राहुल मिश्रा दो मिनट में ग़ालिबों की शायरी को बालिगों की शायरी बना देते थे
सत्य व्यास की नयी किताब दिल्ली दरबार के अंश और प्रोमो वीडियो. मिलिए राहुल मिश्रा से.
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फोटो - thelallantop
सत्य व्यास. पहले बनारस के बारे में लिखा. अब दिल्ली के बारे में लिख रहे हैं. कहते हैं बोकारो दिल में रहता है. अभी तक रह कलकत्ता में रहे थे. आदमी कम, नक्शा ज़्यादा है. इतना घूमे हैं कि नारद जी भी शरमा जायें. लिखते जबर हैं. फिल्मों और क्रिकेट का कीड़ा है. क्रिकेट की नॉस्टेल्जिया लहसुन-प्याज़ से छौंक के पेश करते हैं. आप लबराते फिरेंगे. हाल ही में व्यस्त थे. पूछा तो कहने लगे किताब लिख रहे हैं. किताब तैयार है. आने वाली है.
दिल्ली दरबार छोटे शहरों के युवाओं के दिल्ली प्रवास, प्रेम, प्रयास और परेशानियों की कहानी है. लापरवाह इश्क से जिम्मेदार प्रेम तक पहुंचने की कहानी. ये कहानी उन लाखों युवाओं की है जो बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली जैसे महानगरों की ओर कूच करते हैं. मनोरंजक ढंग से कही गई इस कहानी के केंद्र में टेक्नो गीक 'राहुल मिश्रा' है, जिसका मंत्र है 'सफलता का हमेशा एक शॉर्टकट है' और विडंबना ये है कि वो इस बात को अपने ही सनकी तरीके से सही साबित भी करता जाता है. कहानी परिधि की भी है जो पूर्वी दिल्ली की एक ठेठ लड़की है और राहुल को लेकर भविष्य तलाश रही है. मूलतः ‘दिल्ली दरबार’ दिल्ली की नहीं, बल्कि दिल्ली में बसने वाली वो कहानी है जो चलते-चलते प्रेम, विश्वास, दोस्ती और 'जीवन' के अर्थ खोजती जाती है. पेश है उपन्यास का एक अंश- उस रोज दो घटनाएं हुई थीं. दिन में मुहल्ले वालों ने शुक्ला जी के टीवी पर रामायण देखा था और रात में महाभारत हो गया था. दिन में सीता जी अपनी कुटिया से गायब हुईं थी और रात में गीता जी (शुक्ला जी की बेटी) अपनी खटिया से. सीता जी जब गायब हुईं तो रावण के पुष्पक विमान पर नजर आईं. गीता जी जब गायब हुईं तो पुजारी जी के मचान पर नजर आईं. रावण ने सीताहरण में बल प्रयोग किया था. पुजारी जी के बेटे देवदत्त मिश्रा ने गीतावरण में लव प्रयोग किया था. सीता जी को पुष्पक विमान पर जटायु ने देखा था और उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की थी. गीताजी को पुजारी के मचान पर जटाशंकर चाचा ने देख लिया था और बात फैलाने की भरपूर कोशिश की थी. (बात फैलाने में कोई कोताही नहीं की) खैर, वो वक्त कुछ दूसरा था. नादानों के कन्यादान में देर नहीं की जाती थी और अफवाह उड़ने से पहले विवाह की खबर उड़ा दी जाती थी. पकड़ुआ लव अक्सर अरेंज मैरेज में तब्दील कर दिया जाता था. सो, पुजारी जी और शुक्ला जी ने भी मिल कर देवदत्त और गीता जी का विवाह करा दिया और जैसा कि होना था, राहुल मिश्रा पैदा हुए. राहुल मिश्रा कौन? जी, राहुल मिश्रा वह जिनकी यह कहानी है. खैर, इधर राहुल मिश्रा पैदा हुए और उधर राहुल के पिताजी की नौकरी की डाक आई थी. देवदत्त मिश्रा को गांव-घर छोड़ कर टाटानगर आने का सरकारी फरमान जारी हुआ था. वो आखिरी दिन था जिस दिन राहुल मिश्रा के पिता खुश हुए थे। क्योंकि उसके बाद तो.... राहुल मिश्रा धरती पर आ चुके थे। राहुल मिश्रा पैदा ही प्रेम करने के लिये हुए हैं, ऐसा उनका खुद का कहना है. राजीव राय के बाद एकमात्र इंसान वही हैं जो प्यार, इश्क़ और मुहब्बत में ठीक-ठीक अंतर बता सकते हैं. उनके गुणसूत्रों का असर पहली बार छठी क्लास में परिलक्षित हुआ था जब उन्होंने क्लास टीचर को “आई लव यू” कह दिया था. जवाब में क्लास टीचर ने उनके गाल खींचते हुए “आई लव यू टू” क्या कह दिया, अगले दिन वो दुकानो में कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स खोजते नजर आये. सातवीं क्लास में पहली बार घर पर शिकायत आई तो राहुल की मां ने लड़की की मां को यह कह कर घर से खदेड़ दिया कि आपके दिमाग में कचरा है. राहुल तो अभी “बच्चा” है. हालांकि पिताजी उस दिन ही समझ गए थे कि पूरा “लुच्चा” है. आठवीं क्लास में उन्होंने हिस्ट्री का पेपर इसलिये अधूरा छोड़ दिया क्योंकि “भव्या” के पेन की इंक खत्म हो गयी थी और उन्हें ऐसी स्थिति में उसे अपना पेन न देना अनैतिक लगा था. ये और बात कि “भव्या” कभी जान ही नहीं पाई कि साहब के पास दूसरी कलम नहीं थी. नवीं क्लास में नौ दफ़ा उनके द्वारा डाइसेक्शन के लिये पकड़ कर लाये गए मेढक के मादा निकल आने पर उन्हें क्लास से निकाल दिया गया. वह आज तक समझ नहीं पाए कि उनकी गलती क्या थी? दसवीं क्लास में जब इंटर स्कूल डिबेट के लिये रांची गए तो सामने मिली पहली लड़की से कहा, “Did it hurt when you fell from heaven? बात का ऐसा असर हुआ कि लड़की डिबेट भूल कर डुएट रटने लगी. बारहवीं क्लास में स्कूल में पहली दफा एमएमएस क्रान्ति राहुल मिश्रा ही लेकर आए थे. वो तो बाद में पता चला कि जिस विडियो को वे अपना पता रहे हैं वो दिल्ली के किसी स्कूल का है. बी.एससी. फर्स्ट इयर में आए तो जुड़वा बहनों में से एक मिनट बड़ी बहन सिद्धि को साध लिया. सिद्धि ने एक साल के रिलेशन के बाद ऑर्कुट रिलेशनशिप स्टेटस बदल कर “कमिटेड” करने को कहा. इन्होंने फ़ौरन बदल दिया. सिद्धि को रिद्धी से. उस बेचारी को रिलेशनशिप स्टेटस से कोई समस्या नहीं थी. क्या-क्या बतायें सर! क्या, हम इतना सब कुछ कैसे जानते हैं? अरे भाई! क्लास टू से उसके साथ नथे हुए हैं हम. एक साथ पढ़ाई जोतते आए हैं. वो हीरा हम मोती. एक ही बेंच. समझे! हम नहीं जानेंगे तो कौन जानेगा? कहिएगा तो क्लास टू से क्लास फाइव की कहानी भी बता देंगे. द्वंद समास समझते हैं ना? हां, बस वही समझ लीजिये. द्वंद समास का सजीव उदाहरण हैं हम दोनों. इनके पाप-पुण्य भरे सारे कारनामों के हिस्सेदार रहे हैं, इसलिये जानते हैं कि उनमें कुछ तो करिश्माई है. वो लड़कियों के लिये झगड़ते हैं तो लड़कियां उनके लिये लड़ती हैं. मेरी कविताओं और इंटरनेट की सविताओं की बखिया उधेड़ने में माहिर हैं. दो मिनट में “ग़ालिबों”(गालिब) की शायरी को “बालिगों”(बालिग) की शायरी बना सकते हैं. उनके एकमात्र दोस्त हम हैं और हमारे एकमात्र दोस्त वो. बाकी, लड़कियों को वो दोस्त नहीं मानते. उन्हें “और ऊपर” का दर्जा देते हैं. इस “और ऊपर” के दर्जे के पीछे भी कोई द्विअर्थी रहस्य हो तो मुझे माफ करें. मैं किताबी कीड़ा हूं. राहुल मिश्रा के लेवल का आई. क्यू. मुझमें नहीं. कहानी मेरी नहीं है तो मेरे बारे में जानना भी उतना जरूरी नहीं है. फिर भी आप पूछ रहे हैं तो बता देता हूं. मैं मोहित सिंह. अपने ज्यू-फ्रो हेयर स्टाईल के चलते “झाड़ी” भी कहा जाता हूं. कैसा दिखता हूं यह तो और भी जरूरी नहीं. हां, राहुल कैसा दिखता है यह बता दूं. यदि आप पाठक हैं तो राहुल आपके जैसा ही दिखता है और यदि आप पाठिका हैं तो राहुल आपके मोस्ट डिजायरेबल मैन की तरह दिखता है. किताब का वीडियो प्रोमो- https://www.youtube.com/watch?v=YsPt9K9hvQ8 अमेज़न पर किताब की प्री-बुकिंग के लिए यहां क्लिक करें- http://amzn.to/2gfM8BZ
दिल्ली दरबार छोटे शहरों के युवाओं के दिल्ली प्रवास, प्रेम, प्रयास और परेशानियों की कहानी है. लापरवाह इश्क से जिम्मेदार प्रेम तक पहुंचने की कहानी. ये कहानी उन लाखों युवाओं की है जो बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली जैसे महानगरों की ओर कूच करते हैं. मनोरंजक ढंग से कही गई इस कहानी के केंद्र में टेक्नो गीक 'राहुल मिश्रा' है, जिसका मंत्र है 'सफलता का हमेशा एक शॉर्टकट है' और विडंबना ये है कि वो इस बात को अपने ही सनकी तरीके से सही साबित भी करता जाता है. कहानी परिधि की भी है जो पूर्वी दिल्ली की एक ठेठ लड़की है और राहुल को लेकर भविष्य तलाश रही है. मूलतः ‘दिल्ली दरबार’ दिल्ली की नहीं, बल्कि दिल्ली में बसने वाली वो कहानी है जो चलते-चलते प्रेम, विश्वास, दोस्ती और 'जीवन' के अर्थ खोजती जाती है. पेश है उपन्यास का एक अंश- उस रोज दो घटनाएं हुई थीं. दिन में मुहल्ले वालों ने शुक्ला जी के टीवी पर रामायण देखा था और रात में महाभारत हो गया था. दिन में सीता जी अपनी कुटिया से गायब हुईं थी और रात में गीता जी (शुक्ला जी की बेटी) अपनी खटिया से. सीता जी जब गायब हुईं तो रावण के पुष्पक विमान पर नजर आईं. गीता जी जब गायब हुईं तो पुजारी जी के मचान पर नजर आईं. रावण ने सीताहरण में बल प्रयोग किया था. पुजारी जी के बेटे देवदत्त मिश्रा ने गीतावरण में लव प्रयोग किया था. सीता जी को पुष्पक विमान पर जटायु ने देखा था और उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की थी. गीताजी को पुजारी के मचान पर जटाशंकर चाचा ने देख लिया था और बात फैलाने की भरपूर कोशिश की थी. (बात फैलाने में कोई कोताही नहीं की) खैर, वो वक्त कुछ दूसरा था. नादानों के कन्यादान में देर नहीं की जाती थी और अफवाह उड़ने से पहले विवाह की खबर उड़ा दी जाती थी. पकड़ुआ लव अक्सर अरेंज मैरेज में तब्दील कर दिया जाता था. सो, पुजारी जी और शुक्ला जी ने भी मिल कर देवदत्त और गीता जी का विवाह करा दिया और जैसा कि होना था, राहुल मिश्रा पैदा हुए. राहुल मिश्रा कौन? जी, राहुल मिश्रा वह जिनकी यह कहानी है. खैर, इधर राहुल मिश्रा पैदा हुए और उधर राहुल के पिताजी की नौकरी की डाक आई थी. देवदत्त मिश्रा को गांव-घर छोड़ कर टाटानगर आने का सरकारी फरमान जारी हुआ था. वो आखिरी दिन था जिस दिन राहुल मिश्रा के पिता खुश हुए थे। क्योंकि उसके बाद तो.... राहुल मिश्रा धरती पर आ चुके थे। राहुल मिश्रा पैदा ही प्रेम करने के लिये हुए हैं, ऐसा उनका खुद का कहना है. राजीव राय के बाद एकमात्र इंसान वही हैं जो प्यार, इश्क़ और मुहब्बत में ठीक-ठीक अंतर बता सकते हैं. उनके गुणसूत्रों का असर पहली बार छठी क्लास में परिलक्षित हुआ था जब उन्होंने क्लास टीचर को “आई लव यू” कह दिया था. जवाब में क्लास टीचर ने उनके गाल खींचते हुए “आई लव यू टू” क्या कह दिया, अगले दिन वो दुकानो में कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स खोजते नजर आये. सातवीं क्लास में पहली बार घर पर शिकायत आई तो राहुल की मां ने लड़की की मां को यह कह कर घर से खदेड़ दिया कि आपके दिमाग में कचरा है. राहुल तो अभी “बच्चा” है. हालांकि पिताजी उस दिन ही समझ गए थे कि पूरा “लुच्चा” है. आठवीं क्लास में उन्होंने हिस्ट्री का पेपर इसलिये अधूरा छोड़ दिया क्योंकि “भव्या” के पेन की इंक खत्म हो गयी थी और उन्हें ऐसी स्थिति में उसे अपना पेन न देना अनैतिक लगा था. ये और बात कि “भव्या” कभी जान ही नहीं पाई कि साहब के पास दूसरी कलम नहीं थी. नवीं क्लास में नौ दफ़ा उनके द्वारा डाइसेक्शन के लिये पकड़ कर लाये गए मेढक के मादा निकल आने पर उन्हें क्लास से निकाल दिया गया. वह आज तक समझ नहीं पाए कि उनकी गलती क्या थी? दसवीं क्लास में जब इंटर स्कूल डिबेट के लिये रांची गए तो सामने मिली पहली लड़की से कहा, “Did it hurt when you fell from heaven? बात का ऐसा असर हुआ कि लड़की डिबेट भूल कर डुएट रटने लगी. बारहवीं क्लास में स्कूल में पहली दफा एमएमएस क्रान्ति राहुल मिश्रा ही लेकर आए थे. वो तो बाद में पता चला कि जिस विडियो को वे अपना पता रहे हैं वो दिल्ली के किसी स्कूल का है. बी.एससी. फर्स्ट इयर में आए तो जुड़वा बहनों में से एक मिनट बड़ी बहन सिद्धि को साध लिया. सिद्धि ने एक साल के रिलेशन के बाद ऑर्कुट रिलेशनशिप स्टेटस बदल कर “कमिटेड” करने को कहा. इन्होंने फ़ौरन बदल दिया. सिद्धि को रिद्धी से. उस बेचारी को रिलेशनशिप स्टेटस से कोई समस्या नहीं थी. क्या-क्या बतायें सर! क्या, हम इतना सब कुछ कैसे जानते हैं? अरे भाई! क्लास टू से उसके साथ नथे हुए हैं हम. एक साथ पढ़ाई जोतते आए हैं. वो हीरा हम मोती. एक ही बेंच. समझे! हम नहीं जानेंगे तो कौन जानेगा? कहिएगा तो क्लास टू से क्लास फाइव की कहानी भी बता देंगे. द्वंद समास समझते हैं ना? हां, बस वही समझ लीजिये. द्वंद समास का सजीव उदाहरण हैं हम दोनों. इनके पाप-पुण्य भरे सारे कारनामों के हिस्सेदार रहे हैं, इसलिये जानते हैं कि उनमें कुछ तो करिश्माई है. वो लड़कियों के लिये झगड़ते हैं तो लड़कियां उनके लिये लड़ती हैं. मेरी कविताओं और इंटरनेट की सविताओं की बखिया उधेड़ने में माहिर हैं. दो मिनट में “ग़ालिबों”(गालिब) की शायरी को “बालिगों”(बालिग) की शायरी बना सकते हैं. उनके एकमात्र दोस्त हम हैं और हमारे एकमात्र दोस्त वो. बाकी, लड़कियों को वो दोस्त नहीं मानते. उन्हें “और ऊपर” का दर्जा देते हैं. इस “और ऊपर” के दर्जे के पीछे भी कोई द्विअर्थी रहस्य हो तो मुझे माफ करें. मैं किताबी कीड़ा हूं. राहुल मिश्रा के लेवल का आई. क्यू. मुझमें नहीं. कहानी मेरी नहीं है तो मेरे बारे में जानना भी उतना जरूरी नहीं है. फिर भी आप पूछ रहे हैं तो बता देता हूं. मैं मोहित सिंह. अपने ज्यू-फ्रो हेयर स्टाईल के चलते “झाड़ी” भी कहा जाता हूं. कैसा दिखता हूं यह तो और भी जरूरी नहीं. हां, राहुल कैसा दिखता है यह बता दूं. यदि आप पाठक हैं तो राहुल आपके जैसा ही दिखता है और यदि आप पाठिका हैं तो राहुल आपके मोस्ट डिजायरेबल मैन की तरह दिखता है. किताब का वीडियो प्रोमो- https://www.youtube.com/watch?v=YsPt9K9hvQ8 अमेज़न पर किताब की प्री-बुकिंग के लिए यहां क्लिक करें- http://amzn.to/2gfM8BZ

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