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  • Exclusive Interview Of PK : During an interview with Saurabh Dwivedi Prashant Kishor talks about his father his family and about his childhood

अपने पिता की कौन सी सीख को पॉलिटिक्स में इस्तेमाल करते हैं प्रशांत किशोर?

और प्रशांत किशोर के पैतृक घर को लेकर क्यों कन्फ्यूज़ रहते हैं लोग?

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7 मार्च 2019 (अपडेटेड: 7 मार्च 2019, 10:33 AM IST)
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प्रशांत किशोर ने अपने पिता से लेकर अपने बचपन तक की कई कहानियां सुनाईं हैं.
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2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो सबसे ज्यादा चर्चा हुई एक गैर राजनीतिक नाम की. ये नाम था प्रशांत किशोर का, जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का चुनावी कैंपेन डिजाइन किया था. इसके बाद से ही आम लोगों के अलावा पॉलिटिकल पार्टियों की दिलचस्पी भी प्रशांत किशोर में बढ़ गई थी. सब लोग उनके बारे में जानना चाहते थे. पिता कौन हैं, कहां के रहने वाले हैं, क्या पढ़ाई-लिखाई की है वगैरह-वगैरह. प्रशांत किशोर ने खुद इन बातों का जवाब दिया है दी लल्लनटॉप को दिए इंटरव्यू में. दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी से हुई बातचीत में प्रशांत किशोर ने अपने घर-परिवार, माता-पिता और अपने बचपन की कई कहानियां साझा की हैं.
प्रशांत किशोर ने दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी को दिए इंटरव्यू में बताया है कि वो पढ़ने में कैसे थे.
प्रशांत किशोर ने दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी को दिए इंटरव्यू में बताया है कि वो पढ़ने में कैसे थे.

बकौल प्रशांत, आज वो जो कुछ भी हैं अपने माता-पिता की वजह से हैं. वो बताते हैं कि बेहद साधारण परिवार से हैं. बिहार के सरकारी स्कूल से शुरुआती पढ़ाई लिखाई हुई है. प्रशांत बताते हैं कि पिताजी ने बहुत कुछ सिखाया है. उनकी सबसे बड़ी एक सीख है, जिसे मैं हमेशा ध्यान में रखता हूं. उन्होंने सिखाया था कि हर व्यक्ति, जिसने कुछ हासिल किया है, उसमें कुछ खूबियां ज़रूर होंगी. जब भी ऐसे व्यक्ति मे मिलो तो ये समझने की कोशिश करो कि उसमें कौन सी खूबियां हैं. तो मैं जब भी किसी से मिलता हूं यह ध्यान रखता हूं.

गांव के लोग प्रशांत किशोर के बारे में क्या बातें करते हैं?


अपनी पढ़ाई के बारे में प्रशांत बताते हैं कि पिताजी सरकारी डॉक्टर थे. तो जहां-जहां उनकी पोस्टिंग हुई, वहां के सरकारी स्कूल में शुरुआती पढ़ाई हुई. उसके बाद वो पटना साइंस कॉलेज चले गए. फिर हिंदू कॉलेज आ गए, तबीयत खराब हुई तो बीच में ही छोड़कर चले गए. ग्रेजुएशन पूरा किया लखनऊ से. फिर हैदराबाद होते हुए अमेरिका, भारत, दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत आ गए. इंजीनियरिंग, डॉक्टरी फिर सिविल-सर्विस वाला कोई रूटीन नहीं फ़ॉलो किया. हर दो साल में पढ़ाई छोड़ दी. बारहवीं के बाद तीन साल छोड़ी, फिर ग्रेजुएशन के बाद दो साल छोड़ी. मेरे पिताजी अनशन पर बैठ जाते थे. कहते थे कि वापस जाओ, पढ़ाई करो. मां कहती थीं कि पढ़ लो वरना अभी तो हम लोग हैं, बाद में तुम्हारे भाई बहन तुमसे बात नहीं करेंगे, परिवार में कोई तुम्हें नहीं पूछेगा. जो हर परिवार में पढ़ाई के बारे में कहा जाता है, वहीं मेरे परिवार में था. मेरे में सब निगेटिव ही है बचपन का, कुछ अच्छा कहने के लिए है नहीं.
हमारे यहां पढ़ाई ही सब कुछ होती है. बारहवीं के बाद तीन साल पढ़ाई छोड़ी तो घर वाले काफ़ी परेशान रहे. पर मेरे माता-पिता ने मेरा हमेशा साथ दिया. पढ़ाई वाले सिस्टम में आना-जाना लगा रहा. गिरते-पड़ते पोस्ट-ग्रेजुएशन कर लिया. लकी रहा कि यूएन में नौकरी मिल गई. फिर काम शुरू कर दिया. जब पढ़ाई नहीं करता था, तो एक यंग आदमी जो कुछ गलत कर सकता है, वो सब कर रहा था.

पीके ने बताया कि जब वो पढ़ाई नहीं करते थे, तो वो सब गलत काम करते थे जो एक यंग आदमी कर सकता है.

अपने परिवार के बारे में प्रशांत बताते हैं कि मेरा एक छोटा लड़का है, मेरी पत्नी है. पिताजी हैं. माताजी का देहांत हो गया पिछले साल. बाकी भाई-बहन सब दिल्ली में रहते हैं. बिहार में कोई नहीं है, सब दिल्ली रहते हैं. इसके अलावा प्रशांत अपने पैतृक गांव के बारे में भी बताते हैं कि पिताजी की नौकरी बक्सर में रही, तो लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि मैं बक्सर का हूं. मैं बक्सर का नहीं, सासाराम के कोनार गांव का हूं. अब तो मीडिया के लोग गांव में जाकर ऐसे लोगों से बाइट ले लेते हैं, जिन्हें न तो मैं जानता हूं और न ही मेरे परिवार के लोग. प्रशांत कहते हैं कि अगर आप थोड़ा सा सफल हैं तो आपके गांव का हर आदमी आपका रिश्तेदार बन जाता है. फिर आपको लेकर वो बयान देता है कि मैं उसको जानता हूं, उसके साथ खेलता था, उसके साथ पढ़ता था. बचपन से ही कुछ अच्छा किया नहीं.
प्रशांत किशोर की पसंदीदा किताबें.
प्रशांत किशोर की पसंदीदा किताबें.

किताबों के बारे में प्रशांत कहते हैं कि सियासत में जिनकी दिलचस्पी है, उन्हें रुद्रांशु मुखर्जी की किताब पैरलल लाइफ्स पढ़नी चाहिए. अगर आप उसको पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि गांधी ने क्यों सुभाष चंद्र बोस की बजाय नेहरू को चुना. इसके अलावा विजड्म ऑफ क्राउड और माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रूथ हर भारतीय को पढ़नी चाहिए. गांधी के लिए छोटा मुंह बड़ी बात है, लेकिन अगर गांधी की कोई बात आपको अच्छी नहीं लगती है तो समझ लीजिए कि आपने गांधी को समझने की समझ डेवलप नहीं की है. उस आदमी ने जो कुछ भी कहा, वो सही ही कहा होगा. ये मेरा अपना अनुभव है. गांधी को पढ़कर समझ में आएगा कि उससे बेहतर कोई इंसान धरती पर पैदा नहीं हुआ. लोग मुझसे पूछते हैं कि आपकी क्या विचारधारा है. मैं उनसे पूछता हूं कि आज अगर गांधी होते तो आज वो गोहत्या का विरोध कर रहे हैं, तो संघ की विचारधारा उनकी विचारधारा हो गई. उन्होंने ग्राम स्वराज की बात कही, तो उसके हिसाब से वो सोशलिस्ट हो गए, उन्होंने स्टेट ओनरशिप की बात कही, तो उसके हिसाब से कम्युनिस्ट हो गए और कांग्रेस के तो थे ही. आप बता दीजिए कि उनकी विचारधारा क्या थी? पढ़े लिखे समझदार लोगों से भी पूछता हूं कि गांधी की विचारधारा क्या थी.

जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर से असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं पार्टी नेता?

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