एक कविता रोज: 'अब बेअदब हो रही हैं आवाजें'
पढ़िए सौम्या बैजल की दो कविताएं.
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फोटो - thelallantop
सौम्या बैजल युवा कवि और लेखिका हैं. हिंदी साहित्य की प्रभावशाली दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही हैं. सौम्या आतिश थिएटर सोसाइटी के निर्माताओं में से एक हैं, कत्थक सीख रही हैं, और विज्ञापन की दुनिया में पिछले 10 साल से काम कर रही हैं. आवाज़ें
चलो रोको, दबाओ, बंद करो यह आवाज़ें जो चीखने, बोलने, उठने को अमागर है चलो तोड़ो, काटो, जलाओ, यह हिम्मत, जो जीतने को झुझारू है. नहीं बोल सकती यह आवाज़ें, नहीं मांग सकती यह हक़ नहीं रह सकती यह आवाज़ें आज़ाद और अब. देखो रुक नहीं रही हैं आवाज़ें क्यों रुक नहीं रही आवाज़ें? रास्ते तो बंद किये थे हमने, फिर सुनी कैसे जा रही है यह आवाज़ें? देखो गूँज उठी हैं आवाज़ें, बुलंद हो रही हैं, तुम्हारे दबाव के कंबल को, चीर कर निकल रही हैं हथकड़ियां तोड़ रही हैं आवाज़ें, दिमागों में गूँज रही हैं तुम्हारे मज़हबी किले में अब घर कर रही है बेअदब हो रही हैं आवाज़ें, भस्म कर चुकी हैं दायरों को, पितृसत्ता के अब शासन गिरा रही हैं हर पल वो हवाओं से मिली हैं आवाज़ें दूर तलक जाएंगी मिल रही हैं आवाज़ें ज़हन में उतर जायेंगी आवाम की हैं यह आवाज़ें सुनी तो अब जाएंगी कब तक चुप कराओगे इन्हें, तुम्हे हरा कर ही जायेगीं ग़लती न करो हमें दबाने की, ज्वालामुखी फट जाएगा मिल रही अब हैं यह आवाज़ें, तुम्हे मिटा कर जाएंगी. ***उलझनें
कभी कल में, कभी आज में, कभी इसी सोच में, की कौन से कल में , उलझनें कभी ख़ुशी ढूंढते हुए खुद में, या दूसरों में कभी खुद को ढूंढते हुए खुद में या दूसरों में उलझनें कभी अपने ही गुमान में एक बेबसी की चादर से ढंके हुए जिसका सिरा खुद के ही हाथ में है उस हाथ की ओर नज़र न जाने देने वाली उलझनें कभी लालच कभी लालसा कभी कायरता कभी हौसला कभी रास्ता कभी रेखा कभी बोल कभी सन्नाटा उलझनें कभी लोग कभी खुद कभी सोच कभी वक़्त कभी सही कभी ग़लत कभी सही को ही ग़लत उलझनें कभी हमेशा से, कभी आज की कभी छोटी, कभी बड़ी कभी इंसान की, कभी आवाम की कभी बातों की, कभी सोच की उलझनें कभी पशु कभी मानुस कभी पक्ष कभी विपक्ष कभी हरा कभी भगवा कभी सहायता कभी हिंसा उलझनें कभी तुम कभी हम कभी यहां कभी वहाँ कभी गाय कभी सुअर कभी गोली कभी पत्थर उलझनें कभी और उलझती हुई कभी सुलझती हुई भी और उलझती हुई भी कभी दूसरों को सुलझता देख, और भी उलझती हुई उलझनें कभी औरों को सुलझाने चलीं कभी खुद का सिरा पकड़ने कभी उलझते हुए सिरा खो देने वाली कभी दोबारा मिलती हुई उलझनें चलती फिरती, हंसती-खेलतीं रोज़ शाम मिलने वाली तकिए पर सर रखते ही साँसों को रोकने वाली उलझनें सुलझने के इंतज़ार में उँगलियों के इंतज़ार में फैसलों के इंतज़ार में बातों के इंतज़ार में उलझनेंएक कविता रोज सिरीज की और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने 'एक कविता रोज' टैग पर क्लिक करिए.

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