टोपी शुक्ला इफ्फन की दोस्ती याद है. राही मासूम रज़ा की किताब टोपी शुक्ला पढ़ीहोगी तो याद होगा. दादी के मरने की दुआ करते दोस्त. घर पहुंचकर मरी दादी को देख रोपड़ते दोस्त. हां तो आज (15 मार्च) उन्ही टोपी शुक्ला और इफ्फन की दोस्ती को गढ़नेवाले राही मासूम रजा की पुण्यतिथि है. रज़ा ने कई किताबें लिखीं. नीम का पेड़ किताबपर तो शाहिद कपूर के पापा पंकज कपूर वाला सीरियल भी बना था. आधा गांव, कटरा बीआरजू, सीन 75, ओस की बूंद, दिल एक सादा कागज किताबें मासूम ने लिखीं. वेश्याओं कीजिंदगी पर भी राही मासूम रज़ा जाबड़ सी किताब लिख गए, कारोबारे तमन्ना. आगे पढ़िएराही मासूम रज़ा की किताब कारोबारे तमन्ना के अंश. किताब को छापा है राजकमलप्रकाशन ने.--------------------------------------------------------------------------------काहे मारयो नज़रियाउसका नाम आरजू था. शहर में नई-नई आई थी. हर तरफ उसका तज़किरा (ज़िक्र) था. शाम ही सेकल्लू मियां पानवाले की दुकान पर मजमा लग जाता, रिक्शेवाले से लेकर सेठ महावीरप्रसाद और हाजी बलाती के लड़के गजाधर और नुसरतुल्लाह तक तमाम लोग कल्लू पानवाले कीदुकान को घेर लेते. कोई एक साल पहले जब कल्लू ने यह दुकान खोली थी तो कैंची के खालीडिब्बों और आधी ढोली पान के अलावा दुकान में कुछ नहीं था. कैंची सिगरेट की खालीडिब्बियां सलीके से दुकान में सजी हुई थीं, यों ही कोई भूला-भटका पान खानेवाला आजाता तो कल्लू, बहराम की रिहाई या जंग-ए-इन्दलस वि़स्म की कोई किताब रख पान कीगिलोरियां बनाने लगता और फिर लेटकर किताब पढ़ने लगता. शौक़ीन पान खानेवाले तो उनदिनों सुखदेव की दुकान पर पान खाया करते थे, क्योंकि उन दिनों सुखदेव की दुकान केसामने कयामत आबाद थी. उन दिनों हीरा का ज़ोर था. सच पूछिए तो वह हीरा थी भी, औरकल्लू की दुकान के सामने शहर कांग्रेस कमेटी का दफ़्तर था. उस दफ़्तर में तमाम लोगपान खानेवाले थे. लेकिन गिलोरियां खानेवाले नहीं, बीड़े खानेवाले. फिर ऐसा हुआ किकांग्रेस ने अपने कार्यालय के लिए मकान बनवा दिया और कल्लू के सामनेवाला कोठा खालीहो गया और कुछ ही दिनों के बाद उसमें आरज़ू आ गई और कल्लू को बहराम की गिरफ़्तारी और‘ख़ूनी माशूक उर्फ़ उदास चबूतरा’ क़िस्म की किताब पढ़ने का मौक़ा कम से कम मिलनेलगा. कल्लू एक नमाज़ी परहेजग़ार क़िस्म का आदमी था, उसकी उम्र तो रही होगी यही कोईबाईस चौबीस साल की, लेकिन उसी उम्र में उसके माथे पर सजदे का एक हलका-सा निशान बनगया था. उसे आरज़ू का कारोबार पसंद नहीं था. लेकिन आरज़ू के आते ही उसकी दुकान मेंकैंची की खाली डिब्बियों की जगह कैप्सटन और विल्स की भरी हुई डिब्बियाँ आ गईं. आधीढोली की जगह कई ढोलियां ख्शर्च होने लगीं और फिर महीने, सवा महीने के बाद मजबूरनकल्लू को एक आदमी की ज़रूरत महसूस होने लगी. अब वह तन तन्हा (अकेला) अपना कारोबारनहीं चला सकता था. पहले वह गुरुबेआफ़ताब (दिन डूबने तक) दुकान बंद कर दिया करता था.मग़रिब और इशां के बीच का वक़्त वह नफिलें पढ़ने में गुज़ारता था. फिर पिछले पहर (सुबहसे पहले) वह कलमा शहादत पढ़ता उठ जाया करता था और फ़र्ज़ की नमाज़ और दुआएं पढ़ा करताथा. लेकिन जबसे आरज़़ू आई थी उसके मामूलात (दिनचर्या) में फ़र्क पड़ने लगा था, जोवक़्त वह नफिलें पढ़ने में गुज़ारा करता था वही वक़्त कारोबार के शबाब (जवानी) काहोता था. अब वह उन्हें छोड़कर मस्जिद कैसे जाता. दुकान के पिछले हिस्से में वह समयनिकालकर फ़र्ज़ अदा करता और फिर पान की गिलोरियां लगाने लगता, फिर कोई दो-सवा दो बजेदुकान बंद करके वह घर जाता तो थककर पड़ा रहता और सो जाता. तहज्जुद के लिए आंख ही नखुलती, कभी-कभी तो फ़र्ज़ की नमाज़ भी छूट जाती और वह अपने आपको समझाता, ‘अल्लाहमियां को तो मालूम है नमाज़ मैं जानबूझकर कज़ा (छोड़ता) नहीं की है, रात देर से आयाथा, आंख नहीं खुली....’ राही का मासूम टोपी शुक्ला बिल्कुल अपने जैसा था जब तकआरज़ू की खिड़की में रोशनी रहती तब तक कल्लू की दुकान की ट्यूब लाइट जलती रहती.(उसकी जगह कोई साल भर पहले दो आनेवाला टीन का लैम्प जला करता था) आरज़ू ने कभीकल्लू को कोई अहमियत नहीं दी थी. जब लड़का मौजूद न होता और छुट्टे पानों की ज़रूरतहोती तो खिड़की पर आती, परदा उठाकर आवाज़़ देती, ‘‘ऐ कल्लू, दो आने के पान भेज दो.’’या अगर पान लगाने में असकत (आलस) मालूम होती तो आवाज़ देती, ‘‘ज़रा पान खिलवाओ.’’ बसइसके अलावा इन दोनों में कभी कोई बात न होती, और यह बातें भी आमतौर से एकतरफ़ा हुआकरती थीं, जब वह आवाज़ देती तो कल्लू गर्दन उठाकर उसकी बातें सुन लेता और बस. शाम कोजब उसकी दुकान पर हंगामा होता और गजाधर और नुसरतुल्लाह दोनों दो चार आने पान के लिएदस के कड़कड़ाते हुए नोट निकालते और फिर आरज़ू की तरफ़ एक नज़र देखने के बाद सड़क परपीक थूक देते या अपने किसी दोस्त की पीठ पर हाथ मारकर गलीज (ग़न्दा) सा कहकहा लगाते,या किसी राहगीर पर कोई सस्ता-सा जुमला फेंकते तो कल्लू उन बातों पर कोई ध्यान नदेता, वह नोट भुनाकर बाक़ि पैसे वापस कर देता और नोट को अहतियात (संभालकर) मोड़ करकेटीन के बक्स में डाल देता और फिर उन लोगों से उस वक़्त तक के लिए बेनियाज़ (अलग) होजाता, जब तक वह फिर पान के लिए न कहें.... हां, दुकान बंद करके घर जाते समय रास्तेमें उसे सोचने का थोड़ा मौक़ा मिल जाया करता था. फुर्सत के उन लम्हों में भी वह आरजूया नुसरतुल्लाह या गजाधर के बारे में नहीं सोचा करता था. रास्ते में वह दुकानदारनहीं रह जाता था. वह फिर कल्लू बन जाया करता था. अपने बाप कल्लूत का बेटा, शरीफ़नका भाई और शेख मदारन की बेटी महताब का आशिक़. उसकी पहली ख़्वाहिश तो यह थी शरीफ़न कीशादी हो जाए. शरीफ़न की शादी कर देना कोई दुश्वार काम नहीं था. वह जिस दिन चाहताशरीफ़न के हाथ पीले कर देता, लेकिन एक तो वह शादी के क़ाबिल नहीं थी दूसरे से किकल्लू अब वह पहले की तरह बहराम की रिहाई और जंग-ए-इन्दलस पढ़ने और ऊंघनेवाला कल्लूनहीं था. अब वह शरीफ़न को किसी बकरीदी, किसी ईदी या किसी बुधन के साथ नहीं ब्याहनाचाहता था. वह नहीं चाहता था कि उसकी बहन किसी ऐसे घर में ब्याह कर जाए जहां रात कोघरों में सब्ज़ व सुर्ख्श (हरी एवं लाल) परियां नहीं बोलतीं, ताड़ी बोलती है. प्यारके इशारे नहीं चलते, हाथ चलते हैं और फिर बदन किसी पके हुए फोड़े की तरह टपकता रहताहै और फिर लड़कियां सत्ताईस-अट्ठाईस की उम्र में नौ, दस, ग्यारह लड़के, लड़कियां जननेके बाद या तो मर जाती हैं या ज़िन्दा दरगोर (कब्रिस्तान) रहती हैं. अब शरीफ़न कोकिसी ऐसे घर ब्याहने का सवाल ही नहीं उठता था. अब वह रोज़़ दस-बीस रुपए कमा लेता था-(बल्कि बचा लेता था) अब वह शरीफ़न के लिए अच्छे से अच्छा वर तलाश कर सकता था. इसलिएरात को जब एक हाथ में टार्च और दूसरे में एक मिर्जापुरी कुबड़ी लेकर वह घर की तरफ़चलता और उसके अपने क़दमों की आवाज़ उसकी हमसफर होती और कभी-कभी दूर या नज़दीक सेकुत्तों की आवाज़ें पूछतीं कि वह अजनबी तो नहीं है...तो ऐसे में वह चलते-चलते सोजाता, और शरीफ़न की शादी होने लगी. धूम-धाम से बारात आती, आतिशबाजी छूटती, गालियांगायी जातीं, कभी शरीफ़न की विदाई से पहले वह घर आ जाता और लेट जाता तब उसको एहसासहोता कि वह बहुत थका हुआ है...बस ऐसे ही एहसास के साथ पपोटे भारी पड़ने लगते औरशरीफ़न की शादी या महताब के बारे में सोचते हुए सो जाता. महताब से उसे इस क़िस्म काइश्क़ नहीं था जैसा किताबों में होता है. उसने तो अब तक महताब से यह भी नहीं कहा थाकि उसे उससे मुहब्बत है, उसे तो महताब से सीधा-साधा प्रेम था. ऐसा प्रेम जिसमेंबखुद के ग़ज़लों से गप नहीं लड़़ाई जाती, जिसमें हर गुबार, गुबार मुहम्मिल (पर्दा)नहीं होता और जिसमें घंटे की हर आवाज़ नाक-ए-लैला की घंटियों की आवाज़ नहीं होती,जिसमें न वो खुतून (खम्बा) होता है न खुसरू न तूफ़ानी हबाब (क्षणिक तूफ़ान) होता हैऔर न सौतेली मां और न कच्चा घड़ा, जिसमें सिर्फ़ यह होता है कि दिल में चुपके से एकचिराग़ जल जाता है और जब हर तरफ़ रोशनी हो जाती है तब भी साहबे मकान (मकान मालिक) यहसोचता रहता है कि आख्शिर क़िस्सा क्या है, हर तरफ़ यह रोशनी कैसी.'कर्ज उतर जाता है एहसान नहीं उतरता'वह न कैस था न फरहाद, न रांझा था न महिवालदृवह तो कल्लू था और उसे महताब से वैसा हीप्रेम था जैसा प्रेम कोई कल्लू कर सकता है, और उसकी महताब भी शीरी व लैला नहीं थी,सिर्फ़ महताब थी, एक सीधी-सादी घरेलू लड़की जो दिन में एक हज़ार बीड़ियाँ बना लियाकरती थी. तो यह थे सीधे-सादे कल्लू पान वाले के सीधे-सादे ख़्वाब. उसने यह भी नहींसोचा कि वह लाट साहब हो जाए, आगे पीछे नौकर हों, बीवी का गरारा संभालने के लिए एकखादिमा (नौकरानी) हो और यह वह हो...बस शरीप़$न की शादी हो जाए और महताब को ब्याहलाए और क़िस्सा ख़त्म. शरीफ़न की शादी में कुछ ख्शास देर नहीं थी, बस अच्छे वर कीतलाश थी. कल्लू को उसके निस्बत की फ़िक्र थी और अपनी शादी वह शरीफ़न की शादी के बादकरना चाहता था मगर उसने सोचा कि शादी से पहले मकान की मरम्मत क्यों न करवा डालीजाए. मकान की मरम्मत होने लगी, डाकख्शाना से रुपया निकलने लगा और ख़र्च होने लगा,फिर डाकख़ाने का फार्म भरते-भरते उसे ख्शयाल आया कि चेक काटना चाहिए. यह ख़्वाहिशइतनी शदीद (ज़्यादा) हुई कि तकलीफ़ देने लगी. दोपहर का वक़्त था, दुकान पर कम भीड़थी, वह इलाहाबाद बैंक की तरफ़ चला गया, इधर-उधर देखकर वह जल्दी से बैंक की इमारतमें दाख्शिल हो गया. पहरेदार, नेपाली उसकी तरफ़ देखकर मुसकरा दिया. कल्लू हैरान थाकि किससे पूछे चेक कहाँ काटे जाते हैं, वह चन्द लम्हों (कुछ समय) तक तो खड़ा-खड़ा हरकाउन्टर क्लर्क को देखता रहा. ‘‘का काम है तुहैं?’’ एक चपरासी को उस पर तरस आ गया.‘‘एक ठो चेक काटे का रहा.’’ ‘‘तोहरा एकाउंट है इंहा?’’ ‘‘न.’’ ‘‘पहले इहां एकाउंटखोलो. उधर वाली खिड़की पर जाके बाबू से बात कर लो.’’ वह उधर की खिड़की पर चला गया, औरबाबू उसे सेविंग बैंक और करेन्ट एकाउंट की नज़ाकतें समझाने लगे. उसने सोचा कि उसेचेक काटने से काम है, इसलिए करेन्ट एकाउंट ही खोलना चाहिए. ‘‘नाम क्या है?’’ क्लर्कने फार्म निकालते हुए पूछा. ‘‘हकीमुल्लाह.’’ ‘‘बाप का नाम.’’ ‘‘शेख कलूट.’’ ‘‘क्याकाम करते हो?’’ ‘‘शहर में पान की दुकान है.’’ ‘‘दस्तख्शत (हस्ताक्षर) कर सकते हो?’’‘‘हां.’’ गुरूर से उसकी गर्दन चटकने लगी. क्लर्क ने कलम डुबोकर उसकी तरफ़ बढ़ाया,उसने फ़ॉर्म अपने सामने रखा, फिर निचले होंट के बाएं सिरे को दाँतों में दबाकर वहफ़ॉर्म पर हस्ताक्षर करने लगा. ‘‘अब जब चेक पर ऐसे हस्ताक्षर करोगे तो रुपयामिलेगा.’’ क्लर्क ने उसे चेक से रुपया निकालने का तरीका समझाना शुरू किया, ‘‘यहाँ,उसका नाम लिखना जिसे रुपया देना हो...’’ बैंक में एकाउंट खोलकर जब वह फिर बाज़ार मेंआया तो उसे अपनी अहमियत का अजीब सा अन्दाज़ होने लगा, वह गर्दन झुकाकर चलने लगा जैसेउसे यह खतरा हो कि जिस शख़्स से उसकी आँख मिल जाएगी वह यह पूछ बैठेगा कि क्या वहइलाहाबाद बैंक में करेन्ट एकाउंट खोल कर आ रहा है. उस शाम जब राजगीर और बेलदारवगैरा मजदूरी लेने के लिए आए तो उसने गजाधर और नुसरतुल्लाह की तरफ़ शर्मीलीमुसकराहट से देखने के बाद अपनी चेक बुक निकाली. उसे ख़्याल था कि नुसरत और गजाधरउसकी चेक बुक देखेंगे, मगर वह दोनों तो उस समय आरज़ू की तरफ़ देखकर मुसकराने मेंमहू (लगे) थे. ‘‘इहां नाम लिख दें भैया.’’ आख़िर उससे न रहा गया तो उसनेनुसरतुल्लाह को मुख़ातिब किया. ‘‘हाँ.’’ नुसरतुल्लाह ने चेक बुक को कोई अहमियत नदी. ‘‘ल्यो.’’ उसने चेक फाड़कर राजगीर की तरफ़ बढ़ा दिया. ‘‘ई का है?’’ राजगीर नेहैरानी से उसकी तरफ़ देखा. ‘‘मजूरी दयो.’’ ‘‘ई मजूरी है.’’ कल्लू ने उसे समझानाशुरू किया कि वह कब बैंक जाए और वहां से रुपया ले ले. ‘‘कउनो और काम न है का...’’राजगीर बोला, उसने चेक कल्लू को वापस कर दिया कि वह ख़ुद उसे भुना ले, कल्लू को यहबात बुरी लगी, फिर भी उसने राजगीर को समझाने की कोशिश की, अब दुनिया में लेन-देननकद नहीं किया जाता, सारा काम चेक ही से होता है, मगर राजगीर टस से मस न हुआ. आख़िरआजिज़ आकर कल्लू को राजगीर की मजदूरी नकद पैसों में अदा करना पड़ी. लेकिन उस रातदुकान बंद करके घर जाते हुए न उसने शरीफ़न के बारे में सोचा और न महताब के बारेमें. वह तो सिर्फ़ यह सोचता रहा कि राजगीर ने चेक लेने से इनकार कर दिया तो अब वहकिसे चेक देगा. धीरे-धीरे कल्लू के मकान का हुलिया बदल गया. बाहरी दीवारें पक्कीहोती गईं, फिर अन्दर की दीवारें पक्की हुईं और एक-एक करके छतें पड़ने लगीं, और जबसारा घर पक्का हो गया, दीवारें रंगी जा चुकीं और राजगीर ने दरवाज़े पर कल्लू मंज़िललिख कर काम ख़त्म किया तो कल्लू ने मीलाद शरीफ़ किया. पतंग के काग़ज़ कीलाल-नीली-पीली झंडियां लगीं, चने के लड्डू बने, और शेख कलूट साफ़ लुंगी और कुर्तापहनकर तख़्त के पास बैठ गए. कल्लू ने नुसरतुल्लाह और गजाधर को भी बुलाया था. वहदोनों भी कल्लू के पास बैठे हुए पान खा रहे थे और कल्लू मुंह में पान दबाएभागा-भागा फिर रहा था. कल्लू मंज़िल ने मुहल्ले में कलूट और कल्लू दोनों की शख़्सियतही बदल दी. अब मुहल्ले के लोग कलूट को शेख साहब पुकारने लगे थे. कल्लू तो सुबह कोदुकान पर चला जाया करता था. लेकिन शेख साहब का बाक़ायदा दरबार लगता. सबसे पहले शेखमदारन आए फिर करीम, जोखू, घसीटा नजरू वगैरह और मंगरू वगैरा आ जाते. दोसीरा महकनेलगता और जवानी की कहानियां कही और सुनी जाने लगतीं. शेख मदारन तो कलूट को अकेलाछोड़ते ही नहीं थे, उन्हें अन्देशा था कि कलूट को अकेला पाकर जोखू, घसीटा और मंगरूवगैरा कहीं अपनी बेटी का रिश्ता न कर दें कल्लू से. उनका यह अन्देशा बेबुनियाद नहींथा क्योंकि मंगरू की लड़की किताबुन और नजरू की लड़की फखरुन तो बिलकुल जवान हैं औरजोखू की लड़की महरुन भी अब जवान होनेवाली है. शेख मदारन को मुहल्ले की उन जवानलड़कियों के वजूद की वजह से महताब का मुस्तकबिल (भविष्य) ख़तरे में मालूम होता था.मगर मौक़ा निकालकर जब शेख मदारन कलूट से कल्लू की शादी का ज़िक्र निकालते तो कलूटबड़ी सफाई से बात टाल जाता और जब मदारन फिर वही बात शुरू करते तो कलूट सफाई से कहदेता कि अभी कल्लू की शादी की क्या जल्दी है पहले शरीफ़न की शादी होगी. ‘‘ज़माना बड़ाख़राब है...’’ कलूट तकरीर कर डालता और मुहल्ले की लड़कियों की कहानी सुना डालता किउसने अपनी जवानी के ज़माने में किस की लड़की किसके साथ फंस गई थी. किसकी लड़की किसकेसाथ निकल गई थी. और अब भी उसकी निगाहों से किसका घर ओझल है.... ‘‘ना भय्या, लड़की घरकी इज़्जत है, पहले ओका ब्याह लें तब कल्लू के ब्याह के बारे में सोचें...’’ शेखमदारन हां-हां करते रहे, अब वह यह तो नहीं कह सकते थे न कि कलूट ये सब तुम ठीक कहतेहो मगर मेरी बेटी महताब बिलकुल जवान है, वह भी तो आख़िर मेरे घर की इज़्जत है. औरसच्ची बात तो यह है कि कलूट मुहल्ले की किसी लड़की से कल्लू को ब्याहना नहीं चाहताथा. उसे कल्लू के लिए किसी अच्छे घर की तलाश थी, वह किसी पढ़ी-लिखी लड़की से कल्लू कीशादी करना चाहता था और इस सिलसिले में वह जौनपुर, आज़मगढ़ और इलाहाबाद का सफ़र करचुका था. उसकी निगाह में बिरादरी की कई लड़कियां थीं. इलाहाबाद में शेख विलायत कीलड़की आयशा तो दसवां दरजा पास थी, जौनपुर के चौधरी सुट्टन की लड़की जीनत भी आठवीं पासथी, फिर भला इन पढ़ी-लिखी लड़कियों को छोड़कर कलूट अपने इकलौते बेटे कल्लू की शादी शेखमदारन की बेटी मदारन से क्यों करता. एक तो शेख मदारन अपनी बेटी को कुछ दे नहींसकते. मुश्किल से दोनों वक़्त चूल्हा जलता है और चले हैं कल्लू से अपनी बेटीब्याहने. और कल्लू इन बातों से बेख़बर महताब के बारे में सोचा करता और उन दोनों केबारे में उलटी सीधी स्कीमें बनाया करता जब महताब उसकी बीवी बनकर घर में आ जाएगी औरबीड़ी बनाना छोड़ देगी...बारात के साथ आरज़ू का नाच ज़रूर जाएगा. कव्वाल सालों को लेजाने से क्या हासिल, और फिर नुसरतुल्लाह और गजाधर वगैरा को कव्वाली में क्या मज़ाआएगा. इसलिए सब बारात में शहर के बड़े लोगों को दावत दी जाएगी तो फिर वैसा हीइन्तेजाम करना पड़ेगा. ‘‘यार कल्लू, अब तुम शादी कर डालो.’’ एक दिन नुसरतुल्लाह नेकहा. कल्लू शरमा गया, ‘‘हो जइहे भइया.’’ ‘‘आरज़ू का नाच करवाना न भूलना.’’नुसरतुल्लाह ने गजाधर के गले में हाथ डालते हुए कहा. ‘‘अरे आरज़ू!’’ गजाधर ने हांकलगाई, आरजूश् उस वक़्त खिड़की पर नहीं थी, गजाधर की आवाज़ सुनते ही खिड़की पर आ गई,परदा हटा, आरज़ू मुसकराने लगी, ‘‘कल्लू की बारात के साथ चलोगी न?’’ ‘‘ज़रूर चलूंगी,शादी हो भी.’’ ‘‘क्यों, होगी क्यों नहीं.’’ नुसरतुल्लाह बोला. ‘‘यह तो मुझे देखकरशरमा जाता है, बीवी के सामने तो आँख नहीं खुलेगी.’’ एक कहकहा लगा, कल्लू घबराकर पानलगाने लगा. ‘‘तुम्हीं इसकी आंख खुलवा दो.’’ ‘‘अभी तो यह बेचारा हर काम से पहले बाबासे पूछता होगा.’’ सड़क बेफ़िकरों के कहकहों से गूंज उठी, पड़ोस के दुकानदार भी सड़क परआ गए. कल्लू सख़्त शरमाया हुआ था, उसका चेहरा लाल हो रहा था. आरज़ू मुसकरा रही थी.‘‘अब यह तुम्हारी ज़्यादती है.’’ गजाधर ने कहा. ‘‘अरे तो कहिए न अपने कल्लू से किमेरे हाथ की दो गिलोरियां खा ले.’’ ‘‘कल्लू जाओ, यह इज़्ज़त का सवाल है.’’नुसरतुल्लाह ने कहा. ‘‘यह क्या आएगा, तभी तो शादी नहीं करता, आ जाए तो दस रुपए कीमिठाई खिलाऊँ.’’ ‘‘अरे यार चले भी जाओ.’’ गजाधर ने कहा. ‘‘अमे जाओ.’’ नुसरतुल्लाहने कहा. ‘‘क्या मैं डरता हूँ इस साली से.’’ कल्लू लुंगी झाड़कर खड़ा हो गया.‘‘शाबाश!’’ नुसरतुल्लाह ने उसकी पीठ ठोंकी. कल्लू धड़धड़ाता हुआ ऊपर चढ़ गया. सड़क परफिर एक कहकहा लगा. नुसरतुल्लाह ने आरज़ू को आँख मार दी. आरज़ू मुसकराती हुई खिड़कीसे हट गई. कल्लू दरवाज़े पर खड़ा हुआ था. ‘‘वहां रुक जाने की शर्त नहीं है, अन्दर आजाओ.’’ आरज़ू ने कहा. वह अन्दर आ गया. ‘‘अब इधर बैठ जाओ.’’ वह घबराया-घबराया बैठगया, और दीवारों पर लगी हुई तसवीरें देखने लगा. क़ायदे-ए-आज़म के पास ही पंडित नेहरूकी तसवीर थी और फिर एक पुराना कैलेन्डर रखा था जिसमें मधुबाला मुसकरा रही थीऔर...’’ ‘‘आदाब अर्ज़ है.’’ कल्लू चौंक पड़ा, तसवीरों पर से उसकी निगाहें हट गईं.उस्ताद नेजात उसे सलाम कर रहे थे. वह पसीने-पसीने हो गया क्योंकि उस अदब से सलामकरनेवाले उस्ताद नेजात उसकी दुकान पर रोज़ आते थे और ‘तुम’ कहकर मुखातिब किया करतेथे. उन्होंने घबराए हुए कल्लू की तरफ़ देखे बग़ैर सारंगी निकाली और फिर चुपचाप गर्दनझुकाकर उसके तार मिलाने लगे. उनके लिए कल्लू अब कल्लू पानवाला नहीं था. रईस था औरवह आरज़ू का गाना सुनने आया था. फिर तारीफ़ दरवाजे से गजाधर और नुसरतुल्लाह अपनेमुसाहिबों (साथियों) के गोल के साथ आ गए, कल्लू ने घबरा के वहाँ से भाग जाना चाहामगर नुसरतुल्लाह ने उसे दबोच लिया. वह बैठ गया मगर बहुत परेशान रहा. उसकी पेशानी परपसीने की नन्ही-नन्ही बूंदें थीं और वह निशान सजदा भीग रहा था...फिर तबला टनका,सारंगी ने हाँ में हाँ मिलायी, आरजूश् उनके करीब बैठकर अपने बाएँ पैर से ताल देनेलगी. सांवरिया काहे मारयो नज़रिया इत बहे गंगा इत बहे जमुना बीच में ठारो कन्धियाकाहे मारयो नज़रिया. आरज़ू गाने लगी, गजाधर और नुसरतुल्लाह और उनके दोस्तों नेतारीफ़ शुरू की. उस्ताद नेजात सारंगी बजाते रहे. उन्हें मालूम था कि उन तारीफकरनेवालों में कोई संगीत की क ख से वाक़िफ नहीं है. वह जानते थे आरज़ू जगह-जगह बेताली तक हो रही है. मगर वह उन लोगों की तरफ़ देखकर यूँ मुसकराते रहे जैसे यह लोगसंगीत के असली पारखी हों. ‘‘हुजूर को गाने की बड़ी अच्छी समझ है.’’ उन्होंनेनुसरतुल्लाह को मुखातिब किया और नुसरतुल्लाह जेब में हाथ डाले एक रुपए का नोट तलाशकर रहा था, पांच का नोट तलाश करने लगा. आरज़ू उस वक़्त उसके सामने बैठी भाव बता रहीथी. गजाधर ने दस रुपया का नोट मोड़ कर आरज़ू को खींच मारा. आरज़ू ने उसे झुक के सलामकिया. नुसरतुल्लाह को गजाधर की यह हरकतें हमेशा नागवार गुज़रती थीं, एक दो रुपया कीछूट बहुत होती है, मगर यह साला दस रुपए का नोट उछाल देता है, मजबूरन नुसरतुल्लाह कोभी अपना इरादा बदलना पड़ा, दस रुपए का एक नोट निकालकर उसमें रुपए का एक सिक्का लपेटाऔर फिर उस लिपटे हुए सिक्के को कल्लू के सिर पर रख दिया. कल्लू घबरा गया. आरजूश् नेकल्लू के सिर से वह पुड़िया उठा ली. कमरे में कहकहा गूंजा और कल्लू शरमा गया. उस रातजब वह दुकान बंद करके घर जा रहा था तो न वह शरीफ़न के बारे में सोच रहा था और नमहताब के बारे में, उस रात तो उसके कानों में दूर व नज़दीक से आरज़ू के गाने की आवाज़आ रही थी. काहे मारयो नज़रिया....