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एक कविता रोज: 'घर में अब भी सिलबट्टे पर मसाला पिसता था'

आज पढ़िए पंखुरी सिन्हा की कविताएं.

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17 नवंबर 2016 (Updated: 17 नवंबर 2016, 12:16 PM IST)
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pankhuri sinhaपंखुरी राइटर और कवि हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर पुणे से पत्रकारिता पढ़ी. फिर चली गईं परदेस और वहां से एमए कर आईं. हिंदी और अंग्रेजी, दोनों में लिखती हैं. और ढेर सारी मैगजीनों में छपती रही हैं. आज पढ़िए इनकी कविताएं 'प्रेशर कुकर' पर.

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प्रेशर कुकर इन दिनों पुराना पसंदीदा इश्तहार था जो बीवी से सचमुच करें प्यार वो शादी से कैसे करें इंकार कुछ टेढ़ा सा राजनैतिक घुमाव लिए प्रेमी युगल इधर कुछ दिनों से अगर साथ नहीं रह रहे तो अक्सर खाने पर मिल रहे हैं घर भी खाने पर लेकिन हमेशा ही इनके रिश्ते के तात्कालिक तापमान पर बोलने वाला नियंत्रण की भी विधियां बताने वाला ये व्यक्ति कौन है ?

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ये बोस्टन मैराथन बॉम्बिंग के आस पास के बात है कैनाडा के किसी प्रदेश में प्रान्त में और याद रहे कि कनाडा के उत्तरी प्रदेश बहुत ही बर्फीले ठंढे, लगभग अनबसे प्रांत हैं उन लोगों के प्रांत जो यहां के मूल निवासी रहे हैं जो शब्द ही अपने आप में एक बड़ी राजनैतिक लड़ाइ है और जिसे शायद ही कोई सुलझा रहा है दुनिया के किसी भी बसाये हुए देश में लेकिन कनाडा का वह एक फ्रेंच भाषा भाषी प्रान्त जहाँ अलगाव को लेकर हज़ार मतदान हो चुके हैं और अभी हाल ही में एक वृद्धाश्रम में आग की एक भयानक दुर्घटना सबके दिल दहलाती घटी थी शायद वहीँ पकड़े गए थे कुछ जिहादी कुछ आतंकी और जैसा कि ये लोग करते हैं घरेलू बम बनाकर चलाते हैं इस बार बना रहे थे प्रेशर कुकर में प्रेशर कुकर तब तक स्मृतियों में धरोहर सी एक चीज़ बन गया था उसमे पकने वाला मांस ज़िंदा भेड़ बकरों में तब्दील दूर पहाड़ों पर घूमने वाला आज़ाद जानवर

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काफी रूमानी किस्म की विधियाँ पकाई जा चुकी थीं तब तक प्रेशर कुकर में ये लगभग किशोरावस्था में पाक कला के उत्साह भरे दिन थे और एक नवोदित मित्र जिनका पदार्पण मेरी ज़िन्दगी और घर में भी नया लेकिन पुख्ता था मुर्गे अथवा मुर्गी को बोतल की सॉस के साथ कुकर में सीटी लगवा चुके थे और मैगी समेत विदेशी तर्ज़ के खाने जहाँ सबको लुभा रहे थे लुभा रही थीं ढाबों सी खुली नयी, नयी दुकानें भी घर में अब भी सिल बट्टे पर मसाला पिसता था द्वैत और अद्वैत पर निबंध लिखने के होमवर्क कॉलेज में मिलते थे एक प्रेम मैंने उसी वक़्त तोड़ा था और ज़िन्दगी तभी से जीवन शैलियों की राजनीति का अखाड़ा बन गयी थी
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