पढ़िए, नोट बैन पर रघुराम राजन का क्या सोचना है
जानना नहीं चाहेंगे कि इकॉनमी का रॉकस्टार नोट बैन करने पर क्या सोचता है?

रघुराम गोविंद राजन. इकॉनमी का रॉकस्टार. वो शख्स, जिसके रहने तक इंडियन इकॉनमी को कभी कोई डर नहीं लगा. 5 सितंबर, 2013 को जब इस बंदे ने बतौर RBI गवर्नर पहली स्पीच दी थी, उसके तुरंत बाद सेंसेक्स 333 पॉइंट्स बढ़ गया था. डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 2.1% बढ़ गई थी. बड़ा धांसू आदमी है.
आप सोच रहे होंगे कि हम अचानक आपको राजन के बारे में क्यों बता रहे हैं. जवाब ये है कि लोग नोट बैन के फैसले पर राजन की राय जानना चाहते हैं. असल में जब हजार और पांच सौ के नोट बैन होने की घोषणा हुई, उसके अगले ही दिन खबर आई कि सरकार 6 महीने से इसकी प्लानिंग कर रही थी. नोट छप रहे थे और जरूरी लोगों को इसकी जानकारी भी थी. राजन का कार्यकाल 4 सितंबर, 2016 को खत्म हुआ यानी उन्हें भी इसकी जानकारी थी. तो क्या वो इसके हक में थे? क्या उन्हें इस बारे में बताया गया था? क्या इस फैसले में उनकी भूमिका थी?
नोट बैन का फैसला आने के बाद तो राजन ने कुछ नहीं कहा है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि राजन आखिरी वक्त तक इस फैसले के पक्ष में नहीं थे. अगस्त, 2014 में राजन ने 20वें ललित दोशी मेमोरियल लेक्चर में 'फाइनेंस ऐंड अपॉर्चुनिटी इन इंडिया' टॉपिक पर स्पीच दी थी, जिसमें उन्होंने कहा था, 'ऐसा माना जाता है कि नोट बदलने से काला धन खत्म हो जाएगा, लेकिन चालाक लोग इससे बचने का तरीका खोज लेते हैं.' पढ़िए उन्होंने क्या-क्या कहा था:
ये रहा पूरा टेक्स्ट:'मुझे नहीं पता कि पुराने नोटों की मान्यता खत्म करके नए नोट लाने के बारे में आप क्या सोचते हैं, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं. अभी तक नोटों की मान्यता खत्म करने को काला धन खत्म करने के तरीके के तौर पर देखा जाता रहा है. क्योंकि ऐसे में लोगों को आगे आकर बताना पड़ेगा कि 'मेरी अलमारी में रखे दस करोड़ रुपए कहां से आए हैं'. उन्हें बताना पड़ेगा कि ये पैसे उन्होंने किस तरह कमाए. इसे सल्यूशन के तौर पर पेश किया जाता है. दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से, चालाक लोग इसका भी उपाय खोज लेंगे.
वो अपनी बड़ी रकम को छोटे टुकड़ों में बांटने का तरीका खोज लेंगे. आपने देखा होगा कि जो लोग अपनी ब्लैक मनी को वाइट करने का तरीका नहीं निकाल पाते, वो इन्हें मंदिर के दानपात्र में छोड़ देते हैं. मुझे लगता है इसके और भी कई तरीके हैं. काला धन खत्म करना आसान नहीं है. बेशक इसकी बड़ी मात्रा सोने में है, जिसे पकड़ना और मुश्किल है. मैं उन चीजों पर फोकस करूंगा, जिनकी वजह से लोग ब्लैक मनी बनाते हैं और रखते हैं. ऐसा अधिकतर टैक्स की वजह से होता है और मैं उसी पर फोकस करूंगा.
मेरा मानना है कि इस देश में अभी जो टैक्स रेट है, वो अधिकांश जगहों पर जायज है. हमारा टैक्स सिस्टम अच्छा है. जैसे, ज्यादा कमाई पर अधिकतम टैक्स रेट 33% है. अमेरिका में ये पहले से 39% है, जिस पर स्टेट टैक्स भी लगते हैं, जिससे ये करीब 50% हो जाता है. इस मामले में हम कई इंडस्ट्रियल देशों से नीचे हैं. टैक्स न जमा करने वाले लोगों के पास कोई ऐसा कारण नहीं है, जिसकी वजह से वो टैक्स नहीं जमा कर रहे हैं. मैं डेटा ट्रैक करने और टैक्स का बेहतर प्रशासन बनाने पर फोकस करूंगा, जिससे पता चल सके कि कहां पैसा डिक्लेयर नहीं किया गया है. मुझे लगता है कि मॉडर्न इकॉनमी के इस दौर में पैसे छिपाना बेहद मुश्किल है.'

सरकार के नोट बैन करने के फैसले की तारीफ तो हो रही है, लेकिन इससे लोगों को परेशानी भी बहुत हो रही है. ATM, बैंक और पोस्ट ऑफिस पूरी तरह भरे हुए हैं. उनके बाहर लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं. बैंक के कर्मचारियों को बहुत ज्यादा काम करना पड़ रहा है और जिन लोगों को नोट बदलने के सिस्टम की पूरी जानकारी नहीं है, वो बहुत दिक्कत में हैं. उम्मीद है सब जल्दी ही ठीक हो जाएगा.
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