ग़ज़ल कहने का सलीक़ा सिखाते हैं वसीम
आज वसीम बरेलवी का जन्मदिन है. लल्लन के साथ सेलिब्रेट कीजिए.
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फोटो - thelallantop
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प्रोफेसर जाहिद हसन वसीम का हैप्पी बड्डे है आज. लिखने पढ़ने और गजलों के शौकीन हो तो इनको वसीम बरेलवी के नाम से जानते हो. आज ही की तारीख में सन 1940 में उर्दू शायरी के इस चिराग में रौशनी आई. बरेली में ही, जो इनका ननिहाल है. चलो इस बेहतरीन शायर का जन्मदिन सेलिब्रेट करते हैं उनकी गजलों के साथ.
रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में उर्दू में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. कॉलेज के टॉपर रहे. फिर बरेली कॉलेज में हुए उर्दू के प्रोफेसर. रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में वापसी हुई. पहले टॉपर छात्र थे. रिटायर हुए डीन की पोस्ट पर जाकर. ये उनका एकेडमिक और प्रोफेशनल करियर था. अब बात उनकी गजलों की.
कौन सी बात कहां, कैसे कही जाती है ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है
जैसा चाहा था तुझे, देख न पाए दुनिया दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है
एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने कैसे मां-बाप के होंठों से हंसी जाती है
कर्ज़ का बोझ उठाये हुए चलने का अज़ाब जैसे सर पर कोई दीवार गिरी जाती है
अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछ जो नदी है वो समंदर से मिली जाती है
पूछना है तो ग़ज़ल वालों से पूछो जाकर कैसे हर बात सलीक़े से कही जाती है
वसीम साहब का रोल अहम है, हिंदुस्तान की हिंदी उर्दू शायरी को दुनिया भर में फैलाने के लिए. खास तौर से अपने पड़ोसी पाकिस्तान में. संगीत और कला पर सरहदों का जोर चलता नहीं है. फनकार का कलेजा धड़कता रहता है कि वो कैसे अपने फन का जादू दुनिया के कोने कोने में बिखेर दे. लेकिन पाकिस्तान से जो हमारा रिश्ता है वो किसी से छिपा तो नहीं. जब उसकी बात होती है तो सिर्फ सरहद पर सीज फायर, बम, AK47, नवाज शरीफ से चल कर हिना रब्बानी खार तक. आर्ट को सरहदों में जकड़न महसूस होती है. वो निकलने को उकताया करता है.
सन 2007 में भारत पाकिस्तान के रिश्तों में मजबूती लाने की पहल की गई. एक मुशायरा ऑर्गनाइज किया गया. जिसका लाइव प्रोग्राम 52 देशों में चल रहा था. टीवी के जरिये. वसीम बरेलवी ने वहां लोगों से हाल चाल लिया. फिर बातचीत शुरू करते हुए कहा हमारे यहां बच्चे भी आपके अहमद फराज और कतील शिफाई के कायल हैं. लेकिन यहां कितने लोग निकलेंगे महादेवी वर्मा और निराला को पढ़ने वाले. आप अंग्रेज, फ्रेंच रशियन राइटर्स को पढ़ सकते हो. हिंदी कवियों को भी ट्राई करो. उस आयोजन के बाद वहां गोपालदास नीरज, अशोक चक्रधर और कुंवर बेचैन को इनवाइट किया गया.
वसीम का दुनिया से सीधा साबिका है. सीधे बात करते हैं. आम आदमी के लिए शेर और गजल लिखते हैं. वसीम बरेलवी को लल्लन की तरफ से हैप्पी बड्डे.

