी में भी दर्शक को अंत में एक छोटे फ्लैशबैक के सहारे सब कुछ स्पष्ट कर दिया जाता है. लेकिन इस बार वे सारे फ्लैशबैक इतना आश्चर्यचकित नहीं करते हैं, खासकर तब जब कोई ध्यान से फिल्म देखता है. फिल्म के अंत में दर्शक को पहले से छुपी जानकारियां देना भारतीय सिनेमा में सबसे आसान समाधान है और यह समाधान जितना आश्चर्यचकित करता है उतना ही इरिटेटिंग भी (जैसे उदाहरण के लिए साल 2014 में आई प्रदीप सरकार की ‘मर्दानी’). फिर भी सुजॉय घोष की इस नई कहानी में कहानी बताने यह तरीका उतना खराब नहीं लगता है जितना पुरानी कहानी में था क्योंकि इस बार दर्शक को खुद ही रहस्य जानने का मौका मिलता है और वह इतना धोखा खाया हुआ नहीं लगता है जितना पुरानी वाली कहानी में था. एक सुंदर बात नई कहानी में यह भी है कि इस बार अंत में कोई शिक्षा नहीं है और न ही दर्शकों को फिल्म का मतलब समझाने की कोई बचकानी कोशिश. शायद सुजोय घोष जैसे कुछ फिल्मकारों को अब लगने लगा है कि उनके दर्शक बच्चे नहीं हैं और जो भी नया और अलग है, उसे वे बगैर किसी मदद के समझ सकते हैं.

