एहतियातों के गर्म झोंको से सूख कर ख़ार हो गई होगी इश्क दहलाब लेके आया है, अक्लबीमार हो गई होगी बदनसीबी का क्या इलाज करूं, फिर कोई बात हो गई होगी उनकी सूरत नजरनहीं आती, चांदनी रात हो गई होगी लौट कर फिर नहीं कलीम आया, कहीं तकरार हो गई होगीबात बढ़ कर हदे तनासुब से, गेसुए यार हो गई होगी एक शोला उठा था पहलू से, कोईउम्मीद जल गई होगी गम तो ये है कि दिल के जलने से, उनकी तस्वीर जल गई होगीगजलें पढ़ने का शौक पहले से था. लेकिन गजल को कव्वाली की तरह सुनने का शौक इसेसुनने के बाद लगा. देखो उर्दू अरबी बहुत ज्यादा समझ नहीं आती. लेकिन जितनी पल्लेपड़ती है उतने में दिल हल्के हल्के बुलबुले छोड़ने लगता है. तो साहब ये वाली गजलपहली बार सुनी अजीज़ मियां के मुंह से. फिर पूरी कव्वाली सुनी. "नसीमे सुबह गुलशनमें, गुलों से खेलती होगी. किसी की आखिरी हिचकी, किसी की दिल्लगी होगी."https://www.youtube.com/watch?v=zKcHylfAmJY फिल्मी गाने सुनता था मैं. 5-10 मिनटके. जितने सिंगर हैं सब मेरे फेवरेट. सबको सुनना अच्छा लगता है. लेकिन ये गाना था30 मिनट का. मजा आ गया भाईसाहब. कई बार सुना फिर. रिपीट कर करके. फिर वो गाना एक औरदोस्त को सुनाया. उसने कहा "ये का सुन रहा है बे? कुछ समझे में न आ रहा." मैंनेउसको उसके हाल पर छोड़ा. और अजीज़ मियां की खोज में निकल पड़ा. हां. अब तुम दिमागलगा लो अपना. खोज में मतलब उनके शब्दों, कव्वालियों और आवाज की खोज में. सस्ते सेमोबाइल में जितने आ सके उतने गाने डाउनलोड किए. फिर ये सिलसिला कभी थमा नहीं. अजीज़मियां ने हमको कव्वाली सुनने का ऐसा शौक लगाया. कि जैसे अध्यात्म सुख. वो होता है नएक सुकून टाइप का. जब आप बड़ी तकलीफ में हो. या बड़ी खुशी में लिपटे. लेकिन शेयरकरने को आस पास कोई न हो. तो इनको सुनने से दिल दिमाग कंट्रोल में रहता है.https://www.youtube.com/watch?v=BVzIiA0Oz98 वो नौकरी थी एक कम पैसे ज्यादा कामवाली. लखनऊ की गलियों में सेल्स मैन बन के विचरते थे. एक दिन का हाल सुनाएं. एकचौराहे पर साजो सामान लिए कैनोपी लगाए बैठे थे. दोपहर की बेतहाशा गर्मी. अचानक बादलआ गए. बेमौसम की बारिश शुरू हो गई. हम बड़ा प्रयास किए, काफी जल्दी मचाए. लेकिनसामान समेटने में देर हो गई. बारिश में सब भीग गया. मैंने प्रयास करना भी बंद किया.घुस गया एक एटीएम वाले कमरे में. पूरा भीगा हुआ. पानी टपक रहा था. पन्नी में लिपटामोबाइल निकाला. अब उसके इयरफोन में अजीज़ मियां की कव्वाली बज रही थी. "कभी लब पेआहो नाले, कभी दिल में गम के छाले. के बड़ा ही सख्त निकला, ये मकामें जिंदगानी."https://www.youtube.com/watch?v=bPD7tBHwor8 इस हादसे के बाद मेरी नौकरी चली गई.शहर में रहने का अब कोई चांस नहीं था. बोरिया बिस्तर लेकर वापस गांव आ गया. गांवहमेशा से अच्छा लगता है. वहां पहुंचा तो सारे पुराने टास्क रिज्यूम हुए. दोस्तों केसाथ गप्प सड़ाका. गायों को सानी पानी. खेतों की देखभाल. फोन हमेशा जेब में औरइयरफोन कान में होता था. उसमें चलती रहती थी अजीज़ मियां की कव्वाली. इसलिए कभी बोरनहीं होते थे. लगता था, कोई एकदम साथ चल रहा है. जब पहली बार दिल टूटा तब भी वोकनफुस्की झाड़ रहे थे. "मैंने पहले ही कहा था, के ये हर अदा है फ़ानी. दिले बजनसीबतूने, मेरी बात ही न मानी."अब सुनो कौन हैं अजीज़ मियांजब हमारे मुल्क का एक टुकड़ा हमसे अलग नहीं हुआ था. पाकिस्तान नहीं बना था. तब कीदिल्ली में 17 अप्रैल सन 1942 को पैदा हुए थे अब्दुल अजीज़. जब कव्वाली में मशहूरहुए तो नाम हो गया अजीज़ मियां. लाहौर में पढ़े अजीज़ मियां आगे चल कर नॉनट्रेडीशनल कव्वाली के महारथी हुए. खास और दमदार आवाज के अलावा गज़लों को यूनीक शैलीमें गाने की कला थी इनके अंदर. उनको गज़लें गाते हुए ध्यान से सुनना. एक गज़ल सेदूसरी गज़ल पर जाते हुए ऐसा लगेगा कि एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आ गए हो. बड़ीनाज़ुक उमर थी उस वक्त. साल 1966. मोहम्मद रज़ा पहलवी, ईरान के शाह के सामने गानेका मौका मिला. वो मौका लाइफ का टर्निंग प्वाइंट था. वहां खुश हुए ईरान के शाह,अजीज़ को गोल्ड मेडल मिला. उसके बाद 70 से लेकर 90 के दशक तक एशिया में इनका जलवारहा. कव्वाली में अगर कोई सामने टिकता था तो साबरी ब्रदर्स. इनकी कव्वालियों मेंइश्क, मजहब, सुफी दर्शन सब साथ चलता है. इनके नाम एक रिकॉर्ड है. इतिहास की सबसेलंबी कव्वाली गाने का. "हश्र के रोज़ पूछूंगा" सुनना. ये 115 मिनट की कव्वाली है. 6दिसंबर सन 2000, ईरान की राजधानी तेहरान में, 58 की उम्र में आखिरी सांस ली.