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'तुम हो वही, जिसमें आता है दही, माने कुल्हड़'

कनपुरिया कहानियों के 'जनक' निखिल सचान की नई किताब आ रही है, नाम है यूपी 65.

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28 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 28 जुलाई 2017, 05:01 PM IST)
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nikhil निखिल सचान पेशे से जादूगर हैं. उनकी कहानियों में अजूबा बच्चों से मिलने आता है. भगवान तक से अठन्नी वापस छीनी जा सकती है. पिज्ज़ा वाला दोस्त बन जाता है और रेल की पटरी पर रख दो तो सिक्का चुंबक बन जाता है. ये वो वाले जादूगर हैं, जो मंतर मार दें तो पचास दफा होमवर्क हो जाए. दुनिया को बरगलाने के लिए आईआईटी-आईआईएम वाला चोला पहन लेते हैं. कुछ काम भी करते हैं, ऐसा दावा है. यकीनन झूठ ही होगा, क्योंकि रात को ये भी राजनगर की हिफ़ाजत को निकल जाते हैं. इनकी नई किताब हिंद युग्म प्रकाशन से आ रही है. नाम है यूपी 65. आईआईटी बीएचयू और बनारस की मस्ती से सराबोर है. किताब का एक हिस्सा यहां पढ़िए. अमेजॉन पर प्री बुकिंग चालू है, अपनी किताब मंगा लीजिएगा. प्री बुकिंग के लिए यहां क्लिक करें
अमित कुमार पांडे. इलेक्ट्रॉनिक्स. फर्स्ट इयर. करेली, इलाहाबाद. एल्यूमिनियम के बक्से पर लाल पेंट से बड़ा-बड़ा लिखा था. जब मैं IIT BHU के राजपूताना हॉस्टल के कमरा नंबर चार में घुसा तो मेरा रूममेट अमित कुमार पांडे एल्यूमिनियम के संदूक पर बैठा दाढ़ी बना रहा था. बक्से पर जितनी बेडौल और अनगढ़ उसके नाम की लिखाई थी, उतना ही बेढंगा और बेहूदा वह खुद. उकड़ूं बैठकर शीशे में झांकता हुआ. नथुने फुलाकर नाक में बढ़ आए बालों की पड़ताल कर रहा था. उसके हाथ में जिलेट का ट्विन ब्लेड या ट्रिपल ब्लेड रेजर नहीं था बल्कि बाक़ायदा पुश्तैनी सुलेमानी उस्तरा था. जिसे वह पापा की शेविंग किट से चुराकर लाया था. वे कभी दाढ़ी नहीं बनाने देते थे क्योंकि पढ़ने-लिखने की उमर में मूंछ-दाढ़ी घोटना आवारागर्दी की निशानी है. अब चूंकि पांडे IIT-JEE क्वालीफाई कर चुका था इसलिए IIT में घुसते ही, इस हिटलरी जोर-फरमान के विरोध में सामान-वामान खोले बिना ही, बड़े अधिकार से मूंछ घोट रहा था. वह उस्तरा ऐसे चला रहा जैसे साक्षात छत्रपति शिवाजी हाथों में शमशीर लिए दुश्मन को बेरहमी से काट-बिछा रहे हों. “हेलो! मैं निशांत. तुम्हारा रूम पार्टनर.” मैंने कमरे में अपना सामान रखते हुए कहा. पांडे मुस्कुराते हुए चेहरे पर लगा हुआ फोम अपनी बनियान से पोंछते मुझसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा. मेरे हाथ में किताब थी. “फाइव प्वाइंट सम-वन पढ़ रहे हो?” पांडे ने जोर से हंसते हुए पूछा. “हां. इंग्लिश नॉवेल पढ़ना अच्छा लगता है.” मैंने झेंपते हुए कहा. “हां हां! हिन्दी-अंगरेजी तो ठीक है. हम तो किताब देख के हंसे.” “क्यों, ऐसा भी क्या खराब है किताब में?” “अमा देखो निशांत बाबू! IIT में ऐसी टोपापंती नहीं होती, जैसा इस किताब में लिखा है. और खासकर BHU में. ये मउज वाली जगह है बे. यहां चार साल खाली बकचोदई होती है. अगर ये किताब पढ़ कर, तुमको ये लग रहा है कि यहां आके तुम भी बड़का भारी हवाई जहाज उड़ा लोगे, नासा चले जाओगे या बड़ा भारी साइंटिस्ट बन जाओगे तो ऐसा नहीं होने वाला. और हां, वो जो उसमें प्रोफ़ेसर की लड़की के साथ मचाने वाला सीन है, वो तो यहां एकदम नहीं होने वाला.” पांडे वापस उस्तरा चलाने लगा. “कुछ लोग यहां पढ़ने भी आते हैं. शायद नासा भी पहुंचते हों.” मैंने चिढ़ते हुए कहा. “अब जो यदि तुम पढ़-लिखकर नासा पहुंचने के इरादे से आए हो तो फिर तुम सोलह नंबर कमरे तरफ मत जाना.” “क्यों?” “काहे से उधर एक से एक हरामी लौंडे रहते हैं. अभी कॉलेज में घुसे हुए जुम्मा-जुम्मा दो दिन हुआ नहीं और BF चल रही है वहां.” पांडे फिटकरी से चेहरा रगड़ रहा था. कुछ देर पहले उसकी घनी दाढ़ी और मोटी मूंछ थी. अब नहीं थी. जैसे सन् 1990 में नयन मोंगिया हुआ करता था, पर अब नहीं है. जैसे एक जमाने में पेजर और वॉकमैन था और आज नहीं है. जैसे कभी बाबा सहगल था, अब नहीं है. वैसे ही पांडे की मूंछ दुनिया के मानचित्र से ग़ायब हो चुकी थी. जैसे वो कभी थी ही नहीं. “बढ़िया लग रहे हैं?” पांडे बिना मूंछ-दाढ़ी के दमक रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे कुछ देर पहले अनिल कपूर फोम लगाए बैठा था. पानी मारा तो अंदर से संजय कपूर निकला. बिना जवाब दिए मैं सामान लगाने लगा और उसकी सलाह को अपने दिल-ओ-दिमा में पक्का कर रहा था– ‘अब जो यदि तुम पढ़-लिखकर नासा पहुंचने के इरादे से आए हो तो फिर तुम सोलह नंबर कमरे तरफ़ मत जाना.‘ मैंने खुद से तीन बार कहा.
तीन बार इसलिए क्योंकि मैं IIT BHU में बड़ी चमकदार उम्मीदों के साथ दाख़िल हुआ था. पांडे से मिलने से पहले तक मेरी आंखें वैसे ही चमक रही थीं जैसे आमतौर पर तंबाकू के विज्ञापन के किरदारों की चमका करती हैं. ‘मुंह में रजनीगंधा, कदमों में दुनिया’, ‘दिल बड़ा तो, तू बड़ा’, ‘ऊंचे लोग, ऊंची पसंद’, ‘दीवाना उड़ा रे, मस्ताना चला रे’. तमाम सालों से IIT में दाख़िल होना मेरा सपना था. या यह कह लीजिए कि मेरे परिवार वालों का सपना था, जो मेरे कंधे पर कब लाद दिया गया, मुझे पता ही नहीं चला. जैसे विक्रम के कंधों पर बेताल लाद दिया गया था, मेरे कंधो पर IIT में पढ़ने का सपना टांग दिया गया था.
मैं जहां भी जाता, यह बेताल मेरे साथ चलता और IIT मेरे दिन-ब-दिन की सनक़ का हिस्सा हो गया. पापा अक्सर मुझे स्कूटर पर IIT कानपुर घुमाने ले जाते और मैं वहां की हर एक चीज को कौतूहल से देखा करता. अगर कोई लड़का मोटा चश्मा लगाकर, हाथ में इंजीनियरिंग ड्राइंग का ड्राफ्टर, चार्ट, कम्पास वगैरह लिए घूमता दिख जाता था तो मेरा दिल-ओ-दिमाग बेइंतहा इज्जत से भर जाता था. इज्जत इसलिए क्योंकि मुझे लगता था, हो-न-हो यही लड़का एक दिन आगे चलकर अब्दुल कलाम की तरह अग्नि की उड़ान भरेगा. मिसाइलें बनाएगा. बड़ी-बड़ी इमारतें बनाएगा. क्या पता कोई नया मेटल ही खोज निकाले. स्वदेश के शाहरुख की तरह गांव लौट के पानी का ट्यूबवेल चला दे. मंगल गृह पर जिंदगी ख़ोज दे. अणु के भीतर से परमाणु नोच दे. मुझे बुरा इस बात का लग रहा था रहा था कि पांडे इस बात की अहमियत को समझ नहीं पा रहा था कि वह किस गौरवशाली इंस्टीट्यूट का हिस्सा बन रहा है. बुरा मुझे इस बात का भी लग रहा था कि मैं ऐसा सोचने वाले लड़के के साथ कमरा शेयर करने वाला हूं. और उन लोगों के साथ हॉस्टल शेयर करूंगा जो कॉलेज में घुसते ही BF देखने में लग गए. अरे! कुछ और भी कर सकते थे. डिपार्टमेंट देखने जाते. कंप्यूटर लैब हो आते या लाइब्रेरी ही टहल आते. “लाइब्रेरी कार्ड इश्यू कराने चलोगे?” मैंने पांडे से पूछा. “क्यों. अभी तो इनरॉलमेंट भी नहीं हुआ है. किताब कैसे मिलेगी?” “मैंने सुना है कि अच्छी किताबें हमेशा जल्दी खत्म हो जाती हैं. मेरे एक बड़े भैय्या हैं जो IIT खड़गपुर से पढ़े हैं. उन्होंने कहा था कि अच्छी किताबें पहले ही लाइब्रेरी में छुपा देनी चाहिए. माने अगर फिजिक्स की किताब हो तो उसे नागरिक शास्त्र वाली अलमारी में जाकर सिविक्स की किताबों के बीच गड्ड-मड्ड कर दो. फिर जब लाइब्रेरी कार्ड मिले तो वहां से निकाल कर इश्यू करा लेना.” “अरे नहीं खतम होंगी बे. कहे बौरिया रहे हो!” पांडे मेरे मास्टर प्लान को पूरी तरह खारिज करते हुए बोला. फिर शायद उसे इस बात का आभास हुआ कि मैं ‘बे’ कहने का बुरा मान गया हूं. “यार, देखो बुरा मत मानना बे. इलाहाबाद से हैं. अबे, तबे, कस-में हर बात में निकल आता है. मन में कुछ नहीं रखते. जो कुछ आए तो बक के बराबर कर देते हैं. कभी-कभी इस चक्कर में लभड़ भी जाते हैं पर देखो हम यार हैं तो ऐसे ही. गाली-ऊली दे दें तो बुरा मत मानना. अब तुम रूममेट हो हमारे.” “हम्म.“ मैंने अनमने से कहा. “घर से कौन-कौन आया है?” मैंने बात टालने के लिए पूछा. “घर से कोई क्यों आएगा? बाउ ट्रेन में बिठाने आए थे. और बिठा के करेली वापस. तुम्हारे बाउ आए हैं क्या?” “हां. मेस में खाना खा रहे हैं.” “अबे यार तो पहले बताना था न! हम यहां दाढ़ी-मूंछ का बक्सा लिए हुए बैठे थे. नाउ की दुकान खोल के.” पांडे जल्दी-जल्दी अपना पुश्तैनी शेविंग किट समेटने लगा. “वैसे कहां से हो निशांत बाबू?” “कानपुर.” “कानपुर!” “हां.” पांडे कानपुर कनेक्शन निकल आने से चहक रहा था. यह जबरन वाला कनेक्ट हम उत्तर भारत के लोगों को विरासत में मिला है. आप जहां-कहीं से भी हों, वहां उनका या फिर उनके ममेरे भाई की फुफेरी बहन का मुंहबोला ससुराल या बड़बोला मायका निकल ही आता है. “अबे हम तीन साल कोचिंग पढ़े हैं कानपुर में! अनीस के यहां फिजिक्स. केमेस्ट्री पंकज के यहां और गणित बिश्नोई के यहां.” पांडे मेरे और करीब आ गया था और उसने मेरे कंधे पर गलबहियां डाल दी थीं. “मैं भी वहीं पढ़ा हूं. फिजिक्स लेकिन नारकर के यहां पढ़ता था.” मैंने दो फुट नीचे झुककर, गलबहियों से खुद को मुक्त करते हुए कहा. “हम भी पहले वहीं फिजिक्स पढ़ते थे लेकिन एक बार एक लड़के से पंगा हो गया. हम साले को मजाक में बोल दिए कि मार देब, मर जाबो. वो साला दिल पे ले लिहिस. हम बोले ऐसा थोड़े होता है बे. इलाहाबाद में तो हर कोई ऐसे ही बोलता है. इसका मतलब ये थोड़ी है कि तुमको सही में मार देंगे. पर ऊ सरवा माना नहीं और डेली हमको लभेड़ने के चक्कर में कोचिंग के गेट पर खड़ा रहता था. हम कट लिए इसीलिए. लेकिन यार तुम कानपुर के लगते तो हो नहीं. कानपुर के लौंडे बोलते हैं तो दिल करता है बोलते ही रहें. हमारा एक कनपुरिया दोस्त बात-बात में बोलता था, अभी झपड़िया दिए जाओगे, तब पता चलेगा कि पंजीरी कहां बट रही थी. तुम ‘मैं’ बोलते हो. वहां ‘हम’ बुलाते हैं.” पांडे ने मेरे कानपुरिये अभिमान को उंगली दिखा दी थी. “तुम हो वही, जिसमें आता है दही. माने कुल्हड़.” मैंने अपने डिफेन्स में, चटक कनपुरिया अंदाज सुनाया.
“काम पैंतिस हो गया भाईजी.” तख्त पर चढ़कर, पांडे ने उछलते हुए दूसरा कनपुरिया जुमला दिया. “कुछ पल्ले पड़ रहा है कि अइसे ही औरंगजेब बन रहे हो!” मैंने भी तख्त पर चढ़कर, उसके नहले पर अपना दहला जमाया. “ये मठाधीशी बंद करो बे! ज्यादा चौधराहट करोगे तो अबहिएं यहीं पेल दिए जाओगे.” अब पांडे मेज पर चढ़ बैठा था. “आता न जाता, चुनाव चिह्न छाता.” “बाप मरे अंधेरे में, बेटा पावरहाउस.” “हटिया खुली बजाजा बंद, झाड़े रहे कलक्टरगंज.” “मरबे कम, घसीटबे ज्यादा, लम्बे हुई जाओगे दो मिनट में.” “पचड़े में पड़ोगे तो अभी लभेड़ हो जाएगी भाई जी.”
हम दोनों दे-दनादन कनपुरिया जुमलों का दहला-पकड़ खेल रहे थे. एक रैप-बैटल शुरू हो गया था. पांडे हनी सिंह, तो मैं बादशाह. वह रफ्तार तो मैं बिलाल सईद. पांडे अचानक खेल छोड़ के किताबें सेट करने लगा. “का हुआ बे! निकल गई सारी कलेक्टरी.” मैंने अगले जुमले की अपेक्षा में अपना जुमला फेंका. लेकिन पांडे और भी तल्लीनता से किताबें झाड़ने लगा. ऐसे, जैसे यहां कुछ हो ही नहीं रहा था. “चिर गई? बोलो बे! अभी तो मउज आनी शुरू हुई है.” पांडे ने फिर भी जवाब नहीं दिया. मैंने पलटकर देखा तो पापा खड़े थे और शायद हमारी बकर पुराण का पूरा प्रवचन सुन चुके थे. वे मेस से खाना खाकर लौट आए थे. मैं पापा को यूं देख रहा था जैसे वे परीक्षा में सिलेबस के बाहर से आया हुआ सवाल हों. “नमस्ते अंकल जी.” पांडे किताबें लगाना छोड़कर पापा के पैर पर लगभग लोट ही गया. “खुश रहो.” पापा ने दो कदम पीछे छिटककर कहा और फिर दे-दनादन रैपिड फायर राउंड खेला गया. पापा ने पांडे का पूरा फैमिली ट्री निकाल लिया. कास्ट से लेकर गोत्र तक. मोहल्ले से लेकर गली तक. ‘बहन कहां ब्याही है’ से लेकर ‘मम्मी का मायका किधर पड़ता है' तक. पांडे भी ऐसा पलटीखोर निकला कि दो मिनट में ‘मार देब, मर जाबो’ से ‘जी अंकल जी, एकदम ठीक बात है जी’ में बदल गया. जितना बार वो एक लाइन में ‘बे’ घुसाता था, उससे अधिक बार हर एक लाइन में ‘जी’ सजाने में लगा गया. “दोनों लोग अच्छे से पढ़ाई करना. कॉलेज में तमाम लड़के होंगे जो दिन भर ऐसा दिखाएंगे कि वे कछ नहीं पढ़ रहे हैं और फिर रात में लाइट बंद करके टेबल लैम्प की रोशनी में घंटों रट्टा मारेंगे. ऐसे ही इलाहाबाद पॉलिटेक्निक में कल्पेश सिंह करके एक लड़का था. वो दिन भर सबको क्रिकेट खिलाता था और सबको गुडनाइट बोलकर, रात में कमरे की बत्ती बंद करके मोमबत्ती जलाके पढ़ता था.” “अरे अंकल जी आप इलाहाबाद से पढ़े हैं जी?” पांडे पापा की बात बीच में ही काटकर फिर से जिजियाने लगा. तब तक, जब तक कि पापा अपना सामान उठाकर जाने न लगें. मैं बैग पकड़कर उनके पीछे हो लिया. “मन लगा के पढ़ना और इस लड़के से थोड़ा बचके रहना. ये हमको कल्पेश सिंह जैसा ही खुराफाती लग रहा है. और देखो मूंछ भी घोटा हुआ है. पक्का आवारागर्द होगा.” पापा ने जाते-जाते कहा. वे जाते हुए कभी मुड़कर नहीं देखते थे क्योंकि उनका मानना था कि ऐसा करने से मन कच्चा होता है. “और हां, दिन-रात पढ़ना. यहां स्कूल जैसा हाल नहीं है. यहां तो सब लड़के अपने-अपने स्कूल के टॉपर रहे होंगे. एक बार आप ढीला पड़ गए तो कैच-अप नहीं कर पाएंगे. यहां भी फर्स्ट ही आना है आपको.” UP65-Cover-Final-16 (1) ************* कमरा नंबर तीन पर हाय-तौबा मचा हुआ था. मैंने पांडे से पूछा तो पता लगा कि मुम्बई से आई एक गोरी चिट्टी फैमिली इस बात पर अड़ गई है कि उनका लड़का संदीप सिंह के साथ रूम शेयर नहीं कर सकता. “अरे एक झक्क गोरा, एकदम गुड्डे जैसा लड़का है. उसके बाउ बिदक गए हैं कि रूममेट चेंज करना होगा. बिचारा सारनाथ का ठेठ गंवई लड़का है. करिया ऐसा कि उसके आगे डामर फेल है.” पांडे ने मुंह बनाते हुए कहा. इस बात से अनभिज्ञ कि वह भी रंग से सांवला है गोरा नहीं. हालांकि, ये अलग बात है कि हिंदुस्तान में हर सांवला इंसान खुद को ‘गेंहुआ’ कहलाना पसंद करता है. “काला है तो क्या हो गया!” मैंने पांडे को झिड़कते हुए कहा. “अरे बाहर मत निकलो. नहीं तो तुमई को पकड़ लेंगे. वे रूममेट ऐसे ख़ोज रहे हैं जैसे आदमी अंधेरे में मोमबत्ती खोजता है.” मैं पांडे की बात अनसुना करके बाहर आया तो वहां उसकी मम्मी मंझले सुर में सुबुक रही थीं. नजर मुझ पर पड़ी तो उनकी आंखें चमक-सी गईं. “बेटे, वुड यू प्लीज शिफ्ट विद समीर?” “नो, आई ऑलरेडी हैव अ रूममेट.” “नहीं बेटे आपके साथ उसका भी थोड़ा वेवलेंथ मैच हो जाएगा न. ही हैज नेवर बीन अलोन एक्चुली.” आंटी आगे बढ़ीं. “नहीं आंटी आई डोंट थिंक दैट वार्डन विल लाइक दिस.” मैं पीछे हटा. “ही स्पीक्स सम काइंड ऑफ भोजपुरी, आई गेस. समीर तो समझेगा भी नहीं बेटा.” आंटी और आगे बढ़ीं. “ही विल बी टोटली फाइन, ट्रस्ट मी.” और मैं फटाफट रूम में अपने कमरे की ओर भाग लिया. पांडे पेट पकड़े हंस रहा था. अट्टहास ऐसा कि स्वरूपनगर की रामलीला का रावण याद आ जाए. “हाहा, अबे हम बोल रहे थे कि उधर मत जाना. उसकी मम्मी को ऐसा लग रहा था कि भोजपुरी बोलने वाला लड़का उनके लड़के को कहीं खा-खू न जाए. वो जैसे ही बेसिन पर डेटॉल से सेब धोने आया, हम समझ गए कि ये लौंडा यहां गजब मजा दिलाने वाला है. अबे सेब को सेप्टिक से कौन धोता है बे! इसके बाप भी बद्धी वाली चेक पैंट पहनते हैं जैसे रबर का गुड्डा हों. चलो बे घूम के आते हैं. प्रसाद बता रहा था कि अबकी गजब-गजब नमूने आए हैं इस बैच में.” “प्रसाद कौन?” “अबे तुम प्रसाद से नहीं मिले. चलो सबसे पहले तुमको उसी से मिलाते हैं. वो देखो, कमरा नंबर ग्यारह के दरवाजे पर नीली स्लीवलेस में जो लौंडा खड़ा है, वो है प्रसाद. और उसके बगल में मोहित". पांडे ने आगे बढ़कर दोनों से हाथ मिलाया और हमारा इंट्रो जैसा कुछ करवाया. अगर मैं एक लाइन में प्रसाद का खाका खींचूं तो उसकी सुपर पॉवर थी गप्प हांकना और लंतरानी झोंकना. मोहित की खासियत थी दुनिया भर की बेइज्जती करके प्रसाद को ऊंचे चढ़ाना. एक पतंग तो दूसरा ढील. जो यह कन्नी तो वह छुड़ईया. राम मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी. दोनों बचपन के जिगरी थे और केंद्रीय विद्यालय से पढ़े थे. BHU, अस्सी, लंका, सुसवाही में बचपन से खेले-कूदे थे और इनके चप्पे-चप्पे से वाकिफ थे. वे दोनों एक-दूसरे को वैसे ही पूरा करते थे जैसे सौरव गांगुली के घटिया से शॉट को टोनी ग्रेग की छाती-पीट कमेंट्री पूरा करती थी. क्रिकेट के शौक़ीन लोगों को याद होगा कि गांगुली (जिसे कानपुर के लोग गाण्डुली बुलाते थे) जैसे ही स्टेप आउट करके लॉन्ग ऑफ की ओर गेंद तान देता था, टोनी ग्रेग चिल्लाना शुरू कर देता था, “ओह माय गॉड, प्रिंस ऑफ कलकीटा गोज अगेन, देयर द बॉल गोज डांसिंग, इट्स हाइ, इट्स हाइ, इट्स डांसिंग इन दी स्काई, ओह माय गॉड इट्स गोना वेनिश, वॉट अ क्लास प्रिंस ऑफ कलकीटा.” और इतने में ही कोई ओलंगा छाप क्रिकेटर कैच लपक लेता था और गाण्डुली कलकीटा वापस. टोनी ग्रेग और गांगुली की तरह, मोहित और प्रसाद इतने घनिष्ठ थे कि हमेशा साथ ही पाए जाते थे. जैसे पुराने जमाने के राजा-महाराजा बिना दरबारी-कवि-चारण के अधूरे होते थे, प्रसाद मोहित के बिना अधूरा था. “और पांडे, BHU घूमे तुम लोग या अभी मौका नहीं लगा?” प्रसाद ने पूछा. वह हाथ झुलाते हुए हमारे पास आया. “अभी अकेले सेफ होगा?” पांडे ने पूछा.
“सेफ काहे नहीं होगा जी! रैगिंग से डर रहे हो! कैसे इलाहबादी हो बे?” “डर नहीं रहे हैं. देखो हमारा सीधा हिसाब है कि फैलने उतना ही दो जितना पतीले में झोल हो. उससे ज्यादा में तो हम उबल जाते हैं. सीधी-साफ बात है. मार देब, मर जाबो.” “अरे पंडित! ढेर जोश में? नंगा करके दौड़ाते हैं यहां.” मोहित ने प्रसाद को बैक अप दिया. “जुगनू बना देते हैं यहां. जुगनू समझते हो रे पंडित?” प्रसाद ने मोहित के तीर पे फॉलो अप लिया. “जुगनू?” पांडे की त्योरी चढ़ी हुई थी. “हां जुगनू! अगरबत्ती खोंस देगे पंडी जी, पिछवाड़े में. फिर नचवाएंगे बत्ती बुझा के.” प्रसाद ने कहा. “साजन-साजन तेरी दुल्हन, तुझको पुकारे आ जा.” “आ जा. आ जा. आ….” मोहित ने ईको दिया. “गीतकार आनंद बक्शी. संगीतकार अन्नू मलिक. सिंगर अल्का याग्निक. फिल्म आरजू. समझे पंडी जी?” प्रसाद ने कहा. “रैगिंग?” पांडे दुबला हुआ जा रहा था और मैं भी. “कानपुर होता तो मजाल किसी की जो कपड़े उतरवा लेता!” मैंने जी कड़ा करते हुए कहा. “इतने में तो कट्टा चल जाए बर्रा दो में.” “अच्छा तुम कानपुर से हो?” मोहित जोर से हंसा. उसकी और प्रसाद की खुशी का ठिकाना नहीं था.
“क्यों. कानपुर में ऐसा भी क्या है?” मेरा दिल सिकुड़ के गुझिया हो रहा था. “कानपुर वाले सबसे लम्बा नपते हैं यहां. रोल कॉल होगी. सबसे पहिले कनपुरियों का ही नंबर आता है. पिछले साल विवेक मिसिर करके एक लड़का था कानपुर से. राघवेंदर सिंह ने उसको उमराव जान बना दिया था. बाकायदा पंद्रह दिन उसकी मुजरा ट्रेनिंग चली थी और फिर धनराजगिरी हॉस्टल में मैदान पे लाइट और तखत-उखत सजवा के उसका शो लगा था. पोस्टर छपे थे. कमरे-कमरे पर्चे बंटे थे - आपके शहर में पहिली बार, अखिल भारतीय महान उद्घाटन. कानपुर की कटीली नचनिया आ रही हैं, आवा देखा हो महराज.” प्रसाद बोला. “चिकना था वो भी.” मोहित मेरी तरफ आंख टेढ़ा करके कहा. “ऐसे कोई जबरदस्ती थोड़ी करवा सकता है कुछ भी!” मैंने मजबूती से कहा. “करवाने को तो करवा ही सकता है लेकिन उसकी नौबत ही क्यों आए. कुल मिलाके सैंतीस सौ पचास रुपए का इनाम हुआ था विवेक मिश्रा पे. चार-छह महीने घर से पैसा मंगाने की नौबत नहीं आई थी विवेक मिश्रा को. एक सौ एक का व्यवहार तो हम खुदे किए थे.” प्रसाद ने शान से कहा. “तुम भी आए थे मुजरा देखने?” “तब क्या! BHU घर है हमारा. राघवेंदर सिंह मेरा ही चेलवा है. उसका दो साल पाहिले JEE निकल गया तो सीनियर हो गया. वो कोटा निकल गया था और हम यहां राव सर और झा सर के यहां दूसरी सीट पर बैठ के प्रियंका मोहन की कमर का टैटू ही देखते रह गए. तितली वाला. नहीं तो बेटा हम भी थर्ड इयर में होते. क्या पता आज हम तुम्हारे सीनियर होते और तुमको पंडी जी के साथ नचवा रहे होते.” “मैं रैगिंग देने नहीं जाऊंगा. कम्प्लेन कर दूंगा अगर किसी ने ज्यादा हीरो बनने की कोशिश की.” “हां और नहीं तो क्या! मजाक है क्या! मार देब, मर जाबो!” पांडे ने मेरी हिम्मत बढ़ाई. “ये गजब कभी न करना पंडी जी. आते ही क्रांति की बातें न करो. क्रांति करवाओ पड़ोसी से, खुद मत करो. चाचा नेहरू बनके गुलाब का फूल खोंस लो और नेतागीरी करो, भगत सिंह बनके असेंबली में घुसोगे तो फांसी पे लटका दिए जाओगे. रैगिंग नहीं देनी तो मत देना. बस मेरा और मोहित का नाम बता देना. कोई कुच्छो नहीं कहेगा.” “रैगिंग तो यहां त्यौहार जैसे होता है जी. जज्बाती होके विभीषण छाप विलाप काहे कर रहे हो.” मोहित ने कहा. “हम तो हर हॉस्टल में रैगिंग दे आए हैं. केमिकल सेकेंड इयर वाले खुद को बहुत तोप समझते हैं. गिलेस्पी-गिलेस्पी करके एक लौंडा है, घुंघराले बाल वाला. आइब्रो में बाली पहनता है आंख के ऊपर. साला हमको बोला कि शर्ट उतार. हम सीधे पैंट उतार दिए. चड्ढी भी खोलने ही वाले थे कि खुदई हाथ जोड़ लिया साला. हमारा रैगिंग ले रहा था, हम खुद उसका रैगिंग ले लिए.” प्रसाद बोला. मैं चुपचाप उसे सुन रहा था और यह गुत्थी हल करने की कोशिश कर रहा था कि खुद की पैंट उतार देने से सामने वाली की रैगिंग कैसे हो गई. हां पर इस बात का सुकून जरूर था कि प्रसाद और मोहित से दोस्ती हो गई और शायद अब रैगिंग से बच भी जाएंगे. प्रसाद मुझे बाकी के लड़कों से मिलाने ले जा रहा था पर मैं पंद्रह नंबर से आगे नहीं गया. मैं उसकी बात टाल गया. पांडे की हिदायत अभी भी मेरे दिल-ओ-दिमाग में सुरक्षित थी. ‘अब जो यदि तुम पढ़-लिखकर नासा पहुंचने के इरादे से आए हो, तो फिर तुम सोलह नंबर कमरे तरफ मत जाना.’ मैंने कदम वापस खींच लिए और अपने कमरे में वापस आ गया. राजपूताना हॉस्टल दिन चढ़ते गुलजार हो रहा था. मैं आते-जाते लोगों को देख रहा था. तरह-तरह के लोग.
निखिल की पहले भी दो किताबें आ चुकी हैं. नमक स्वादानुसार और जिंदगी आइस पाइस. इनको खरीदने के लिए नीचे लिंक दिए हैं. Namak Swadanusar Zindagi Aais Pais और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करो. बाप से पिटा, मां से लात खाई, तुमाई चुम्मी के लिए गुटखा छोड़ दें? कानपुर में कुछ सवा सौ लड़के, पिछले छह आठ साल से उसके पीछे पड़े थे दरोगा जी की जिंदगी के डेड वायर में नया करंट दौड़ गया केस्को वाले सीताराम चौरसिया की मनोहर कहानी कानपुर की मनोहर कहानियां: न्यू जनता टी स्टाल

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