'लेकिन 84 में कहां थे कॉमरेड कन्हैया?'
ऐसे ही बयानों से उन्हें बल मिलता है जो हर घटना पर सामने वाला का 84 में पता खोजते रहते हैं. इस सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म से भी आजादी चाहिए, कॉमरेड.
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फोटो - thelallantop
अवॉर्ड वापसी के दौर में फेसबुक पर एक दिलचस्प दलील दिखी थी. कई का लिखना था कि ये लोग जो अब इनटॉलरेंस से आहत हो रहे हैं, ये सन 84 में कहां थे, जब सिख विरोधी दंगा हुआ.
बाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ उत्साही ट्विटर खखोरुओं ने इस आधार पर एक जुमला ही गढ़ लिया. कि, '84 में कहां थे बे?'
'अब तो कह रहे हो, पर तब कहां थे?' तो ये एक नया मंत्र है जो 'जब जागो तभी सवेरा' का विलोम है और बड़ी से बड़ी पॉलिटिकल बहस को नाकुच कर सकता है; बेपटरी कर सकता है.
लेकिन JNUSU के चर्चित प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार के बयान से 84 की बहस फिर उठ खड़ी हुई है. उन्होंने कह दिया कि 1984 के सिख विरोधी दंगे और 2002 के गुजरात दंगे अलग-अलग थे. क्योंकि 2002 स्टेट-स्पॉन्सर्ड था और 1984 भीड़ के गुस्से का नतीजा था. इस बयान पर कन्हैया को अपने ही लोगों का साथ नहीं मिला. JNUSU में उनकी साथी शहला राशिद, पूर्व प्रेसिडेंट सुचेता डे, कविता कृष्णन समेत लेफ्ट और समाजवादी रुझान के कई नेताओं ने इस पर आपत्ति की. फिर कन्हैया की तरफ से सफाई आई, जिसमें कहा गया कि उन्हें गलत समझा गया है.
https://twitter.com/kavita_krishnan/status/714667861713809409
https://twitter.com/_YogendraYadav/status/714743341192228865
तो आप कह सकते हैं कि कन्हैया कुमार अपनी बात से पलट गए. वे पलटे हैं, उन्होंने माफी नहीं मांगी है, इसलिए सवाल अब भी हवा में तैर रहे हैं. क्या वह राजीव गांधी के 'बड़ा पेड़ गिरता है तो..' वाले बयान को भूल गए हैं? वह 1984 के दंगों को डिफेंड करने की भाषा क्यों बोल गए, जबकि यह हिम्मत तो अब कांग्रेस भी नहीं जुटा पाती. उनके वरिष्ठतम नेता दंगों पर माफी मांग चुके हैं. सज्जन कुमार से लेकर जगदीश टाइटलर जैसे आरोपियों को पार्टी किनारे कर चुकी है. फिर कन्हैया क्यों ऐसा कह गए?
देश के नौजवानों ने कन्हैया में जिस हीरो की संभावना देखी थी, वह ऐसी ही 'सेलेक्टिव' बयानबाजी से धूमिल होती है. इसी तरह लोग हार्दिक पटेल होकर रह जाते हैं. कन्हैया भाई, लोग पूछ रहे हैं कि ये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से हुई मुलाकात का असर है क्या?

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