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जानिए कैसे पहचान होती है सिंगल यूज प्लास्टिक की, जिसे खत्म करने के लिए अभियान शुरू हुआ है

प्लास्टिक की चीजों पर बने निशान आपको बहुत कुछ बताते हैं.

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2 अक्तूबर 2019 (अपडेटेड: 2 अक्तूबर 2019, 07:27 AM IST)
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प्लास्टिक रीसाइक्लिंग को लेकर बहुत ज्यादा भ्रम फैले हुए हैं, वह एक छोटी सी गलती के कारण.
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15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक लक्ष्य तय किया- 'सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त भारत'. लाल किले से उन्होंने कहा कि इसके लिए गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर से एक जनआंदोलन की शुरुआत भी होगी. उसकी शुरुआत हो भी गई है, लेकिन अब भी सबके मन में एक सवाल है. और सवाल ये है कि प्लास्टिक तक तो ठीक है, ये 'सिंगल यूज प्लास्टिक' क्या बला है.
वैसे तो सिंगल यूज प्लास्टिक को लेकर ऐसी कोई परिभाषा नहीं है, जो सर्वमान्य हो. मोटा-माटी प्लास्टिक की वो चीजें, जिन्हें फेंकने से पहले या रिसाइकल करने से पहले केवल एक बार ही यूज किया जाता है, उन्हें सिंगल यूज प्लास्टिक कहा जाता हैं.  पॉलीथीन, सोडे की बोतल, पानी की बोतल, स्ट्रॉ (पाइप), फूड पैकेजिंग अदि सिंगल यूज प्लास्टिक में ही आते हैं. इन्हें रिसाइकल तो किया जा सकता है लेकिन इसमें बहुत मेहनत लगती है और लागत भी ज्यादा आती है.
फोटो क्रेडिट- मीट ग्रीन
फोटो क्रेडिट- मीट ग्रीन

इसलिए दुनियाभर में केवल 10 से 15 प्रतिशत पॉलीथीन ही रिसाइकल हो पा रही है. बाकी बची प्लास्टिक समुद्र में, नालियों में, खेतों में, मैदानों में सालों साल पड़ी रहती है. चूंकि प्लास्टिक पेट्रोलियम पदार्थों से बनती है, इसलिए इसका गलना मुश्किल है. इसे गलने में सालों लग जाते हैं. यानी एक बार बनने के बाद प्लास्टिक पर्यावरण में ही मंडराती रहती है. इससे पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचता है.
फोटो क्रेडिट- ऑनलाइन फोकस डी
फोटो क्रेडिट- ऑनलाइन फोकस डी

फ़िलहाल ऐसी कोई चीज नहीं है जो प्लास्टिक की जगह ले सके. यानी ऐसी चीज़ जो प्लास्टिक जितनी सस्ती हो और आसानी से उपलब्ध भी हो. इसलिए प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण से बचने का एक ही उपाय है कि प्लास्टिक को ज्यादा प्रोड्यूस ही न किया जाए. इसके लिए दो तरीके हैं-
पहला है रीयूज का
रीयूज का मतलब होता है किसी प्रोडक्ट को एक से अधिक बार यूज करना. नई वस्तु खरीदने की जगह पुरानी चीजों को ही बार-बार यूज करना. इस तरह प्लास्टिक से बनी चीजों की मांग ही कम हो जाएगी तो प्लास्टिक प्रदूषण भी कम होगा ही.
दूसरा उपाय है रिसाइकलिंग का
रिसाइकलिंग से मतलब होता है किसी पुराने सामान के मटेरियल से कोई नया सामान बनाना, उदाहरण के तौर पर लोहे के पुराने बर्तनों को पिघलाकर, लोहे का दरवाजा बना लेना या लोहे की सीढ़ी बना लेना. रिसाइकलिंग के कल्चर से प्लास्टिक का उत्पादन कम हो सकता है.
फोटो क्रेडिट- Reuters
फोटो क्रेडिट- Reuters

इस तरह रिसाइकलिंग और रीयूज दोनों ही शब्द अलग-अलग प्रक्रियाओं को दर्शाते हैं. लेकिन यहां एक बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है. ऐसा नहीं है कि आप प्लास्टिक से बनी पानी की बोतल को बार-बार उपयोग कर लेंगे. अगर ऐसा किया भी तो बीमार होने के चांस बढ़ सकते हैं.  दरअसल पानी की बोतल बनाने में यूज होने प्लास्टिक की गुणवत्ता ऐसी होती है कि कुछ समय बाद उनमें से कुछ हानिकारण  केमिकल निकलने लगते हैं. इससे तमाम बीमारियां हो सकती हैं. यहां तक कि कैंसर भी हो सकता है.
अब आप सोच रहे होंगे कि कैसे पता चले कि आप जिस प्लास्टिक प्रोडक्ट को यूज कर रहे हैं वह नुकसानदायक है या नहीं ? वह किस चीज से बना है? कितने दिन तक यूज किया जा सकता है? इसका भी जवाब है.
हम सबने रेलवे स्टेशन पर रेल नीर की पानी की बोतल ख़रीदी होगी, इसके नीचे बेस पर एक त्रिभुज का निशान बना होता है. इस त्रिभुज में ही 1 से लेकर 7 के तक के नंबर लिखे होते हैं. इन्हें रिक्स नंबर भी कहते हैं. क्यों कहते हैं ये हम आगे बताएंगे. लेकिन फ़िलहाल इतना ही याद रख लीजिए कि प्लास्टिक के प्रोडक्ट्स पर दिखाई देने वाला त्रिभुज और उसके अंदर लिखे हुए नंबर को रिक्स नंबर कहते हैं. नीचे वाले फोटो में रिक्स नंबर वाले निशान को देख सकते हैं.
फोटो क्रेडिट- guide stop waste
फोटो क्रेडिट- guide stop waste

ऐसे चिन्ह केवल पानी की बोतल पर ही नहीं छपे होते, बल्कि प्लास्टिक से बनी हर चीज पर बने होते हैं. आमतौर पर ये निशान प्रोडक्ट के बेस के नीचे छपा हुआ होता है लेकिन ये कहीं पर भी छपा हो सकता है. इसका कोई तय नियम नहीं है कि कहां छपा हुआ मिलेगा. त्रिभुज के अंदर वाले नंबर से ही पता लगाया जाता है कि प्लास्टिक की वह वस्तु किस मेटेरियल से बनी है. उसकी डिटेल्ड जानकारी से ये पता लगाया जा सकता है कि वह कितनी बार यूज की जा सकती है. उसके क्या नुकसान हैं क्या फायदे हैं. इसे अच्छे से जानने-समझने के लिए आपको या तो गूगल करना पड़ेगा या हमारी स्टोरी भी पढ़ सकते हैं- प्लास्टिक की बोतल में पानी पीने से पहले उसके नीचे लिखा नंबर देख लीजिए

फोटो क्रेडिट -sites.google.com
फोटो क्रेडिट- sites.google.com

अब एक और निशान होता है. उसे कहते हैं रिसाइकलिंग सिंबल. ये भी त्रिभुज जैसा ही होता है, तीन तीरों से मिलकर बना होता है. तीनों तीर मिलकर एक साइकल पूरा करते हैं, जैसे पहला तीर, दूसरे तीर का पीछा कर रहा है. दूसरा तीर तीसरे तीर का, और तीसरा तीर दोबारा से पहले वाले तीर का पीछा कर रहा है. एक तरह से तीरों का ये साइकल, चीजों के दोहराव और उनके पुनर्चक्रण को दर्शाता है. यह निशान दुनियाभर में रीसाइकल की जा सकने वाली चीज़ों का यूनिवर्सल सिम्बल माना जाता है. इसे साल 1970 में  गैरी एंडरसन ने ईज़ाद किया था. अगर किसी सामान पर ये सिंबल मिल जाए तो इसका मतलब होता है कि उसे रिसाइकल किया जा सकता है.
फोटो क्रेडिट - Inhabitat
फोटो क्रेडिट - Inhabitat

एक जैसे दिखते हैं दोनों निशान

रिसाइकलेबल सिंबल और रिक्स नंबर वाला सिम्बल दोनों ही लगभग एक जैसे दिखते हैं. लेकिन दोनों के मायने अलग-अलग हैं.  अक्सर लोग दोनों में कन्फ्यूज हो जाते हैं. 'रिसायक्लेबल सिम्बल' में केवल तीरों वाला एक त्रिभुज ही होता है, ये किसी भी चीज पर हो सकता है. खाने की, पीने की, लोहे की, कागज की, कपड़े की, किसी भी वस्तु पर इसके होने का मतलब होता है कि फलानी चीज़ रिसाइकलेबल है. रिक्स नंबर वाले निशान में रिसायकल वाला सिंबल तो होता है लेकिन उसके अंदर एक नंबर भी होता है.
पहले फोटो में 'यूनिवर्सल रीसाइक्लेबल सिम्बल' है जबकि दूसरे फोटो में 'रिक्स सिम्बल' है.
पहली फोटो में 'यूनिवर्सल रिसाइकलेबल सिम्बल' है जबकि दूसरी फोटो में 'रिक्स सिम्बल' है.

रिक्स नंबर केवल प्लास्टिक की वस्तुओं पर होता है. इससे केवल प्लास्टिक के मेटेरियल का पता लगाया जा सकता है. इसका ये मतलब नहीं होता कि वो वस्तु रिसाइकलेबल है. तमाम कंज्यूमर्स प्लास्टिक की किसी वस्तु पर रिक्स नंबर के सिंबल को देखकर कन्फ्यूज हो जाते हैं और उस वस्तु को रीसाइक्लेबल मान लेते हैं. इसी कन्फ्यूजन पर आज हम डिस्कस करेंगे. और ये भी बताएंगे कि प्लास्टिक की बनी कौन सी वस्तु रीसाइक्लेबल है और कौन सी नहीं.
फोटो क्रेडिट- विकिपीडिया.
फोटो क्रेडिट- विकिपीडिया. 

ये कन्फ्यूजन कहां से आया? ये कंफ्यूजन एक छोटी सी गलती के कारण हुआ है. इसे जानने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि प्लास्टिक क्या होती है? दरअसल प्लास्टिक रेजिन्स से मिलकर बनती है. ये रेजिन्स ही प्लास्टिक मटेरियल तैयार करने का आधार होते हैं. ये रेजिन्स आपस में मिलकर चेन बनाते हैं जिसे पॉलिमर कहते हैं. ये पॉलिमर्स एक दूसरे से गुथे होते हैं. इन पॉलिमर्स से मिलकर प्लास्टिक बनती है. अगर अलग-अलग तरह की प्लास्टिक बनानी हो तो अलग-अलग तरह के रेजिन्स इस्तेमाल करने पड़ते हैं. रेजिन्स से बने पॉलिमर्स की संरचना और उनके गुथे होने के तरीके के आधार पर ही प्लास्टिक का कड़ापन तय होता है. इन पॉलिमर्स की आंतरिक संरचना को बदलकर ही प्लास्टिक को नरम और कठोर बनाया जाता है.
फोटो क्रेडिट- स्लाइड शेयर.
फोटो क्रेडिट- स्लाइड शेयर.

जैसे सामान पैक करने वाली पॉलिथिन एकदम नरम होती है. जबकि कीबोर्ड बनाने वाली प्लास्टिक एकदम कठोर होती है. अपनी जरूरत के हिसाब से प्लास्टिक कई तरह की बनाई जा सकती है. इस तरह प्लास्टिक की बढ़ती उपयोगिता के चलते प्लास्टिक की बाढ़ सी आ गई. 80 के दशक में जब प्लास्टिक की मात्रा बढ़ रही थी, तो प्लास्टिक से फैलने वाले प्रदूषण पर चर्चाएं होने लगीं. लोगों से अपील की जाने लगी कि प्लास्टिक को दोबारा यूज करें. पुरानी प्लास्टिक को रिसाइकल करके ही नए प्रोडक्ट्स बनाने का प्रयास करें. इस काम के लिए प्लास्टिक को जगह-जगह से इकट्ठा किया जाना था, लेकिन प्लास्टिक तो कई प्रकार की होती है, इसलिए रीसायकल करने वाली फर्मों के सामने ये चुनौती थी कि कैसे अलग-अलग प्रकार की प्लास्टिक की पहचान हो. कैसे उसे अलग-अलग इकठ्ठा किया जाए.
फोटो क्रेडिट- वेटिकन न्यूज.
फोटो क्रेडिट- वेटिकन न्यूज.

ये इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि दो अलग-अलग तरह की प्लास्टिक को एक साथ रिसाइकल करने से जो नया प्रोडक्ट बनता था, वह एकदम खराब गुणवत्ता का होता था. अगर गुणवत्ता ही सही नहीं होगी तो कोई क्यों ही कोई पुरानी वस्तु से बने रिसाइकल्ड प्रोडक्ट को खरीदेगा. इसलिए ये ज़रूरी हुआ कि प्लास्टिक को अलग-अलग इकठ्ठा कर, अलग-अलग रिसाइकल किया जाए. इस समस्या का समाधान करने के लिए अमेरिका की एक संस्था 'द सोसाइटी ऑफ़ द प्लास्टिक इंडस्ट्री' ने साल 1988 में 7 कोड तैयार किए. सातों कोड, सात प्रकार की प्लास्टिक रिप्रजेंट करते थे. ये कोड 1 से लेकर 7 की संख्या में थे. हर नंबर अलग अलग तरह के रेजिन्स से बने प्लास्टिक के लिए दिया गया. इसलिए इन नंबर्स को 'रेज़ीन आइडेंटीफिकेशन कोड्स (RICs)' भी कहा जाता है.
फोटो क्रेडिट-the science of eating./Natural Society
फोटो क्रेडिट-the science of eating./Natural Society

इनमें 1 से लेकर 6 नंबर तक के रिक्स कोड 6 तरह की प्लास्टिक को दर्शाते हैं. जबकि 7 वां कोड बाकी प्रकार की बची हुई सभी प्रकार की प्लास्टिक्स के लिए है. जिन इन छह नंबर तक की प्लास्टिक्स में नहीं आतीं. यानी आगे जाकर कोई नई तरह की प्लास्टिक बनती भी है, तो वह 7 नंबर प्रकार की प्लास्टिक में ही आएगी. एक तरह से रिक्स नंबर 7,  'अदर्स' की तरह काम करता है. इन नंबर्स को यानी 1 से लेकर 7 की संख्या को तीन तीरों वाले एक त्रिभुज के बीच में रखा गया. ये निशान लगभग सभी प्रकार की प्लास्टिक से बने प्रोडक्ट्स के ऊपर मिल जाएगा. इसी निशान से अंदाजा लगाया जाता है कि वह वस्तु किस प्रकार की प्लास्टिक से बनी हुई है. किस प्रकार की रेजिन से बनी है. उसमें यूज किया गया रेजिन कितना खतरनाक है, क्या-क्या सावधानियां रखनी है.
फोटो क्रेडिट- Capeandislands.org
फोटो क्रेडिट- Capeandislands.org

इस तरह रिक्स कोड, मोस्टली रिसाइक्लिंग से जुड़े हुए लोगों को प्लास्टिक की पहचान करने के लिए बनाए गए थे. न कि ये पहचानने के लिए कि फलानी वस्तु रिसाइकल करने योग्य है या नहीं. लेकिन धीरे-धीरे लोगों का ध्यान इस निशान पर जाने लगा. रिक्स नंबर्स के ऊपर बने रिसाइकल सिम्बल के कारण लोगों में कन्फ्यूजन पैदा हुआ, कि अगर प्लास्टिक की किसी वस्तु पर रिक्स का चिन्ह बना हुआ है, तो वह रिसाइकल करने योग्य है और अगर किसी वस्तु पर वह निशान नहीं है तो वह वस्तु रिसायकल करने योग्य नहीं है.
रिक्स नंबर बनाने वालों को नहीं पता था कि त्रिभुज का ये निशान इतना बड़ा कंफ्यूजन पैदा कर देगा. इसलिए इस कन्फ्यूजन को दूर करने के लिए रिक्स के निशान पर दोबारा से पुर्नार्विचार करने की मांग उठने लगी. रिक्स सिम्बल बनाने वाली संस्था ने साल 2013 में अपने सिम्बल्स को रिवाइज किया. और अलग-अलग तीर से बने त्रिभुज को एक बंद त्रिभुज में बदल दिया. लेकिन हमारे देश में आज भी पुराने सिम्बल्स को ही यूज किया जा रहा है.नीचे वाले फोटो में आप नए निशानों को देख सकते हैं.
2013 में बदले गए नए रिक्स कोड.
2013 में बदले गए नए रिक्स कोड.

लेकिन दुनियाभर में जैसे-जैसे प्लास्टिक रिसाइकलिंग करने की एडवोकेसी करने वाला मूवमेंट आगे बढ़ने लगा, उस मूवमेंट को पब्लिक मूवमेंट बनाने के लिए ये जरूरत महसूस होने लगी कि कस्टमर्स को ये पता हो कि कौन सी वस्तु रिसाइकल करने योग्य है, कौन सी नहीं है. शुरू में ऐसा होता था कि अमेरिका के अलग-अलग शहरों में कुछ ही प्रकार की प्लास्टिक को रिसाइकल किया जा सकता था, कुछ को नहीं. किसी शहर में किसी प्लास्टिक को रिसाइकल करने की टेक्नोलॉजी होती थी, किसी शहर में नहीं. इसलिए इन शहरों की नगरपालिकाओं ने जो मानक बनाए थे. वह इन्हीं को ध्यान में रखकर बनाए थे. इस कारण अलग-अलग शहरों में अलग-अलग प्रकार के मानक हो गए. कोई प्लास्टिक अगर किसी शहर में रिसाइकल हो सकती थी तो ज़रूरी नहीं है कि दूसरे शहर में भी उसे रिसाइकल करने की अनुमति हो.
फोटो क्रेडिट - wfdd.org
फोटो क्रेडिट - wfdd.org

समय के साथ अलग-अलग तरह की प्लास्टिक का प्रोडक्शन शुरू होने लगा. उसी के साथ प्लास्टिक को रिसाइकल करने वाली टेक्नोलॉजी भी डेवलप होने लगीं. अलग-अलग शहरों में रिसाइकल के लिए अलग-अलग स्टैंडर्ड्स के बीच, अमेरिकी संस्था ASTM International ने चार नए निशान डेवलप किए हैं.  (ASTM International - formerly known as American Society for Testing and Materials जिसके अंतर्गत वह संस्था आती है जिसने रिक्स नंबर्स को डेवलप किया था). ये नए सिम्बल्स कंज्यूमर ओरिएंटेड हैं. इससे कंज्यूमर्स जान सकते हैं कि प्लास्टिक से बनी कौन सी वस्तु रिसाइकल करने योग्य है, कौन सी नहीं.
नए रीसाइकलिंग स्टैंडर्ड्स (फोटो क्रेडिट-How2recycle).
नए रिसाइकलिंग स्टैंडर्ड्स (फोटो क्रेडिट-How2recycle).

1.वाइडली रिसाइकलेबल ( बड़े स्तर पर रिसाइकल होने वाली वस्तु ) - जिन प्लास्टिक्स को 60 प्रतिशत से ज्यादा अमेरिकन्स रिसाइकल कर सकते हों. 2.समटाइम्स रिसाइकलेबल (कभी-कभी रिसाइकल होने वाली चीजें )- जिन प्लास्टिक्स को 60 प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत अमेरिकन्स ही रिसाइकल कर सकते हों. 3. नॉट येट रिसाइकलेबल ( जिन्हें अभी तक रिसाइकल न किया जा सका हो) - ऐसे प्रोडक्ट्स जिन्हें 20 प्रतिशत से भी कम अमेरिकंस रिसाइकल कर पा रहे हों. ऐसे प्रोडक्ट्स को रिसाइकल करते समय केमिकल्स का खतरा बना रहता है. इन्हें सही तरह से रिसाइकल करने की टेक्नोलॉजी अभी डेवलप नहीं हो सकी है. 4. स्टोर ड्राप-ऑफ- अगर कोई ऐसे स्टोर्स के पास रह रहा हो जहां प्लास्टिक बैग्स और पॉलिथिन को रिसाइकल किया जा सकता हो. वह वहां जाकर रिसाइकल किए जा सकते हैं.
स्टोर ड्राप ऑफ का एक चित्र (फोटो क्रेडिट-how2recycle.info)
स्टोर ड्राप ऑफ का एक चित्र (फोटो क्रेडिट-how2recycle.info)

इसके अलावा प्लास्टिक की रिसाइकलिंग से जुड़े और भी कई तथ्य हैं. जैसे सभी प्लास्टिक रीसाइक्लेबल नहीं होते:-
पॉलीथीन - आसानी से नहीं हो सकती.
फोटो क्रेडिट - My Happy Greens.
फोटो क्रेडिट - My Happy Greens.

स्ट्रॉ (पाइप)- रिसाइकल करना आसान नहीं है.
फोटो क्रेडिट- USA Today
फोटो क्रेडिट- USA Today

कॉफ़ी कप्स - नहीं हो सकते क्योंकि इसमें कागज भी लगा होता है. इसके अलावा प्लास्टिक की बहुत ही पतली सी परत इसके अंदर लगी हुई होती है. इसे हटाकर रिसाइकल करना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है.
फोटो क्रेडिट- all table ware
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इसके अलावा गंदे प्लास्टिक को भी रिसाइकल नहीं किया जा सकता. प्लास्टिक को रिसाइकल करने से पहले उससे हासिल होने वाली वैल्यू को भी देखा जाता है. अगर कोई प्लास्टिक इतनी गंदी है कि उसे साफ करने में वक्त और पैसे दोनों ही लगेंगे, तो उसे छोड़ दिया जाता है. जैसे अगर खाना खाने के बाद प्लास्टिक की प्लेट पर सॉस लगी रह जाती है, या चिकनापन रह जाता है तो उसे रिसाइकल नहीं किया जा सकता.
फोटो क्रेडिट- mumcentral.
फोटो क्रेडिट- mumcentral.

बार-बार रिसाइकल करने से प्रोडक्ट की क्वॉलिटी गिर जाती है प्लास्टिक मूलतः पॉलिमर ही है जो एटम्स की लम्बी चेन से मिलकर बनते हैं. जब इन्हें बार-बार रिसाइकल किया जाता है तो ये चेन छोटी हो जाती है. इसका असर प्लास्टिक से बने रिसाइकल्ड प्रोडक्ट की क्वॉलिटी पर पड़ता है. इसलिए प्लास्टिक से बने प्रोडक्ट्स को अधिकतम दो से तीन बार ही रिसाइकल किया जा सकता है.
फोटो क्रेडिट- national geographic.
फोटो क्रेडिट- national geographic.

जबकि कांच या किसी और मेटल से बने दूसरे प्रोडक्ट्स को कई बार रिसाइकल किया जा सकता है.

ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे श्याम ने की है.




वीडियो देखें: प्लास्टिक की बोतल में पानी पीने से पहले उसके नीचे लिखा नंबर देख लीजिए

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