इमरान हाशमी: जिसने न्यूटन और आइंस्टाइन में अंतर बताया था
इस हीरो ने खुद वो जगह बना ली जिसके बाद इसकी फोटो पर लड़के फिल्म के डायलॉग लिखने लगे. आज जन्मदिन है.
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कॉलेज लेवल पर यूथ फेस्टिवल होते हैं. इमरान हाशमी एक बुरा बालक है. लड़ाई झगड़े करता था. अलटा-पलटी ऐसी हुई कि उसे पढ़ाकुओं की क्लास में बैठना पड़ा. मास्टर ने समस्याएं खड़ी कीं और इस चक्कर में वो यूथ फेस्टिवल में क्विज खेलने जा बैठा. जैसे अंत में पहुंचा आखिरी सवाल आया. 'अल्बर्ट आइंस्टाइन ने थर्ड लॉ ऑफ मोशन किस साल में डिस्कवर किया था?' 29 सेकंड लेने के बाद. लड़ाकू बालक इमरान हाशमी ने जवाब दिया. ये ट्रिक क्वेश्चन है. लॉ ऑफ मोशन आइंस्टाइन ने नहीं न्यूटन ने डिस्कवर किया था. जनता ताली बजाती-बजाती पगला गई. अब पूछिए इस सीन में क्या खास था वही तो बात है. कुछ खास नहीं था. सलीके से पिक्चराइज तक नहीं किया. शेष आइडिया अच्छा था. यही इमरान हाशमी को कम करके आंकने की वजह भी बनता है. ऐसा उनके साथ कई-कई बार हुआ है.
बावजूद इसके वो बॉलीवुड में अलग महत्व रखते हैं. उनकी फिल्में चलती हैं. उनका नाम चलता है. वो बहुत अलग कंटेंट वाली फिल्में करते हैं. उनका अलग दर्शक वर्ग है. वो फालतू के बवाल में नहीं फंसते. अपनी पर्सनल लाइफ को हद से ज्यादा सबके सामने उघाड़ते नहीं. किसी से कभी बड़ा झगड़ा नहीं हुआ उनका. किसी गुटबंदी में आप उनको सीधे नहीं घसीट सकते.
इमरान का पूरा नाम इमरान अनवर हाशमी है. एक रोज़ इमरान ने सोचा नाम बदलते हैं. इमरान ने अपना नाम बदलकर फरहान हाशमी रख लिया. फिर बाद में वही नाम हो गया. जमा नहीं था. बस अनवर हटा रहा. इमरान फिल्मों में आए कैसे? 2001 में 'ये जिंदगी का सफर' नाम की फिल्म के साथ डेब्यू करने वाले थे, लेकिन बाद में फिल्म मेकर ने उन्हें फिल्म से निकाल दिया. जो तब होना था, तीन साल बाद हुआ. इमरान हाशमी की पहली पिक्चर फुटपाथ हुई. जब वो फिल्म परदे पर उतरी तो कैलेंडर पर साल 2003 चल रहा था.
14 साल के फिल्मी करियर में इमरान ने अब तक उंगलियों पर गिने जाने लायक फिल्में ही की हैं. लगभग 35. लेकिन याद करने जाएं तो आपको वो इमरान हाशमी याद आता है. मर्डर का सन्नी याद आता है, जिससे मिलने के बाद लौटती मल्लिका सारी राह रोती और फ्लैशबैक में जाती रहती हैं. इमरान बॉलीवुड में हमेशा से थे. जब कुणाल खेमू कलयुग कर रहे थे तब भी. जब इरफ़ान चॉकलेट कर रहे थे तब भी. निशा कोठारी द किलर में आएं, सयाली भगत आएं या गीता बसरा आएं, इमरान ने द किलर से द ट्रेन के समय में सबको आते देखा और अब सबका घर बसते देख रहे हैं. बस वो थे और हैं. जो चश्मे के पार से विद्या बालन को घूरता है. उससे जलता है. पर उसे पनपने के मौके देता है. एक बात याद रखें. मैं इंटरटेनमेंट हूं कहकर भले विद्या महफ़िल लूट ले गईं. उसके पहले तीन दफा इंटरटेनमेंट इमरान ने ही कहा था. वो उदास नायिका को मौत से बचाने के लिए दौड़ता है. तो दूसरी तरह हीरोइन की बसी बसाई गृहस्थी में आग भी लगाता है. वो कहानियां सुनाता है, जादू दिखाता है तो छिपकली के आड़े खुद डरकर आपको भी डराता है. वो ऑस्ट्रेलिया में टैक्सी चलाता है तो भुच्च सड़कछाप होकर बंदूकें भी बेचता है.
अब की राज़ रीबूट याद कीजिए. वो राज़ से अब के नहीं जुड़े हैं. न तब जब वो कंगना के पीछे जाते हैं. और पेंटिंग बनाते थे. इमरान ने 2002 में राज फिल्म के सेट पर बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर भी काम किया था. तब जब डीनो मोरिया ऊंचे गले के स्वेटर पहन बर्फ में लाशें गाड़ते थे.
इमरान का एक बेटा भी है. क्यूट अगर कहते हैं तो ऐसे ही बालकों को कहते होंगे. इमरान ने अपने और अपने बेटे की लाइफ पर किताब भी लिखी है. जिसका नाम kiss of life है. इस किस का उस किस से कतई वास्ता नहीं है जो हमने इमरान को फिल्मों में कई-कई बार करते देखा है. किताब उनके बेटे की कहानी थी, अयान की कैंसर से जंग और उस पर जीत का किस्सा. इस किताब में इमरान की ज़िंदगी भी थी. कॉलेज, स्कूल के दिनों की बातें दादी-पापा और बाकी परिवार वालों की बातें भी समेटी थीं.
बात क्रुक की, जिसमें इमरान हाशमी ने इंडिया के उचक्के का रोल किया. जो गलत तरीके से ऑस्ट्रेलिया जाता है. कुछ लोगों के लिए बुरा बनता है. कुछ से प्रेम पाता है, उन्हें धोखा देता है. वो विश्वास करने योग्य नहीं है, लेकिन अंत में वो सब ठीक कर देता है. इमरान की छवि ऐसी ही दिखाई जाती है फिल्मों में. वो इस सदी की शुरुआत में बॉलीवुड में आए थे. तब न प्रेम कथाएं बन रहीं थी. न विज्ञान फंतासी, आर्ट फिल्में करने वालों के अलग ठीहे हैं. फिल्में छल पर बन रहीं थीं. सेक्स को उड़ेलने के प्रयास चल रहे थे, हीरो अब थोड़ा बुरा हो सकता था, स्क्रीन पर देहातन कर सकता था. परस्त्रीगमन कर सकता था. राजश्री वाला हीरो होना जरूरी नहीं था. ये लड़का वैसा ही था. आशिक बनाया आपने, अक्सर, मर्डर वाला. वो अपनी सलूहियत से बुरा हो सकता था. और उम्मीद की जाती थी कि दर्शक इसका बुरा न मानेगा.
https://www.youtube.com/watch?v=vnlk8V-q0oU
एक फिल्म और थी. आवारापन. एक कोरियन फिल्म से उठाया कच्चा माल था. मुझे नहीं पता कि इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कैसा परफॉर्म किया. जानने-मानने वाले इस फिल्म को कैसी मानते हैं. पर 2007 में आई इस फिल्म को कस्बों से शहर में हमने 2010 तक सुना है. वो समय जब एफएम रेडियो पर आरजे प्रेमगुरु बन बैठते थे. कॉलेज की किताबों के बीच इस फिल्म के गाने हमारे बुकमार्क होते. हर समय की एक गंध होती है. हर समय की एक ध्वनि होती है. उसी तरह हर समय का अपना कोलाहल होता है. उस कोलाहल के बीच हमें कुछ गाने अपने से सुनाई देते. जो ब्लूटूथ डिवाइसेज से बांटे जाते. इमरान हाशमी की फिल्में सुलभ थीं, समझ आती थीं. हमें अच्छी लगतीं. इमरान हाशमी उस समय का धुंधला सा चेहरा थे. जो जनाई तक नहीं देते.
मैं कहता हूं एक पूरे दौर के लड़कों को अच्छे से कुरेदिए. वो बताएंगे उन्हें इमरान हाशमी पसंद है. इसलिए नहीं कि उसकी फिल्मों में देह दर्शन होता था. या वो किस करता दिखता था. वो उनकी तरह का था. बहुत स्पेशल नहीं, गलतियां करने वाला बदतमीज. आवारापन के शिवम की तरह जो एक रोज़ एक रौ में मलिक को गोली मार मर जाएं. मुक्त हो जाएं. लड़के बीच सड़क पर सुन्दर सा टॉप पहने सोनल चौहान की कैब रुकवाकर प्रपोज करना चाहते थे. लेकिन गर्लफ्रेंड तो थी नहीं. सो ये दुआ करते कि भले अंगूठी उठाते हुए गोली खाकर मर जाने सी नियति हो. पर जीवन में प्रेम आए.
https://www.youtube.com/watch?v=bR-6AYyVyF4
शाहरुख अपनी उम्र के रास्ते पर बढ़ गए थे. सलमान के साथ कंट्रोवर्सीज थी. अक्षय सिंह इज किंग में बिजी थे. आमिर क्या कर रहे थे? उस काल में इमरान हाशमी गैंगस्टर, अक्सर, द ट्रेन,तुम मिले और क्रुक कर रहे थे. मजाक में कहा जाता है, इमरान को क्या जरूरत है कमाने की? आधे पैसे तो फिल्म के गानों की कमाई से हो जाती है.
https://www.youtube.com/watch?v=7CbQxyftNo4
इस हीरो ने खुद वो जगह बना ली जिसके बाद इसकी फोटो पर लड़के फिल्म के डायलॉग लिखने लगे.
इमरान कंट्रोवर्सेज में कम ही रहते हैं. धर्म हर जगह उछल आता है. धर्म इमरान हाशमी के पिता मुस्लिम और मां ईसाई हैं. इस बात का हमें और आपको कोई फर्क नहीं पड़ता पर अगली बात पर पड़ा. 2009 में इमरान ने दावा किया था कि मुंबई के एक पॉश इलाके पाली हिल में हाउसिंग सोसाइटी ने उनको घर देने से मना कर दिया था. वजह बताई कि वो मुसलमान है. इसे इसी बॉलीवुड के कोट-अनकोट में 'बड़े सितारों' ने पब्लिसिटी स्टंट बता दिया था. बाद में हुआ ये भी कि इमरान अपने आरोप से पीछे हट गए थे. एक दफा एक शो में रैपिड राउंड के दौरान इमरान ने ऐश्वर्या प्लास्टिक सा कुछ कह दिया था. बाद में नतीज़ा ये निकला कि स्क्रिप्ट पसंद होने की बाद भी ऐश्वर्या राय ने इमरान हाशमी के साथ एक फिल्म करने से इंकार कर दिया. ऐसी दो-एक बातों को किनारे करें तो वो और किसी बवाल में न फंसे.
एक बार जरुर वो सुट्ट हो गए थे. चार साल पहले 2013 की बात है. तारीख थी 19 अप्रैल. ये वो समय था जब इमरान 'एक थी डायन' में बिजी थे. अपने कुछ दोस्तों को 'एक थी डायन' दिखा रहे थे. तभी एक लड़की उनके घर के सामने आ पहुंची. हंगामा मचाने लगी. पता लगा कि लड़की का नाम रश्मि है. उसका कहना है कि इमरान हाशमी और वो लंबे समय से साथ हैं. बस इमरान उनसे शादी करने को तैयार नहीं होते. बाद में जांच-पड़ताल में बातें झूठी निकलीं. कुछ न होना था कुछ न हुआ. जो बातें आईं थीं, लड़की के दिमाग का फितूर निकली.
जाते-जाते इमरान की ज़िंदगी का एक किस्सा सुनिए. 11 मार्च 2016 को उनकी मां गुजर जाती हैं. इमरान तब अज़हर फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. उस सदमे के वक़्त वो फिल्म की शूटिंग एक दिन के लिए रोक देते हैं. पर बहत जल्द लौट आते हैं. ताकि फिल्म फिर शूट कर सकें. इमरान बनें रहें. वो जरूरी हैं. बधाइयां!
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इमरान का पूरा नाम इमरान अनवर हाशमी है. एक रोज़ इमरान ने सोचा नाम बदलते हैं. इमरान ने अपना नाम बदलकर फरहान हाशमी रख लिया. फिर बाद में वही नाम हो गया. जमा नहीं था. बस अनवर हटा रहा. इमरान फिल्मों में आए कैसे? 2001 में 'ये जिंदगी का सफर' नाम की फिल्म के साथ डेब्यू करने वाले थे, लेकिन बाद में फिल्म मेकर ने उन्हें फिल्म से निकाल दिया. जो तब होना था, तीन साल बाद हुआ. इमरान हाशमी की पहली पिक्चर फुटपाथ हुई. जब वो फिल्म परदे पर उतरी तो कैलेंडर पर साल 2003 चल रहा था.
14 साल के फिल्मी करियर में इमरान ने अब तक उंगलियों पर गिने जाने लायक फिल्में ही की हैं. लगभग 35. लेकिन याद करने जाएं तो आपको वो इमरान हाशमी याद आता है. मर्डर का सन्नी याद आता है, जिससे मिलने के बाद लौटती मल्लिका सारी राह रोती और फ्लैशबैक में जाती रहती हैं. इमरान बॉलीवुड में हमेशा से थे. जब कुणाल खेमू कलयुग कर रहे थे तब भी. जब इरफ़ान चॉकलेट कर रहे थे तब भी. निशा कोठारी द किलर में आएं, सयाली भगत आएं या गीता बसरा आएं, इमरान ने द किलर से द ट्रेन के समय में सबको आते देखा और अब सबका घर बसते देख रहे हैं. बस वो थे और हैं. जो चश्मे के पार से विद्या बालन को घूरता है. उससे जलता है. पर उसे पनपने के मौके देता है. एक बात याद रखें. मैं इंटरटेनमेंट हूं कहकर भले विद्या महफ़िल लूट ले गईं. उसके पहले तीन दफा इंटरटेनमेंट इमरान ने ही कहा था. वो उदास नायिका को मौत से बचाने के लिए दौड़ता है. तो दूसरी तरह हीरोइन की बसी बसाई गृहस्थी में आग भी लगाता है. वो कहानियां सुनाता है, जादू दिखाता है तो छिपकली के आड़े खुद डरकर आपको भी डराता है. वो ऑस्ट्रेलिया में टैक्सी चलाता है तो भुच्च सड़कछाप होकर बंदूकें भी बेचता है.
अब की राज़ रीबूट याद कीजिए. वो राज़ से अब के नहीं जुड़े हैं. न तब जब वो कंगना के पीछे जाते हैं. और पेंटिंग बनाते थे. इमरान ने 2002 में राज फिल्म के सेट पर बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर भी काम किया था. तब जब डीनो मोरिया ऊंचे गले के स्वेटर पहन बर्फ में लाशें गाड़ते थे.
इमरान का एक बेटा भी है. क्यूट अगर कहते हैं तो ऐसे ही बालकों को कहते होंगे. इमरान ने अपने और अपने बेटे की लाइफ पर किताब भी लिखी है. जिसका नाम kiss of life है. इस किस का उस किस से कतई वास्ता नहीं है जो हमने इमरान को फिल्मों में कई-कई बार करते देखा है. किताब उनके बेटे की कहानी थी, अयान की कैंसर से जंग और उस पर जीत का किस्सा. इस किताब में इमरान की ज़िंदगी भी थी. कॉलेज, स्कूल के दिनों की बातें दादी-पापा और बाकी परिवार वालों की बातें भी समेटी थीं.
बात क्रुक की, जिसमें इमरान हाशमी ने इंडिया के उचक्के का रोल किया. जो गलत तरीके से ऑस्ट्रेलिया जाता है. कुछ लोगों के लिए बुरा बनता है. कुछ से प्रेम पाता है, उन्हें धोखा देता है. वो विश्वास करने योग्य नहीं है, लेकिन अंत में वो सब ठीक कर देता है. इमरान की छवि ऐसी ही दिखाई जाती है फिल्मों में. वो इस सदी की शुरुआत में बॉलीवुड में आए थे. तब न प्रेम कथाएं बन रहीं थी. न विज्ञान फंतासी, आर्ट फिल्में करने वालों के अलग ठीहे हैं. फिल्में छल पर बन रहीं थीं. सेक्स को उड़ेलने के प्रयास चल रहे थे, हीरो अब थोड़ा बुरा हो सकता था, स्क्रीन पर देहातन कर सकता था. परस्त्रीगमन कर सकता था. राजश्री वाला हीरो होना जरूरी नहीं था. ये लड़का वैसा ही था. आशिक बनाया आपने, अक्सर, मर्डर वाला. वो अपनी सलूहियत से बुरा हो सकता था. और उम्मीद की जाती थी कि दर्शक इसका बुरा न मानेगा.
https://www.youtube.com/watch?v=vnlk8V-q0oU
एक फिल्म और थी. आवारापन. एक कोरियन फिल्म से उठाया कच्चा माल था. मुझे नहीं पता कि इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कैसा परफॉर्म किया. जानने-मानने वाले इस फिल्म को कैसी मानते हैं. पर 2007 में आई इस फिल्म को कस्बों से शहर में हमने 2010 तक सुना है. वो समय जब एफएम रेडियो पर आरजे प्रेमगुरु बन बैठते थे. कॉलेज की किताबों के बीच इस फिल्म के गाने हमारे बुकमार्क होते. हर समय की एक गंध होती है. हर समय की एक ध्वनि होती है. उसी तरह हर समय का अपना कोलाहल होता है. उस कोलाहल के बीच हमें कुछ गाने अपने से सुनाई देते. जो ब्लूटूथ डिवाइसेज से बांटे जाते. इमरान हाशमी की फिल्में सुलभ थीं, समझ आती थीं. हमें अच्छी लगतीं. इमरान हाशमी उस समय का धुंधला सा चेहरा थे. जो जनाई तक नहीं देते.
मैं कहता हूं एक पूरे दौर के लड़कों को अच्छे से कुरेदिए. वो बताएंगे उन्हें इमरान हाशमी पसंद है. इसलिए नहीं कि उसकी फिल्मों में देह दर्शन होता था. या वो किस करता दिखता था. वो उनकी तरह का था. बहुत स्पेशल नहीं, गलतियां करने वाला बदतमीज. आवारापन के शिवम की तरह जो एक रोज़ एक रौ में मलिक को गोली मार मर जाएं. मुक्त हो जाएं. लड़के बीच सड़क पर सुन्दर सा टॉप पहने सोनल चौहान की कैब रुकवाकर प्रपोज करना चाहते थे. लेकिन गर्लफ्रेंड तो थी नहीं. सो ये दुआ करते कि भले अंगूठी उठाते हुए गोली खाकर मर जाने सी नियति हो. पर जीवन में प्रेम आए.
https://www.youtube.com/watch?v=bR-6AYyVyF4
शाहरुख अपनी उम्र के रास्ते पर बढ़ गए थे. सलमान के साथ कंट्रोवर्सीज थी. अक्षय सिंह इज किंग में बिजी थे. आमिर क्या कर रहे थे? उस काल में इमरान हाशमी गैंगस्टर, अक्सर, द ट्रेन,तुम मिले और क्रुक कर रहे थे. मजाक में कहा जाता है, इमरान को क्या जरूरत है कमाने की? आधे पैसे तो फिल्म के गानों की कमाई से हो जाती है.
https://www.youtube.com/watch?v=7CbQxyftNo4
इस हीरो ने खुद वो जगह बना ली जिसके बाद इसकी फोटो पर लड़के फिल्म के डायलॉग लिखने लगे.
इमरान कंट्रोवर्सेज में कम ही रहते हैं. धर्म हर जगह उछल आता है. धर्म इमरान हाशमी के पिता मुस्लिम और मां ईसाई हैं. इस बात का हमें और आपको कोई फर्क नहीं पड़ता पर अगली बात पर पड़ा. 2009 में इमरान ने दावा किया था कि मुंबई के एक पॉश इलाके पाली हिल में हाउसिंग सोसाइटी ने उनको घर देने से मना कर दिया था. वजह बताई कि वो मुसलमान है. इसे इसी बॉलीवुड के कोट-अनकोट में 'बड़े सितारों' ने पब्लिसिटी स्टंट बता दिया था. बाद में हुआ ये भी कि इमरान अपने आरोप से पीछे हट गए थे. एक दफा एक शो में रैपिड राउंड के दौरान इमरान ने ऐश्वर्या प्लास्टिक सा कुछ कह दिया था. बाद में नतीज़ा ये निकला कि स्क्रिप्ट पसंद होने की बाद भी ऐश्वर्या राय ने इमरान हाशमी के साथ एक फिल्म करने से इंकार कर दिया. ऐसी दो-एक बातों को किनारे करें तो वो और किसी बवाल में न फंसे.
एक बार जरुर वो सुट्ट हो गए थे. चार साल पहले 2013 की बात है. तारीख थी 19 अप्रैल. ये वो समय था जब इमरान 'एक थी डायन' में बिजी थे. अपने कुछ दोस्तों को 'एक थी डायन' दिखा रहे थे. तभी एक लड़की उनके घर के सामने आ पहुंची. हंगामा मचाने लगी. पता लगा कि लड़की का नाम रश्मि है. उसका कहना है कि इमरान हाशमी और वो लंबे समय से साथ हैं. बस इमरान उनसे शादी करने को तैयार नहीं होते. बाद में जांच-पड़ताल में बातें झूठी निकलीं. कुछ न होना था कुछ न हुआ. जो बातें आईं थीं, लड़की के दिमाग का फितूर निकली.
जाते-जाते इमरान की ज़िंदगी का एक किस्सा सुनिए. 11 मार्च 2016 को उनकी मां गुजर जाती हैं. इमरान तब अज़हर फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. उस सदमे के वक़्त वो फिल्म की शूटिंग एक दिन के लिए रोक देते हैं. पर बहत जल्द लौट आते हैं. ताकि फिल्म फिर शूट कर सकें. इमरान बनें रहें. वो जरूरी हैं. बधाइयां!
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