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बिहार में राज्यसभा सीटों के बहाने विधानसभा चुनाव का चक्रव्यूह तोड़ने की कवायद

पांच लोगों को राज्यसभा भेजकर चुनावी गोटियां फिट कर दी गई हैं?

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2 जून 2020 (अपडेटेड: 2 जून 2020, 01:44 PM IST)
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केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद प्रमुख तेजस्वी यादव (फोटो: पीटीआई)
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चुनाव आयोग ने 19 जून को राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव कराने की घोषणा की है. पहले ये चुनाव 26 मार्च को होना था, लेकिन कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए इसे टाल दिया गया था. राज्यसभा की जिन सीटों के लिए चुनाव होना था, उनमें बिहार की पांच सीटें भी शामिल थीं. लेकिन इन पांच सीटों के लिए पांच प्रत्याशी ही मैदान में उतरे, इसलिए चुनाव की नौबत नहीं आई और 18 मार्च को नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ये सभी निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए.
1. विवेक ठाकुर (भाजपा) 2. हरिवंश (जनता दल यूनाइटेड) 3. रामनाथ ठाकुर (जनता दल यूनाइटेड) 4. प्रेम गुप्ता (राष्ट्रीय जनता दल) 5. अमरेन्द्र धारी सिंह (राष्ट्रीय जनता दल)
देखने में तो यह एक सामान्य प्रक्रिया लगती है, लेकिन यदि इन नामों पर गौर किया जाए, तो यह आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीतिक बिसात का एक पहलू नजर आता है. सब जानते हैं कि बिहार के चुनावों में जाति की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है. यहां जाति के आधार पर ही चुनावी गोटियां फिट किए जाने की परंपरा रही है. हालांकि मंडल कमीशन (1990) के बाद के दौर में वर्ग आधारित चेतना भी देखी जाती रही है. अगड़े-पिछड़े की राजनीति, पिछड़ा-अति पिछड़ा की राजनीति, दलित-महादलित की राजनीति आदि बिहार की चुनावी बाजी तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है. इन सभी वर्गों में जातीय गोलबंदी, यहां तक की उपजाति के स्तर पर खेमेबंदी भी देखी गई है.
आइये अब इन राज्यसभा उम्मीदवारों के सहारे बिहार की चुनावी तिकड़म को समझने की कोशिश करते हैं.
सबसे पहले बात बीजेपी के विवेक ठाकुर की
विवेक को उनके पिता सीपी ठाकुर की राज्यसभा सीट दी गई है. 90 साल की उम्र पार कर चुके सीपी ठाकुर राज्यसभा से रिटायर हो रहे थे. सीपी ठाकुर कांग्रेस से भाजपा में आए हैं. तीन बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. वे वाजपेयी सरकार में स्वास्थ्य एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री भी रह चुके हैं. बिहार के रसूखदार भूमिहार नेता माने जाते हैं. लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक भूमिहार नेता (गिरिराज सिंह) को टिकट मिलने से भूमिहार समाज और भाजपा के बीच अविश्वास का माहौल बन रहा था, जबकि सीपीआई के जनाधार सिमटने के बाद से ही भूमिहार समाज बिहार में भाजपा से जुड़ गया था.
बिहार में भाजपा यदि किसी बिरादरी के शत-प्रतिशत अपने साथ होने का दावा कर सकती थी, तो वह भूमिहार और कायस्थ बिरादरी ही थी. इसलिए अब ऐसी परिस्थिति में सीपी ठाकुर की सीट किसी और बिरादरी के नेता को दिए जाने की तो भाजपा सोच भी नहीं सकती थी. जबकि इस सीट के लिए कई दावेदार सामने आ रहे थे. लिहाजा भाजपा ने यह सीट सीपी ठाकुर के बेटे को देकर न सिर्फ सीपी ठाकुर को संतुष्ट करने की कोशिश की है, बल्कि भूमिहार समाज को भी यह संदेश दिया गया है कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन की मजबूरियों के कारण भले ही सीटें कम करनी पड़ी हों, लेकिन पार्टी आज भी भूमिहार मतदाताओं के साथ वैसे ही खड़ी है, जैसे पहले खड़ी थी.
अब बात करते हैं JDU उम्मीदवार हरिवंश की
पेशे से पत्रकार रहे हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति पद पर आसीन हैं. इसलिए उनका दोबारा राज्यसभा जाना तय ही था. यदि उन्हें फिर से नॉमिनेट नहीं किया जाता, तो राज्यसभा के उपसभापति का पद खाली हो जाता और इसके लिए चुनाव करवाने की नौबत आ जाती. हरिवंश पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबी रहे हैं. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी उनके मधुर संबंध हैं. इस लिहाज से वे भाजपा और जदयू के संबंधों को बनाए रखने में एक कड़ी की भूमिका निभा सकते हैं.
लेकिन केवल इतने भर के लिए ही उनको अहमियत नहीं दी जाती. उन्हें फिर से राज्यसभा भेजने के पीछे एक जातीय गणित भी है. वे जाति से राजपूत हैं. यदि बिहार की राजनीति का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि बिहार में यादव, राजपूत और भूमिहार दबंग जाति के तौर पर माने जाते रहे हैं. यहां किसी भी पार्टी या गठबंधन की चुनावी सफलता बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वह इन तीन दबंग बिरादरियों में से किन्हीं दो को अपने साथ रख पाने में कितना कामयाब हो पाती है.
रामनाथ ठाकुर की अहमियत
पूर्व मुख्यमंत्री और पिछड़ी जातियों के बीच अति पिछड़ी जातियों की पहचान करने और उन्हें आरक्षण (Quota within quota) देने वाले कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर को भी जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर दोबारा राज्यसभा भेजा गया है. बिहार में जनता दल यूनाइटेड को अति पिछड़े वर्ग की राजनीति का चैंपियन माना जाता है. बिहार की कुल जनसंख्या (सभी धर्मों को मिलाकर) में 60 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग है. इनमें आधे से भी ज्यादा (लगभग 32 प्रतिशत) आबादी अतिपिछड़ों की है. बिहार में अतिपिछड़ी जातियों में लोहार, बढ़ई, नाई, मल्लाह, बिन्द, तुरहा धानुक, अंसारी इत्यादि जातियां (तकरीबन 100 जातियां और उपजातियां) आती हैं, जो एक बिरादरी के तौर पर तो कोई ज्यादा अहमियत नहीं रखतीं, लेकिन एक वर्ग के रूप में यह बिहार का सबसे बड़ा वोट बैंक है.
इसी अति पिछड़ा वोट बैंक को कर्पूरी ठाकुर ने संगठित किया था. जब वे मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने मुंगेरी लाल कमीशन की सिफारिश के आधार पर बिहार सरकार की नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया था. इस 20 प्रतिशत में 12 प्रतिशत अति पिछड़ी जातियों के लिए तथा आठ प्रतिशत दबंग पिछड़ी जातियों (यादव, कुर्मी, कुशवाहा और वैश्य) के लिए कोटा तय कर दिया था. इसे ही Quota Within Quota कहा जाता है. तब से कर्पूरी ठाकुर का नाम अति पिछड़ी जातियों के मसीहा के तौर पर लिया जाता रहा है. जनता दल यूनाइटेड ने इसी अति पिछड़ी जातियों के वोट बैंक की अहमियत को मद्देनजर रखते हुए कर्पूरी ठाकुर के बेटे को राज्यसभा में दोबारा भेजा है.
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पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे और राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर (फोटो: ट्विटर)

प्रेम गुप्ता
हरियाणा के भिवानी के रहनेवाले प्रेम गुप्ता राजद की 'रसद-पानी' के आपूर्तिकर्ताओं में गिने जाते हैं. इन्हें देवीलाल के सान्निध्य में लालू यादव के करीब आने का अवसर मिला. एक जमाने में लालू यादव के 'अमर सिंह' (जैसे मुलायम सिंह के लिए अमर सिंह थे) कहे जाते थे. मनमोहन सिंह की सरकार में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री रहे हैं. प्रेम गुप्ता विधानसभा चुनाव में राजद के लिए वोट बटोरने के काम तो नहीं आ सकते, लेकिन चुनावी खर्च के लिए पैसे का इंतजाम करने की अपनी भूमिका बखूबी निभा सकते हैं.
अमरेन्द्र धारी सिंह
इन सभी उम्मीदवारों में सबसे चौंकाने वाला नाम अमरेन्द्र धारी सिंह का रहा. लालू यादव की पार्टी ने किसी भूमिहार को राज्यसभा भेजकर भूमिहार समाज की राजद से दूरी को पाटने की कोशिश की है. अमरेन्द्र धारी सिंह पटना जिले के रहने वाले हैं. बड़े उद्योगपति हैं. दिल्ली-मुम्बई और देश के कई हिस्सों में इनका कारोबार फैला हुआ है. भूमिहार समाज के गरीब परिवारों के बच्चों को आईआईटी, मेडिकल, कैट इत्यादि की परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद करते हैं. इन बच्चों के दिल्ली और कोटा में रहने और कोचिंग करने का खर्चा उठाते हैं.
अपने इन्हीं प्रयासों से भूमिहार समाज के बीच काफी लोकप्रिय हैं. लालू यादव ने इनकी इसी लोकप्रियता को अपनी पार्टी के पक्ष में भुनाने के लिए यह मास्टर स्ट्रोक (राज्यसभा की सीट) खेला है. यादवों और भूमिहारों के बीच हिंसक माहौल का गवाह रहे बिहार मेंं इन दो जातियों की एकता किस स्तर तक कायम होती है, ये भी आगामी विधानसभा चुनावों में देखा जाना है.
बाकी यह बिहार है और पाटलिपुत्र की सत्ता की लड़ाई है. पाटलिपुत्र के सत्ता संघर्ष में गौतम बुद्ध और हर्यक वंश के जमाने से ही शह-मात और घात-प्रतिघात का दौर देखा जाता रहा है.

यह स्टोरी हमारे साथी अभिषेक ने की है.




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