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मस्तानी के पापा छत्रसाल को मिला था अजूबा आशीर्वाद

बुंदेल राजपूत राजा छत्रसाल का आज जन्मदिन है. उनके किस्से पढ़े जाएं.

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4 मई 2016 (अपडेटेड: 4 मई 2016, 06:39 PM IST)
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नक्शे के हिसाब से बुंदेलखंड सेंट्रल इंडिया में पड़ता है. आधा यूपी और आधा एमपी में. आजकल बुंदेलखंड गरीबी और पिछड़ेपन की मार झेल रहा है. लगभग हर साल सूखा पड़ जाता है. लेकिन बुंदेलखंड की हिस्ट्री रिच है, इस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता. यहां के राजा बड़े बहादुर होते थे. उनकी कहानियां तो सुनते होगे. डेयरिंगबाज इतने थे कि कभी हारते नहीं थे.
आल्हा ऊदल के किस्से तो घर घर सुने जाते हैं. कहानियों में तो वो अमर हैं ही. लल्लू बाजपेई ने उनको ऐसा नसों में पिरोया है कि अब निकलना नामुमकिन है. वो आल्हा और ऊदल जिन्होंने लोकगाथाअों के अनुसार पृथ्वीराज चौहान को चुनौती दी. वहीं से झांसी की रानी जो मर्दानी बन कर अंग्रेजों से लड़ी थीं. उसी बुंदेलखंड की बात हो रही है. उसी बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल का आज जन्मदिन है.
राजा छत्रसाल को हिस्ट्री पढ़ने वाले तो जानते होंगे. जो नहीं जानते वो बाजीराव मस्तानी फिल्म याद करें. अगर देखे हैं तो. नहीं देखे तो फिर देख के आओ. उसमें मस्तानी के पापा छत्रसाल थे. बुंदेला राजपूत छत्रसाल. मस्तानी की शादी पेशवा बाजीराव प्रथम से हुई थी. राजा छत्रसाल 1649 में पैदा हुए थे. और मरे 1731 के साल. अपनी 82 साल की जिंदगी में 52 लड़ाईयां लड़ी थीं.
Source: Wikipedia
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अकेले दम पे औरंगजेब के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. 22 साल की उम्र थी तब और साथ में बस पांच घुड़सवार और पच्चीस तलवारबाज़. ये वो दौर था जब मराठा छत्रपति शिवाजी ने भी मुगलों के छक्के छुड़ा रखे थे. हर तरफ उनकी जय जय मची थी. छत्रसाल भी औरंगजेब के खिलाफ लड़ाई में शिवाजी से हाथ मिलाने पहुंचे थे. शिवाजी ने उन्हें सलाह दी कि बेहतर होगा वो बुंदेलखंड में ही औरंगजेब के खिलाफ लड़ाई शुरू करें.
अगले दस साल तक छत्रसाल ने बुंदेलखंड में मुगलों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी. इन दस सालों में राजा छत्रसाल ने चित्रकूट, पन्ना, कालपी, सागर, दमोह, कोटा को मुगलों से छुड़ा लिया था. छत्रसाल ने मुगलों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी जब तक पूरे बुंदेलखंड को आजाद नहीं करा लिया. बाजीराव और छत्रसाल का रिश्ता बाप बेटे की तरह था. बाजीराव ने तमाम लड़ाइयों में जी जान लगाकर छत्रसाल की मदद की थी.
छत्रसाल ने मुगलों से आखिरी लड़ाई 1730 में लड़ी थी. तब तक छत्रसाल बूढ़े हो चुके थे. इसलिए लड़ाई में बाजीराव के अलावा पठान, मोहम्मद खान बंगश की भी मदद ली. ये लड़ाई मुगलकाल का टर्निंग प्वाइंट थी. इसे जीतने के बाद बुंदेलखंड मुगलों से पूरी तरह आजाद हो गया.
छत्रसाल को कवियों से बड़ा प्यार था. जैसा उस जमाने के हर राजा का शगल होता था. उनके दरबार में सबसे प्रिय कवि थे भूषण. इसके अलावा धरम करम में भी खासा इंट्रेस्ट था. महात्मा प्राणनाथ को बना रखा था अपना गुरु.
तो गुरु प्राणनाथ से मिलने का किस्सा बड़ा रोचक है. साल 1683 था. मऊ के पास की जगह हुआ करती थी पन्ना. अपने भतीजे देव कर्ण के साथ जा रहे थे लड़ाई पर. मुगलों पर चढ़ाई की पूरी तैयारी थी. वहीं भतीजे ने कहा कि गुरू से मिला जाए. राजा ने बात मानी. पहुंच गए गुरू के दरबार. वहां गुरुजी ने उनको अपनी तलवार गिफ्ट की. और उनके सिर पर एक साफा बांधा. और आशीर्वाद दिया. "तुम हमेशा विजयी होगे. तुम्हारे राज्य में हीरे की खदानें खोदी जाएंगी और एक दिन तुम महान सम्राट बनोगे." फिर उसके बाद राजा का कॉन्फिडेंस टॉप पर चला गया. और वो कोई लड़ाई कभी नहीं हारे.
उनकी रॉयल फैमिली अब भी मध्य प्रदेश के छतरपुर में रहती है. वहां छत्रसाल के नाम पर एक म्यूजियम मौजूद है. दिल्ली का छत्रसाल स्टेडियम भी उनके नाम पर है. बहादुर योद्धा और मस्तानी के पापा के नाम लल्लन का सलाम.


स्टोरी दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रही आकांक्षा ने एडिट की है.

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