The Lallantop
Advertisement

राजस्थान में 14 जिलों के किसान सड़कों पर हैं और हम बेखबर हैं

कहानी सीकर के उस किसान आंदोलन की भी, जब एक बुढ़िया की लाठी ने रजवाड़ों को हिलाकर रख दिया था.

Advertisement
pic
12 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 13 सितंबर 2017, 07:02 AM IST)
Img The Lallantop
सीकर में किसानों का महापड़ाव
Quick AI Highlights
Click here to view more
ये साल 1370 के आसपास की बात है. उस समय आमेर (जयपुर) पर कछवाहा वंश का राज था. तत्कालीन राजा उदयकरण ने अपने बेटे बाला को विराटनगर के पास बरवाड़ा सहित 12 गांव की जागीर दे दी. इसी बाला का बेटा हुआ मोकल. मोकल जब इस जागीर का जागीरदार हुआ तो उसने बरवाड़ा के पास ही 'अमरा की ढाणी' में अपनी नई हवेली बनाई और अपनी जागीर को नया नाम दिया, 'अमरसर'. उनकी जागीर 12 गांव से फैलकर 20 गांव तक पहुंच गई लेकिन उसे संभालने के लिए उसके घर में कोई वारिस नहीं था. बेटे की चाह लिए वो फ़कीर-दरवेशों के यहां भटकने लगा. ऐसे में उसे एक फ़कीर मिले शेख बुरहान. कहते हैं कि शेख बुरहान की दुअाओं के असर में मोकल को एक बेटा हुआ. शेख बुरहान की याद में उसने अपने बेटे का नाम रखा शेखा. 1445 में जब मोकल की मौत हुई तब शेखा की उम्र महज़ 12 साल थी.
शेखा अमरसर की गद्दी पर बैठा और धीरे-धीरे अपना साम्राज्य फैलाने लगा. उसकी मौत तक चुरू, झुंझनु, सीकर, जयपुर और नागौर के कुछ हिस्से पर उसके नाम का पंचरंगा झंडा फहराता था. शेखा के नाम पर राजपूतों की अलग शाखा शुरू हुई, 'शेखावत'. जो क्षेत्र शेखा ने जीता था उसे नाम दिया गया शेखावटी. हालांकि शेखावत कछवाहों की एक शाखा थी लेकिन इसका अलग वजूद था. यह उस समय राजपूताना के दो बड़े साम्राज्य मारवाड़ और आमेर के बीच धंसा हुआ था.
1445 में शेखावटी राज्य की स्थापना के बाद से आजादी तक यहां शेखावत राजपूत 'भोमियाचारी' व्यवस्था के तहत शासन करते रहे. भोमियाचारी व्यवस्था में हर गांव या कुछ गांवों के समूह पर एक शेखावत राजपूत सरदार होता था, जिसे स्थानीय लोग भोमिया कहते थे. भोमिया शासन की सबसे छोटी इकाई थी. वो लगान वसूलने से लेकर न्याय तक हर किस्म के काम करता था.
राव शेखा: जिनके नाम पर राजपूतों की नई शाखा शेखावत शुरू हुई
राव शेखा: जिनके नाम पर राजपूतों की नई शाखा शेखावत शुरू हुई

अंग्रेज जब भारत आए तो अपने साथ कई बदलाव साथ लाए. ऐसा ही एक बदलाव था 'मार्शल कौम' की अवधारणा. भारतीय जाति व्यवस्था के अनुसार सिर्फ राजपूतों को हथियार उठाने का अधिकार था. अंग्रेजों ने किसान जातियों को हथियारबंद कर अपने लश्कर में शामिल करना शुरू किया. इन किसान जातियों को उन्होंने नाम दिया, 'मार्शल रेस'.
इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि पहले विश्वयुद्ध के दौरान शेखावटी के 14,000 जाट अंग्रेज सेना का हिस्सा बने. अंग्रेजों ने उन्हें यूरोप के अलग-अलग मोर्चों पर झोंक दिया. करीब दो हज़ार लोगों ने अपनी जान दी. इसमें से कुछ के नाम इंडिया गेट के पत्थरों पर गोदे गए हैं.
पहले विश्वयुद्ध में फ़्रांस के मोर्चे पर छठी जाट रेजिमेंट के सैनिक
पहले विश्वयुद्ध में फ़्रांस के मोर्चे पर छठी जाट रेजिमेंट के सैनिक

बाकी बचे लोग जब यूरोप से वापस अपने घरों को लौटे तो नई चेतना को साथ लेकर आए. मोर्चों पर गोलियों और बमों के बीच भी उनके सुस्ताने के लिए थोड़ा वक़्त था. उन्होंने बड़ी तसल्ली से नए किस्म के मानवीय समाज को देखा. वो जिस समाज से आते थे वहां उनकी जिंदगी कमतरी के स्थायी अहसास पर टिकी हुई थी. वो राजपूतों के रावळे के सामने से नंगे पैर निकलते. उनकी फसल का बड़ा हिस्सा लाग-बाग़ (लगान) में चला जाता. उनकी महिलाएं सोने-चांदी के जेवर नहीं पहन सकती थीं. यूरोप में भयंकर जंगी माहौल में दुश्मन के अलावा आजादी और समानता से भी उनका साबका पड़ा. यह मुलाकात उनके दिमागों में चिपक गई. जब वो अपने गांव लौटे तो वो हथियार चलाना और आत्मसम्मान से जीना सीख चुके थे.
1921 में जब गांधी जी भिवानी आए तो सीकर से बड़ी संख्या में लोग उनके जलसे में शामिल होने पहुंचे. इस जलसे को शेखावटी में राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत के तौर पर समझ सकते हैं. इसके बाद जाट महासभा और आर्य समाज ने धीरे-धीरे यहां अपने पैर जमाने शुरू किए. उस जमाने की जनगणना बताती है कि शेखावटी की 25 फीसदी आबादी जाट थी और लगभग 50 फीसदी जमीन को जोत रही थी. 1930 में जाट महासभा के बैनर तले एक मजबूत किसान आंदोलन की शुरुआत हुई. यह किसान आंदोलन करीब एक दशक तक चला.
इस तरह हुई शेखावटी में किसान आंदोलन की शुरुआत 
शेखावटी के किसान आंदोलन की शुरुआत बहुत नाटकीय थी. 20 जनवरी 1934 को बसंत पंचमी के दिन प्रजापति महायज्ञ हुआ. जाट महासभा और आर्य समाज इस यज्ञ के आयोजक थे. जल्द ही यह धार्मिक आयोजन राजनीतिक जलसे में बदल गया. हरियाणा के किसान नेता सर छोटूराम इस यज्ञ में शिरकत कर रहे थे. इस यज्ञ में बड़े पैमाने पर लोग जुटे. यज्ञ के अंत में हाथी पर शोभायात्रा निकाली जानी थी, जिस सीकर के महाराजा के गढ़ के सामने से निकलना था. राव राजा कल्याण सिंह ने इसे तौहीन के तौर पर लिया. जिस गढ़ के सामने लोग जूतियां पहनकर नहीं निकल सकते थे, वहां हाथी पर सवार होकर निकलने को कैसे सहन किया जाता. इस बात पर बहुत बहस हुई और अंत में जयपुर पुलिस के महानिरीक्षक एफ.एस. यंग की समझाइश के बाद हाथी पर वेदों की प्रति रखकर शोभायात्रा निकली गई. सीकर दरबार और उसके अधीन आने वाले तमाम ठिकाने इस बात का बदला लेने के लिए मौके का इंतजार करने लगे.
सर छोटूराम
सर छोटूराम

यज्ञ के बाद शेखावटी के कई गांवों ने लगान देने से इनकार कर दिया. अंग्रेज और रजवाड़े इस बात की गंभीरता को समझते थे. 24 मई 1934 को जयपुर दरबार ने कैप्टन वेब को जिले के पुलिस अमले की कमान देकर सीकर भेजा. ऐसे में आया दिसम्बर 1934 का अध्यादेश. इस अध्यादेश के अनुसार किसानों को उनके दिए लगान की रसीद दी जाने वाली थी ताकि स्थानीय ठिकानेदार मनमाना लगान न वसूल कर सके. इसके अलावा लगान न देने को कानूनी अपराध घोषित कर दिया गया.
ठिकानेदार यज्ञ के बाद जिस मौके का इंतजार कर रहे थे वो उन्हें मिल गया. उन्होंने इस अध्यादेश को आधार बनाकर अवैध गिरफ्तारियां शुरू कर दीं. चोटी के किसान नेता हरी सिंह, ईश्वर सिंह, पृथ्वी सिंह, गोरू सिंह, पन्ने सिंह, गणेश राम, सूरज सिंह, तेजा सिंह, गंगा सिंह आदि को गिरफ्तार कर लिया गया. जनता ने इन गिरफ्तारियों के खिलाफ विद्रोह शुरू कर दिया.
एक बुढ़िया की लाठी ने रजवाड़ों को हिला दिया
सीकर की एक तहसील है धोद. रजवाड़ों के समय इसी तहसील का गांव कूदन किसान आंदोलन का केंद्र बन गया. 25 अप्रैल 1935 के दिन कूदन में लगान के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए आस-पास के गांवों के लोग इकठ्ठा हो गए. जब इस प्रदर्शन की सूचना सीकर पहुंची तो कैप्टन वेब अपने अमले के साथ कूदन के लिए रवाना हुए.
कूदन पहुंचते ही सैकड़ों लगों ने वेब के घोड़े को घेर लिया. गांव के दक्षिण में सुखानी जोहड़ी है. यह जगह बरसात के दिनों में पानी के भराव के लिए छोड़ी गई थी. अप्रैल का महीना था तो सूखी जोहड़ी ने मैदान की शक्ल अख्तियार कर रखी थी. यहां हजारों की तादाद में किसान इकठ्ठा हुए. वेब के साथ स्थानीय ठिकानेदारों के कारिंदे अपने घोड़े पर सवार होकर जोहड़ी के चारों तरफ खड़े थे.
राव राजा कल्याण सिंह
राव राजा कल्याण सिंह

मामले की गंभीरता को देखते हुए तहसीलदार भी वेब के पीछे-पीछे मौके पर पहुंच गए. गांव की धर्मशाला में तहसीलदार ने किसानों के प्रतिनिधियों को समझौता वार्ता के लिए बुलाया. आस-पास के गांवों के चौधरी किसान प्रतिनिधि बनकर वार्ता में गए. अंत में प्रतिनिधि इस बात पर राजी हो गए कि किसान बढ़ी हुई लगान की राशि चुका देंगे.
इस बीच कूदन गांव की ही एक बुढ़िया धापी दादी धर्मशाला के पास बने कुएं पर अपनी भैंस को पानी पिलाने के लिए पहुंची हुई थीं. जब उन्हें समझौता वार्ता की जानकारी मिली तो वो कौतुहल के मारे वहां रुक गई. जब प्रतिनिधि वार्ता पूरी करके बाहर निकले तो धापी दादी बाहर उनका इंतजार कर रही थीं. उन्होंने वार्ता के बारे में उनसे पूछा तो बताया गया कि वो बढ़ा हुआ लगान देने का कोल (वचन) देकर आए हैं.
इतना सुनते ही धापी दादी ने भैंस हांकने के लिए इस्तेमाल लाई जाने वाली कंटीली छड़ी गांव के चौधरी पेमाराम महरिया के सिर पर दे मारी. पेमाराम बचने के लिए पीछे हटे तो उनका साफा (सिर पर पहनी जाने वाली पगड़ी) छड़ी में अटक कर खुल गया. वो और दूसरे चौधरी बचने के लिए फिर से धर्मशाला की ओर भागे. इधर धापी दादी जोर-जोर चिल्ला रही थी, "तुम लोगों को बढ़ी लगान स्वीकार करने का अधिकार किसने दिया?"
कैप्टन वेब की दुर्लभ तस्वीर
कैप्टन वेब की दुर्लभ तस्वीर

धापी की ललकार सुनकर लोग भी धर्मशाला की तरफ भागे. उन्होंने धर्मशाला को घेर लिया. तहसीलदार की सुरक्षा में बाहर खड़े सिपाहियों के हथियार छीन लिए गए. बिगड़ते हालात देखकर कैप्टन वेब ने अपने सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दिया. गोली चलने की वजह से किसान तितर-बितर हो गए. कुल 12 किसान इस गोलीकांड में मारे गए और 106 किसानों को गिरफ्तार किया गया. इसमें से 56 कूदन गांव के थे.
कूदन गांव में हुई बर्बर पुलिस कार्रवाई की खबर पहले भारतीय मीडिया और बाद में अंतरराष्ट्रीय अखबारों में छपी. घटना के करीब एक महीने बाद 3 अप्रैल को ब्रिटेन की सांसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ़ कॉमंस' में हुई पुलिस बर्बरता पर उस समय के भारत मंत्री सैम्युअल होर से जवाब-तलब किया गया. इस घटना को आज 82 साल हो गए हैं. देश में लोकतंत्र है और शेखावटी में किसान पिछले ढाई महीने से अपनी मांगों के लिए लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज़ सुनी नहीं जा रही है.
ऐसे शुरू हुआ आंदोलन
मंदसौर के हिंसक किसान आंदोलन को अभी 10 दिन भी नहीं बीते थे. सीकर की दांता-रामगढ़ तहसील के गांव लामियां में बड़ौदा राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के कर्मचारी मौका-मुआयना करने पहुंच चुके थे. लामियां गांव के किसान नारायण ने पिछले सात साल से किसान क्रेडिट कार्ड के तहत लिया गया कर्ज चुका नहीं पाए थे. वो 5 हेक्टेयर के लगभग रकबे पर खेती करते थे. इस सात साल के दौरान उन्होंने चार अकाल भुगते थे.
18 जून को दांता-रामगढ़ स्थिति तहसील कार्यालय में उनकी जमीन के एक तिहाई भाग की नीलामी रखी गई. पास ही के खूड गांव के छोटूराम ने 1.67 हैक्टेयर रकबे का सबसे ज्यादा दाम लगाया. 10.83 लाख की बोली लगाकर ये हिस्सा खरीद लिया. महीने भर में अलग-अलग बैंको ने करीब आधा दर्जन किसानों की जमीन नीलाम की.
 
 
महापड़ाव में वसुंधरा राजे की सांकेतिक अर्थी के पास बैठी महिलाऐं
महापड़ाव में वसुंधरा राजे की सांकेतिक अर्थी के पास बैठी महिलाएं

सीकर के पास किसान आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है. यह निलामियां आंदोलन की शुरुआत के लिए काफी थीं. मध्य जुलाई में आल इंडिया किसान सभा ने किसान कर्फ्यू का ऐलान किया. किसान कर्फ्यू माने सुबह 8 से 1 के बीच किसान सड़कों पर होंगे और काम पर जा रहे हर आदमी को काम पर न जाने देने की अपील करेंगे. यह आंदोलन की शुरुआत थी.
क्या हैं मांगें
इस आंदोलन की मुख्य तौर पर 11 मांगे हैं. किसान मांग कर रहे हैं कि उनका कर्ज माफ़ किया जाए. उनके बिजली के बिल माफ़ किए जाएं. स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिश लागू हों. किसानों को गाय के बछड़े बेचने की इजाज़त दी जाए. आंदोलन के नेता कामरेड अमराराम ने दी लल्लनटॉप को बताया-
"मूंगफली, मूंग और ग्वार की फसलों को इस बार बारिश ने काफी नुकसान पहुंचाया है. ऊपर से बाजार में उनका भाव भी काफी गिर गया है. हम सरकार से मांग कर रहे हैं कि वो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर हर किसान की फसल खरीदे. इसके अलावा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने चुनावी घोषणापत्र में पांच साल में 15 लाख नौकरी देने का वायदा किया था. हमारे नौजवान बेरोजगार घूम रहे हैं. राज्य सरकार रोजगार देने की बजाय सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में सौंप रही है. हम राज्य सरकार से उसके किए हुए वादे पूरे करने की मांग कर रहे हैं."
amararaam
महापड़ाव को संबोधित करते अमराराम

1 सितम्बर का महापड़ाव
जुलाई 16 से लेकर अगस्त के आखिरी सप्ताह तक करीब आधे दर्जन बार किसान सीकर जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन के लिए जुटे. यहां वो दिन भर प्रदर्शन करते और शाम को ज्ञापन देकर घर लौट जाते. प्रशासन के पास आश्वासन के अलावा देने के लिए कुछ नहीं था. इधर किसान सभा बार-बार महापड़ाव की चेतावनी दे रही थी.
अंत में 1 सितंबर को किसान सभा की तरफ से सूबे में महापड़ाव का ऐलान हुआ. 1 सितंबर से करीब 12 से 15 हजार किसान सीकर में पड़ाव डाले हुए हैं. इसके अलावा झुंझनु, चुरू, हनुमानगढ़, बीकानेर, नागौर, गंगानगर सहित सूबे के 14 जिलों में किसान जिला मुख्यालयों को घेर कर बैठे हुए हैं.
चक्काजाम के दौरान शांति कायम करने के लिए लगा पुलिस अमला
चक्काजाम के दौरान शांति कायम करने के लिए लगा पुलिस अमला

करीब 10 दिन के महापड़ाव के बावजूद जब सरकार की तरफ से समझौते के लिए कोई पहल नहीं हुई तो 11 तारीख को किसान सभा ने चक्का जाम का ऐलान कर दिया गया. सीकर इस आंदोलन का केंद्र है. जिले में करीब 450 किसान चौकी बनाई गईं. 11 तारीख को सीकर में सुबह से इन्टरनेट सेवा रोक दी गईं. लगभग हर गांव में किसान वाहनों को रुकवाने के लिए सड़कों पर उतर गए. सीकर पूरी तरह से बाकी जिलों से कट गया. ऐसा ही हाल हनुमानगढ़, झुंझनु और चुरू में भी देखा गया. अखबारी आंकड़ों के मुताबिक करीब 3500 हजार वाहन और 16000 लोग इस चक्का जाम की वजह से रास्तों में फंसकर रह गए. 170 बसें डिपो से बाहर नहीं निकली. हर रोज करीब तीस हजार यात्री इन बसों में यात्रा करते हैं. 1100 निजी स्कूल बंद रहे. हालांकि चक्काजाम के दौरान मालगाड़ी पर पथराव को छोड़कर कोई भी हिंसक वारदात नहीं हुई.
चक्काजाम के चलते खाली पड़ी सड़कें
चक्काजाम के चलते खाली पड़ी सड़कें

क्या हैं इस महापड़ाव के सियासी मायने
किसान सभा के चक्काजाम से ठीक एक दिन पहले महापड़ाव को संबोधित करने के लिए सूबे के दो बड़े नेता पहुंचे. पहले थे किरोड़ी लाल मीणा और दूसरे हनुमान बेनीवाल. हनुमान और मीणा वसुंधरा राजे के धुर विरोधी हैं. किरोड़ी किसी दौर में बीजेपी में हुआ करते थे लेकिन राजे से अनबन के चलते पार्टी से अलग हो गए. उन्होंने 2008 के चुनाव में बीजेपी की हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 2008 में कांग्रेस सत्ता में आई और किरोड़ी लाल मीणा की पत्नी गोलमा देवी नई सरकार में माननीय मंत्री बनीं.
महापड़ाव में हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीणा
महापड़ाव में हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीणा

किरोड़ी लाल मीणा की तरह ही हनुमान बेनीवाल भी किसी दौर में बीजेपी में हुआ करते थे. वसुंधरा राजे के साथ मनमुटाव के चलते उन्होंने 2009 में पार्टी छोड़ दी थी. फ़िलहाल वो खींवसर विधानसभा से निर्दलीय विधायक है. हनुमान वसुंधरा के कट्टर विरोधी है. राजस्थान में शेखावटी और मारवाड़ का बड़ा हिस्सा जाट बाहुल्य वाला है. मारवाड़ में मदेरणा और मिर्धा परिवार के पतन के बाद वो इस बेल्ट में नए जाट नेता के तौर पर स्थापित हो रहे हैं.
दोनों नेताओं ने इस किसान आंदोलन को पूरा समर्थन दिया है. किरोड़ी लाल मीणा ने सभा में घोषणा की कि अगर सरकार किसानों की मांग नहीं मानती है तो अगला महापड़ाव सीकर की बजाय जयपुर में होगा. वो इस दावे के साथ मंच से उतरे कि अगर सीकर से पांच लाख लोग जयपुर पहुंचेंगे तो वो 6 लाख आदमियों के साथ जयपुर पहुंचेंगे.
घडसाना के पूर्व सीपीएम विधायक पवन दुग्गल
घडसाना के पूर्व सीपीएम विधायक पवन दुग्गल

2013 तक सीपीएम के सूबे में 3 विधायक हुआ करते थे. 2013 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम अपनी तीनों सीट गवां चुकी है. 2006 में गंगानगर के घडसाना और अनूपगढ़ में किसानों ने पानी की मांग पर उग्र आंदोलन किया था. इस आंदोलन में पुलिस गोलीबारी में लगभग आधा दर्जन लोग मारे गए थे. इस आंदोलन की वजह से सीपीएम अनूपगढ़ विधानसभा सीट जीतने में कामयाब रही थी और पवन दुग्गल यहां से विधायक चुने गए थे.
राजस्थान में फिलहाल चल रहे किसान आंदोलन के नेता कामरेड अमराराम सूबे के बड़े किसान नेता हैं. वो चार बार विधायक रह चुके हैं, लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी. इस आंदोलन की वजह से सीपीएम की स्थिति का मजबूत होना स्वाभाविक है.
सरकार की विफलता
करीब ढाई महीने से चल रहे किसान आंदोलन के प्रति सरकार का रवैया लापरवाही वाला रहा है. वो लगातार इस आंदोलन की अनदेखी करती रही. 11 सितम्बर को चक्का जाम के चलते जब पूरा शेखावटी सूबे से पूरी तरह कट गया, उसके बाद सरकार की नींद खुली है. आनंदपाल के मामले में भी सरकार की तरफ से ऐसी ही लापरवाही देखी गई थी.
राजस्थान के कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी
राजस्थान के कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी

11 सितम्बर से एक दिन पहले 10 सितम्बर की शाम ढलते-ढलते सरकार ने आंदोलन के नेताओं के पास सरकार की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव भेजा. वो सीकर से जयपुर के लिए रवाना हुए भी लेकिन रास्ते में उनके पास खबर आई कि सीकर में शाम 7 बजे से धारा 144 लगा दी गई है. इसके बाद आंदोलन के नेता फिर से महापड़ाव की तरफ लौट आए.
12 सितम्बर की शाम चार मंत्रियों की कमिटी और आंदोलन के 11 प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत भी विफल रही. 13 सितंबर को दूसरे दौर की वार्ता होनी है.आंदोलनकारी स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिशों को लागू करवाने पर अड़े हुए हैं. इसके अलावा पशुधन और किसानों को 5000 की पेंशन देना ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सहमति  बनना फिलहाल मुश्किल दिख रहा है. ऐसे में दूसरे दौर की वार्ता सफल में भी संशय बरकरार है.
आपातकाल के बाद सीकर किसान आंदोलन और वामपंथी राजनीति का गढ़ रहा है. यहां किसानों के प्रदर्शन में आपको अक्सर एक नारा सुनने को मिल जाएगा, "खेत-खेत, रणखेत". सीकर के किसान आंदोलन का अपना इतिहास है लेकिन सवाल यह है कि आजादी के बाद देश के किसानों की हालात में क्या बदलाव हुआ? इसका जवाब हमें इलाके के जनकवि रामेश्वर बगड़िय इस तरह देते हैं-
पहले जांके घोड़ा हा, मुछ्या के मरोड़ा हा बे'ही पाछा आय मुछ्या मुंडाय राम-राम साय. (पहले जिनके घोड़े थे. मुछों पर मरोड़े थे. अब वो ही मूछों को मुंडवाकर फिर से लौट आए हैं और हमसे राम-राम करके वोट मांग रहे हैं.)

यह भी पढ़ें 

इस आदमी का 1 घंटे 35 मिनट का लाइव-स्ट्रीम शिवराज के 28 घंटे के उपवास पर भारी था

स्वामीनाथन कमेटी की वो बातें, जिनकी वजह से MP के किसान गदर काटे हैं

मध्य प्रदेश में 6 किसानों का कत्ल किसने किया?

Advertisement

Advertisement

()