आज अनिल यादव पैदा हुए थे. मतलब हैं वो अभी भी. पर पैदा तो एक ही बार होंगे न. तोबधाई. आपको. उन्हें क्या देना. महाठस आदमी हैं. कभी मिलेंगे. तो छाती से भींचलेंगे. वैसे भी ये शुभकामनाओं टाइप की चीज से वो लटपटा जाते हैं. मुंह ऐसा बना लेतेहैं, जैसे कंचा छीन लिया हो और भुनकने भी न दे रहे हों.पर लल्लन, ये अनिल कौन है? और सौरभ क्यों निहाल हो रहा है उन पर? भंते. अनिल यादवफक्कड़ आदमी है. पत्रकार था. किसी मंतरी और संतरी को मुंह नहीं लगाया. पॉलिटिक्सकवर करता था. अपनी ईमानदारी भी कवर किए रहा. न्यूजरूम में सब कहते. भंगेड़ी हैससुरा. दुनियादारी की डैश समझ नहीं. पर उन्हें समझाए कौन. कि पिनक में तो सब हैं.बस इसकी तुमसे मैच नही करती. खैर.फोटो क्रेडिट: उदय शंकरएक दिन ऐसे ही सनक सुट्ट में लौंडे ने उठाया झोला. दसियों साल पहले. और चला गयानॉर्थ ईस्ट. बोला, असम में बिहारी मजदूर मारे जा रहे हैं. उन पर रिपोर्टिंग करूंगा.जैसे दिल्ली की टीवी और अखबारों को सारा ऐड वहीं से मिलता हो. पर बाजार उसके लिएतीन टाइम का खाना, गाना भर देता था. बाकी वो अपने भीतर ही उगा लेता था. सो निकलपड़ा. घूमा.लौटा होगा कभी. राम जाने. ऐसों का कोई भरोसा भी तो नहीं.नहीं, नहीं. फिर उसने एक दिन पोथी लिख दी. नाम धरा, 'वह भी कोई देस है महराज'. औरमैं छाती ठोंककर कहता हूं. हिंदी में इस तरह की दूसरी कोई किताब नहीं लिखी गई. नजबान के मामले में, न जान के मामले में. अगर आपने ये किताब नहीं पढ़ी है तो फौरनइंटी-गुलंटी बांध लो. और तभी खोलना, जब खोजकर, खरीदकर पढ़ लो.यादव जी चंपे हुए हैं. उन्होंने एक और तेजाबी किताब लिख मारी. कहानियों की. उसकानाम है 'नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं'. आप इसको पढेंगे न. तो मन ऐसा हो जाएगा किजैसे मसट्ट मारके बिना हल्ला किए कोई भारी गम आ जाए और आदमी रोना भूल जाए. जो आवाजनिकले, वो निरी अजानी और बेसुरी हो. इस किताब की कहानियों का सच ऐसा ही है.अभी चाय पी रहा था तो पत्रकार साथी विवेक बोले, अरे पुरानी किताबों में उलझे हो.उनका कोई नया नॉवेल आ रहा है. उस पर लिखो. तो अनिल महराज. लल्लन गणतंत्र केनागरिकों को जल्द अनंत और पेंग्विन का टुकड़ा चखाएं. पता करना है कि नहीं कि सब पकगया या नहीं और नमक कैसा है.खूब मुबारक. स्वस्थ रहो गुरु. ताकि भोलेशंकर के परसाद में लौ लगी रहे. परिवार परनेह बरसता रहे. और कलम थरथराए नहीं. स्याही सूखे नहीं. और हमारे फोन में जो नंबरहै. अनिल महाराज. उस पर हम साल 9 जनवरी को डायल बटन दबाते रहें.पढ़िए वह भी कोई देस है महाराज का एक हिस्सा, किताब मिलेगी अंतिका प्रकाशन पर. गौरीनाथ का पब्लिकेशन है ये.*** काली को कोक भोग जिरो घाटी में जिस साल कुरू हसांग का जन्म हुआ, तब तक अपातानीआदिवासी पहिए जैसी किसी चीज के बारे में नहीं जानते थे. हालांकि वे अरूणाचल केआदिवासियों में स्थायी खेती और सिंचाई प्रणाली विकसित करने के चलते सबसे आधुनिकमाने जाते हैं. अब भी नब्बे प्रतिशत से अधिक जमींनों पर जंगल जलाकर झूम खेती ही कीजा रही है. 1963 में उसका भुवनेश्वर के सैनिक स्कूल में दाखिला हुआ तो पिता नेपारंपरिक रीति से डिम्ब (अंडे) की बलि देकर गांव की सीमा से अनंत, अज्ञात दुनियामें विदा किया था. पांच साल के भीतर एयर फोर्स में कमीशन पाकर वह पायलट हुआ औरलड़ाकू विमान मिग उड़ाने लगा. अरूणाचल राज्य बनने के बाद राजनीति में किस्मत आजमानेके लिए 1978 में फ्लाइट लेफ्टिनेन्ट के ओहदे से रिटायरमेंट लेकर वह गांव लौट आयाथा. अधेड़ कुरू हसांग कई चुनाव हारने के बाद उस वक्त अरूणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटीके महासचिव थे और हपोली कस्बे में उनकी पत्नी एक मेडिकल स्टोर चलाती थीं.नोक्टे, खाम्पटी, सिंगफो, निशि, टागिन समेत कई आदिवासी जातियों के अपने ऐसे अपवादसरीखे नायक हैं जिन्होंने संयोगों के कारण इसी जीवन में कई जीवन देखे हैं. उन्होंनेइतनी दूरी तय की है जितनी बाकी मानव सभ्यता ने कई हजार सालों में की होगी. अरूणाचलमें साठ से अधिक आदिवासी जातियां हैं और करीब पचास से अधिक ज्ञात भाषाएं हैं. हरपुराने सरकारी अफसर के पास ऐसे कई किस्से होते हैं जिनकी शुरूआत इस भाव से होती हैकि जब वे आए थे तो नंगेपन की सनसनी के अभ्यस्त होने के कारण आदिवासियों की ओर देखतेनहीं थे और जब देखना शुरू किया तो क्या हुआ.... यहां का पुरातन लिखित इतिहास भी बसतीन सौ साल पुराना है.खुद अरूणाचल ने भी ऐसी ही रफ्तार से लोकतंत्र में छलांग लगाई है. आजादी के पहले इसइलाके का सरकारी नाम ‘आदिवासी इलाका’ था. अंग्रेजों के सर्वे टीमें यदा कदा सैन्यटुकड़ियों को साथ सड़क और रेल बनाने की संभावना जांचने जाती थीं ताकि पूर्वी देशोंके साथ ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार बढ़ाया जा सके. 1954 में सीमांत के कामेन्ग,सियांग, सुबंसरी, लोहित, तिराप और तुएनसांग डिविजनों को मिलाकर नार्थ ईस्ट फ्रंटियरएजेन्सी (नेफा) का गठन किया गया जो लंबे समय तक विदेश मंत्रालय के अधीन रहा. 1972के बाद तुएनसांग नागालैंड में चला गया और बाकी बचा हिस्सा अरूणाचल प्रदेश हो गया.1962 की लड़ाई में चीन से हार के बाद केंद्र सरकार ने सड़क और संचार के नेटवर्क परअधाधुंध पैसा झोंका है जो बोलता है. 78000 वर्ग किलोमीटर में कुल नौ लाख लोग बसतेहैं लेकिन टेलीफोन के खंभे हर जंगल में हैं. रसद सामग्री के साथ नेताओं, अफसरों औरसैनिकों को ले जाने के लिए सिलीगुड़ी और डिब्रूगढ़ से सेना के कई जहाज नियमित उड़तेहैं जिन पर प्रतिदिन औसत चार करोड़ रूपए का खर्च आता है. राज्य में सौ के आसपासहेलीपैड हैं. हेलीकाप्टरों के धुंध में भटक जाने के कारण हुई दुर्घटनाओं मेंसर्वाधिक मंत्री, मुख्यमंत्री और पायलट यहीं मारे गए हैं.मैं हपोली जाकर कुरू हसांग और उनकी पत्नी से मिलना चाहता था. फौज से पहली छुट्टी केदौरान अपने गांव की उनकी स्मृतियों पर लंबा इंटरव्यू करना चाहता था लेकिन भटक करतवांग पहुंच गया. उस दिन भालुकपांग में एक महायानी बौद्ध भिक्षु के भीतर बचा रह गयाकवि जाग गया था. उसने बस इतना कहा था, ‘जब तक बाकी दुनिया में पौ फटती है तवांग धूपमें दो घंटे खेल चुका होता है.‘...मेरे पास तो बनारस के दोस्तों के दिए कुछ लामाओंके नाम भी थे जो कभी सारनाथ धर्म पढ़ने गए थे, अब अरूणाचल के मठों में रहते थे. सोएक बहुत लंबी, सर्पिल सड़क पर चल पड़ा जिस पर बादलों का नजरबंद था और बर्फ कारेगिस्तान था. आसमान में उतनी तरह के नीले रंग देख पाना फिर कभी संभव नहीं हुआ.बोमडिला पहुंचने से पहले मुझे अंदाजा नहीं था कि टाटा सुमो पहले और दूसरे गियर मेंड्राइवर की आशंकाएं किसी वफादार घोड़े की तरह समझती होगी. दुर्गम पहाड़ में ड्राइवरहोने के लिए खास तरह के कान चाहिए होते हैं जो इंजन के शोर के बीच उसकीफुसफुसाहटों, कराहों और सिसकियों को सुन सकें. अलग किस्म की संवेदना की जरूरत होतीहै ताकि एक्सीलरेटर और ब्रेक गाड़ी से उखड़ कर शरीर में फिट हो जाएं और हर कंपन एकस्पष्ट विचार में बदल जाए. आगे-पीछे अंकित सस्ती समझी जाने वाली शायरी में अक्सरगाड़ी खुद एक प्रेमिका पात्र की तरह अकारण नहीं आती, उसकी बुनियाद में आदमी और मशीनका जीवंत संबंध और साथ जीने-मरने का वादा होता है. नेचि फू पास पर 6000 फीट कीऊंचाई से उतरते हुए कई बार मैने टाटा सुमो को कटी पतंग की तरह खाई में लहराते देखाजिसे हेलीकाप्टर समझ कर नीचे घाटी के बच्चे हाथ हिला रहे थे. हर बार ड्राइवर को गौरसे देख लेता था, कहीं मेरे भीतर का डर उसे प्रभावित तो नहीं कर रहा है लेकिन वह तोगहरे ध्यान में था. ऐसे दिक, काल में जहां सवारियों का अस्तित्व समाप्त हो चुका था.साढ़े आठ हजार फीट की ऊंचाई पर बसे बोमडिला से अनंत रूपों में तिरते बादलों काखिलवाड़ शुरू होता है. अचानक आया कुहरा दुनिया को ओझल कर देता है, जरा देर में झक्कधवल हिमालय ठीक सामने दिखने लगता है. यह पश्चिम कामेन्ग का जिला मुख्यालय है जहांमोम्पा, शेद्रुकपेन, अका, मिजी और बगुन आदिवासी हैं. कुत्ते कुख्यात हैं जो रात मेंशून्य से नीचे की ठंड में आदमी को फाड़कर खा भी सकते हैं. जैव विविधता ऐसी है कियहां की एक सरपतनुमा वनस्पति का एक ट्रक गुवाहाटी पहुंचा देने पर एक नए ट्रक कीचेसिस मिल जाती है. यह टैक्सस बकाटा है जिससे कलकत्ते में कैंसररोधी रसायन टैक्सालनिकाल कर यूरोप भेजा जाता है. बाजार में एक बूढ़े ने किसी अदृश्य स्मारक का परिचयकराने के भाव से कहा, “लड़ाई में चीनी यहां तक आए थे.”सोने की जगह दिरांग घाटी में स्लेट की छत वाले एक ढाबे में मिली. उतरती रात कोउन्मादी हवा सीटियां बजा रही थी लेकिन तापमान तेजी से गिरने के कारण उसके सामनेखड़े रह पाना मुश्किल था. स्लीपिंग बैग के ऊपर दो रजाइयों के बावजूद ठंड हड्डियोंमें घुसी जा रही थी. ढाबे की मालकिन ने मुझे भट्टी के पास बैठने तो दिया लेकिन सोनेसे पहले अपने भयानक कुत्ते को ताकीद भी कर गई थी, देखना कोई भी बाहर न निकलने पाए.चांदनी में बर्फीला हिमालय देखने की लालसा से जैसे ही जरा सा कदम उठाता कुत्ता दांतपीसकर किसी सम्राट की तरह गुर्राता था, ‘जरा देर का नयनसुख या जिन्दगी, पहले सोच लोतुम्हें चाहिए क्या! मन मसोस कर अपनी जगह वापस बैठना ही पड़ता था.सुबह मैं लामा नवांग लामसांग को खोजने आठवीं शताब्दी में प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यपद्मसंभव द्वारा एक पुराने किले दिरांग जोंग में स्थापित गोम्पा (मठ) में गया. यहइलाका भारत कम तिब्बत ज्यादा है जहां पद्मसंभव को लोपोन रिमपोछे के नाम से जानाजाता है. छोटे से मठ के गर्भगृह में लामा बच्चे पुरानी पोथियों में से कुछ पढ़ रहेथे. एक बूढ़े लामा ने बताया कि वे बाहर गए हैं, दिरांग में नहीं हैं. कुछ सोचने केबाद उसने टिन का एक पिचका बक्सा खोलकर उसमें रखा एक बहुत पुराना पत्थर निकाल करमेरी हथेली पर रखा, “यह एक दानव का हृदय है जिसे यहां मारा गया था. उसके बाद मोनजनजाति बौद्ध हो गई.” “उसका हृदय पत्थर का कैसे हो गया?” ”पत्थर का नहीं और कैसाहोगा...दानव था.” बौद्ध धर्म की विजय के उस प्रतीक पर अविश्वास करने का अब कोई कारणनहीं बचा था.दिरांग से सेला पास की ओर चढ़ते हुए बनस्पतियां गायब होने लगती हैं, अंत मेंग्रेनाइट की काली चट्टानों पर बर्फ और कहीं कहीं गद्दे जैसी घास बचती है. धुंध मेंचींटी चाल चलते सेना के ट्रक कराहते हैं, चरते हुए याक दिखते हैं और आक्सीजन कीकिल्लत के कारण सांस लेने में उलझन होती है. चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर सेला दुनियाका दूसरा सबसे ऊंचा दर्रा है जहां गाड़ियां पहुंचती हैं. उस ऊंचाई से बार्डर रोडआर्गनाइजेशन के पराक्रम से बनी घुमावदार सड़कें लापरवाही से तिकल्ला कर फेंका गयापतंग का मंझा लगती हैं. सेला के गेट के तुरंत बाद बाएं हाथ पर किनारे पर जम चुकी एकझील थी, बीच में जरा से बचे नीले जल में ब्रह्मांड की परछाईं झिलमिला रही थी. कुछनए रंगरूट वहां बर्फ गोले फेंकते हुए फोटो खींच रहे थे. गेट के पास पत्थर की झोपड़ीमें एक चाय की दुकान थी जिसकी छोटी सी खिड़की से बादलों की परतों में छिपी घाटियांझिलमिला रही थीं. एक परिवार था जो फौजियों और पर्यटकों को चाय बेचकर गुजारा कर रहाथा. चाय बनाने वाले ने फौजियों की ओर मुंह की भाप छोड़ते हुए बड़प्पन से कहा, “किसीजगह पहुंचने में जितनी तकलीफ होगी वह उतनी ही सुंदर होती जाएगी...लेकिन कितने दिन.”उस वीरान पहाड़ी रेगिस्तान में सबसे सुंदर चीज सफेद झंडे थे जो बर्फीली हवा मेंफड़फड़ा रहे थे. इस इलाके में रिवाज है कोई मन्नत मानता है तो एक सफेद झंडा गाड़देता है. इस यकीन में जीता होगा कि प्रार्थना हवा में उड़ती हुई एक दिन सही ठिकानेपर पहुंच जाएगी.ढलान शुरू होते ही ड्राइवर फिर ध्यानमग्न हो गया. थोड़ी देर पहले बारिश हुई थी.चट्टानों के किनारों पर टपकता पानी बीच में ही जम गया था जिससे विचित्र आकृतियां बनगई थीं. उनमें बर्फ के खंजर सबसे ज्यादा थे. हरियाली जसवंत गढ़ के पास लौटनी शुरूहुई और जंग में एक पुराने मोम्पा घर में चूल्हे पर गरम पानी की केतली के बगल में रमकी बोतल रखी हुई थी. आपने कितने पेग पी यह गिनने के लिए एक बिल्ली स्टूल पर बैठीथी. हवा से सहन में टंगी घंटियां बज रही थीं. मालकिन बाहर बैठी थी जिसे यकीन था किजानलेवा सर्दी लोगों को ईमानदार बना देती होगी. उतरती शाम में तवांग गोम्पा कीसुनहरी छतें मोड़ों से दिखने लगीं थी, कलक्टर से कह कर सर्किट हाउस में एक ठाठदारसुइट बुक कराया जा चुका था.रह रह कर उखड़ती सांसों के बीच शुद्धतम हवा पीता हुआ, सारनाथ से आए किसी लामा कापता लगाने मैं दोपहर में गोम्पा पहुंचा. गेट पर घूमता धर्मचक्र बेहद सर्द था. किशोरभिक्षु प्रार्थना हाल के बाहर मैदान में दलिया खा रहे थे. उनके ऊपर फड़फड़ाता ध्वजहवा के वेग से साठ फीट ऊंचे खंभे को कंपा रहा था. उनकी पीठ की ओर महायान संप्रदायके इस जगप्रसिद्ध मठ का म्यूजियम था जिसमें हाथी का एक अतिविशाल दांत, पुरातन वाद्ययंत्र, भिक्षुओं की वस्तुएं और नक्काशी किए हुए सोने, चांदी से मढ़ी मानव खोपड़ियांरखी थीं. एक लाइब्रेरी थी जिसमें सात सौ साल से अधिक पुरानी पांडुलिपियां रेशम मेंलपेट कर रखी गई थीं. प्रार्थना हाल तीन सौ साल पहले तिब्बत से लाई गई बुद्ध की बीसफीट से अधिक ऊंची प्रतिमा से परावर्तित प्रकाश से आलोकित था. दीवारों पर तांत्रिकअनुष्ठानों के चित्र बने हुए थे.इतनी विशाल प्रतिमा यहां तक कैसे पहुचीं, पहले इसकी कई किवंदंतियां थीं. आधी सदी सेपहले एक तेज भूकंप में इसके दरक जाने के बाद कई नई कहानियां जुड़ गईं. 1997 मेंयहां परम पावन दलाई लामा आए, उनके आदेश से नेपाल से कुशल मूर्तिकार मरम्मत के लिएबुलाए गए. तब प्रतिमा के भीतर से मिले दस्तावेजों से पता चला, बुद्ध का हर अंगअलग-अलग दक्षिण तिब्बत में गेलुग्प संप्रदाय के उपासकों गढ़वाया था जिन्हें घोड़ोंपर ढोकर लाया गया.म्यूजिम के इंचार्ज लामा से मैने पूछा, यहां इतनी खोपड़ियां क्यों रखी हुई हैं.उन्होंने एक चित्र में पेन्डेन लमू (काली) की पहचान कराते हुए कहा, “उनमें तांत्रिकलामा कभी पूजा के दौरान मदिरा चढ़ाते थे…लेकिन अब पेप्सी या कोक अर्पित किया जाताहै.“ “वह कहां मिलता है?” “बाजार में जनरल स्टोर से!”, लामा ने मुझे आश्चर्य सेदेखते हुए कहा.ल्हासा (तिब्बत) के बाद तवांग दुनिया में दूसरे नंबर का सर्वाधिक प्राचीन महायान मठहै जिसे सत्रहवीं शताब्दी में मेरे लामा लोट्रे ग्यात्सी ने अपने घोड़े की सलाह परस्थापित किया था. तिब्बती में तवांग का अर्थ घोड़े द्वारा चुना गया स्थान होता है.तांत्रिक पीठ के रूप में दुनिया भर में इसकी मान्यता है, सत्रह मठ इसके प्रशासनिकनियंत्रण में हैं. बहुत दिन नहीं बीते जब जमींन का टैक्स वसूलने तिब्बत के संग्राहकतवांग के गांवों में आया करते थे. अरूणाचल राज्य बनने के समय चीन ने इसी आधार पर कईक्षेत्रों को भारत का हिस्सा बताने पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया था. बाजार मेंतिब्बती चिकित्सा पद्धति के दो दवाखाने भी हैं.शाम को बाजार में बाइक पर सवार एक चीवरधारी लामा ने बताया, इस बार बौद्ध महोत्सवमें गाने के लिए जसपिन्दर नरूला को बुलाया जा रहा है. उदित नारायण गाकर जा चुका है.कोयला की शूटिंग के समय शाहरूख और माधुरी दीक्षित भी आ चुके हैं. उससे मैने पूछा,पूजा में देसी दारू की जगह मल्टीनेशनल पेप्सी क्यों चढ़ाया जाने लगा तो उसने आंखमार कर मौज में जवाब दिया, “बुद्धिज्म भी तो मल्टीनेशनल धर्म है, हर्ज क्या है!”लामा के फर्राटे से निकल जाने के बाद अचानक समझ में आया कि ग्यारह हजार फुट कीऊंचाई पर इस लगभग निर्जन इलाके के बौद्ध मठों की जिन्दगी कितनी बदल चुकी है. दोमहीने पहले स्त्रियों के मठ (ग्यांयांग अनि गोम्पा) में बीएसएनएल के सिम वालेमोबाइल फोन पहुंचे हैं. दूसरे मठों के मित्रों की खैर खबर लेने के लिए भेजे गए उनकेएसएमएस कई कई दिन घाटियों की धुंध में झूलते रहते हैं. दूसरा बड़ा परिवर्तन मठोंमें केबिल कनेक्शन वाले टीवी का पहुंचना है. जिन पुरातन इमारतों का सन्नाटा सदियोंतक आदमी की जांघ की हड्डी से बने वाद्ययंत्रों से टूटता था उनमें रहने वाले लामा अबसीरियलों और फिल्मों पर खूब बात करते हैं. उन दिनों बाइक के एक विज्ञापन का जिंगलहुड़ीबाबा बाकी किशोरों की तरह लामाओं में भी हिट था. टीवी अपने साथ वर्षों तक चलनेवाला लंबा शास्त्रार्थ लेकर आया था. पुराने भिक्षुओं का कहना था, औरत की अर्धनग्नदेह और फिल्मों की हिंसा ब्रह्मचारियों को भ्रष्ट करेगी. युवाओं का कहना था,जबरदस्ती होगी तो चोरी, छिपे कहीं और देखेंगे जिससे झूठ, अपराधबोध जैसी विकृतियांआएंगी. अंततः टीवी जीता और साधना के नीरस जीवन में रंगीन दुनिया दाखिल हो गई.अगले दिन मठ में नए भिक्षुओं को पढ़ाने वाले अध्यापक लामा थोन्डू मुझे अपनी कोठरीमें ले गए. उन्होंने खुद चाय बनाकर पिलाई. साधक की दिनचर्या के बीच उन्होंने बताया,परम पावन दलाई लामा जब यहां आए तो थोड़े से युवा लामाओं ने उनसे पूछा था- भगवानबुद्ध ने जब मदिरा का निषेध कर दिया था तो उसका पूजा में प्रयोग क्यों किया जा रहाहै. यह व्यवस्था उनकी दी हुई है कि तंत्र में मदिरा के स्थान पर चायपत्ती के घोल,फलों के रस का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन आसानी से उपलब्ध होने के कारण चलनपेप्सी का हो गया. कई पुराने तांत्रिक अब भी मदिरा का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इसेहतोत्साहित करने की कोशिश की जा रही है.टीवी आने से जरा पहले मठ में बहस चली थी, लामाओं को राजनीति में जाना चाहिए यानहीं. इस मठ से जुड़े बुद्ध के अवतार समझे जाने वाले टीजी रिनपोछे लुमला विधानसभासीट से चुनाव लड़े, मुकुट मिथि और गेंगांग अपांग दोनों की सरकारों में दल बदल करमंत्री भी बने थे. पुरानों का कहना था राजनीति साधु को भ्रष्ट बनाएगी, नयों काआग्रह था कि जनसेवा का व्यावहारिक मौका चूकना नहीं चाहिए. राममंदिर आंदोलन के बादभाजपा के टिकट पर संसद में पहुंचने वाले हिन्दी पट्टी के बाबा यहां रोल मॉडल के तौरपर पेश किए जाने लगे. इस मठ में तीन सौ ज्यादा वोटर हैं चुनावों के दौरान सभी दलोंके प्रत्याशी प्रचार करने आते हैं. बाइक और मोबाइल संपन्न पृष्ठभूमि वाले अधिकांशलामाओं के पास पहुंच रहे हैं. चकाचौंध से खिंचकर मठ छोड़ने वाले लामाओं की तादादबढ़ रही थी लेकिन मठाधीश चिन्तित नहीं थे. मोम्पा जनजाति में जिसके तीन बेटे हों,उसे बीच वाले को मठ को समर्पित करना पड़ता है. इसलिए आने वालों की भी कमीं नहीं थी.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़िए:नॉर्थ-ईस्ट के युवाओं में इतना फेमस क्यों है कोरियन कल्चर?कहानी लचित बोरफुकन की जिसने मुगलों का विजयरथ रोकने के लिए अपने ही मामा को मारदियाअलग राज्य की मांग के लिए हो रहे आंदोलन की बलि चढ़ा है ये पत्रकारअसम के इस टीचर की ज़लील हरकत देखकर, शैतान भी शर्म से डूब मरेगा--------------------------------------------------------------------------------वीडियो: वो लड़की जिसने पहले नीतीश को बिहार जितवाया और फिर बीजेपी को असम औरमणिपुर