The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Facing backlash, Kanhaiya Kumar forced to clarify on 1984 vs 2002 riots remark

'लेकिन 84 में कहां थे कॉमरेड कन्हैया?'

ऐसे ही बयानों से उन्हें बल मिलता है जो हर घटना पर सामने वाला का 84 में पता खोजते रहते हैं. इस सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म से भी आजादी चाहिए, कॉमरेड.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
कुलदीप
30 मार्च 2016 (अपडेटेड: 30 मार्च 2016, 09:41 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
अवॉर्ड वापसी के दौर में फेसबुक पर एक दिलचस्प दलील दिखी थी. कई का लिखना था कि ये लोग जो अब इनटॉलरेंस से आहत हो रहे हैं, ये सन 84 में कहां थे, जब सिख विरोधी दंगा हुआ. बाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ उत्साही ट्विटर खखोरुओं ने इस आधार पर एक जुमला ही गढ़ लिया. कि, '84 में कहां थे बे?' 'अब तो कह रहे हो, पर तब कहां थे?' तो ये एक नया मंत्र है जो 'जब जागो तभी सवेरा' का विलोम है और बड़ी से बड़ी पॉलिटिकल बहस को नाकुच कर सकता है; बेपटरी कर सकता है. लेकिन JNUSU के चर्चित प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार के बयान से 84 की बहस फिर उठ खड़ी हुई है. उन्होंने कह दिया कि 1984 के सिख विरोधी दंगे और 2002 के गुजरात दंगे अलग-अलग थे. क्योंकि 2002 स्टेट-स्पॉन्सर्ड था और 1984 भीड़ के गुस्से का नतीजा था. इस बयान पर कन्हैया को अपने ही लोगों का साथ नहीं मिला. JNUSU में उनकी साथी शहला राशिद, पूर्व प्रेसिडेंट सुचेता डे, कविता कृष्णन समेत लेफ्ट और समाजवादी रुझान के कई नेताओं ने इस पर आपत्ति की. फिर कन्हैया की तरफ से सफाई आई, जिसमें कहा गया कि उन्हें गलत समझा गया है. https://twitter.com/kavita_krishnan/status/714667861713809409
Embed
https://twitter.com/_YogendraYadav/status/714743341192228865 तो आप कह सकते हैं कि कन्हैया कुमार अपनी बात से पलट गए. वे पलटे हैं, उन्होंने माफी नहीं मांगी है, इसलिए सवाल अब भी हवा में तैर रहे हैं. क्या वह राजीव गांधी के 'बड़ा पेड़ गिरता है तो..' वाले बयान को भूल गए हैं? वह 1984 के दंगों को डिफेंड करने की भाषा क्यों बोल गए, जबकि यह हिम्मत तो अब कांग्रेस भी नहीं जुटा पाती. उनके वरिष्ठतम नेता दंगों पर माफी मांग चुके हैं. सज्जन कुमार से लेकर जगदीश टाइटलर जैसे आरोपियों को पार्टी किनारे कर चुकी है. फिर कन्हैया क्यों ऐसा कह गए?
Embed
देश के नौजवानों ने कन्हैया में जिस हीरो की संभावना देखी थी, वह ऐसी ही 'सेलेक्टिव' बयानबाजी से धूमिल होती है. इसी तरह लोग हार्दिक पटेल होकर रह जाते हैं. कन्हैया भाई, लोग पूछ रहे हैं कि ये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से हुई मुलाकात का असर है क्या?

अब थोड़ी दंगों की बात

दोनों दंगों के समय पुलिस की आंखें किसी अज्ञात आज्ञा से मुंदी हुई थीं. तमाम कमिशन की रिपोर्ट पढ़ ली जाएं. एक ऐड आता था. 'तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे'? आप व्याख्या के कितने तोप महारथी हों, इसे किसी भी तरह जायज नहीं ठहरा सकते. यह दलील कि 'तेरी हिंसा, मेरी हिंसा से बेहतर है', जितनी कमजोर है, उतनी घटिया है. दोनों दंगों में राज्य, प्रशासन और पुलिस, तीनों शामिल थे. गुंडों के चेहरे अलग थे, पर उनके क्रूर तरीके एक से थे. दोनों ही मामलों में लोगों को जलाया गया, उन पर धारदार हथियार से हमले किए गए. घरों से निकाल-निकाल कर मार डाला गया. महिलाओं से रेप किए गए. पुलिस की मिलीभगत के बिना देश की राजधानी में 2100 हत्याएं संभव थीं? नानावती कमिशन की रिपोर्ट पढ़िए. जो कहती है कि कांग्रेसी भी शामिल थे, पुलिस का रवैया भी निष्क्रिय था और पुलिस ने पीड़ितों को सुरक्षा भी मुहैया नहीं कराई.
Embed
चलो गुजरात दंगों में कुछ तो न्याय हुआ. किसी को तो सजा मिली. राज्य सरकार की पूर्व मंत्री मायाबेन कोडनानी और बाबू बजरंगी को सजा हुई. लेकिन 84 के दंगों में शामिल उन कांग्रेसियों का क्या हुआ जो दिल्ली के चौराहों पर हाथ लहरा-लहरा कर दंगाई भीड़ की अगुवाई कर रहे थे?
Embed
हां तो कॉमरेड कन्हैया, मैं बात कर रहा था '84 में कहां थे बे' की. तो जैसा आपने अर्ज किया है, उसी तरह के बयानों से ऐसे जुमलों को बल मिलता है. जो कहना न होगा कि बड़े से बड़ी बहस को नाकुच कर देते हैं. बेपटरी कर देते हैं. हमें इस सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म से भी आजादी चाहिए कॉमरेड. ख्याल रखिए.

Advertisement

Advertisement

()