एल क्लासिको – स्पेनिश भाषा के ये दो शब्द जैसे ही साथ आते हैं, दुनिया भर केफुटबॉल प्रेमी बावरे हो जाते हैं. स्पेन के क्लब रिअल माद्रिद और फुटबॉल क्लब डीबार्सिलोना के बीच होने वाले मैच को एल क्लासिको कहा जाता है. अर्जेंटाइन फुटबॉल सेनिकले स्पेनिश शब्द क्लासिको का मतलब होता है चिरप्रतिष्ठित और एल स्पानी मेंअंग्रेज़ी के द की तरह है जैसे द लल्लनटॉप. स्पेन के 2 क्लबों का मैच कैसे दुनियाका सबसे बड़ा मैच बन गया इसकी कहानी में राजनीति, सज़ा-ए-मौत, देशभक्ति, पहचान कीलड़ाई सब कुछ है. किसी भी खेल में कोई भी मैच ऐसा नहीं जो इसके आसपास आ सके. यहांतक की दूसरे क्लबों के प्रशंसक भी इनमें से किसी एक टीम के फैन ज़रूर होते हैं.पिछले 20 सालों में कोई भी ऐसा खिलाड़ी नहीं है जिसने फिफा प्लेयर ऑफ द इयर काखिताब जीता है और इन दोनों में से किसी एक क्लब के लिए न खेला हो. दोनों टीमें जबखेलती हैं तो जंग होती है. स्पेन की अखंड़ता दर्शाने वाले क्लब माद्रिद और आज़ादीचाहने वाले, अपने को स्पेन से अलग समझने वाले कातालुन्या के शहर बार्सिलोना के बीच.इस साख की लड़ाई में देखने को मिलती है सबसे बेहतरीन फुटबॉल.जंग-ए-आज़ादी, सज़ा-ए-मौत और फुटबॉलफुटबॉल क्लब डी बार्सिलोना या एफसीबी की स्थापना 1899 में योआन गैम्पर ने विदेशीखिलाड़ियों को जोड़-तोड़कर की थी. बार्सिलोना कातालुन्या राज्य की राजधानी है और येराज्य स्पेन से आज़ाद होना चाहता है. वही रिअल माद्रिद की स्थापना 1902 में की गईथी. यह शहर स्पेन और स्पानी राष्ट्रवादियों के दिलों में बसता है. 1902 में स्पेनके राजा एलफोंज़ो त्रयोदश ने माद्रिद में एक टूर्नामेंट का आयोजन करवाया था. इसटूर्नामेंट में बार्सिलोना और बास्क क्षेत्र के क्लब विज़्काया दोनों को बुलायागया. बास्क लोग भी अपना अलग देश बनाने के लिए स्पानी सरकारों से खूनी संघर्ष करचुके हैं. इस आमंत्रण टूर्नामेंट में बार्सिलोना ने रिअल माद्रिद को हरा दिया लेकिनफाइनल में बास्क से हार गए. फाइनल में बास्क और कातालन टीम, दो स्पानी राष्ट्रवादसे लड़ रही टीमों के जाने से टूर्नामेंट आयोजित करवाने वालों ने तीसरे स्थान के लिएएक मैच और करवा दिया. और वो मैच बना पहला एल क्लासिको. इस मैच के कई सालों बाद तकऐसे ही टूर्नामेंट होते रहे और 1929 में स्पेनिश प्रीमियरा ला लीगा की शुरूआत हुईइसमें बार्सिलोना समेत 10 टीमें थीं.30 के दशक में स्पानी सरकार के लिए बार्सिलोना क्लब कातालन राष्ट्रवाद का प्रतीक बनगया. मिलिट्री जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको ने स्पेन की राजशाही का तख्तापलट कर दियाऔर गृह युद्ध छिड़ गया. 1936 में फ्रांसिस्को फ्रांको ने आज़ादी चाहने वालेकातालुन्या के क्लब बार्सिलोना के अध्यक्ष जोसेप सुन्योल को बिना किसी मुकदमे केगिरफ्तार कर मरवा डाला. अब ये मैच और भी तनावपूर्ण होने लगा था.दोनों टीमों के बीच शायद ही कोई एकतरफा मैच हुआ हो. 1943 में विश्व युद्ध -2 केदौरान दोनों टीमों में कोपा डेल रे का मैच अब तक का सबसे एकतरफा मैच रहा है. इस मैचमें रिअल ने बार्सिलोना को 11-1 से हरा दिया. मैच से पहले फ्रांको सरकार के आंतरिकसुरक्षा के डायरेक्टर ने रिअल के खिलाड़ियों से मुलाकात कर के बताया कि आप लोग शासनके लिए खेल रहे हैं. इस मैच के परिणाम को फ्रांको की स्पेन के ऊपर पकड़ के तौर परदिखाया गया. बार्सिलोना क्लब को अपना नाम बदलने और लोगो में से कातालन झंड़ा हटादेने के लिए मज़बूर किया गया. इस बुरे दौर में बार्सिलोना का नारा बना ‘मे क्यूइयून क्लब’ यानी हम सिर्फ एक क्लब नहीं हैं और बार्सिलोना ने 40 के दशक में कई बारखिताब जीते.अल्फ्रेदो दी स्तेफानो के साथ रोनाल्डो. रिअल माद्रिद के दो सुपर स्टार दोनों क्लबों में हर कीमत पर दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों को अपने साथजोड़ने की रस्साकस्सी रहती है. 1953 में दोनों क्लबों में अर्जेंटीनी खिलाड़ीअल्फ्रेदो दी स्तेफानों को अपने साथ जोड़ने की होड़ मच गई. दी स्तेफानो को आज भीसबसे महान फुटबॉलर माना जाता है. दी स्तेफानो उन दिनों अर्जेंटाइन टीम रिवर प्लेटसे कोलंबिया की टीम लॉस मिलिनारिओस चले गए थे. स्तीफानो के लिए इधर बार्सिलोना नेरिवर प्लेट के साथ डील कर ली उधर रिअल ने स्तीफानो को लॉस मिलिआनारिओस से खरीदलिया. दोनों में कानूनी लड़ाई चली और आखिरकार दी स्तेफानो मिले रिअल माद्रिद को.स्तीफानो के आने के बाद लंबे समय तक रिअल माद्रिद का राज चला. इस दौर में 1953-64तक रिअल ने 8 ला लीगा, एक कोपा डेल रे और 5 यूरोपियन कप खिताब जीते.बार्सिलोना और कातालुन्या की आज़ादी का एक रंग हैवक्त गुज़रने के साथ, दोनों टीमों के खेल में अंतर आया. रिअल माद्रिद का झुकावदुनिया भर से प्रतिभाओं को खरीदने पर रहा और बार्सिलोना ने अपने घर में प्रतिभाओंको तैयार किया. टोटल फुटबॉल के देश नीदरलैंड से योहान क्रायूफ को रिकॉर्ड 20 लाखडॉलर में साइन करके बार्सिलोना वालों ने 1960 के बाद पहली बार ला लीगा का खिताबजीता. टोटल फुटबॉल का मतलब होता है कोई भी खिलाड़ी किसी भी पोजीशन पर खेले और सारीपोजीशन भरी रहे. न किसी डिफेंडर को डिफेंडर होने की बंदिश और न मिडफील्डर आधे पालेमें रहना ज़रूरी है. योहान क्रायूफ जब बार्सा के कोच बने तो इन्होंने फुटबॉल की एकनई शैली बना दी जिसे टीका-टाका कहा जाता है. छोटे-छोटे पासों के ज़रिए विरोधी टीमके खिलाड़ियों के बीच से गैप बना-बनाकर गेंद को गोल तक पहुंचना. इस टीकी-टाका के दमपर ही स्पेनिश टीम ने पिछले कुछ सालों में इतनी कामयाबी पाई है. हमारी हिन्दुस्तानीहॉकी की भी यही शैली थी लेकिन एस्ट्रोटर्फ आने के बाद 1976 से वो खेल धीरे-धीरेखत्म हो गया.करीब उसी समय 1975 में फ्रांको की मौत के बाद स्पेन की राजनीति में स्थिरता आईलेकिन दोनों टीमों की राइवलरी बढ़ती ही चली गई. धीरे-धीरे दोनों टीमों के मुकाबलोंके आगे बाकी टीमों के मैच नीरस पड़ने लगे. रिअल माद्रिद और बार्सिलोना दोनों टीमेंस्पेनिश फुटबॉल की पहचान बन गईं. आमतौर पर ये दो टीमें ही स्पेनिश लीग प्रीमियरा लालीगा जीतने लगीं. फिर आया वो दौर जब ये क्लब किसी भी फुटबॉल खिलाड़ी के लिए ड्रीमटीम बन गए. स्टीवन जेराड जैसे एकाध खिलाड़ी को छोड़कर फुटबॉल के सारे आधुनिक सितारेइन दोनों में से किसी एक टीम में ज़रूर खेले हैं. इन टीमों के कोचों को 5 साल केबच्चे में भी प्रतिभा दिखे तो साइन कर लेते हैं.फुटबॉल और राजनीति की मिलावट नहीं होनी चाहिए लेकिन इस मैच में ये होकर ही रहता है.मैच चाहें रिअल माद्रिद के हॉम ग्राउंड एस्तादियो सांतियागो ब्रनबू में हो या अपनेघर कैंप नू में, बार्सिलोना के सपोर्टर कातालन आज़ादी के झंड़े दिखाते हैं औरफुटबॉल संघ वाले ज़ुर्माना लगाते रहते हैं. 9 नबंवर 2014 को स्पेन के कातालुन्यामें आजादी के लिए सांकेतिक मतदान भी हुआ था. आज़ादी अभी नहीं मिली है लेकिन इस मैचको जीतकर बार्सिलोना और कातालुन्या के लोग आज़ादी महसूस करते हैं. रिअल की जीतस्पेनिश अखंडता की जीत होती है. और स्पेन में अभी भी फ्रांसिस्को फ्रांको के समर्थकहैं जो चाहें किसी भी शहर में क्यों न हों रिअल के कट्टर समर्थक होते हैं.मारकाट से बेहतर अगर फुटबॉल के मैदान पर ही फैसला होता रहे तो अच्छा है. वैसे अगरकातालुन्या अलग देश बनता है तो बार्सिलोना और रिअल माद्रिद अलग-2 देशों में खेलेंगेऔर फिर सिर्फ यूरोपियन मुकाबलों में ही आपस में भिड़ेंगे.हमारी फुटबॉल भी ऐसी बन सकती थीहमारे यहां मोहन बागान और ईस्ट बंगाल की आपसी प्रतिद्वंद्विता ऐसी ही रही है. मोहनबागान रिअल माद्रिद और बार्सिलोना से भी पहले बना था. बंगाल विभाजन के बाद दोनोंक्लबों की होड़ शुरू हुई थी. मोहन बागान - ईस्ट बंगाल के मैच ने सबसे ज्यादा दर्शकजुटाने का रिकॉर्ड कई बार बनाया है. बंग-विभाजन के दौरान आज के बांग्लादेश से आएहिंदु ईस्ट बंगाल के सपोर्टर थे और पहले से रहने वाले बंगाली हिंदु मोहन बागान केसपोर्टर थे. मुस्लिम फैन बेस के साथ मोहम्मडन सपोर्टिंग अलग से क्लब था. मोहन बागानके जीतने पर कोलकाता में हिल्सा और ईस्ट बंगाल के जीतने पर प्रॉन मछली के दाम आसमानछूने लगते थे. मज़े की बात ये कि इंग्लिश टीमों के साथ मुकाबलों में ये क्लब एक होजाते थे. लेकिन उस राइवलरी को ये क्लब भुना नहीं पाए, वक्त के साथ बदल नहीं पाए औरटीवी आने के बाद पूरे भारत पर यूरोपियन फुटबॉल छा गई और ये क्लब ग्लोबल तो दूरराष्ट्रीय भी नहीं हो पाए. हालांकि अभी भी ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के मैच देखनेके लिए 80 हज़ार तक लोग आ जाते हैं और ये दोनों आपस में खेलती हैं तो ऐसा लगता हैजैसे हम यूरोपियन टीमों को खेलते हुए देख रहे हैं.