15 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 22 जनवरी 2021, 09:53 AM IST)
एक कविता रोज़ में पढ़िए सत्यार्थ की कविता.
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एक कविता रोज़ में आज पढ़िए सत्यार्थ की कविता. सत्यार्थ पेशे से भारतीय पुलिस सेवा में हैं लेकिन उनकी जड़ें आज भी हिंदी से फलती-फूलती हैं. कवितायें लिखने के साथ-साथ पढ़ते भी खूब हैं. आज एक कविता रोज़ में सुनते हैं उनकी कविता 'नदी का जन्म'. ये कविता नदी के कंधे पर बन्दूक रखकर वो गोली चलने का प्रयास करती है, जिससे शायद हम सब चोटिल हैं. आइये पढ़ते हैं उनकी कविता -
नदी का जन्म
सत्यार्थ
नदी का जन्म
किसी दुख से नहीं हुआ था
न पृथ्वी का
वे जन्म के बाद के दुख ढो रही हैं
पहले वे पेट में दबाए चलती रहीं
बहती रहीं
उन्हें कोई रास्ता नहीं समझ आया
वे घूमती भटकती रहीं
उन्हें लगा दो पल मिले तो
सुस्ता कर सोच पाएं
कोई और मार्ग
लेकिन ऐसा नहीं हुआ
रात के साथ सूर्य चला गया
सुबह के साथ चन्द्रमा
शुक्र का तारा जब चाहा
- आया और गया
लेकिन वे कोई समय न पा सकीं
उतना भी नहीं जितना दफ़्तर का कोई छोटा कर्मचारी पा लेता है
और इस तरह वे रवाँ रहीं
अनवरत
शाश्वत सी
और तब उनके दुख भी--
साथ ही साथ
शाश्वत.