सिर पर कफन बांधकर मरने के लिए निकले आतंकवादी भी इन औरतों से डरते हैं
इराकी कुर्दिस्तान की फौज का नाम है पेशमरगा. इसकी महिला सिपाहियों से ISIS बहुत खौफ खाता है.
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कुर्दिश कौम के अंदर राष्ट्रवाद की भावना बहुत गहरी है. ये खुद को बिना देश का मानते हैं. उन्हें अपने मुल्क की तलाश है. ग्रेटर कुर्दिस्तान की, जो एक आजाद लोकतंत्र होगा.
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एक बार खबर आई. 2016 में. इराकी फौज ने इस्लामिक स्टेट (ISIS) के एक आतंकवादी को पकड़ा. आतंकी गिड़गिड़ाने लगा. उसको मरना था. शाम 4 बजे से पहले. फौज के सिपाहियों ने पूछा. इतनी जल्दी क्यों है तुझे मरने की? ब्रेन वॉशिंग की दहशत देखिए. आतंकवादी ने कहा, आज खास दिन है. शाम 4 बजे जन्नत में कोई मीटिंग है. शाम 4 बजे तक मर गया, तो वहां पहुंचना तय है. जो ऐसा इरादा करके मरने की ठानकर घर से निकलता हो, उसे किससे डर लगता है?

पेशमरगा फौज में कुर्द महिलाओं के अलावा कई यजीदी महिलाएं भी शामिल हैं. ISIS ने जिन समुदायों पर सबसे ज्यादा जुल्म किया, उनमें यजीदी भी शामिल हैं.
कुर्द औरतों के हाथों मरने से बहुत डरता है ISIS पेशमरगा फौज की औरतों से ISIS बहुत खौफ खाता है. कुर्द औरतें. मजबूती से हथियार थामे निशाना लगातीं नेल पॉलिश रंगी उंगलियां. होठों पर लिपस्टिक. आंखों में काजल की लकीर. सेना की वर्दी में तैनात. आतंकवादी बड़ा डरते हैं इनसे. इनके हाथों नहीं मरना चाहते. उन्हें लगता है कि औरत के हाथ से मारे गए, तो जन्नत नहीं मिलेगी. जिहाद की राह पर निकला खुद को 'बहादुर' समझने वाला 'आतंकी औरत' के हाथों मरकर तो सीधे दोजख पहुंचेगा! जब दुनिया ने इन कुर्द औरतों को पहली नजर देखा, तो दीवानी हो गई. पश्चिमी देशों को ये लड़कियां अजूबा लग रही थीं. कहां तो इस्लामिक देशों की कट्टरता. कहां हाथ में AK 47 थामे मोर्चे पर तैनात ये लड़कियां.

महिलाओं और पुरुषों की ट्रेनिंग में कोई फर्क नहीं होता.
कुर्दिश संस्कृति में हमेशा से ही सेंटरस्टेज पर रही है जंग इराक, ईरान, तुर्की, सीरिया और आर्मेनिया में रहते हैं कुर्द. करीब तीन करोड़ की आबादी. कुर्दिश संस्कृति में जंग की हमेशा से एक खास जगह रही है. अपना वजूद बचाने के लिए वो हमेशा से लड़ते आए हैं. कभी इस दुश्मन से. कभी उस दुश्मन से.

इराक की सरकार और कुर्दों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे. ISIS चूंकि दोनों का दुश्मन है, इसीलिए उन्होंने साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया.
कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की पुरानी परंपरा है पिछले 100 साल पर ही नजर फेर लीजिए. कुर्दों ने ओटोमन साम्राज्य से लड़ाई की. ब्रिटेन से लड़े. सद्दाम हुसैन के दौर में बाथिस्ट सत्ता से लड़े. अब ISIS से लड़ रहे हैं. पेशमरगा फौज इराकी कुर्दों की सेना है. कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की पुरानी परंपरा है.

ISIS के खिलाफ लड़ रही ताकतों के लिए कुर्दिश पेशमरगा फौज काफी अहमियत रखती है.
कुर्दों के लिए लड़ना शौक नहीं, मजबूरी है इराक में एक तानाशाह दौर था सद्दाम हुसैन का. अल-अनफाल का दौर. सद्दाम के हाथों कुर्दों के खिलाफ शुरू किया गया नरसंहार. बाकी अल्पसंख्यक भी निशाने पर थे. गांव के गांव जला दिए गए. शहर उजाड़ दिए गए. लोगों को उनके घरों से निकालकर फेंक दिया गया. कहते हैं, इस दौर में पौने दो लाख से ज्यादा कुर्द मारे गए. तब पेशमरगा सद्दाम की फौज से लड़ते थे. जान बचाने का संघर्ष था. जीने का संघर्ष था. कुर्दिश में एक शब्द है. झिनी शाख. माने, पहाड़ों में रहने वाली औरतें. ये कुर्द औरतें अपने पतियों और भाइयों का साथ देती थीं.

कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की परंपरा नई नहीं है. ये समाज हमेशा से बेहद जुझारू रहा है.
कुर्द समाज की रोल मॉडल हैं झिनी शाख गुरिल्ला वॉर. छापामार युद्ध. घात लगाकर हमला करो और फिर यूं गायब हो जाओ कि कभी थे ही नहीं. इन्हीं औरतों को 'झिनी शाख' कहते थे. आजादी हासिल करने की उस लड़ाई में इन औरतें ने मर्दों का खूब साथ दिया. कुर्द आबादी को इन औरतों पर बड़ा नाज है. इनमें से कुछ के नाम आज की पीढ़ी को भी याद हैं. 70 के दशक की पेशमरगा कमांडर खुस्का हलिमा. 1974 में सद्दाम हुकूमत द्वारा फांसी पर चढ़ाई गई छात्र कार्यकर्ता लैला कासिम. मशहूर पेशमरगा लड़ाका हीरो इब्राहिम अहमद.

ISIS कुर्दों से जितनी नफरत करता है, उससे कहीं ज्यादा उनसे खौफ खाता है.
कागजी नहीं है पेशमरगा औरतों का संघर्ष कुर्द औरतें फिर से मोर्चे पर हैं. 2014 से ही. ISIS के खिलाफ. कई बार बहस भी हुई. आलोचक कहते, ये बस सजावटी हैं. ध्यान और वाहवाही बटोरने के लिए लाई जाती हैं. ये आलोचक गलत थे. इन लड़ाकों की लड़ाई कागजी नहीं है. शुरुआत में उन्हें मोर्चे पर नहीं भेजा गया. फिर जैसे-जैसे लड़ाई बढ़ती गई, लड़ाकों की जरूरत भी बढ़ती गई. सैकड़ों लड़कियां और औरतें अपनी मर्जी से आगे आईं. उनकी जरूरत बनने लगी.

इराकी कुर्दिस्तान में कदम रखने की हिम्मत ISIS में भी नहीं. सालों के संघर्ष ने कुर्दों को तपा दिया है. उनके लिए बहादुर होना चॉइस नहीं है, जीने का तरीका है.
जितनी नफरत ISIS औरतों से नहीं करता, उससे ज्यादा ये कुर्द औरतें ISIS से नफरत करती हैं इन सब औरतों में एक बात कॉमन है. सबको ISIS से चिढ़ है. इस चिढ़ की वजह? ISIS को औरतों से चिढ़ है. उनके लिए औरतें बस सेक्स और गुलामी की चीज हैं. पांव की जूती. कुर्द औरतों को ये होना मंजूर नहीं. कुर्दों को इस्लामिक समाज के सबसे प्रगतिशील समुदायों में गिना जाता है. कुर्दों के अलग तौर-तरीकों के कारण वैसे भी वो कट्टरपंथी मुसलमानों को फूटी आंख नहीं भाते.

ISIS के खिलाफ जंग में कुर्द समाज बहुत काम आया है. शायद इसीलिए अब वो अपने अधिकार मांगने पर जोर दे रहे हैं. अभी-अभी इराकी कुर्दिस्तान में आजाद मुल्क के लिए वोटिंग हुई है.
इस्लामिक समाज की सबसे प्रगतिशील आबादियों में से एक हैं कुर्द पश्चिमी चलन के मुताबिक शायद लोगों को कुछ कमियां दिखें. लेकिन जितनी आजादी कुर्द औरतों को है, उतनी शायद इस्लामिक समाज में किसी और जगह की औरतों को मयस्सर नहीं है. कुछ समय पहले इराकी कुर्दिस्तान की औरतों ने एक गजब की बात कर डाली. फरमान निकाल दिया. औरतों और मर्दों की बराबरी का. बड़ी संख्या में मर्दों ने इसका समर्थन किया. बहुत जागरूक और जुझारू कौम है इनकी.

कुर्दिश महिलाएं न केवल जंग के मैदान में मौजूद हैं, बल्कि आंतरिक सुरक्षा की ड्यूटी भी निभा रही हैं.
बस मारना ही नहीं जानती हैं ये औरतें, जान बचाना भी खूब जानती हैं पेशमरगा को अपने आदर्शों पर बड़ा नाज है. वो बड़े गर्व से बताते हैं. वो निहत्थों पर हाथ नहीं उठाते. बूढ़ों, बच्चों और मासूमों को नहीं मारते. यहां तक कि पकड़े गए ISIS आतंकियों के साथ भी इंसानियत से पेश आते हैं. जिन्हें लोग कबीलाई कहते हैं, वही कुर्द युद्ध के सबसे आदर्शवादी नियमों की हिफाजत करते हैं. उन्हें लगता है कि ये नैतिकता ही उन्हें मजबूत करती है. इंसानियत निभाती हैं, लेकिन जंग के मैदान में लड़ने वाली कुर्द औरतें अपने लिए कोई रियायत नहीं मांगतीं. दुश्मन को मारती हैं. दुश्मन के हाथों मारी जाती हैं. उन्हें बस लड़ना भर ही नहीं आता. घायलों की तीमारदारी भी आती है. जान बचाना भी जानती हैं. जंग के मैदान में घायल पड़े शख्स को सुरक्षित कैसे निकाला जाए, ये भी आता है. यानी, उन्हें न केवल दुश्मनों को मारना आता है, बल्कि जरूरतमंदों की जान बचाने के नुस्खे भी खूब आते हैं. असली लड़ाके तो ऐसे ही होते हैं.
कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान, जो जान बचाने के लिए यहां वहां भाग रहे हैं
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औरत से.
कुछ औरतों से.
क्योंकि...
मरना एक बात है.
औरत के हाथों मरना दूसरी बात है.
औरतों को पैर की जूती समझने वालों के लिए...
बहादुर औरतों के हाथों मरना शर्मिंदगी है.

पेशमरगा फौज में कुर्द महिलाओं के अलावा कई यजीदी महिलाएं भी शामिल हैं. ISIS ने जिन समुदायों पर सबसे ज्यादा जुल्म किया, उनमें यजीदी भी शामिल हैं.
कुर्द औरतों के हाथों मरने से बहुत डरता है ISIS पेशमरगा फौज की औरतों से ISIS बहुत खौफ खाता है. कुर्द औरतें. मजबूती से हथियार थामे निशाना लगातीं नेल पॉलिश रंगी उंगलियां. होठों पर लिपस्टिक. आंखों में काजल की लकीर. सेना की वर्दी में तैनात. आतंकवादी बड़ा डरते हैं इनसे. इनके हाथों नहीं मरना चाहते. उन्हें लगता है कि औरत के हाथ से मारे गए, तो जन्नत नहीं मिलेगी. जिहाद की राह पर निकला खुद को 'बहादुर' समझने वाला 'आतंकी औरत' के हाथों मरकर तो सीधे दोजख पहुंचेगा! जब दुनिया ने इन कुर्द औरतों को पहली नजर देखा, तो दीवानी हो गई. पश्चिमी देशों को ये लड़कियां अजूबा लग रही थीं. कहां तो इस्लामिक देशों की कट्टरता. कहां हाथ में AK 47 थामे मोर्चे पर तैनात ये लड़कियां.

महिलाओं और पुरुषों की ट्रेनिंग में कोई फर्क नहीं होता.
कुर्दिश संस्कृति में हमेशा से ही सेंटरस्टेज पर रही है जंग इराक, ईरान, तुर्की, सीरिया और आर्मेनिया में रहते हैं कुर्द. करीब तीन करोड़ की आबादी. कुर्दिश संस्कृति में जंग की हमेशा से एक खास जगह रही है. अपना वजूद बचाने के लिए वो हमेशा से लड़ते आए हैं. कभी इस दुश्मन से. कभी उस दुश्मन से.

इराक की सरकार और कुर्दों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे. ISIS चूंकि दोनों का दुश्मन है, इसीलिए उन्होंने साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया.
कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की पुरानी परंपरा है पिछले 100 साल पर ही नजर फेर लीजिए. कुर्दों ने ओटोमन साम्राज्य से लड़ाई की. ब्रिटेन से लड़े. सद्दाम हुसैन के दौर में बाथिस्ट सत्ता से लड़े. अब ISIS से लड़ रहे हैं. पेशमरगा फौज इराकी कुर्दों की सेना है. कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की पुरानी परंपरा है.

ISIS के खिलाफ लड़ रही ताकतों के लिए कुर्दिश पेशमरगा फौज काफी अहमियत रखती है.
कुर्दों के लिए लड़ना शौक नहीं, मजबूरी है इराक में एक तानाशाह दौर था सद्दाम हुसैन का. अल-अनफाल का दौर. सद्दाम के हाथों कुर्दों के खिलाफ शुरू किया गया नरसंहार. बाकी अल्पसंख्यक भी निशाने पर थे. गांव के गांव जला दिए गए. शहर उजाड़ दिए गए. लोगों को उनके घरों से निकालकर फेंक दिया गया. कहते हैं, इस दौर में पौने दो लाख से ज्यादा कुर्द मारे गए. तब पेशमरगा सद्दाम की फौज से लड़ते थे. जान बचाने का संघर्ष था. जीने का संघर्ष था. कुर्दिश में एक शब्द है. झिनी शाख. माने, पहाड़ों में रहने वाली औरतें. ये कुर्द औरतें अपने पतियों और भाइयों का साथ देती थीं.

कुर्द समाज में महिला लड़ाकों की परंपरा नई नहीं है. ये समाज हमेशा से बेहद जुझारू रहा है.
कुर्द समाज की रोल मॉडल हैं झिनी शाख गुरिल्ला वॉर. छापामार युद्ध. घात लगाकर हमला करो और फिर यूं गायब हो जाओ कि कभी थे ही नहीं. इन्हीं औरतों को 'झिनी शाख' कहते थे. आजादी हासिल करने की उस लड़ाई में इन औरतें ने मर्दों का खूब साथ दिया. कुर्द आबादी को इन औरतों पर बड़ा नाज है. इनमें से कुछ के नाम आज की पीढ़ी को भी याद हैं. 70 के दशक की पेशमरगा कमांडर खुस्का हलिमा. 1974 में सद्दाम हुकूमत द्वारा फांसी पर चढ़ाई गई छात्र कार्यकर्ता लैला कासिम. मशहूर पेशमरगा लड़ाका हीरो इब्राहिम अहमद.

ISIS कुर्दों से जितनी नफरत करता है, उससे कहीं ज्यादा उनसे खौफ खाता है.
कागजी नहीं है पेशमरगा औरतों का संघर्ष कुर्द औरतें फिर से मोर्चे पर हैं. 2014 से ही. ISIS के खिलाफ. कई बार बहस भी हुई. आलोचक कहते, ये बस सजावटी हैं. ध्यान और वाहवाही बटोरने के लिए लाई जाती हैं. ये आलोचक गलत थे. इन लड़ाकों की लड़ाई कागजी नहीं है. शुरुआत में उन्हें मोर्चे पर नहीं भेजा गया. फिर जैसे-जैसे लड़ाई बढ़ती गई, लड़ाकों की जरूरत भी बढ़ती गई. सैकड़ों लड़कियां और औरतें अपनी मर्जी से आगे आईं. उनकी जरूरत बनने लगी.

इराकी कुर्दिस्तान में कदम रखने की हिम्मत ISIS में भी नहीं. सालों के संघर्ष ने कुर्दों को तपा दिया है. उनके लिए बहादुर होना चॉइस नहीं है, जीने का तरीका है.
जितनी नफरत ISIS औरतों से नहीं करता, उससे ज्यादा ये कुर्द औरतें ISIS से नफरत करती हैं इन सब औरतों में एक बात कॉमन है. सबको ISIS से चिढ़ है. इस चिढ़ की वजह? ISIS को औरतों से चिढ़ है. उनके लिए औरतें बस सेक्स और गुलामी की चीज हैं. पांव की जूती. कुर्द औरतों को ये होना मंजूर नहीं. कुर्दों को इस्लामिक समाज के सबसे प्रगतिशील समुदायों में गिना जाता है. कुर्दों के अलग तौर-तरीकों के कारण वैसे भी वो कट्टरपंथी मुसलमानों को फूटी आंख नहीं भाते.

ISIS के खिलाफ जंग में कुर्द समाज बहुत काम आया है. शायद इसीलिए अब वो अपने अधिकार मांगने पर जोर दे रहे हैं. अभी-अभी इराकी कुर्दिस्तान में आजाद मुल्क के लिए वोटिंग हुई है.
इस्लामिक समाज की सबसे प्रगतिशील आबादियों में से एक हैं कुर्द पश्चिमी चलन के मुताबिक शायद लोगों को कुछ कमियां दिखें. लेकिन जितनी आजादी कुर्द औरतों को है, उतनी शायद इस्लामिक समाज में किसी और जगह की औरतों को मयस्सर नहीं है. कुछ समय पहले इराकी कुर्दिस्तान की औरतों ने एक गजब की बात कर डाली. फरमान निकाल दिया. औरतों और मर्दों की बराबरी का. बड़ी संख्या में मर्दों ने इसका समर्थन किया. बहुत जागरूक और जुझारू कौम है इनकी.

कुर्दिश महिलाएं न केवल जंग के मैदान में मौजूद हैं, बल्कि आंतरिक सुरक्षा की ड्यूटी भी निभा रही हैं.
बस मारना ही नहीं जानती हैं ये औरतें, जान बचाना भी खूब जानती हैं पेशमरगा को अपने आदर्शों पर बड़ा नाज है. वो बड़े गर्व से बताते हैं. वो निहत्थों पर हाथ नहीं उठाते. बूढ़ों, बच्चों और मासूमों को नहीं मारते. यहां तक कि पकड़े गए ISIS आतंकियों के साथ भी इंसानियत से पेश आते हैं. जिन्हें लोग कबीलाई कहते हैं, वही कुर्द युद्ध के सबसे आदर्शवादी नियमों की हिफाजत करते हैं. उन्हें लगता है कि ये नैतिकता ही उन्हें मजबूत करती है. इंसानियत निभाती हैं, लेकिन जंग के मैदान में लड़ने वाली कुर्द औरतें अपने लिए कोई रियायत नहीं मांगतीं. दुश्मन को मारती हैं. दुश्मन के हाथों मारी जाती हैं. उन्हें बस लड़ना भर ही नहीं आता. घायलों की तीमारदारी भी आती है. जान बचाना भी जानती हैं. जंग के मैदान में घायल पड़े शख्स को सुरक्षित कैसे निकाला जाए, ये भी आता है. यानी, उन्हें न केवल दुश्मनों को मारना आता है, बल्कि जरूरतमंदों की जान बचाने के नुस्खे भी खूब आते हैं. असली लड़ाके तो ऐसे ही होते हैं.
कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान, जो जान बचाने के लिए यहां वहां भाग रहे हैं
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ऐसा क्या है इस वोटिंग में कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में फिर से जंग के बादल मंडराने लगे हैं?
कुर्द : मुसलमानों की इस क़ौम ने जब भी अलग देश की मांग की, तब मारे गए
गोली इस महिला का सिर उड़ा देती, लेकिन इसने जो किया वो चौंकाने वाला है
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