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'बलमा हमार फिएट कार लेके आया है'

ये किस्से वहां के हैं, जिसका नाम है चतुर्भुज स्थान. जहां बड़ी बड़ी तवायफें आतीं. कोठे बनवातीं. गाने सुनातीं.

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सौरभ द्विवेदी
30 दिसंबर 2015 (अपडेटेड: 30 दिसंबर 2015, 12:10 PM IST)
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दिल्ली में डर लगता है. यहां लोग मिलते बहुत हैं. मतलब से. मुस्कुराते हुए. और फिर गुम हो जाते हैं. क्योंकि उन्हें पहली बार में ही पता चल जाता है. आप किसी काम के नहीं. दाम के नहीं. पर डर के आगे डकार है. और उसके बाद राहत. क्योंकि इसी दिल्ली में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो बेमतलब मिलते हैं. ज्ञानी इन्हें अच्छे लोग कहता है. मैं सच्चे लोग. प्रभात रंजन ऐसे ही एक आदमी हैं. जो दिल्ली के किनारे मयूर विहार में रहते हैं. प्रभात पेशे से मास्टर हैं. कॉलेज में हिंदी पढ़ाते हैं. पढ़ने वाले जानें उनकी टीचरी का हाल. हमें भी बीते बरस प्रभात ने पढ़ाया. एक पुटरियों में बंधा कुल्ल किस्सों का किस्सा. नाम रखा कोठागोई. कोठा गांव के घर में होता था. उसमें घड़े रखे रहते थे. घड़े में दाल होती थी. और एक सांप भी. जो साल में दो चार बार दिख जाता. काटता नहीं. मम्मी कहती. पुरखे हैं. मैं सोचता, बड़े काले हैं. क्रीम नहीं चुपड़ी किसी ने इनको. बड़ा हुआ. मनोहर कहानियां पढ़ने लगा. तो समझ आया. ये जो रंडी तवायफ होती हैं. ये जहां नाचती गाती हैं. उसे भी कोठा कहते हैं. फिर फिलमें देखीं. तो पता चला कि वो भी कोठा होता है, जहां औरतें पइसे लेकर गंदा काम करती हैं. वैसे इसे गंदा काम क्यों कहते हैं. किसके लिए गंदा. स्खलित होने वाले के लिए. या उसके लिए जो लिजलिजेपन के जरिए अपनी जिंदगी को एक रोज और घसीट लेती है. प्रभात रंजन ने एक कोठा और खोला. इस किताब के जरिए. हम सबकी दुनिया में. हमें पता चला. कि कोठों में रहने वाली सिर्फ चेहरा, स्तन, जांघ या योनि भर नहीं हैं. सिर्फ घुंघरू, आवाज या कदम भर नहीं हैं. कि सबकी जिंदगी की तकलीफें पाकीजा वाली मीना कुमारी की तरह सर्द दर्द जर्द भरी ट्रैजिक सुंदरता लिए नहीं होतीं. कोठागोई बिहार के एक शहर मुजफ्फरपुर की कहानी है. वहां पर भी एक खास जगह की, जिसका नाम है चतुर्भुज स्थान. कैसा सुंदर संस्कृत अर्थ और देव ध्वनि वाला नाम. और काम. बड़ी बड़ी तवायफें आतीं. कोठे बनवातीं. गाने सुनातीं. सेठ आते. पइसे से प्यार खरीदने का भरम पालते. फिर पाला मार जाता. कोई और रंडी. कोई और सेठ, कोई और गाना. सब चतुर्भुज के आसमां पर किनारे चुपके से टंक जाता. मेरा मेरे समय को लेकर सबसे बड़ा डर एक ही है. कि किस्से जो कभी लपर लपर हमारे आसपास के मुंह में तंबाकू भरे बूढ़ों की लार से गिरते थे. कहीं वो बिना दर्ज हुए खत्म न हो जाएं. प्रभात ने उस डर को कुछ दूर किया है. उन्होंने कुछ बेहद जरूरी वाकये एक नए कहन में लिखे हैं. फतवों का अपना क्रेज है. सो एक मेरे हिस्से भी. काफिर हूं सो बिना साहित्य का मौलवी बने जारी किए देता हूं. कोठागोई साल 2015 की तीन सबसे अच्छी किताबों में से एक है. एक. बाकी दो हैं, रवीश कुमार की 'इश्क में शहर होना' और रबिशंकर बल की 'दोजखनामा'. उन पर बातें वहां, जहां उनके अंश दिखेंगे. यहां तो आप कोठागोई का एक नजारा देखिए. और जो पढ़कर और की चुल्ल उठे. तो खोज लीजिए. वाणी प्रकाशन ने छापा है इसे. कोठागोई का एक टुकड़ा
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