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गोरखपुर में मारे गए बच्चों की कहानी सालभर पहले बता दी गई थी

'पीर नवाज़' का अंश. ये किताब राजू शर्मा ने लिखी है.

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13 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 13 सितंबर 2017, 10:05 AM IST)
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राजू ने अपनी किताब में गोरखपुर मामले के करीब की एक कहानी बुनी है.
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गोरखपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की मौतों ने कई सवाल खड़े किए. ज़िम्मेदार कौन से लेकर, अपराधियों को बचाने की कोशिशों तक. कौन शामिल था और कौन फंसाया गया. इसी त्रासदी को करीब से छूता एक उपन्यास लिखा है राजू शर्मा ने. किताब का नाम है 'पीर नवाज़'. इसे राजकमल प्रकाशन ने 2016 में छापा है. यहां पढ़िए किताब का एक अंश.


'प्रस्ताव रखिए, मोटा-मोटी, समय बलवान नहीं, पर मूल्यवान है.’ 'मसौदा है, दिमागी बुखार उन्मूलन प्रोजेक्ट.’ 'कैसा बुखार, बरखुरदार?...प्लीज़ नोट द काफिया!’ (हंसी) 'जापानी एनसिफेलाइटिस, सर.’ 'देखिए, लेन-देन जापानी येन में नहीं होगा, समझ लीजिए. ग्रीन डॉलर सबसे अच्छा, हमें उसका बुखार है!’(हंसी) 'चलिए, उन्मूलन का क्या है, हो गया. हमारे सचिव लोग इतने सयाने हैं, कोढ़, टीबी, हैजा, मैला का उन्मूलन तो करा ही दिए, इन्हें कहिए तो शौच का भी उन्मूलन करा दें!’(हंसी) 'कहां होगा उन्मूलन?’ 'गोरखपुर मंडल, सर.’ 'शाबास! गोरखपुर बड़ा दुष्ट है, उन्मूलन होना ही चाहिए! लागत?’ 'तीन साल में... करोड़ रुपए’(कान में फुसफुसाहट) 'ज़्यादा है या कम है?’ 'न ज़्यादा न कम.’ 'बढ़िया, कहां से आएगा?’ 'रस्मी फंड से.’ 'रस्मी?’ 'राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन.’ 'बहुत खूब! आखिर प्राचीन रस्म है! चलिए रस्मी अदायगी हो गई. हमारा हिस्सा?’ 'आधा, फिफ्टी परसेंट सर.’ 'और होगा क्या, एक मुश्त बताइए, हत्या स्वीकार नहीं, जान लीजिए, गांठ में बांध लीजिए.’ 'निश्चित रहें सर, प्रोजेक्ट में हर जिला में प्रयोगशाला, हर ब्लॉक में एक्सटेन्शन सेन्टर, गोरखपुर में रिसर्च और रिफरल सेन्टर, राजधानी में विश्व स्तरीय प्रयोगशाला और सरवेलेन्स केन्द्र...’ 'सरवेलेन्स? कैसा सरवेलेन्स?’ 'सर, वायरस का...’ 'ओह, हम कुछ और समझे, और?’ 'वैक्सीन का इम्पोर्ट, हर बच्चे का टीकाकरण, रेफरिजरेशन की कोल्ड चेन, मोबाइल इकाइयां, फॉगिंग मशीन, पेयजल और सफाई कार्यक्रम, ट्रेनिंग, भ्रमण, विदेश यात्रा, पद और भर्तियां वगैरह-वगैरह.’ 'सबसे संगीन वगैरह है, तभी दो बार उच्चारण करते हैं, क्यों जी! चलिए, पूरा वर्ल्ड बैंक प्रोजेक्ट हो गया! दो साल में दो सौ उद्घाटन, ये जोड़ दीजिए. भर्ती में आरक्षण रहेगा, ठीक. कौन ये पुण्य का जतन करेगा?’ 'कागज़ पर, ऑन पेपर, सरकारी निगम सर.’ 'कहां है निगम?’ 'सर?’ 'आप, माने निगम बाबू, इतने धुंधले क्यों हैं, ठीक से दिखाई भी नहीं देते!’ 'बिचौलिए की भूमिका है सर, धुंधले रहे सो उपयुक्त है.’ 'सोलह आने सही, कागज़ पर हैं आखिर, ऑन पेपर! कागज़ की कमी तो नहीं? निश्चिन्तता है न!’ 'और असल कौन करेगा? बकरे की मां किससे खैर मनाएगी?’ 'सर आपके सामने हैं.’(तीन युवा, कुर्सी के पीछे महंगे कोट) 'आपका नाम?’ 'एसएसएस टेक्नोलॉजी लिमिटेड, ट्रिपिल एस, इन शार्ट.’ 'अच्छा है, शार्ट कट बेहतर है. अब समझा, इसलिए आप तीन हैं, सत्यम् शिवम् सुन्दरम्!’(ताली और हंसी) 'पर बकरे की मां कैसे खैर मनाएगी?’ 'बैक टू बैक करार होगा, धुंधले निगम और ट्रिपिल एस में.’ 'वन्डरफुल, बेचारी बकरी! टेंडर का दूध कौन काढ़ेगा?’ 'पहले से कढ़ा है.’ 'किसने काढ़ा?’ 'हमने, माने ट्रिपिल एस. अच्छी फसल के लिए घर की खेती सर्वश्रेष्ठ है.’ 'शाबास, चट मंगनी पट ब्याह! यह सब कहां हो रहा है?’ 'हमारे खास दफ्तरों के तहखानों में.’ 'टेंडर दाखिल कौन करेंगे, कम्पटीशन का भी रूल है न.’ 'साथी हैं, यार हैं, गन्धर्व हैं, प्रेत हैं.’ 'माने सब फर्जी...’ 'फर्जी मतलब कागज़ी, ऑन पेपर, नाम के वास्ते...’
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गोरखपुर में अगस्त से अब तक जापानी इन्सेफेलाइटिस से कई बच्चों की जान जा चुकी है.

... जापानी स्कैम कोई इकल्ला केस या मानक व्यवस्था का अपवाद या अतिक्रमण नहीं था. उसकी जड़ें शासन के तंत्र में ऊपर से नीचे तक फैली थीं. पूरा राजनीतिक और प्रशासनिक अमला भागीदार और भोगी था. यह खुला राज़ एक बहता, सड़ता घाव था. सचिवालय, मुख्यमंत्री का दफ्तर, सीआईडी, सतर्कता आयोग, सब जगह इसकी जानकारी और गलियारी चर्चा थी. जब मैंने जावेद से जस्टिस के नाम शिकायत पत्र लिखने के लिए कहा तो वह भर्राई आवाज़ से हंसा.
'आप समझते हैं दिल्ली को इसका ज्ञान नहीं? यह कोई पहली जांच नहीं, ऑडिट के पैरे पहले से हैं, जंग खा रहे हैं, कमीशन का गठन आपसी लीपापोती और सौदेबाज़ी का दोतरफा औज़ार है. कमीशन से क्लीन चिट दिलाने की बोलियां लगेंगी. मंत्रालय के पास पर्याप्त सबूत पहले से मौजूद हैं. सीबीआई के पास साक्ष्य की पेटियां हैं, टेप हैं. यह मामला अब सत्ता के अहलकारों के बीच तय होना है. एक साल लगे या पांच साल, उगाही और राजनीतिक हितों के लिए मामले और सबूतों का दफ़नाना ज़रूरी है. यह सब अब कमीशन की आड़ में ही सम्भव है.’
मैं चुप रह गया, क्या कहता, पर कहीं मेरी चुप्पी में आक्रोश की घटाएं गरजी थीं. मन ही मन कोई इरादा बुलन्द हो गया था.
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डॉक्टरों कहते हैं कि ये बीमारी ठीक होने के बाद भी बच्चे में मानसिक या शारीरिक विकलांगता हो सकती है.
यह सब आज कमरे के सन्नाटे में लिखना एक श्रुतिलेख के अभ्यास की तरह है. थकान और ऊब है, साहित्य के व्याकरण का यह आक्षेप और विलाप कि इसमें नया क्या है, यह पहला स्कैम नहीं, न आखिरी है, यह सब इसी तरह हुआ है, और होता रहेगा. तो क्या स्कैम की अनिवार्यता, उसका एकाधिकार और अजेयता, यह दंश भाषा की संरचना में भी फैल गया है, कि हर अक्षर दुश्मन होकर जैसे मेरी खिल्ली उड़ा रहा है. तो क्या जावेद का त्याग और यंत्रणा, उस व्यक्ति का निश्चय जो सदस्य सचिव की हैसियत से उस रात जावेद को सुन रहा था, जिसके मन की चुप्पी में कोई बादल गरजा था, ऐसे बादल का उल्लेख क्या किसी शब्दकोश में नहीं, वे कौन से मेघ थे जिन्हें कालीदास ने अमर किया था, और साहित्य की व्याकरण दम साधे, चकित सी रह गई थी.
एक वायरोलोजिस्ट के पास ऐसे प्रश्नों का निराकरण नहीं, पर चूंकि वह नागरिक भी है, तो उगते सूरज की तरह इतना तो वह भी साफ देख रहा है कि अगर अर्थजगत में मुफ्त का खाना दाना नहीं, तो मुफ्त की लूट भी नहीं, एक वित्तीय घोटाला किसी अमूर्त राजकोष का घाटा मात्र नहीं, मुद्रा व्यापार की रूह है, विनिमय की दास, वह वृक्षों पर नहीं फल फूलती, लूट किसी गुरु गम्भीर परिशिष्ट की तालिका के कोष्ठक में सिमटा सिर्फ एक ऋणात्मक अंक नहीं, वह उस यातनाघर का सीमांकन भी है जहां दरिद्र और कुपोषित, रोगी और निराश्रित, दमित और सन्तप्त की चीख और यंत्रणा के स्वर हैं, उस अंक की लिखाई और बुनावट में किसान और मज़दूर के रक्त का प्रवाह है, पसीने की बू है.
लूट की भरपाई दीन विहीन के निवाले के अपहरण से होती है, क्योंकि राजकोष की बैलेन्स शीट का कठोर समीकरण है, दोनों तरफ के कॉलम का योग बराबर होना चाहिए, अगर लूट है तो लुटना लाजि़मी है, स्कैम एक हल्का शब्द है, घोटाला देशज उच्चारण, उसका भार और भी कम है, मतलब गड़बड़ी, घपला, गड़बड़ झाला... पर अपने असली रूप और विन्यास के परिष्कार में स्कैम एक वित्तीय संहार है, नरसंहार का राजकोषीय, तालिकाबद्ध अंक रूप, संहार का यह मैदान असीम है, इसकी व्यापकता और बहुरूप के लिए धरती की परिधि कमतर है, इस विनाश के हथियार कागज़, कलम और हस्ताक्षर हैं.
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गोरखपुर में इस बीमारी का प्रकोप चार दशक से है.

स्कैम के सर्प मुख ने पांडे को डसा. पांडे का परिवार गांव में था, उसके इकलौते बारह साल के बेटे को जापानी ज्वर ने जकड़ लिया. गांव पहुंचने में पांडे को तीन दिन लगे. इस बीच बच्चे को दौरे पड़ने लगे और रोग ने विकराल रूप धारण कर लिया. वह बेटे को लेकर भटका, प्राइमरी केन्द्र, फिर बड़े केन्द्र पहुंचा. कोई फायदा नहीं, सारी प्रणाली ठप पड़ी थी. एलिसा टेस्ट के लिए रीढ़ से सैम्पल लेने की व्यवस्था तक नहीं थी. उपकरण डिब्बों में बन्द पड़े थे. जब तक बच्चा मेडिकल कॉलेज पहुंचा, बहुत देर हो चुकी थी.
मस्तिष्क को लाइलाज आघात पहुंचा. एक टांग में फालिज़ मार गया. डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, हर सिपाही और सरकारी कारिन्दे की तरह पांडे को घोटाले का पूरा इल्म था. कितनी ही बार उसने स्कैमबाज़ों को कमीनगी करते, नोट लुटाते देखा था. पांडे का संसार दुख के धुएं में डूब गया. मन की राख में प्रतिशोध के अंगार जल रहे थे. यह वजह थी कि वह डॉक्टर जावेद के लिए खतरे उठा रहा था. सरकार की इतनी बड़ी मशीनरी में एक पांडे ही था जिस पर जावेद भरोसा कर सकता था, वरना बाकी सब तो दुश्मन बने थे. परजीवी, सिस्टम के मुरदारखोर गिद्ध या ऐसे दब्बू और हरामखोर जिन्होंने हर तरफ से आंखें मूंद ली थीं. नैतिकता गिरवी रख दी थी. सबके अपने आका, सबके अपने राम, यह नियम बन गया था.
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इस बीमारी का पहला केस गोरखपुर में 1978 में दर्ज किया गया था.

जावेद अहमद ने हर कदम पर घोटाले का विरोध किया था. टेंडर के कागज़ों पर दस्तखत बनाने से इनकार कर दिया. स्टॉक रजिस्टरों की हेराफेरी में नकेल डाली. आपत्तियां लिखीं. तब से वह माफिया के रेडार पर था. मुश्किल यह थी कि वह बहुत कुछ जान गया था. विभाग के साथियों ने मुंह मोड़ लिया था. अगर राजा हरिश्चन्द्र ही बनना है तो नौकरी त्यागे, श्मशान में चांडाली करे, हमारी जान की आफत क्यों बना है.
अहमद के खिलाफ बाकायदा एक मुहिम शुरू हुई, उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के फर्जी मुकदमे दर्ज हुए. एक नर्स ने शोषण और बलात्कार के प्रयास की रिपोर्ट दर्ज कराई. जावेद का निलम्बन हुआ, पुलिस और माफिया उसकी खोज कर रहे थे.
'तुम इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? प्रदेश छोड़ दो. दिल्ली में नौकरी पाने में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी. इन मुसीबतों से छुटकारा मिलेगा.’मैंने चोर नज़र से उसे सलाह दी. हवा का एक झोंका सबको चीरता हुआ चला गया. पेड़-पौधे, झाड़, पत्ते, तने कांपते से झरझराए. मानो सब मेरी सलाह को अपमानजनक ठहराते हुए एक सिरे से खारिज कर रहे थे. कहीं दूर बिलखती हवा ने कुछ विलाप का स्वर अपना लिया था. पत्तों के चड़चड़ाने में दबी आग की कशिश जान पड़ी.
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अस्पताल में बीमार पड़ा एक बच्चा.
'परिवार है यहां, ज़मीन, जड़ें सब कुछ. होश हवास, सुख-दुख, जीना-मरना यहीं बदा है. इसे छोड़कर कैसे जा सकते हैं.’ जावेद ने कोमलता से कहा, 'अगर तेईस करोड़ के प्रदेश में मेरी सुरक्षा का समाधान नहीं, तो सवा सौ करोड़ के देश में मैं कहां बच लूंगा. इसका अन्त मेरे साथ ही होगा, तब मेरे परिवार को ये शायद बख्श दें. यही एक उम्मीद बची है मेरे पास.’
जावेद के सिर पर मौत नाच रही थी. वह सच और घोटाले का सबसे सशक्त गवाह था.
'पर कोई तो तरीका होगा लड़ने का, सामना करने का. इस तरह से हार कैसे मान सकते हैं’. मैं पूछ रहा था.
जावेद के कदम पहली बार लड़खड़ाए. वह बेहद थका था. भगवान जाने कब अन्न का दाना उसके मुंह में गया होगा. सच तो यह था कि उसका शरीर और रक्त जल रहा था. जो ऊर्जा उसके भीतर बची थी वह अब शरीर की नहीं थी. स्नायु की उत्तेजना उसकी शक्ति का आखिरी साधन थी. अचानक जैसे उसे कुछ याद आया और वह मुस्कराने लगा. उसकी स्मृति में समुद्र की व्यापकता थी. 'आप जानते हैं, ऐसा कोई हथकंडा नहीं जिसे उन्होंने छोड़ा हो. कुछ साल पहले दिमागी बुखार की ज़मीन तोड़ने के लिए मैंने एक अभियान चलाया था कि धान के खेतों में ठहरा पानी, जल के पक्षी जैसे बगुले, हंस और सुअर के बाड़ों के बीच जो वायरस का पोषक चक्र है, उसे तोड़ने के लिए सुअर पालन की विधियों में आमूल बदलाव होना चाहिए. हमने आबादी से हटकर सुअर बाड़े बनाने और उसकी वैज्ञानिक देख-रेख की कवायद शुरू की थी. कुछ सफलता भी मिली. जब घोटालेबाज़ हरकत में आए तो अफवाहें शुरू हुईं, कि गोरखपुर की सीमा नेपाल से लगती है. यह आतंकियों की घुसपैठ का भारी इलाका है.
फर्रुखाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में एक महीने में 49 नवजात की मौत हुई है. (फोटो: india.com)
फर्रुखाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी पिछले महीने 49 नवजात की मौत हुई है. (फोटो: india.com)
'मैं और मेरे साथी हिन्दुओं के खिलाफ मत बना रहे हैं. मुसलमानों को गोलबन्द कर रहे हैं, मेरा सम्पर्क पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से है. वहां से पैसा आ रहा है. मैं कट्टर हिन्दू विरोधी हूं. मैं सुअर पालन की खिलाफत कर रहा हूं क्योंकि मुसलमान हूं. ये कौम शैतानों के साथ है, इसलिए दिमागी बुखार का मुसलमानों पर कम असर होता है. सरकारी रजिस्टरों में मैं कथित आतंकवादी भी हूं.' पांडे को भी मुझे समझाना पड़ा था.
एका-एक मेरे ज़ेहन में एक सवाल कौंधा था. मैंने जावेद से प्रोजेक्ट डायरेक्टर के उम्दा प्रेज़ेन्टेशन के बारे में पूछा. ऐसे कागज़ात कौन तैयार करता है, मेरा सवाल था. जावेद ने तसदीक की कि जापानी ज्वर से जुड़ा हर सरकारी दस्तावेज़ एसएसएसएल टेक्नोलॉजी कम्पनी के मार्फत तैयार किया जाता है. वही इस प्रोजेक्ट के कर्ता-धर्ता हैं. बाद में और कागज़ों के साथ जावेद ने प्रेज़ेन्टेशन की एक कॉपी भी मुझे भिजवाई थी.


गोरखपुर मामले से जुड़ा वीडियो देखें:



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