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श्री जगन्नाथ हर साल रथ यात्रा पर निकलने से पहले 15 दिन की 'सिक लीव' पर क्यों रहते हैं?

25 जून से जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा शुरू हो गई है.

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रुचिका
25 जून 2017 (अपडेटेड: 21 अक्तूबर 2017, 05:00 PM IST)
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पुरी में श्री जगन्नाथ का मंदिर है. जहां जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की पूजा की जाती है. 25 जून से इनकी रथ यात्रा शुरू हो गई. ये रथ यात्रा कैसे शुरू हुई, इसकी कहानी नीचे लिंक में है. कहते हैं हर साल भगवान 15 दिन की सिक लीव पर होते हैं. मतलब सर्दी-बुखार के चक्कर में हर साल 15 दिन की छुट्टी. इन 15 दिनों में भगवान की अलग सेवा की जाती है. आपको बताते हैं कि ये 15 दिन वाला कॉन्सेप्ट आया कहां से.


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हर साल स्नान यात्रा निकाली जाती है. देवताओं को सजाया जाता है, ताकि वो भक्त खुश हो सकें, जो गणेश को भी उतना ही मानते हैं जितना जगन्नाथ को. जैसे गणेश भगवान जी को इस मंदिर में बहुत माना जाता है, वैसे ही सूर्य देवता को भी. रोज़ मंदिर में सूर्य देवता की भी पूजा होती है. मंदिर के मुक्ति मंडप में इनको पूजा जाता है. श्री जगन्नाथ मंदिर, ओडिशा की ट्राइबल कम्यूनिटीज़ के रीति रिवाज़ों और मान्यताओं से बहुत जुड़ा हुआ है. देवताओं का जो लकड़ी वाला लुक है, वो भी इन्हीं ट्राइबल कम्यूनिटी की वजह से आया है. इनमें से भी स्वरस ट्राइबल कम्यूनिटी सबसे आगे है. जब जगन्नाथ नीलमाधव के फॉर्म में थे, तब से स्वरस आदिवासी उनकी पूजा कर रहे हैं.

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रथ यात्रा के पहले फेज़ की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है. उत्तर भारत में जहां इस पर्व पर लोग सोने-चांदी जैसे महेंगे सामान खरीदते हैं, वहीं ओडिशा में नए मानसून की फसल के लिए जोताई का काम, इसी त्योहार से शुरू होता है. पुरी में अक्षय तृतीया के दिन, जगन्नाथ के गर्मियों में मनाए जाने वाले त्यौहारों की शुरुआत होती है. इन त्यौहारों की शुरुआत चंदन यात्रा से होती है. जो 6 हफ्तों तक 2 फेज़ में चलती है. पहला फेज़ 21 दिनों का होता है. जिसमें हर दिन देवताओं की मूर्तियां नरेंद्र टेंक तक ले जाई जाती हैं.


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चंदन यात्रा के बाद आती है स्नान यात्रा. जो नहाने वाला फेस्टिवल होता है. इसे ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इसमें देवताओं को उनके स्थान से उतारकर, स्नान मंडप तक ले जाया जाता है. इसकी तैयारी एक दिन पहले से होने लगती है. ताड़ के पेड़ की लकड़ी से काम चलाऊ रेंप तैयार किया जाता है. जिसपर बैठाकर भगवान को स्नान मंडप तक लाया जाता है. स्नान यात्रा को स्नान पूर्णिमा भी कहते हैं. इस दिन सारे देवताओं को सजा कर हाथी का रूप दिया जाता है.


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स्नान यात्रा के बाद ज़रूरी है कि भगवान की मूर्तियों पर वापस पेंट किया जाए. ये सब भक्तों से छुप कर किया जाता है. इसे गुप्त सेवा कहते हैं. रथ यात्रा से पहले स्नान यात्रा में भगवानों की मूर्तियों का रंग फीका पड़ जाता है. इसे सही करने के लिए ही ये गुप्त सेवा की जाती है. स्नान यात्रा के बाद देवताओं को बुखार चढ़ जाता है. 15 दिन तक उनकी खास देख-रेख की जाती है.



इस स्टोरी के लिए इनपुट 'सुभाष पाणी' की बुक 'रथ यात्रा' से लिया गया है.


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'रथ यात्रा' बुक का कवर



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