'उस उम्र में घरवाले पराए लगते थे और लड़कियां सबसे बड़ी हमदर्द'
किताब '50-50 ज़िन्दगी' का अंश.
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'जिंदगी 50-50' किताब 11 सितम्बर से मिलने लगेगी.
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8 साल पहले- बैंगलोर,
मैं और अनाया,
अभी मुझे बैंगलोर के ऑफिस में ज्वॉइन किए हुए कुल एक साल भी नहीं हुआ था. यही कोई 24 वर्ष का नौजवान था मैं. यही वह उम्र थी जब मैं आधे नितम्बों से नीचे (लो वेस्ट) जीन्स पहना करता था. जब तक झुकने में जॉकी की अंडरवियर का रंग न दिखे तब तक किसी को ड्यूड नहीं समझा जाता था. बाइक की रफ़्तार 100 होती थी और काम की रफ़्तार शून्य. घरवाले पराए लगते थे और लड़कियां सबसे बड़ी हमदर्द. बनियान दिखाने से व्यक्ति माचो बनता था और पूरी शर्ट पहनने में फैशन चला जाता था. बहन को बाजार ले जाने में शर्म आती थी, प्रेमिका को वन पीस में घुमाने में शान बढ़ती थी. मम्मी के कहने पर पानी देने में पीठ दर्द का एहसास होने लगता था और बस के बगल में बैठी लड़की के लिए बड़े ही शान से शीशा खोलने में ताकत का एहसास होने लगता था.

बंगलुरु रहने के लिहाज से सुंदर शहर माना जाता है.
बैंगलोर का मौसम मुझे कतई नहीं पसंद. आप सोच रहे होंगे कि बैंगलोर में कितना अच्छा मौसम रहता है. हमेशा सुहावना-सुहावना. फिर क्यों? जी हां, बैंगलोर में हर समय एक जैसा ही मौसम रहता है. वहां का मौसम कुछ इस तरह रहता है- सुबह थोड़ी ठण्ड, दिन चढ़ने के साथ धूप निकलनी शुरू होती है. दिन ढलने से पहले ही मौसम अपने रंग फिर से बदलने को लालायित हो उठता है और धीरे-धीरे बादल आने शुरू हो जाएंगे फिर शाम को बरसात. जिस तरह उत्तर भारत में एक साल में ये तीन मौसम अपना रंग बदलते है उसी तरह बैंगलोर एक दिन में उतने मौसम दिखा देता है. किसका दिल नहीं करता कि ऐसे सुहाने मौसम में वह अपनी प्रेमिका की गोद में सर रखकर न बतियाए. उसके मखमली हाथों का स्पर्श अपने माथे पर न होने दे. प्रेम में भीगी उसकी आंखों का पान करना कौन नहीं चाहेगा. उसके हाथों को अपने हाथों में थामकर मोहब्बत के प्रतीक उन फूलों की झाड़ियों के नीचे कौन नहीं बैठना चाहेगा?
पर मेरे प्रेम और मौसम दोनों का बड़ा गहरा नाता रहा है. जब मैं स्कूल में था, मेरा साल कुछ यूं गुजरता था. पहले साल भर एक डेस्परेट लड़के की भांति किसी लड़की को लाइन मारता. उसके स्कूल से लेकर कोचिंग, खाने से लेकर पीने, दोस्तों से लेकर रिश्तेदारों सबकी खबर रखता. मेरे मन को आप टेम्परेचर नापने वाली मशीन भी कह सकते हैं. वह इसीलिए कि लाइन मारते-मारते जब मेरा मन यह अनुमान लगा लेता कि अब सामने वाली लड़की के दिल का लोहा गरम हो चुका है. तब तक नया वर्ष निकल चुका होता और मैं उसे प्रपोज़ करने के लिए शुभ घड़ी का इंतज़ार करने लगता. वह शुभ घड़ी, प्रेम चतुर्थी यानी वैलेंटाइन डे से बेहतर क्या दिन हो सकता है.

बंगलुरु में मौसम के कई मिजाज़ एक दिन में ही दिख जाते हैं.
बड़ा सज धजकर जब मैं ‘प्रेम चतुर्थी’ के दिन अपने साल भर के इश्क़ का इज़हार करने जाता तो मैं इस बात से भी डरा रहता कि कहीं एक वर्ष की मेहनत की अर्थी न निकल जाए. किसी तरह प्रपोज़ करता पर लड़की चौथी तक इंतज़ार करने के लिए कह देती. यानी वह सोचकर बताएगी. जब गर्मी शुरू होने वाली होती, तो कहीं जाकर मार्च के अंतिम वीक में लड़की ‘हां’ कहती थी. गर्मी में वह या तो कहीं रमणीय स्थल घूमने चली जाती या फिर अपने मामा के यहां चली जाती. वापस आते-आते बारिश का सुहाना मौसम आने लगता और मेरे मन में कई तरह के ख्याल बुनने लगते. उस मौसम में अपनी प्रेमिका को घुमाने के सपने देखने लगता. पर जब वह वापस आती तो बारिश में मेरे अरमान भी धुल जाते क्योंकि अपने मामा के यहां अरमान नाम का उसे नया लड़का मिल गया होता. इस तरह मेरी मोहब्बत गर्मी के मौसम में परवान चढ़ती और सुहावने मौसम में मैं प्रेमिका विहीन हो जाता. बदकिस्मती से बैंगलोर का मौसम इतना सुहावना रहता कि मुझे अपनी प्रेमिका मिलने की कोई आस ही नहीं दिखती थी.
पर कहते हैं, घूरे के दिन भी फिरते हैं. मेरे दिन भी बदले. मेरे प्रेम और मौसम ने अपनी दुश्मनी दशहरा के दिन खत्म कर दी. आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यों? दशहरा आपसी द्वेष को भूलकर सद्भाव से मिलने का त्योहार है. प्रेम और मौसम में इस दिन से दोस्ती शुरू हो गई. यह मेरे लिए बिल्कुल उसी तरह की स्थिति थी मानो एक राष्ट्रवादी विचारधारा वाला व्यक्ति राम मंदिर छोड़कर समाज कल्याण में वामपंथियों का साथ देने लगे.

बारिश में बंगलुरु खूबसूरत लगता है.
मैं अपने ऑफिस में बैठा हुआ पंद्रह इंच की स्क्रीन की दुनिया में खोया हुआ था. वैसे भी इस पंद्रह इंच की स्क्रीन की अपनी अलग दुनिया है. इसमें नौकरी भी है. छोकरी भी है. यहां तक कि फेसबुक, ट्विटर नामक कई समाज भी जिन्होंने देश, जाति, सम्प्रदाय के बंधन को तोड़कर अपना समाज बनाया. इसमें स्कूल भी है जहां ज्ञान मिलता है और लूट-पाट भी होती है. पूरी तरह से एक दूसरी दुनिया. जिस दूसरी दुनिया का बचपन से हम सपना देखते थे, वह किसी और गृह पर नहीं, इस पंद्रह इंच की स्क्रीन में है. तभी तो इसे नाम दे दिया गया है- वर्चुअल वर्ल्ड. खैर, मैं अपने इस वर्चुअल वर्ल्ड में खोया हुआ काम कर रहा था तभी मेरे ठीक दाईं तरफ बगल वाली सीट पर एक हमउम्र लड़की आकर बैठ गई. बिलकुल छरहरी काया, बिलकुल उतना ही वेट, जितना जरूरी है, न तनिक भी ज्यादा न कम. सही जगह पर सही मांस. इसे आजकल नाम भी दे दिया गया है, 'जीरो फिगर'. उसने नीले रंग की सलवार कमीज पहनी थी, हाथों में बड़े-बड़े कंगन चमक रहे थे और कानों में लटकते हुए बड़े-बड़े बाले. वैसे कॉर्पोरेट वर्ल्ड में ऐसे कपड़े पहनकर लोग कम ही आते हैं, पर वह कोई अलग ही बंदी थी बिलकुल अलग. उसके ऊपर ये कपडे ऐसे जंच रहे थे जैसे बेहतरीन सी किताब पर उसका कवर, उसे और भी निखार देता है. मुझे उसका बायीं तरफ का गोरा गाल और आंख दिख रही थी, जिस पर हल्का-हल्का काजल लगा हुआ था. पलकों पर हलके रंग के ऑय शैडो. कुछ बाल उसके गाल को छूकर हवा में लहरा रहे थे. बिलकुल दूध से धुली काया. मानो कोई परी अचानक उतर आई हो मेरे बगल में.
मैं उसे निहारे ही जा रहा था, तभी वो मेरी तरफ चेहरा कर बोली,‘हाय!!’ मेरे तो मानो होश ही उड़ गए. सन्नाटा छा गया मेरे कानों में. कुछ देर के लिए मेरी पलकें एकटक उसे देखती रहीं. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी हैरतअंगेज चीज़ को देखने के बाद आंखें हटती नहीं हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे गिफ्ट पैक का बड़ा सा डिब्बा खोलने पर एक सस्ता सा पेन निकल आए. बिल्कुल वैसे ही जैसे बीवी का घूंघट उठाने पर एक लड़का निकल आए.
वास्तविकता यह थी कि जब तक मैंने उसका दायां गाल नहीं देखा था, तब तक तो उसके अंदर हर अच्छाई दिख रही थी. पर जैसे ही उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा, उसका पूरा चेहरा मुझे नजर आ गया. मैं अवाक- सा रह गया, मेरी भौचक्की आंखें उसी की ओर घूरे जा रही थीं. मैंने उसका पूरा चेहरा देखने से पहले ऐसी कल्पना भी नहीं की थी. उसके दाएं गाल पर एक बड़ा सा धब्बा बना हुआ था. जिसने उसके चेहरे को बदसूरत बना के रख दिया था. मेरी नजरें उससे हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं अनचाहे उसे घूर रहा था. शायद वह भी मेरी भावनाओं को समझ गई थी क्योंकि मैंने उसके "हाय" का जवाब भी नहीं दिया था और स्तब्ध बैठा निहार रहा था. मेरा मनोभाव समझकर तुरंत अपना चेहरा मोड़कर वह अपने कंप्यूटर पर काम करने लगी. मेरे मन में विचित्र-सा एहसास हो रहा था.

मैंने इससे पहले ऐसा कभी महसूस नहीं किया था. भगवान ने भी कैसे इतने खूबसूरत चेहरे को बिगाड़कर रख दिया था. ऐसा लग रहा था जैसे इंसान को बनाने वाला इंजीनियर इसे बहुत सुन्दर बनाना चाह रहा था, जब सिर्फ एक तरफ का गाल ही बचा था तब उसे खूब जोर से सूसू लग आई और दूसरा गाल बनाने की प्रक्रिया बड़ी जल्दबाज़ी में सिर्फ खानापूर्ति में ही निभायी हो. ऐसा लग रहा था कि प्रेम करते समय उसके पापा मम्मी बड़े मन से एकदूसरे से जुड़े हो पर तभी फूफा के छोटे से बच्चे ने कुण्डी खटका कर उनकी तन्मयता भंग कर दी हो और उन्हें प्रेम की प्रक्रिया का अंतिम क्षण जल्दबाजी में निपटाना पड़ा हो. उसको काम करता देख, मैंने भी खुद को कंप्यूटर में काम करने के लिए विवश किया पर अब काम में कहां मन लगने वाला था? मेरे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या प्रतिक्रिया दूं इस पर. भगवान को कोसूं या फिर उससे नफरत करूं.
बार-बार न चाहते हुए भी उसके चेहरे की तरफ देख लेता. मानो अदृश्य-सा कोई चुम्बक था उसके पास. मैं न चाहते हुए उसके आकर्षण से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा था और अनायास ही नज़रें उसके चेहरे पर टिक ही जातीं. कभी-कभी हमारी आंखें मिलतीं तो वह झेंप जाती. कभी-कभी वह मुझे उसकी ओर देखते हुए पकड़ लेती और फिर अपना चेहरा सीधा करके असहज होकर कंप्यूटर पर काम करने लगती. वह जान गई थी कि मैं उसके चेहरे पर बने हुए दाग के कारण उसके साथ ऐसा बर्ताव कर रहा हूं. पर मैं भी नासमझ था, बार-बार उसे देखे जा रहा था. शायद पहली बार इतनी खूबसूरत लड़की का दूसरा पहलू देख रहा था.
इस वजह से मन दुखी था. खैर, किसी तरह ऑफिस खत्म हुआ, मैं घर पहुंचा, भोजन किया, बिस्तर में लेट गया पर अगले दिन सुबह तक उसका चेहरा हर मिनट मेरे मन में कौंधता रहा. वह रह-रह कर मेरे मन में प्रवेश कर जाती थी. उसका एक तरफ का सुन्दर सा परी जैसा चेहरा और दूसरी तरफ वो दाग. कहते है चांद में भी दाग होता है पर यह दाग कुछ ज्यादा ही डरावना था. जब तक मैंने उसका दायां गाल नहीं देखा था, तब तक धूम-2 फिल्म के सहायक नायक अली की तरह मेरे मन ने कई तरह के सपने संजो लिए थे. पर दूसरा गाल देखते ही मेरे सपने भी उसी अली की तरह तुरंत टूट गए थे.
किसी तरह मेरी रात कटी और फिर से दिन भी कट गया. अब मेरे मन ने उसका वह चेहरा स्वीकार कर लिया था. कुछ समय लगता है अनचाही चीज़ को अपने मन को स्वीकार करने में. अभी उसको आए दो हफ्ते हुए थे, पर न वह किसी से ज्यादा बात करती थी, न ही हंसती थी. बस अपनी सीट पर बैठकर पूरी तन्मयता के साथ अपना काम करती. कभी गाल पर हाथ रखे घंटों किसी ख़याल में खोयी रहती. उसकी आंखों की पुतलियां स्थिर रहतीं टेबल पर पड़े किसी वस्तु पर. उस समय उसकी स्थिर आंखों में मुझे एक उफनता हुआ समंदर दिखता था. काम करते वक़्त भी मैं उसे बार-बार कनखिओं से देख ही लेता था. कभी-कभी हम दोनों के बीच औपचारिकतावश कुछ बातचीत हो जाती थी. पर तब भी मेरे कान से ज्यादा आंखें ही सक्रिय रहतीं. जब वह इस बात को भांप लेती तो अचानक ही बीच में बोलना छोड़कर काम में लग जाती. और शाम को चुप-चाप फिर बैग उठाकर चली जाती.
बुक का नाम: ज़िन्दगी 50-50
लेखक: भगवंत अनमोल
प्रकाशन: राजपाल एंड सन्स
कीमत: 175 रुपए
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मैं और अनाया,
अभी मुझे बैंगलोर के ऑफिस में ज्वॉइन किए हुए कुल एक साल भी नहीं हुआ था. यही कोई 24 वर्ष का नौजवान था मैं. यही वह उम्र थी जब मैं आधे नितम्बों से नीचे (लो वेस्ट) जीन्स पहना करता था. जब तक झुकने में जॉकी की अंडरवियर का रंग न दिखे तब तक किसी को ड्यूड नहीं समझा जाता था. बाइक की रफ़्तार 100 होती थी और काम की रफ़्तार शून्य. घरवाले पराए लगते थे और लड़कियां सबसे बड़ी हमदर्द. बनियान दिखाने से व्यक्ति माचो बनता था और पूरी शर्ट पहनने में फैशन चला जाता था. बहन को बाजार ले जाने में शर्म आती थी, प्रेमिका को वन पीस में घुमाने में शान बढ़ती थी. मम्मी के कहने पर पानी देने में पीठ दर्द का एहसास होने लगता था और बस के बगल में बैठी लड़की के लिए बड़े ही शान से शीशा खोलने में ताकत का एहसास होने लगता था.

बंगलुरु रहने के लिहाज से सुंदर शहर माना जाता है.
बैंगलोर का मौसम मुझे कतई नहीं पसंद. आप सोच रहे होंगे कि बैंगलोर में कितना अच्छा मौसम रहता है. हमेशा सुहावना-सुहावना. फिर क्यों? जी हां, बैंगलोर में हर समय एक जैसा ही मौसम रहता है. वहां का मौसम कुछ इस तरह रहता है- सुबह थोड़ी ठण्ड, दिन चढ़ने के साथ धूप निकलनी शुरू होती है. दिन ढलने से पहले ही मौसम अपने रंग फिर से बदलने को लालायित हो उठता है और धीरे-धीरे बादल आने शुरू हो जाएंगे फिर शाम को बरसात. जिस तरह उत्तर भारत में एक साल में ये तीन मौसम अपना रंग बदलते है उसी तरह बैंगलोर एक दिन में उतने मौसम दिखा देता है. किसका दिल नहीं करता कि ऐसे सुहाने मौसम में वह अपनी प्रेमिका की गोद में सर रखकर न बतियाए. उसके मखमली हाथों का स्पर्श अपने माथे पर न होने दे. प्रेम में भीगी उसकी आंखों का पान करना कौन नहीं चाहेगा. उसके हाथों को अपने हाथों में थामकर मोहब्बत के प्रतीक उन फूलों की झाड़ियों के नीचे कौन नहीं बैठना चाहेगा?
पर मेरे प्रेम और मौसम दोनों का बड़ा गहरा नाता रहा है. जब मैं स्कूल में था, मेरा साल कुछ यूं गुजरता था. पहले साल भर एक डेस्परेट लड़के की भांति किसी लड़की को लाइन मारता. उसके स्कूल से लेकर कोचिंग, खाने से लेकर पीने, दोस्तों से लेकर रिश्तेदारों सबकी खबर रखता. मेरे मन को आप टेम्परेचर नापने वाली मशीन भी कह सकते हैं. वह इसीलिए कि लाइन मारते-मारते जब मेरा मन यह अनुमान लगा लेता कि अब सामने वाली लड़की के दिल का लोहा गरम हो चुका है. तब तक नया वर्ष निकल चुका होता और मैं उसे प्रपोज़ करने के लिए शुभ घड़ी का इंतज़ार करने लगता. वह शुभ घड़ी, प्रेम चतुर्थी यानी वैलेंटाइन डे से बेहतर क्या दिन हो सकता है.

बंगलुरु में मौसम के कई मिजाज़ एक दिन में ही दिख जाते हैं.
बड़ा सज धजकर जब मैं ‘प्रेम चतुर्थी’ के दिन अपने साल भर के इश्क़ का इज़हार करने जाता तो मैं इस बात से भी डरा रहता कि कहीं एक वर्ष की मेहनत की अर्थी न निकल जाए. किसी तरह प्रपोज़ करता पर लड़की चौथी तक इंतज़ार करने के लिए कह देती. यानी वह सोचकर बताएगी. जब गर्मी शुरू होने वाली होती, तो कहीं जाकर मार्च के अंतिम वीक में लड़की ‘हां’ कहती थी. गर्मी में वह या तो कहीं रमणीय स्थल घूमने चली जाती या फिर अपने मामा के यहां चली जाती. वापस आते-आते बारिश का सुहाना मौसम आने लगता और मेरे मन में कई तरह के ख्याल बुनने लगते. उस मौसम में अपनी प्रेमिका को घुमाने के सपने देखने लगता. पर जब वह वापस आती तो बारिश में मेरे अरमान भी धुल जाते क्योंकि अपने मामा के यहां अरमान नाम का उसे नया लड़का मिल गया होता. इस तरह मेरी मोहब्बत गर्मी के मौसम में परवान चढ़ती और सुहावने मौसम में मैं प्रेमिका विहीन हो जाता. बदकिस्मती से बैंगलोर का मौसम इतना सुहावना रहता कि मुझे अपनी प्रेमिका मिलने की कोई आस ही नहीं दिखती थी.
पर कहते हैं, घूरे के दिन भी फिरते हैं. मेरे दिन भी बदले. मेरे प्रेम और मौसम ने अपनी दुश्मनी दशहरा के दिन खत्म कर दी. आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यों? दशहरा आपसी द्वेष को भूलकर सद्भाव से मिलने का त्योहार है. प्रेम और मौसम में इस दिन से दोस्ती शुरू हो गई. यह मेरे लिए बिल्कुल उसी तरह की स्थिति थी मानो एक राष्ट्रवादी विचारधारा वाला व्यक्ति राम मंदिर छोड़कर समाज कल्याण में वामपंथियों का साथ देने लगे.

बारिश में बंगलुरु खूबसूरत लगता है.
मैं अपने ऑफिस में बैठा हुआ पंद्रह इंच की स्क्रीन की दुनिया में खोया हुआ था. वैसे भी इस पंद्रह इंच की स्क्रीन की अपनी अलग दुनिया है. इसमें नौकरी भी है. छोकरी भी है. यहां तक कि फेसबुक, ट्विटर नामक कई समाज भी जिन्होंने देश, जाति, सम्प्रदाय के बंधन को तोड़कर अपना समाज बनाया. इसमें स्कूल भी है जहां ज्ञान मिलता है और लूट-पाट भी होती है. पूरी तरह से एक दूसरी दुनिया. जिस दूसरी दुनिया का बचपन से हम सपना देखते थे, वह किसी और गृह पर नहीं, इस पंद्रह इंच की स्क्रीन में है. तभी तो इसे नाम दे दिया गया है- वर्चुअल वर्ल्ड. खैर, मैं अपने इस वर्चुअल वर्ल्ड में खोया हुआ काम कर रहा था तभी मेरे ठीक दाईं तरफ बगल वाली सीट पर एक हमउम्र लड़की आकर बैठ गई. बिलकुल छरहरी काया, बिलकुल उतना ही वेट, जितना जरूरी है, न तनिक भी ज्यादा न कम. सही जगह पर सही मांस. इसे आजकल नाम भी दे दिया गया है, 'जीरो फिगर'. उसने नीले रंग की सलवार कमीज पहनी थी, हाथों में बड़े-बड़े कंगन चमक रहे थे और कानों में लटकते हुए बड़े-बड़े बाले. वैसे कॉर्पोरेट वर्ल्ड में ऐसे कपड़े पहनकर लोग कम ही आते हैं, पर वह कोई अलग ही बंदी थी बिलकुल अलग. उसके ऊपर ये कपडे ऐसे जंच रहे थे जैसे बेहतरीन सी किताब पर उसका कवर, उसे और भी निखार देता है. मुझे उसका बायीं तरफ का गोरा गाल और आंख दिख रही थी, जिस पर हल्का-हल्का काजल लगा हुआ था. पलकों पर हलके रंग के ऑय शैडो. कुछ बाल उसके गाल को छूकर हवा में लहरा रहे थे. बिलकुल दूध से धुली काया. मानो कोई परी अचानक उतर आई हो मेरे बगल में.
मैं उसे निहारे ही जा रहा था, तभी वो मेरी तरफ चेहरा कर बोली,‘हाय!!’ मेरे तो मानो होश ही उड़ गए. सन्नाटा छा गया मेरे कानों में. कुछ देर के लिए मेरी पलकें एकटक उसे देखती रहीं. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी हैरतअंगेज चीज़ को देखने के बाद आंखें हटती नहीं हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे गिफ्ट पैक का बड़ा सा डिब्बा खोलने पर एक सस्ता सा पेन निकल आए. बिल्कुल वैसे ही जैसे बीवी का घूंघट उठाने पर एक लड़का निकल आए.
वास्तविकता यह थी कि जब तक मैंने उसका दायां गाल नहीं देखा था, तब तक तो उसके अंदर हर अच्छाई दिख रही थी. पर जैसे ही उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा, उसका पूरा चेहरा मुझे नजर आ गया. मैं अवाक- सा रह गया, मेरी भौचक्की आंखें उसी की ओर घूरे जा रही थीं. मैंने उसका पूरा चेहरा देखने से पहले ऐसी कल्पना भी नहीं की थी. उसके दाएं गाल पर एक बड़ा सा धब्बा बना हुआ था. जिसने उसके चेहरे को बदसूरत बना के रख दिया था. मेरी नजरें उससे हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं अनचाहे उसे घूर रहा था. शायद वह भी मेरी भावनाओं को समझ गई थी क्योंकि मैंने उसके "हाय" का जवाब भी नहीं दिया था और स्तब्ध बैठा निहार रहा था. मेरा मनोभाव समझकर तुरंत अपना चेहरा मोड़कर वह अपने कंप्यूटर पर काम करने लगी. मेरे मन में विचित्र-सा एहसास हो रहा था.

मैंने इससे पहले ऐसा कभी महसूस नहीं किया था. भगवान ने भी कैसे इतने खूबसूरत चेहरे को बिगाड़कर रख दिया था. ऐसा लग रहा था जैसे इंसान को बनाने वाला इंजीनियर इसे बहुत सुन्दर बनाना चाह रहा था, जब सिर्फ एक तरफ का गाल ही बचा था तब उसे खूब जोर से सूसू लग आई और दूसरा गाल बनाने की प्रक्रिया बड़ी जल्दबाज़ी में सिर्फ खानापूर्ति में ही निभायी हो. ऐसा लग रहा था कि प्रेम करते समय उसके पापा मम्मी बड़े मन से एकदूसरे से जुड़े हो पर तभी फूफा के छोटे से बच्चे ने कुण्डी खटका कर उनकी तन्मयता भंग कर दी हो और उन्हें प्रेम की प्रक्रिया का अंतिम क्षण जल्दबाजी में निपटाना पड़ा हो. उसको काम करता देख, मैंने भी खुद को कंप्यूटर में काम करने के लिए विवश किया पर अब काम में कहां मन लगने वाला था? मेरे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या प्रतिक्रिया दूं इस पर. भगवान को कोसूं या फिर उससे नफरत करूं.
बार-बार न चाहते हुए भी उसके चेहरे की तरफ देख लेता. मानो अदृश्य-सा कोई चुम्बक था उसके पास. मैं न चाहते हुए उसके आकर्षण से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा था और अनायास ही नज़रें उसके चेहरे पर टिक ही जातीं. कभी-कभी हमारी आंखें मिलतीं तो वह झेंप जाती. कभी-कभी वह मुझे उसकी ओर देखते हुए पकड़ लेती और फिर अपना चेहरा सीधा करके असहज होकर कंप्यूटर पर काम करने लगती. वह जान गई थी कि मैं उसके चेहरे पर बने हुए दाग के कारण उसके साथ ऐसा बर्ताव कर रहा हूं. पर मैं भी नासमझ था, बार-बार उसे देखे जा रहा था. शायद पहली बार इतनी खूबसूरत लड़की का दूसरा पहलू देख रहा था.
इस वजह से मन दुखी था. खैर, किसी तरह ऑफिस खत्म हुआ, मैं घर पहुंचा, भोजन किया, बिस्तर में लेट गया पर अगले दिन सुबह तक उसका चेहरा हर मिनट मेरे मन में कौंधता रहा. वह रह-रह कर मेरे मन में प्रवेश कर जाती थी. उसका एक तरफ का सुन्दर सा परी जैसा चेहरा और दूसरी तरफ वो दाग. कहते है चांद में भी दाग होता है पर यह दाग कुछ ज्यादा ही डरावना था. जब तक मैंने उसका दायां गाल नहीं देखा था, तब तक धूम-2 फिल्म के सहायक नायक अली की तरह मेरे मन ने कई तरह के सपने संजो लिए थे. पर दूसरा गाल देखते ही मेरे सपने भी उसी अली की तरह तुरंत टूट गए थे.
किसी तरह मेरी रात कटी और फिर से दिन भी कट गया. अब मेरे मन ने उसका वह चेहरा स्वीकार कर लिया था. कुछ समय लगता है अनचाही चीज़ को अपने मन को स्वीकार करने में. अभी उसको आए दो हफ्ते हुए थे, पर न वह किसी से ज्यादा बात करती थी, न ही हंसती थी. बस अपनी सीट पर बैठकर पूरी तन्मयता के साथ अपना काम करती. कभी गाल पर हाथ रखे घंटों किसी ख़याल में खोयी रहती. उसकी आंखों की पुतलियां स्थिर रहतीं टेबल पर पड़े किसी वस्तु पर. उस समय उसकी स्थिर आंखों में मुझे एक उफनता हुआ समंदर दिखता था. काम करते वक़्त भी मैं उसे बार-बार कनखिओं से देख ही लेता था. कभी-कभी हम दोनों के बीच औपचारिकतावश कुछ बातचीत हो जाती थी. पर तब भी मेरे कान से ज्यादा आंखें ही सक्रिय रहतीं. जब वह इस बात को भांप लेती तो अचानक ही बीच में बोलना छोड़कर काम में लग जाती. और शाम को चुप-चाप फिर बैग उठाकर चली जाती.
बुक का नाम: ज़िन्दगी 50-50
लेखक: भगवंत अनमोल
प्रकाशन: राजपाल एंड सन्स
कीमत: 175 रुपए
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राही का मासूम टोपी शुक्ला बिल्कुल अपने जैसा था

