~प्रेमचंद हिंदी के सबसे ज्यादा ओवररेटेड राइटर हैं.~मैं तो बचपन से कोठों पर जाता रहा हूं.~दिल्ली में जीबी रोड के कोठे पर गया था तो पुलिस ने दौड़ा लिया.~चेतन भगत ने अंग्रेजी से ज्यादा हिंदी का नुकसान किया है.~रवीश कुमार हिंदी के सबसे बड़े पोस्टर बॉय हैं.~हिंदी में आज भी ज्यादातर किताबें महंतों की रेकमंडेशन पर छपती हैं.~नामवर सिंह सारे महंतों में एक अपवाद हैं.--------------------------------------------------------------------------------प्रभात रंजन राइटर हैं. 'कोठागोई' लिखी है. पढ़ाते हैं. डीयू के जाकिर हुसैन कॉलेजमें. चलाते भी हैं. एक ब्लॉग. लिटरेचर का. जानकी पुल के नाम से. बतियाते भी हैं.खूब खुले भाव से. इस बुध को वह हमारे घर आए. 'दी लल्लनटॉप' अड्डे पर. सौरभ द्विवेदीसे बतकही हुई. वही यहां पेश है. ज्यों की त्यों.सौरभ: क्या आप कभी कोठे पर नाच देखने गए हैं? प्रभात: बचपन में तो वहीं जाते थे.हमारे यहां फिल्में देखना बुरा माना जाता था. चाचा के घर या किसी बड़े जमींदार केघर जमने वाली बाइयों की महफिलों में जाना बुरा नहीं माना जाता था. वहां जाते थे.तमीज से पालथी मारकर बैठते थे. और गजलें सुनते थे. घर में उसकी रेकॉर्डिंग भी कीजाती थी. बाद में चतुर्भुज स्थान (मुजफ्फरपुर में बाइयों का इलाका) भी इसीक्युरॉसिटी के चलते गया.सौरभ: और दिल्ली. यहां के कोठे? प्रभात: दिल्ली में जाएंगे तो पुलिस पकड़ लेगी. एकबार भागकर जान बचाई थी. आज भी जीबी रोड में दो कोठे हैं. जहां म्यूजिकल परफॉर्मेंसहोती है. हम एक बार अपने दोस्त राकेश रंजन कुमार के साथ गए थे. ये कुमार वही हैंजिन्होंने गांधी टु हिटलर फिल्म बनाई थी. तो हम गए. रिसर्च करने. रंजन शौकीन भी थे.मगर जब वहां थे, तभी पुलिस का छापा पड़ गया. मैं मंडल कमीशन के दौरान पुलिस की लाठीखा चुका था. जानता था कि क्या होगा. तो तेजी से भाग गया. रंजन रुका रहा. उसने सोचाडीयू-हिंदू कॉलेज बोलूंगा और बच जाऊंगा. मगर पीटा गया. पीछे की पॉकिट में मोबाइलथा. वो भी लाठी खाकर टूट गया.सौरभ: कोठागोई लिख दी. लोग कुछ कुछ कहते होंगे, या अटकलें लगाते होंगे... प्रभात:मुझे क्या कहेंगे. मैं तो किताब लिखने गया. हिंदी का सबसे बड़ा कोठेबाज लेखक तोभारतेंदु हरिश्चंद्र था. वसुधा डालमिया ने लिखा है. अपनी किताब में. कि भारतेंदु नेकोई रात अपने घर नहीं गुजारी. वसुधा की किताब भारतेंदु पर सबसे अच्छी रिसर्च है.अभी तक अंग्रेजी में थी. हाल ही में राजकमल प्रकाशन ने हिंदी में छापी है. और उससेभी पहले. गालिब. चावड़ी बाजार तो बना ही इसी ढंग से था. आज भी आप जाएंगे वहां. तोघरों के झरोखे उसी अंदाज के नजर आएंगे. जो पुरानी बनावट के हैं.सौरभ: क्या अब ये माना जाए कि हिंदी लिटरेचर सिर्फ नारे या सनसनी के तौर पर नहीं,असल में बोल्ड और ब्यूटिफुल हो रहा है. प्रभात: नैतिकता हिंदी बेल्ट में है. जो किऊपरी आवरण है. नैतिकता वही होती भी है. और राइटर के चरित्र के अनुसार उसके साहित्यका मूल्यांकन कैसे किया जाए. प्रेमचंद बड़े शराबी थे. उनकी पत्नी ने लिखा किसामुद्रिक विज्ञान (ज्योतिष) में बहुत दिलचस्पी रखते हैं. तो क्या प्रेमचंद का सारायथार्थवादी लेखन झूठ मान लिया जाए.प्रभात की किताब 'कोठागोई' का कवर पेजसौरभ: हिंदी का मोस्ट ओवर रेटेड राइटर कौन लगता है आपको? प्रभात: प्रेमचंद. ये बातमैं हल्के में नहीं कह रहा हूं. आइडिया के लेवल पर गोदान महान उपन्यास है. कर्ज मेंडूबा किसान. आज भी चारों तरफ दिख रहा है. मगर अवध के जिस गांव की कहानी प्रेमचंदकहते हैं, वह नॉवेल में दिखता ही नहीं. भाषा भी नहीं दिखती. बोलियां नहीं दिखतीं.प्रेमचंद खड़ी बोली हिंदी के लेखक हैं. मगर ये भाषा किसी की अपनी नहीं.हिंदी को प्रेमचंद के मोड से निकलने की जरूरत है. आप (यानी कि आलोचक लोग) रेणु कोआंचलिक कहकर साइडलाइन करते हैं. इसे डेरोगैटरी ढंग से इस्तेमाल करते हैं. पाठकों नेभी उसे वास्तविक मान लिया. माहौल ऐसा हो गया कि जो आंचलिक लिखे वो नेशनल राइटर नहींहै. और ये क्यों हुआ. क्योंकि हिंदी की सारी पॉलिटिक्स बनारस के इर्द गिर्द है.मौजूदा दौर के सबसे ज्यादा ओवररेटेड राइटर की बात करूं तो जवाब होगा, अखिलेश. तद्भववाले. उनमें कोई मौलिकता नहीं. अखिलेश ने उदय प्रकाश का मॉडल उठाया. थोड़ी सीकहानियां लिखीं. 'निर्वासन' उपन्यास लिखा जो हाईली ओवररेटेड है.सौरभ: और अंडर रेटेड. जिसे हिंदी साहित्य समाज समय रहते समझ नहीं पाया. प्रभात:मृदुला गर्ग. वह हिंदी की पहली मॉर्डन राइटर हैं. उनके नॉवेल चितकोबरा ने हिंदी कीसेंसिबिलिटी को नई शकल दी. आज इतने दशक बीतने के बाद भी हिंदी की समझ उससे आगे नहींनिकल पाई. आज भी डिस्कोर्स के नाम पर देहमुक्ति की बात ही होती है. और जो इस खोल सेबाहर निकल गई हैं, अभी उनकी किताबें ही नहीं आईं. जैसे मनीषा पांडे. एक और अंडररेटेड राइटर वंदना राग हैं. उनके लिखे में भी बनावट नहीं दिखती है. लोगों को मेराये कहना स्त्री विरोधी लगता है. मगर यही सच है. कि देह से आगे भी बढ़ने की जरूरतहै. मगर कितनों ने ऐसी कोशिश की है.सौरभ: हिंदी मैंने भी पढ़ी. जेएनयू से एमए और एमफिल किया. मगर कभी कॉलेजयूनिवर्सिटी में इंटरव्यू नहीं दिया. दोस्तों ने दिया. जो बताया वो डराने वाला होताहै. अपन को कभी आलोचना या रचना के लिए पत्रिकाओं या संपादकों के चक्कर नहीं लगानेपड़े. सीधे नौकरी करने लगे. मगर पढ़कर, देखकर और बातकर ये समझ में आया. कि हिंदीमें महंतों का बड़ा महत्व और स्थान है. उनके बारे में आप क्या कहेंगे.महंत 1: नामवर सिंहप्रभात: वह सारे महंतों में एक अपवाद हैं. मैं जब 1988 में दिल्ली पढ़ने आया था.हिंदू कॉलेज से बीए कर रहा था. पहली छुट्टी में गांव गया. वहां रिश्ते के चाचामिलने आए. मैं बताता रहा. वहां पढ़ता हूं. दिल्ली में. हिंदू में. हिंदी. वह सुनतेरहे. फिर पूछा, नामवर सिंह वहीं पढ़ाते हैं क्या. मैंने कहा, नहीं वह जेएनयू मेंहैं. जवाब सुन चाचा दुखी हुए. बोले उनसे जरूर पढ़ना. अब आप गौर करें. चाचा मेरेहिंदी के नहीं थे. साहित्य के नहीं थे. मगर नामवर सिंह को जानते थे.कैसा कमाल है ये. नामवर हिंदी के कहानीकार या उपन्यासकार नहीं हैं. कवि नहीं हैं.मगर ऐसी व्याप्ति हिंदी में किसी और की नहीं है. क्यों है, कैसे है. मैं समझ नहींपाया. एक बात और है. जो अखरती है. नामवर सिंह ने मंडल बनाया. बहुत लोगों को खारिजकिया. कुछ बरस पहले यहीं दिल्ली की बात है. राजकमल प्रकाशन का प्रोग्राम था. अजीतवडनेरकर को शब्दों का सफर के पहले खंड के लिए अवॉर्ड मिला था. वहां नामवर ने रेणुको भ्रष्ट भाषा का लेखक कहा.सौरभ: मगर नामवर सिंह तो कहते हैं कि रेणु के मैला आंचल का महत्व इसकी रिलीज के समयन समझ पाना उनके आलोचकीय जीवन की सबसे बड़ी भूल है. प्रभात: नामवर सिंह का रिग्रेटकरना पॉलिटिक्स है. ये कह दिया और काम पूरा हो गया. सवाल ये है कि आंचलिकता को लेकरहिंदी में क्या माहौल बनाया गया. एक समझ बना दी गई. कि हिंदी को अंग्रेजी जैसा होनाचाहिए. आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं. परीक्षा गुरु. अंग्रेजी ढंग का पहलाउपन्यास. आप बताइए. ये खड़ी बोली किसकी भाषा है. दरअसल हिंदी को अंग्रेजी से खतरानहीं था. बोलियों से था. आज देखिए. भोजपुरी से खतरा है. ये इंटरनैशनल लैंग्वेज है.फिजी मॉरीशस से लेकर कहां कहां नहीं बोली जाती. मगर हिंदी इसे अब तक बोली कहकरदबाती रही. अंग्रेजी के नाम पर ताली पीटते हैं. वह खुद ही मानक नहीं रही. इसके मानकराइटर चेतन भगत और रविंदर सिंह हैं. मैं खुद भी रविंदर का अनुवाद करता हूं.सौरभ: लिटरेचर पर बात हो और चेतन भगत पर सवाल न पूछा जाए.आपने खुद ही उनका जिक्र करदिया. प्रभात: हिंदी पट्टी में जहां लेखक नहीं पहुंच पा रहे थे. रीडरशिप तैयार करनेके लिए. उस रीडरशिप को चेतन भगत ने कैटर किया. उसने कहा कि मैं आम लोगों कीअंग्रेजी लिखता हूं. ये काम हिंदी वाले अभी तक नहीं कर पाए. लप्रेक भी नहीं कर पारहा है. चेतन भगत ने क्या किया. उन तमाम लोगों को जो हिंदी के रीडर हो सकते थे,अंग्रेजी की तरफ खींचा. ये वो रीडर है, जो कभी अमिताभ घोष और रुश्दी को नहींपढ़ेगा.महंत 2 : अशोक वाजपेयीप्रभात: ये जो हिंदी में अंग्रेजियत वाली बात मैं कह रहा था, अशोक वाजपेयी जी इसकेसबसे बड़े उदाहरण हैं. उन्होंने वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीयविश्वविद्यालय बनाया. और कहा कि मैं इसे ब्रिटिश काउंसिल की तरह बनाना चाहता हूं.पर सच तो ये है कि ब्रिटिश काउंसिल ही अब वह नहीं रही. वहां इंग्लिश लैंग्वेज केकोर्स बिकते हैं. ये असल में नेहरूवियन मॉडल है. और उसी सोच के बुद्धिजीवी. वाजपेयीजी तो फिर भी ईमानदारी बरतते हैं. कहते हैं कि मैं बोलियों का नहीं, भाषा का लेखकहूं. उनके तो घर में भी बोली नहीं खड़ी हिंदी ही बोली जाती थी. औरों की क्या कहूं.मेरी मातृ बोली वज्जिका है. इसमें मैं सिर्फ मां से बात कर पाता हूं. मेरी बेटीदिल्ली में रही है. उसे मैं वज्जिका क्यों सिखाऊं. और सीखे भी तो किससे बोले. उसकीमां वज्जिका भाषी नहीं है. सच्चाई तो ये है कि परिवेश न मिलने से भाषा खत्म हो रहीहै. यहीं देखिए. मेरे शहर की दो लेखिकाएं हैं. अनामिका और गीताश्री. उनसे कभी कभीवज्जिका बोलता हूं. फिर हिंदी में स्विच कर जाते हैं. बोलियों को विस्थापन ने खत्मकर दिया है.महंत 3: राजेंद्र यादवप्रभात:उनका योगदान बड़ा था. 90 में हिंदी साहित्य से फोकस खतम हो रहा था. दलितविमर्श और स्त्री विमर्श लेकर आए. पर उनकी सीमाएं थीं. एक किस्सा बताता हूं. अलकासरावगी की नब्बे के दशक में किताब आई. नॉवेल. कलिकथा वाया बाईपास. अगर ये नहीं आतीतो हमारे जैसे बहुत से लोग राइटर बनने का ख्वाब नहीं देखते. अलका राजेंद्र यादवकैंप से नहीं थीं. उसको वह खारिज करते रहते थे. हमने एक बार उनसे सवाल पूछा था. कहाकि जिस परिवेश पर ये उपन्यास लिखा गया है. मारवाड़ी कम्युनिटी पर, उस पर उसी वक्तप्रभा खेतान ने भी पीली आंधी लिखा. मगर कविकथा वाया बाईपास सबको बाईपास करता हुआरीडर्स तक दूर देशों तक में पहुंचा. इसका फ्रेंच में गैलिमार जैसे प्रतिष्ठितपब्लिकेशन ने छापा. स्पैनिश और इटैलियन में ट्रांसलेशन हुआ. मगर आप मानते ही नहींकि ये अच्छा नॉवेल है. राजेंद्र यादव का जवाब था, अलका सरावगी में बोल्डनेस नहींहै. अब इसकी क्या व्याख्या की जाए.सौरभ: मुझे ऐसा लगता है कि चीजें बदल रही हैं. एकैडमिक लेवल पर तो नहीं पता. मगरहिंदी पब्लिक स्फीयर में चीजें बदल रही हैं. नए किस्म की हिंदी. बोलियों से प्राणपाती. अंग्रेजी से खौफ न खाती. न ही उसे दुरदुराती. सीना तानकर चलती. फुलकॉन्फिडेंस. हमारी आपकी हिंदी. रोजी रोटी देने वाली हिंदी. दयनीयता के चूतड़ों परहौंककर लात मारने वाली हिंदी. हिंदी के लोग. जवान. खुले. मिले. कहकहे लगाते. सबसेमिलते. सबकी सुनते. कम हैं. मगर हैं. आपको क्या लगता है. हिंदीस्तान को लेकर.प्रभात: देखिए. हिंदी की अपनी कहानी है. जब ये भाषा बन रही थी. तो पहले सौ साल कहागया कि इसमें कविता नहीं लिख सकते. ब्रज भाषा को रिप्लेस नहीं कर पा रही थी ये वहांपर. जब खड़ी होने लगी तो कहा गया कि नौकरों की भाषा है. अंग्रेजों ने ईजाद की है.ताकि गुलामों से कह सकें. दरवाजा खोल दो. किचेन लैंग्वेज है. नेहरू जी का भी यहीरुझान था. उसी तर्ज पर एक क्लास डिवेलप हुई. सरकार पर निर्भरता बढ़ी. पर सरकारक्यों करे. कब तक करे. और सरकारों ने कब भाषा को बचा लिया. तो अब हिंदी उस ऐतिहासिकढंग से और सरकारी तर्ज से मुक्त हो रही है. सारे प्रकाशक सरकारी खरीद के लिए मरेजाते थे. एक नेक्सस बन गया था. अध्यापकों और प्रकाशकों का. राजा राममोहन राय सेलेकर दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी तक. यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी इसी का हिस्सा.लेकिन अब एकडैमिक्स की सत्ता क्यों गायब हो रही है. क्योंकि अब वहां बजट कम होनेलगा है. प्रोफेसर अप्रभावी हो गए हैं. अचानक क्यों बाजार की तरफ भाग रहे हैंपब्लिशर. राइटर. कि रीडर खरीदे. लाइब्रेरी बंद हो रही हैं. सरकार खरीद के क्याकरेगी. दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी कमेटी में था मैं. सारे सेंटर्स में जाते थे हमलोग. शाहदरा और चांदनी चौक को छोड़कर बाकी जगहों पर लोग ही नहीं आते थे पढ़ने. अबये सरकारी लाइब्रेरी बड़ी जगहों पर हैं. कमर्शल जगहों की प्राइम प्रॉपर्टी हैं.सरकार कल को इनका कुछ और यूज करेगी. तो हिंदी मुक्त हो रही है. मीरा की कविता मेंविरह वेदना. सूरदास में किसान चेतना. इस तरह की घिस्सड़ राइटिंग, अकैडमिक राइटिंगके मरने का वक्त आ गया है.सौरभ: नए चलन का बाजार है. नए राइटर हैं. इंग्लिश से सीधा मुकाबला भी है. ऐसे मेंक्या बचेगा. कौन बचेगा. कितना बचेगा? प्रभात: जो पाठक के लिए लिखेगा, वही बचेगा.गंभीर लेखन भी होना चाहिए. मगर 60-70 साल से यही हो रहा है. किसान कर्ज में डूबाहै. सूदखोरों के नीचे दबा है. भूखा मर रहा है. यही बार बार कहा जा रहा है. गोदानमें भी यही था. संजीव के उपन्यास फांस में भी यही है. मेरा सवाल ये है कि क्या हरजगह हर किसान हर आदमी दबा ही हुआ है. आप हिंदी के ज्यादातर कैरेक्टर देखिए. दबेकुचले सताए दिखते हैं.सौरभ: मनोहर श्याम जोशी के कैरेक्टर तो मुझे खिलंदड़पन और जिंदगी से भरपूर लगतेहैं. प्रभात: हिंदी वाले (पढ़ें आलोचक और मठाधीश) तो उन्हें मानते ही नहीं. मनोहरश्याम जोशी को पाठकों ने बड़ा लेखक बनाया है. आज मरने के बाद भी टटा प्रोफेसर काअनुवाद इरा पांडे करती हैं. और उसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड मिलता हैअनुवाद का.सौरभ: पाठकों का प्यार तो राही मासूम रजा को भी खूब मिला... प्रभात: राही मासूम रजापहले बड़े मुस्लिम लेखक थे. वह अलग परिवेश लेकर आते थे. शिया मुस्लिम समाज कीकहानियां लेकर आए. शानी भी थे, मगर रजा के सामने छोटे लेखक साबित हुए. दरअसल हिंदीकहानी में शिया मुस्लिम को ज्यादा तवज्जो मिली है. आप आज के दौर में असगर वजाहत कोही देख लीजिए. उनका कल्ट नाटक माना जाता है. जिस लाहौर नहीं वेख्या. मगर इसका जोसंस्करण अब छपता है, जो पॉपुलर हुआ है. वह हबीब तनवीर के मंचन से तय हुआ ड्राफ्टहै. उनका सबसे चर्चित उपन्यास सात आसमान आधा गांव का एक्सटेंशन दिखता है. इसकेबरअक्स सुन्नी समाज से आने वाले अब्दुल बिस्मिल्ला का कोई नाम नहीं लेता. जबकि वहअसगर से बड़े राइटर हैं. लेकिन असगर वजाहत ने विशुद्द किस्सागोई का बचाया. और उसढंग से हिंदी की सेवा की. आज जो भागकर चेतन भगत की तऱफ जा रहा है. पहले वह हिंदीमें गुलशन नंदा और सुरेंद्र मोहन पाठक को पढ़ता था. फिर धीमे धीमे असगर वजाहत औरकमलेश्वर जैसों पर शिफ्ट होता था. मगर हिंदी वालों ने उस कड़ी को ही नहीं अपनाया.बेस्ट सेलर का हल्ला होता है. आज भी सुरेंद्र मोहन पाठक के नॉवेल की हार्पर 35 हजारकॉपी छापता है. कौन मुकाबिल है इसके.सौरभ: नए राइटर्स के बारे में आप क्या कहेंगे. जो अपने ढंग और भाषा में कहानी कहरहे हैं. फर्मे के फेर में नहीं पड़ रहे. मसलन, रवीश कुमार. प्रभात: देखिए रवीशकुमार का हिंदी पब्लिक स्फीयर में अपना और बहुत बड़ा व्यक्तित्व है. यही उनकीकिताबों को बड़ा बनाता है. कंसेप्ट की बात करूं तो लप्रेक में राजकमल प्रकाशन ने दोकिताबें और छापीं. क्या बिक रही हैं वो. गिरींद्र झा की तो मुझे किताब ही नहींलगती. कंपाइलेशन है. इसमें गांव और शहर दो तरह के लप्रेक हैं. कनेक्ट नहीं है.एकरूपता नहीं है. रवीश में है. दिल्ली को लेकर है. बहुत साफ है. इस सीरीज में वहअकेला है, जो मौलिक है. जिन्होंने किताब की तरह किस्सों को बरता है. एक धागा है.सबके बीच. इस सीरीज के तीसरे राइटर विनीत कुमार गिरींद्र से बेहतर हैं. लेकिन वहमीडिया विमर्शकार हैं. वही लिखें. फिक्शन कविता लिखना आसान नहीं. लोगों को ढेलामारने की तरह दिख रहा है. अब देखिए. मैं आपके यहां आया और तसलीमा की किताब उठाकरउनकी कविताएं पढ़ने लगा. राइटर की भाषा, लिखन का गठन दिखता है. जो गिरींद्र औरविनीत में मिसिंग है.सौरभ: और जो इधर हिंदी में बेस्टसेलिंग बुक का चलन चालू हुआ है, वह...प्रभात: हिंदी के बड़े पब्लिशर बिक्री के आंकड़े जारी नहीं करते. ऐसे में हिंदयुग्म जैसे पब्लिकेशन ने हजार डेढ़ हजार कॉपी बेचकर माहौल बना लिया. नए नए राइटर्सलेकर आए. मगर अब वह भी समझ गए हैं. कि ये हिंदी की बेस्टसेलिंग जैसी शोशेबाजी सेज्यादा दिन काम नहीं चल सकता. इसलिए वे नई हिंदी की बात करने लगे हैं. लेकिन उनकाएक योगदान मानना चाहिए कि उनकी वजह से हिंदी वहां पहुंची, जहां हिकारत की नजर सेदेखी जाती थी. उनके लेखक हिंदी को नए मार्केट में ले गए. मगर यहां भी मार्केट औरपब्लिसिटी ज्यादा है. नई खेप में सबसे अच्छा राइटर तो प्रचंड प्रवीर है. उसे उस तरहकी पब्लिसिटी नहीं मिली. उनकी कमाल किताब है, अल्पाहारी गृहत्यागी. हार्पर ने बिनाप्रचार के उसकी 3 हजार कॉपी बेच ली हैं. हिंद युग्म ने निखिल सचान की किताब छापीथी. नमक स्वादानुसार. उसे उस साल की बेस्ट किताबों में गिना गया. कई मित्रों नेअखबारों में ऐसा किया. मगर निखिल सचान की दूसरी किताब का क्या हुआ. कोई चर्चा तकनहीं. हालांकि अब हिंद युग्म मानव कौल को छाप रहा है. उसकी अच्छी चर्चा है. हिंदीमें बेस्टसेलर पहले से रहे हैं. और सिर्फ राइटर बनकर भी काम चलाया जा सकता है. आपसुरेंद्र मोहन पाठक के यहां जाकर देखिए. राइटर हैं. पेंट हाउस में रहते हैं. उम्दासिंगल मॉल्ट स्कॉच पिलाते हैं. उदय प्रकाश को देखिए. देश विदेश घूमते हैं.सौरभ: हमारे वक्त में कविता की ज्यादा बात नहीं होती. जब होती है, अतीत में लौटकरहम कवियों को याद करते हैं. उनकी कविताएं पढ़ते हैं. क्या अब कविता की मौत जैसेफतवे जारी होने का वक्त आ गया है. प्रभात: 50-60 के दौर में कविता का एक स्ट्रक्चरबना दिया गया. इससे जो बाहर निकला, उसे बाहर कर दिया गया. इसलिए नई कहन की कविता कमनजर आ रही है. मगर अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैं. आप शुभम श्री की कविताएं पढ़िए.उसकी एक कविता है. बुखार ब्रेकअप आई लव यू. क्लासिक लगती है. अब तक के पूरेस्ट्रक्चर को तोड़ती है. उन्हीं शुभम श्री ने हिंदी की जड़ता पर भी बढ़िया कवितालिखी है. चिरकुट था चिरकुट हूं चिरकुट रहूंगा बोलूं चाहे न बोलूं शकल से दिखूंगाचेप कहे, चाट कहे, चंट कहे कोई बत्तीसी निकाले हंस हंस सहूंगा धरती का जीव नहींऑर्डर पर आया हूं हिंदी पढ़ूंगा चंपक बनूंगा तो नई आवाजें हैं. ये हिंदी के कैनन कोबदल सकती हैं. उसे विक्टिम मोड से निकाल सकती हैं. मगर ये व्यवस्थित ढंग से लिखतीनहीं हैं. एक राइटर हैं. उनके फेसबुक पर 36 हजार फॉलोअर हैं. वहीं जमी रहती हैं.किताब नहीं लिखतीं. आजकल लाइक्स लूटने की होड़ मची है राइटर्स में. उदय प्रकाश कोदेखिए. चार साल से फेसबुक पर एक्टिव हैं. चार साल से कोई कहानी नहीं लिखी. दिन मेंचार पोस्ट जरूर लिख देते हैं. आखिरी कहानी जज साहब आई थी. उसके बाद ऑर्डर ही नहींजमा उनका.सौरभ: तो हिंदी के जो स्थापित नाम हैं. वे इन नई आवाजों को पहचान क्यों नहीं रहे?प्रभात: आप नई आवाजों की बात कर रहे हैं. मैं तो 45 पार हूं. मेरी किताब की आपलोगों ने बात की. पाठक बात कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि उस पर नामवर सिंह औरमैनेजर पांडे लिखें. मगर नहीं लिखेंगे. और जिस दुनिया को मैं दुरदुराता रहा. वोमुझे अपनाएगा. अपना रहा है. मैं तो हिंदी का परंपरागत ढंग से ही होना चाहता था.आलोचक था. 29 साल की उम्र में मार्खेज पर किताब लिखी. बहुवचन का संपादक था.किस्सागोई में तो इत्तफाक से आ गया. सहारा समय ने कहानी प्रतियोगिता की थी. 31 हजारका इनाम था. सोचा, ये रकम मिल जाए तो कुछ पूंजी जुट जाए. कहानी लिख दी, जानकी पुल.और फिर सिलसिला चल गया. खैर. हिंदी के ये लोग हम नए लोगों का जिक्र क्यों नहींकरते. लिखते क्यों नहीं. क्योंकि लिखना इतिहास में दर्ज करने सा है. ये मिलेंगे तोबात करेंगे. सराहेंगे. पर लिखेंगे नहीं. नामवर सिंह ने एक प्रोग्राम में कोठागोई काजिक्र किया. आभार उनका. पर क्या कहा. बाइयों की जो कविताएं मैंने किताब में दर्जकीं. उन पर बात करते रहे. बस. अशोक वाजपेयी के घर जाकर किताब देता हूं. कभी नहींलिखते कहते कुछ. मेरे अपने गुरु सुधीश पचौरी. मिलेंगे तो मेरी लिखी कहानियों कीलाइन की लाइन सुना देंगे. पर लिखेंगे नहीं.सौरभ: टीचरों और राइटरों की कौम से हटें तो हिंदी के पोस्टर बॉय कौन हैं. जो इसजबान को नई जगहों पर नए तेवरों के साथ पहुंचा रहे हैं. बिना शाल श्रीफल कीधक्कामुक्की किए. प्रभात: इरफान है. जब देखो तब उदय प्रकाश की कविता पढ़ देता है.मनोज वाजपेयी है. हिंदी को नए सिरे से गर्व दिला रहा है मुंबई में. इम्तियाज अली कोदेखिए. उसकी सारी कहानियां हिंदी बेल्ट की होती हैं. जबकि उसने खुद इंग्लिश मेंऑनर्स किया है. ए वेडनेस डे के बाद सब नीरज पांडे को जानने लगे. वही नीरज यहांहिंदी पब्लिशरों से कहता रहा. मेरी किताब छाप दो. किसी ने नहीं छापी. पेंग्विन नेछाप दी. गालिब डेंजर. बेस्ट सेलर हो गई. वो कहता है. यार हिंदी वाले कब पेशेवरहोंगे. वो अभी भी हिंदी खोजता है. गुलशन नंदा के किसी नॉवेल की तलाश कर रहा था हालही में. हिंदी के एक पोस्टर बॉय रवीश कुमार हैं. दिल्ली से बाहर निकलिए. क्या धूमहै उनकी. क्या फैन फॉलोइंग है. उनसे बड़ा आइडियल नहीं. उन्होंने अपने ब्लॉग मेंमेरा एक दो बार जिक्र किया. मेरे शहर के लोग कहने लगे. प्रभात बड़ा आदमी हो गया है.रवीश कुमार इस पर लिखता है. नीलेश मिसरा भी हिंदी के पोस्टर बॉय हैं. मेरी उनसेतमाम असहमतियों के बावजूद. उन्होंने अरबन एरिया में हिंदी की जगह बनाई है.सौरभ: क्या दिक्कत है हिंदी के पब्लिशर को नीरज पांडे जैसे लोगों को छापने में. येतो हिंदी के लिए अच्छी बात ही होगी न... प्रभात: हिंदी में अभी भी ज्यादातर किताबेंमहंतों की संस्तुति पर छपती हैं. पब्लिशर जिस दिन फेसवैल्यू के लेखन के हिसाब सेचीजें तय करेंगे, ये दुनिया छपाई की बदल जाएगी. चाहे राजकमल हो या वाणी हो. सबकायही हाल है. राजकमल ने लप्रेक क्रांति की है, मगर उसमें किन्हें छापा. उन्हीं को जोसंपादक सत्यानंद के दोस्त हैं. शुभमश्री का मैंने जिक्र किया. कोई छापेगा उसे.सौरभ: अपने निजी जीवन के बारे में बताइए. पैदाइश. परिवार. पत्नी. पुत्रीप्रभात: मेरी पैदाइश पैदाइश 3-11-1970 की है. बाबू जी एग्रीकल्चर साइंटिस्ट थे.किसान हैं. खेती करते हैं. माता जी गृहिणी हैं. सीतामढ़ी में गांव है. पढ़ाईमुजफ्फरपुर में हुई. फिर हिंदू कॉलेज आ गया. डीयू से पढ़ाई की. जनसत्ता में नौकरीकी. इधर उधर काम किया. 35 साल की उम्र में जाकिर हुसैन ईवनिंग कॉलेज में नौकरी पाई.शादी हुई. मगर तलाक हो गया. बेटी है. प्रतीक्षा नाम है उसका. 12 साल की है. मेरेसाथ ही रहती है.सौरभ: अमूमन देखने में आता है कि तलाक होने पर बच्चे मां के पास रह जाते हैं.कानूनीलड़ाई आपके हक में कैसे हुई. प्रभात: मैं अकेला नहीं हूं. लिएंडर पेस ने भी अपनीबेटी के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. हमारे केस में क्या था कि पति पत्नी दोनोंवर्किंग थे. मैं ईनविंग कॉलेज में हूं. जज ने इसे बेटी के लिहाज से पॉजिटिव माना.सौरभ: इसके चलते सामाजिक स्वीकृति को लेकर कैसा अनुभव रहा. क्योंकि मैं जिस शहर सेआता हूं. वहां मुझ समेत कुछ चुनिंदा लोगों को देखकर आज भी नुक्कड़ों में कहा जाताहै. वो देखो. उसने लव मैरिज की है. डिवोर्स के मामले में तो और भी एक कदम आगे होतीहै बतकही. प्रभात: सामाजिक रूप से पूछ कम ही है. लंपट माना जाता हूं. लोग कहते हैं.ऐसा आदमी ही कोठे पर किताब लिख सकता है. शादी बियाह में जाता नहीं हूं ज्यादा.गॉसिप खूब होती है मेरे बारे में. पर सिर्फ बुरा ही बुरा नहीं है. कई लोग भी मुझसेजुड़ते हैं. अब जिस सोसाइटी में रहता हूं. वहीं का देख लीजिए. लोग अच्छे से पेश आतेहैं. कहीं जाता हूं. तो बेटी का ख्याल रखते हैं. जब लंबे टूर पर जाता हूं तो बेटीमां के पास चली जाती है.सौरभ: मैंने देखा है, सुना है. हिंदी डिपार्टमेंट की मास्टरी शिव को साधने से भीज्यादा मुश्किल है. बिना पैरवी के नौकरी बहुत मुश्किल है. सिर्फ काबिलियत की कद्रनहीं. आप अपनी सुनाइए. कैसे मिली डीयू की मास्टरी. प्रभात: मेरे ऊपर सुधीश पचौरी काहाथ था. वो न होते, तो नौकरी न मिलती. मैं जनसत्ता में सहायक संपादक था. जहां भीइंटरव्यू में जाता, अपमानित किया जाता था. सवाल पूछे जाते थे. उत्तर आधुनिकता परक्या कहना है. या इस तरह के कि आपने अंग्रेजी की पढ़ाई क्यों नहीं की है. हिंदी केमठाधीश मसलन, नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ त्रिपाठी ये सब करते थे. मुझे लगा कि इसदुनिया में नहीं जाना चाहिए. क्या दिक्कत थी उन्हें. कि मैं हिंदी वालों की तरहनहीं रहता था. अलग था तो सजा दी जाती थी. क्योंकि मैं लाल झंडा वाले छात्र संगठनोंमें नहीं था. लेफ्ट की हेजेमनी ने विश्वविद्यालयों को बहुत नुकसान पहुंचाया है.तमाम ऐसे लोगों को नौकरी दी है जो किसी लायक नहीं थे. मुझे 35 साल की उमर में नौकरीमिली. 27 साल का था, तब से ट्राई कर रहा था. रिजल्ट कभी खराब नहीं था. डीयू का टॉपरथा. जेआरएफ था. अखबारों में लिखता था. मगर इन सब चीजों की हिंदी विभागों में सजा दीजाती है. रचनात्मक आदमी को बर्दाश्त नहीं करते. आज भी यूनिवर्सिटी में अपनेडिपार्टमेंट में जाता हूं तो आधे घंटे खड़ा करके रखते हैं. जबकि उनसे ज्यादा टेबलवर्क करता हूं. लेटर ड्राफ्ट से लेकर सब कुछ अच्छे से आता है. लेकिन गोपेश्वर सिंहऔर हरमोहन शर्मा जैसे लोगों को ये पसंद नहीं. तो मेरा सच यही है. अगर सुधीश पचौरी नहोते तो नौकरी न मिलती. कोई माने या न माने. सारे लोगों को नौकरी गुरुओं की वजह सेही मिलती है. आज तक विनीत कुमार को नौकरी नहीं मिली. जबकि वह बहुत प्रतिभाशाली है.उसने अपने दम अपनी पहचान बनाई है. मीडिया आलोचना में उसका अपना स्थान है. और मिहिरपंड्या. वह तो विनीत से भी ज्यादा प्रतिभाशाली है. गंभीरता से उसने सिनेमा पर कामकिया है. बिना किसी मीडिया अटेंशन को चाहे. उसे तो इतना भी विनीत जितना भी नहींमिला. एडहॉक के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है. अभी गेस्ट लेक्चर है. इन दोनों केगुरु भी सुधीश पचौरी थे. मगर उनको वीसी बनना था. इसलिए विभागीय नियुक्तियों केचक्कर में नहीं पड़े. जबकि विनीत और मिहिर तो मॉडल स्टूडेंट हैं. एक्टिव हैं.किताबें लिखी हैं. पेपर लिखे हैं. पर अंत में गुरुओं को भी प्रसन्न तो रखना होताहै. मैं असल में उनका पहला स्टूडेंट था. विक्टिमाइज किया गया. मगर उनके पावर मेंआते ही लेक्चरर बन गया. पर उन्होंने भी कॉलेज में ही छोड़ दिया.सौरभ: ओह. तो डीयू में बुरा हाल है. प्रभात- डीयू में तो अज्ञेय और मोहन राकेश कोनौकरी नहीं दी गई. उनका व्यक्तित्व रंगीन था. विभागाध्यक्ष नागेंद्र का कहना था.ठीक है विद्वान हैं. मगर छात्रों को क्या संदेश मिलेगा. दो तीन शादियां कर रखी है.सौरभ: अब कुछ गंभीर बातें करते हैं. ये बताइए कि जब आप छोटे थे. तो बड़े होकर किसहीरोइन से शादी करना चाहते थे प्रभात- वही जिससे रेणु करना चाहते थे. वहीदा रहमानसौरभ: और किस हीरो की तरह बनना चाहते थे. प्रभात: हमारी जेनरेशन का हर आदमी अमिताभबच्चन बनना चाहता था. लेकिन मैं बड़े होकर सुनील गावस्कर बनना चाहता था. कॉलेज तकआकर क्रिकेट खेला. मगर हम बिहारियों को बड़ी जिम्मेदारी के साथ दिल्ली भेजा जाताहै. बेटा जाएगा. नौकरी पाएगा. और खेल में तो करियर नहीं होता न.सौरभ: आपकी फोन लिस्ट में पांच सबसे भैरंट लोग. प्रभात: इम्तियाज अली. नीरज पांडे.पीयूष मिश्रा. अहमद पटेल. वाणी त्रिपाठी. वाणी तो मेरी मुंहबोली बहन है. उससे हीसबसे ज्यादा बात होती है. रवीश कुमार का भी फोन नंबर है मेरे पास.सौरभ: महात्वाकांक्षा क्या है प्रभात रंजन की प्रभात: 15 साल से लगा हूं उसी में.हिंदी का एक ऐसा प्रफेशनल बन जाऊं. स्थापित हो जाऊं. तो फिल्म या मीडिया से न हो.कुछ बड़ा मुकाम बनाऊं. अपनी एक लकीर खींच सकूं. अनुवाद, अखबार. सब जगह लिखता हूं.सब काम करता हूं. मौका आया था. फिल्मों में जाने का. मुंबई में जाने का. इम्तियाजजब लव आजकल शुरू कर रहा था. जब आया था. बोला. बहुत हो गया. अब चल यहां से. मैंनेकहा. ऐसे नहीं जाऊंगा. 10 साल से लगा हूं. नीरज के साथ जाने का लोभ ज्यादा था. वहथ्रिलर करता है. बेबी जैसी फिल्में. ये मेरे करीब हैं. वाणी भी जब एक्ट्रेस थी तोबहुत कोशिश करती थी मेरे लिए. अब लगता है मरते मरते कुछ बन जाऊंगा. यही पहचान चाहताहूं बस. हिंदी का राइटर. ऐसे ही लोगों के करीब रहा. मनोहर श्याम जोशी. उदय प्रकाश.सौरभ: एक आखिरी सवाल. ये ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर. ईजी टाइपिंग टूल्स. गूगल के. इसनेहिंदी की कितनी मदद की है. प्रभात: ये क्रांति है. हिंदी के पेशेवरों को पहचान मिलीही इससे है. जो शुरुआती ब्लॉगर थे. रवीश. विनीत. मनीषा, अनु सिंह चौधरी. वही आजराइटर बन रहे हैं. फेसबुक और ब्लॉग न होता तो हम जैसों का क्या होता. कोठागोई सेपहले मेरी पहचान ही जानकी पुल के मॉडरेटर की थी. मुक्तिबोध अपनी कविता में कहतेरहे. मठ और गढ़ सब तोड़ने होंगे. हिंदी के सब मठ फेसबुक और ब्लॉगिंग ने तोड़े हैं.पहले आप किसी पर टिप्पणी नहीं कर सकते थे. करते थे तो छप नहीं सकते थे. आज कोईपवित्र नहीं रहा. परे नहीं रहा. आज कोई भी किसी की भी आलोचना कर देता है. इससे एकनया यकीन आया है. जो हिंदी को बचाएगा.