तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान मृतक में भी डाल देगी जान धूली-धूसर तुम्हारे ये गातछोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात परस पाकर तुम्हारी ही प्राण, पिघलकरजल बन गया होगा कठिन पाषाण छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल बांस थाकि बबूल? तुम मुझे पाए नहीं पहचान? देखते ही रहोगे अनिमेष! थक गए हो? आंख लूं मैंफेर? क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार? यदि तुम्हारी मां न माध्यम बनी होतीआज मैं न सकता देख मैं न पाता जान तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान धन्य तुम, मां भीतुम्हारी धन्य! चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य! इस अतिथि से प्रिय क्या रहातम्हारा संपर्क उंगलियां मां की कराती रही मधुपर्क देखते तुम इधर कनखी मार और होतींजब कि आंखें चार तब तुम्हारी दंतुरित मुस्कान लगती बड़ी ही छविमान! - और साहित्यअकादमी के खजाने से निकला ये वीडियो भी देख लीजिए.https://www.youtube.com/watch?v=InjD9lNkLRI