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मुख्तार अंसारी बनाम ब्रजेश सिंह: यूपी का सबसे बड़ा गैंगवार

गैंगवार होता था तो 400 राउंड गोलियां AK-47 की चल जाती थीं. कहानी, गैंगस्टर मुख्तार अंसारी और ब्रजेश सिंह की अदावत की.

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11 जनवरी 2018 (अपडेटेड: 11 जनवरी 2018, 11:13 AM IST)
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गैंग्स ऑफ़ वासेपुर तो आपने देखी ही होगी. उतने ही खतरनाक तरीके से काम करने वाले गैंग्स बनारस, मऊ, गाजीपुर और जौनपुर में 2009-10 तक पूरी पॉलिटिक्स पर हावी थे. ये वो दौर था, जब मुख़्तार अंसारी का कारवां निकलता था तो लाइन से 19-20 SUV गुज़रती थीं. सारी गाड़ियों के नंबर 786 से ख़तम होते थे. किसी की क्या मजाल कि पूरे शहर का भारी ट्रैफिक उन्हें 2 मिनट भी रोक सके. इन इलाकों में पान, चाय की दुकान पर बैठे चचा लोग बता देंगे कि मुख़्तार अंसारी जब चलता था, तो बॉडीगार्ड समेत अपने पूरे गैंग में सबसे लंबा दिख जाता था.
अब मुख़्तार अंसारी की फैमिली हिस्ट्री सुनेंगे तो 2 मिनट बाद पता चलेगा कि आपका मुंह खुल गया था. इनके दादाजी थे कांग्रेस के कभी प्रेसिडेंट रह चुके मुख़्तार अहमद अंसारी. इनके भाई अफज़ल 4 बार कम्युनिस्ट पार्टी से MLA रह चुके हैं और एक बार समाजवादी पार्टी से. अंसारी का कहना है कि इनके अब्बा और दादाजी फ्रीडम फाइटर थे. साथ ही चाचा और दादाजी नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस और गांधीजी के भी काफ़ी करीब थे. चाचा हामिद अंसारी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वीसी भी रह चुके थे.
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मुख्तार फिलहाल मऊ की घोसी सीट से बीएसपी विधायक हैं.

कुछ समय पहले तक जब मुख़्तार का इंटरव्यू लेने के लिए मीडिया की लाइन लगी रहती थी, तब मुख़्तार सुनहरे फ्रेम का चश्मा लगाए हाज़िर होता. इंटरव्यू के दौरान जेब से दो बंदूकें निकाल के उनसे खेलना शुरू कर देता था, फिर बताता था कि उसे सिर्फ 'टॉप' क्वालिटी की चीज़ें पसंद हैं. कपड़े, बंदूकें...सब कुछ टॉप क्वालिटी. रिवॉल्वर 957 मैग्नम और राइफल 975 मैग्नम की पसंद हैं. मुख़्तार इंटरव्यू देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होता था. क्योंकि उसे लगता है अगर वो बोलना शुरू किया तो सब बोल देगा. क्योंकि वो दूसरे नेताओं जैसा नहीं बल्कि जनता, खासतौर पर गरीबों का सेवक है. आगे उसका ये भी कहना था कि मीडिया अफवाह फैलाती है कि मैं जेल के अंदर शराब पीता हूं, जबकि मैं तो चाय और सिगरेट तक नहीं पीता, पान मसाला भी नहीं खाता.
पॉलिटिकल करियर की बात करें तो मुख़्तार की शुरुआत भी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर टाइप ही थी. कोयला, रेलवे, शराब का ठेका, गुंडा टैक्स यही सब. जब पूर्वांचल में 1970 के दौर में कई सरकारी योजनाएं लाईं गईं, तो उनके ठेके हथियाने की होड़ में कई गैंग भी उभरने लगे. मुख़्तार मकनु सिंह के गैंग से ताल्लुकात रखता था. दूसरी तरफ साहिब सिंह का गैंग था. सैदपुर में एक प्लॉट को लेकर दोनों गैंग्स की भिड़ंत हुई और यहीं से यह दुश्मनी शुरू हो गई.
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मुख्तार अंसारी निर्दलीय विधायक रहने के बाद सपा और बीएसपी में भी शामिल हुए थे. फिलहाल वो बीएसपी से विधायक हैं.

उधर साहिब सिंह गैंग से अलग होकर ब्रजेश सिंह गाजीपुर में 'फ्रीलांस' ठेकेदारी और गुंडागर्दी करने लगा. यहां फिरौती, रंगदारी, किडनैपिंग, और करोड़ों की ठेकेदारी को लेकर मुख़्तार और ब्रजेश सिंह के गैंग में भिड़त होती रही. 1995 के करीब मुख़्तार अंसारी पॉलिटिक्स में उतर आया और चार बार मऊ से MLA बना. पहला चुनाव बसपा से और आगे दो निर्दलीय. 1990 से 2008 के करीब तक बनारस, गाजीपुर और जौनपुर दोनों गैंग की दुश्मनी के बीच अपराध का गढ़ बन गया. उस ज़माने में बनारस-जौनपुर के लोगों को क्राइम के मामले में बॉम्बे की फीलिंग आती थी. और तो और कई कहानियां स्कूली लड़कों के जाने-अनजाने इस गैंगवार में घुस जाने और यहां तक कि कट्टा-वट्टा रखने की भी है.
'रॉबिनहुड' मुख्तार अंसारी...? अब बताते हैं मुख़्तार अंसारी की 'रॉबिनहुड' इमेज के बारे में. लड़की की शादी के लिए पैसा चाहिए, लड़के को सरकारी नौकरी दिलानी हो या कोई सरकारी ऑफिस में बार-बार दौड़ा रहा हो, तो आम आदमी मुख़्तार के पास जा सकता था. और तो और लड़की की शादी में दूल्हा कतरा रहा हो तो दूल्हा उठवाने तक का काम मुख्तार से हाथ जोड़कर करवा सकता था.
मऊ, बनारस और गाजीपुर में बुनकर उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी भारी बिजली कटौती. मुख़्तार ने इस मामले को सीरियसली लिया और कुछ ही दिनों में ये समस्या काफी हद तक सुलझ गई. इसके अलावा इसमें भी चचा लोग की राय जानना चाहें तो मुख़्तार बड़ा क्रिमिनल था, मार-काट करता था, लेकिन आम आदमी का कुछ नहीं बिगाड़ता था, बल्कि बड़े पॉलिटिकल दांव-पेच के बीच उनका भला ही हो जाता था. इसी वजह से मुख्तार अंसारी की पॉलिटिकल ताकत बढ़ती गई.
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पूर्वांचल में बृजेश सिंह (बाएं) और मुख्तार अंसारी की अदावत के किस्से खूब सुनने को मिलते हैं.

2002 में ब्रजेश सिंह और मुख़्तार अंसारी की भयानक लड़ाई में मुख़्तार गैंग के तीन लोग मारे गए. ब्रजेश सिंह ज़ख़्मी हो गया और उसके मरने की खबर आई. लेकिन महीनों तक किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई कि ब्रजेश सिंह ज़िन्दा है. और उसके वापस न आने तक मुख़्तार का वर्चस्व पूरा था. फिर ब्रजेश सिंह के वापस आने के साथ इस कहानी में एक तीसरी कड़ी जुड़ गयी, जो थी बीजेपी MLA कृष्णानंद राय की. जिन्होंने मुख़्तार और उसके भाई को 2002 में उत्तर प्रदेश चुनाव में हरा दिया. इसमें ब्रजेश सिंह ने उनको समर्थन दिया. अब गाजीपुर-मऊ इलाके में हिंन्दू-मुस्लिम वोट बैंक बनने लगे और आए दिन सांप्रदायिक लड़ाइयां होने लगीं. ऐसे ही एक मामले में मुख़्तार गिरफ़्तार हो गया.
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बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय (बाएं) की हत्या में मुख्तार अंसारी का नाम सामने आया था.

कृष्णानंद राय की हत्या के बाद ब्रजेश सिंह गाजीपुर-मऊ इलाके से फ़रार हो गया. 2008 में वह ओडिशा से गिरफ़्तार कर लिया गया और कुछ समय बाद प्रगतिशील मानव समाज पार्टी का हिस्सा बन गया. 2008 में मुख़्तार अंसारी ने बसपा की ओर वापस रुख़ किया और दावा किया कि उसे अपराध के केस में फंसाया गया था. मायावती ने मुख़्तार को 'गरीबों का मसीहा' बताया और ज़ोर-शोर से चुनाव प्रचार शुरू हो गया.
यही वो वक्त था, जब मुख़्तार की 'रॉबिनहुड' इमेज पर बसपा ने बहुत ज़ोर दिया. 2009 के लोक सभा चुनाव में मुख़्तार बनारस से खड़ा हुआ और बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी से हार गया. लेकिन गज्जब बात तो यह है कि मुख़्तार ने ये पूरा चुनाव जेल के अंदर से ही संभाल लिया. मुख़्तार जब गाजीपुर के जेल में था तभी एक दिन पुलिस रेड में पता चला कि उसकी ज़िंदगी बाहर से भी ज़्यादा आलीशान और आरामदायक चल रही है. अंदर फ्रिज, टीवी से लेकर खाना बनाने के बर्तन तक मौजूद थे. तब उसे मथुरा के जेल में भेज दिया गया.
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2010 में बसपा ने मुख़्तार के आपराधिक मामलों को स्वीकारते हुए उसे पार्टी से निकाल दिया. अब मुख़्तार ने अपने भाइयों के साथ नयी पार्टी बनाई, कौमी एकता दल. जिससे वह 2012 में मऊ चुनाव जीत गया. 2014 में मुख़्तार ने ऐलान किया कि वह बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ेगा, लेकिन बाद में उसने ये कह कर आवेदन वापस ले लिया कि इससे वोट सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएंगे. 2016 में जब मुख्तार अंसारी को सपा में शामिल करने की बात आई, तो उस वक्त मुख्यमंंत्री अखिलेश यादव ने अपने मंत्री बलराम यादव को मंत्रीमंडल से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. किसी तरह से मुलायम सिंह से कह सुनकर बलराम यादव तो वापस आ गए, लेकिन मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल न करने की बात पर अखिलेश यादव अड़े ही रहे. इसके बाद विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी ने अपनी पार्टी कौमी एकता दल का मायावती की पार्टी बीएसपी में विलय कर दिया.
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(ये स्टोरी पारुल ने लिखी है.) 

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